The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Happy Birthday Mobile Phone: The 1973 Call That Cut the Wires and Changed the World Forever

जब सवा किलो की 'ईंट' से हुई थी पहली कॉल और सामने वाले की बोलती बंद हो गई थी!

Mobile Phone Birthday: 3 अप्रैल 1973 को मार्टिन कूपर ने दुनिया की पहली मोबाइल कॉल करके लैंडलाइन की गुलामी तोड़ी. लेकिन उसी दिन से इंसान मोबाइल का गुलाम भी बन गया. जानिए पहली कॉल, पहली 'ईंट' जैसे फोन और मोबाइल क्रांति की पूरी कहानी.

Advertisement
pic
3 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 05:27 PM IST)
Mobile Phone Birthday
मोबाइल फोन का हैप्पी बर्थडे
Quick AI Highlights
Click here to view more

कल्पना कीजिए आप टॉयलेट में बैठे हैं और हाथ में फोन नहीं है. अब बताइए. सांसें तेज हो गई न? दिल में हल्की सी घबराहट भी आ गई होगी. ऐसा लग रहा होगा जैसे कोई जरूरी मैसेज छूट गया, कोई मीम बिना देखे निकल गया, या फिर इंस्टाग्राम ने कोई नई रील बना दी और आप उस ऐतिहासिक पल में मौजूद नहीं थे.

आज मोबाइल फोन सिर्फ एक डिवाइस नहीं है. ये हमारी जेब में रहने वाला छोटा सा संसार है. इसमें दोस्त हैं, दुश्मन हैं, प्यार है, ब्रेकअप है, बैंक है, ऑफिस है, और हां, वो सारे रिश्तेदार भी हैं जो साल में दो बार फोन करते हैं और बाकी समय व्हाट्सएप पर "गुड मॉर्निंग" भेजकर अपना सामाजिक धर्म निभा देते हैं.

लेकिन यही फोन, जिसे हम आज अपने शरीर का एक्सटेंशन मान चुके हैं, इसकी पहली सांस 3 अप्रैल 1973 को ली गई थी. न्यूयॉर्क की एक सड़क पर, एक आदमी ने सवा किलो की एक ईंट जैसी चीज कान से लगाई और दुनिया की पहली मोबाइल कॉल कर दी. उस दिन दुनिया ने पहली बार देखा कि फोन अब दीवार की खूंटी पर लटका गुलाम नहीं रहेगा.

मजेदार बात ये कि उस आदमी ने पहली कॉल अपने दोस्त को नहीं की थी. ‘ब्रिटानिका’ (Britannica) की ‘हिस्ट्री ऑफ मोबाइल कम्युनिकेशन’ (History of Mobile Communications) रिपोर्ट के मुताबिक उसने कॉल किया था अपने सबसे बड़े कॉम्पिटिटर को. यानी दुश्मन को. ताकि सामने वाला समझ जाए कि भाई अब गेम बदल चुका है.

यही कहानी है मोबाइल फोन की पहली चीख की. और उसी चीख से शुरू हुआ वो शोर, जो आज हमारी जिंदगी में हर सेकेंड बजता रहता है.

1973 का न्यूयॉर्क: छठी एवेन्यू पर एक आदमी और हाथ में 'एलियन वाली ईंट'

अब जरा 1973 में चलिए. न्यूयॉर्क की छठी एवेन्यू (6th Avenue). दोपहर का वक्त. लोग ऑफिस जा रहे हैं. टैक्सी हॉर्न बजा रही हैं. सड़क पर हलचल है. उसी भीड़ में एक आदमी खड़ा है, जिसके हाथ में कुछ ऐसा है जिसे देखकर लोग सोच रहे होंगे कि ये क्या उठा लाया.

किसी को लगा होगा ये कोई वॉकी टॉकी है. किसी को लगा होगा ये पुलिस वाला कोई नया हथियार लेकर घूम रहा है. और किसी ने तो शायद ये भी सोच लिया होगा कि भाई साहब एलियन से लड़ाई करने वाले हैं.

लेकिन असल में वो आदमी था मार्टिन कूपर (Martin Cooper). मोटोरोला (Motorola) में इंजीनियर. और हाथ में जो चीज थी, वो था दुनिया का पहला हैंडहेल्ड मोबाइल फोन प्रोटोटाइप. ‘स्मिथसोनियन लर्निंग लैब’ के मुताबिक उस डिवाइस का नाम बाद में पड़ा Motorola DynaTAC. लेकिन उस दिन वो बस एक भारी भरकम सपना था. और मार्टिन कूपर उस सपने को सड़क पर लेकर निकल पड़े थे.

फिर उन्होंने नंबर डायल किया. उस वक्त कोई टच स्क्रीन नहीं थी. कोई फेस अनलॉक नहीं. कोई स्क्रीन पर नाम चमकता नहीं था. बस बटन थे. और बटन दबाते ही इतिहास की पहली वायरलेस कॉल हवा में तैर गई.

जब 'दुश्मन' को फोन लगाकर मार्टिन कूपर ने मजे ले लिए

अब असली ट्विस्ट सुनिए. मार्टिन कूपर ने फोन किया किसे?

अपने बॉस को?

अपनी पत्नी को?

अपने दोस्त को?

या किसी पत्रकार को?

नहीं… उन्होंने फोन लगाया जोएल एंगेल (Joel Engel) को. जो उस वक्त बेल लैब्स (Bell Labs) और AT&T के बड़े वैज्ञानिक माने जाते थे. और यही कंपनी मोटोरोला की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी थी.

अब आप समझिए. ये ऐसा ही है जैसे आज कोई एंड्रॉयड वाला सीधे एप्पल के ऑफिस के बाहर खड़े होकर आईफोन पर कॉल करके बोले, "देखो भाई, हमने पहले बना लिया."

‘सीएनएन’ को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में मार्टिन कूपल ने पल को याद करते हुए बताकि कैसे उन्होंने ने कॉल मिलाई. दूसरी तरफ जोएल ने फोन उठाया. और मार्टिन ने कहा,

"जोएल, मैं मार्टिन कूपर बोल रहा हूं. मैं तुम्हें एक हैंडहेल्ड सेलुलर फोन से कॉल कर रहा हूं. एक असली सेलुलर फोन."

अब सोचिए जोएल की हालत. वो सालों से उसी टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे थे. और सामने वाला सड़क पर खड़ा होकर बता रहा है कि भाई हमने कर दिखाया. ये इतिहास का सबसे क्लासिक "I told you so" मोमेंट था. एक तरफ इंजीनियरिंग की जीत. दूसरी तरफ कॉर्पोरेट वाली तगड़ी जलन. 

first call
दुनिया का पहला मोबाइल कॉल लगाते मार्टिन कपूर (फोटो- मार्टिन कूपर आरकाइव)

वो फोन था या सवा किलो की ईंट?

अब आज के जमाने में फोन का वजन 10 ग्राम बढ़ जाए तो लोग ट्विटर पर लिख देते हैं, "भाई ये फोन नहीं डंबल है." लेकिन 1973 में जिस फोन से पहली कॉल हुई थी, उसका वजन था करीब 1.1 किलोग्राम. यानी लगभग सवा किलो.

मतलब एक हाथ में फोन पकड़ो तो दूसरे हाथ से खुद को बैलेंस करो. क्योंकि ये फोन नहीं था, ये कंधे पर जिम्मेदारी थी. और इसका लुक?

ऊपर से एंटीना बाहर निकला हुआ. ऐसा लग रहा था जैसे रेडियो स्टेशन पकड़ने वाला यंत्र हो. बटन बड़े बड़े, जैसे कैलकुलेटर. स्क्रीन? स्क्रीन तो छोड़िए, उसमें तो बस नंबर डायल करने का इंतजाम था.

आज अगर कोई आदमी सड़क पर ऐसा फोन लेकर चले, तो लोग सोचेंगे कि भाई ने शायद म्यूजियम से चोरी कर लिया. चलो तुलना करते हैं.

1973 का Motorola DynaTAC बनाम आज का स्मार्टफोन

अब जरा संसार के पहले मोबाइल फोन की आज के किसी मोबाइल फोन से करते हैं.

वजन

DynaTAC 1.1 kg

आज का फोन: 170 से 230 grams

चार्जिंग टाइम

DynaTAC: 10 घंटे

आज का फोन: 30 मिनट से 1 घंटा

टॉक टाइम

DynaTAC: सिर्फ 30 मिनट

आज का फोन: 20 से 40 घंटे तक

कीमत

DynaTAC: (बाद में 1983 में लॉन्च हुआ मॉडल): लगभग 3995 डॉलर

आज का फोन: 10 हजार से 1.5 लाख रुपये

मतलब उस जमाने में फोन खरीदना ऐसा था जैसे आज आप कार खरीद रहे हों. और वो भी ऐसी कार जिसमें सिर्फ आधा घंटा चलने की बैटरी हो.

आज के फोन में 5 कैमरे हैं, तब बस एक ही काम था-बात करवाना

आज फोन से हम क्या क्या करते हैं? वीडियो कॉल, फोटो, इंस्टाग्राम, गेम, बैंकिंग, ऑफिस मीटिंग, ऑनलाइन शॉपिंग, GPS, AI, और पता नहीं क्या क्या. 

लेकिन 1973 वाला फोन सिर्फ एक काम करता था- कॉल. न कैमरा. न स्क्रीन. न मैसेज. न फोटो. न इंटरनेट. न नोटिफिकेशन. मतलब उस फोन को देखकर आज का बच्चा बोलेगा, "इसमें PUBG चलेगा?"

और अगर आप कहेंगे "नहीं", तो वो बोलेगा, "फिर ये खिलौना क्यों है?" असल में उस जमाने में फोन का मतलब था सिर्फ आवाज. और आवाज को हवा में भेज देना, बिना तार के. यही सबसे बड़ा चमत्कार था.

लैंडलाइन की खूंटी से आजादी: असली लड़ाई यही थी

आज हम सोचते हैं कि मोबाइल आया तो बस कॉल करने में सुविधा हो गई. लेकिन मामला इतना छोटा नहीं था. उस जमाने में फोन मतलब घर की दीवार पर लगा एक भारी सा डिब्बा. उससे एक तार जुड़ा होता था. और वो तार आपको एक जगह बांध देता था.

फोन बजा तो दौड़कर घर जाना पड़ेगा. ऑफिस में फोन बजा तो वहीं उठाना पड़ेगा. मतलब आपकी जिंदगी की लोकेशन फिक्स थी. मार्टिन कूपर और मोटोरोला की सोच थी कि इंसान को फोन तक नहीं जाना चाहिए. फोन को इंसान के साथ चलना चाहिए.

ये विचार आज सुनने में साधारण लगता है. लेकिन 1973 में ये विचार पागलपन था. क्योंकि तब वायरलेस टेक्नोलॉजी का मतलब था पुलिस रेडियो या सेना का कम्युनिकेशन. सिविलियन आदमी के हाथ में वायरलेस फोन? ये तो उस दौर में साइंस फिक्शन था. और यही साइंस फिक्शन 3 अप्रैल 1973 को रियलिटी बन गया.

लेकिन पहली कॉल के बाद भी 10 साल तक जनता को फोन नहीं मिला

अब आप सोचेंगे कि कॉल हो गई, तो अगले महीने मार्केट में फोन बिकने लगा होगा. नहीं. ‘ब्रिटानिका’ के ‘टेलीकॉम हिस्ट्री रिकॉर्ड्स’ के मुताबिक पहली मोबाइल कॉल बेशक 1973 में हुई. लेकिन पहला कमर्शियल मोबाइल फोन बाजार में आया 1983 में. यानी पूरे 10 साल बाद.

क्यों? क्योंकि कॉल करना एक बात थी, लेकिन नेटवर्क बनाना दूसरी बात. मोबाइल फोन का मतलब सिर्फ फोन नहीं. इसका मतलब था टावर, सिग्नल, फ्रीक्वेंसी, बैटरी टेक्नोलॉजी, और हजारों तकनीकी समस्याएं.

सबसे बड़ी दिक्कत थी स्पेक्ट्रम. यानी हवा में किस फ्रीक्वेंसी पर बात होगी. सरकारें और टेलीकॉम कंपनियां इसी बात पर भिड़ी रहती थीं. और दूसरी दिक्कत थी बैटरी. आज हम बैटरी को कोसते हैं, लेकिन उस दौर में बैटरी का मतलब था भारी वजन और कम क्षमता. तो 10 साल तक मोबाइल टेक्नोलॉजी बस लैब और टेस्टिंग में पसीना बहाती रही.

1983 में आया पहला कमर्शियल मोबाइल: Motorola DynaTAC 8000X

1983 में मोटोरोला ने वो कर दिखाया जो दुनिया को असंभव लगता था. कंपनी ने पहला कमर्शियल हैंडहेल्ड मोबाइल फोन लॉन्च किया. नाम था Motorola DynaTAC 8000X. अब ये वही DynaTAC लाइन थी, लेकिन ये मार्केट में बिकने वाला मॉडल था. और ‘मोटोरोला कॉमर्शियल लॉन्च रिकॉर्ड्स’ के मुताबिक इसकी कीमत थी करीब 3995 डॉलर.

आज अगर डॉलर को रुपये में बदलें, और फिर महंगाई जोड़ें, तो अंदाजा लगाइए कि ये कीमत लाखों रुपये में बैठेगी. मतलब मोबाइल फोन शुरुआत में अमीरों का खिलौना था. बड़े बिजनेसमैन, राजनेता, और कॉर्पोरेट लोग ही इसे खरीद सकते थे.

और यही वजह है कि शुरुआती मोबाइल फोन को "स्टेटस सिंबल" कहा जाता था.

mobile
1983 में जब मार्केट में आया सेल फोन (फोटो- विकिपीडिया)

मोबाइल क्रांति में सबसे बड़ा रोल था नेटवर्क का, फोन का नहीं

अब एक जरूरी बात समझिए. मोबाइल क्रांति सिर्फ फोन बनने से नहीं आई. असली क्रांति आई नेटवर्क बनने से. फोन तो एक डिवाइस है. लेकिन वो तब तक बेकार है जब तक उसके लिए टावर, फ्रीक्वेंसी, और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर ना हो.

यानी मोबाइल का जन्म एक बच्चे जैसा था. लेकिन उसे बड़ा करने के लिए पूरी दुनिया को नेटवर्क का दूध पिलाना पड़ा. 

फिर आया 1G. यानी पहली जनरेशन मोबाइल नेटवर्क. इसमें सिर्फ कॉल होती थी. आवाज भी कभी साफ आती थी, कभी कट जाती थी.

फिर आया 2G. इसमें SMS आया. यानी टेक्स्ट मैसेज. अब लोग कॉल कम और मैसेज ज्यादा करने लगे.

फिर आया 3G. इंटरनेट ने पैर पसारे.

फिर आया 4G. और फिर तो डेटा ने दुनिया को घुटनों पर ला दिया.

आज 5G चल रहा है. मतलब इंटरनेट की स्पीड इतनी कि फिल्म डाउनलोड करने में समय नहीं लगता, लेकिन जिंदगी डाउनलोड करने का टाइम फिर भी नहीं मिलता.

नोकिया ने मोबाइल को आम आदमी का दोस्त बना दिया

अगर मोबाइल इतिहास में किसी एक ब्रांड को "जनता का नेता" कहना हो, तो वो नोकिया है. मोटोरोला ने शुरुआत की, लेकिन नोकिया ने मोबाइल को हर हाथ तक पहुंचाया. 90 के दशक में नोकिया के फोन हर जगह थे. मजबूत, टिकाऊ, और बैटरी ऐसी कि चार्ज करके रखो तो हफ्ते भर चल जाए. 

और फिर आया वो गेम, जिसने बच्चों की पढ़ाई की हालत खराब कर दी. हम बात कर रहे हैं Snake की. आज गेमिंग इंडस्ट्री अरबों डॉलर की है, लेकिन उस दौर में Snake ही बच्चों का PUBG था.

नोकिया ने मोबाइल को सिर्फ डिवाइस नहीं रहने दिया. उसने इसे आदत बना दिया. 

nokia
नोकिया में लाई मोबाइल हैंडसेट क्रांति (फोटो- नोकिया)

नोकिया के उस दौर के बारे में हमारे साथी सूर्यकांत ने पिछले साल एक दिलचस्प रिपोर्ट लिखी थी. पढ़ाना चाहें तो टाइटल: नोकिया का 36 किलो का फोन, जिससे प्रेरित होकर मोटोरोला के कर्मचारी ने की थी पहली मोबाइल कॉल पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं. यकीन मानिए मज़ा आएगा. 

बहरहाल लौटते हैं आज की खबर पर और चलते हैं ब्लैकबेरी की दुनिया में.

ब्लैकबेरी का दौर: जब कीपैड ही शान था

फिर आया ब्लैकबेरी का जमाना. उस दौर में ब्लैकबेरी रखना मतलब VIP होना. ब्लैकबेरी की खासियत थी उसका QWERTY कीपैड. लोग उंगलियों से तेजी से टाइप करते थे. ईमेल भेजते थे. ऑफिस का काम फोन से करते थे.

ब्लैकबेरी ने पहली बार दुनिया को दिखाया कि मोबाइल सिर्फ कॉल नहीं करेगा, ये काम भी करेगा. इसी वजह से ब्लैकबेरी बिजनेस क्लास का राजा बन गया. लेकिन फिर टेक्नोलॉजी ने करवट ली. टच स्क्रीन आई. और ब्लैकबेरी पीछे छूट गया.

blackberry
स्टेटस सिंबल बना ब्लैकबेरी फोन (फोटो- विकिमीडिया)

2007: स्टीव जॉब्स ने आईफोन लाकर दुनिया को टच करा दिया

और फिर आया वो साल जिसने मोबाइल इतिहास को दो हिस्सों में बांट दिया. स्टीव जॉब्स मंच पर आए. हाथ में आईफोन पकड़ा. और कहा कि आज हम तीन चीजें लॉन्च कर रहे हैं-

  • एक iPod.
  • एक फोन.
  • और एक इंटरनेट कम्युनिकेटर.

और फिर बोले, 

"ये तीन अलग चीजें नहीं हैं. ये एक ही डिवाइस है."

उस दिन दुनिया ने पहली बार देखा कि फोन की स्क्रीन पर उंगली चलाने से सब कुछ हो सकता है. कीपैड की जरूरत खत्म. स्टाइलस का जमाना खत्म. मोबाइल अब कंप्यूटर बन गया. यहीं से स्मार्टफोन का असली युग शुरू हुआ.

iPhone
स्टीव जॉब्स ने लॉन्च किया iPhone (फोटो- Apple)

मोबाइल ने दुनिया को जोड़ा भी और तोड़ा भी

अब कहानी का सबसे मजेदार हिस्सा यही है. मोबाइल ने दुनिया को जोड़ दिया. लेकिन उसी मोबाइल ने दुनिया को तोड़ भी दिया. पहले लोग मिलने जाते थे. अब लोग वीडियो कॉल कर लेते हैं.

पहले रिश्तेदार घर आते थे. अब सिर्फ स्टेटस देखते हैं. पहले दोस्त पार्क में बैठते थे. अब ग्रुप चैट में "हाहाहा" लिखकर दोस्ती निभाते हैं.

मोबाइल ने हमें कनेक्ट किया. लेकिन असली बातचीत कम कर दी. हम अब एक साथ बैठकर भी अलग अलग स्क्रीन में घुसे रहते हैं. घर में मम्मी चाय पूछ रही है और बेटा फोन में "रील" देख रहा है. पापा न्यूज पढ़ रहे हैं, बहन इंस्टा स्क्रॉल कर रही है. और दादी सोच रही हैं कि ये लोग बिना बोले भी कैसे खुश हैं.

मोबाइल ने दुनिया की दूरी कम की, लेकिन रिश्तों की गर्माहट भी कम कर दी.

मोबाइल का सबसे बड़ा असर: हमारा दिमाग अब शांत रहना भूल गया

पहले खाली समय होता था. लोग खिड़की से बाहर देखते थे. किताब पढ़ते थे. चाय पीते थे. या बस यूं ही सोचते थे. अब खाली समय मतलब फोन निकालना.

बस स्टॉप पर खड़े हो? फोन. 

लिफ्ट में हो? फोन. 

खाना आ रहा है? फोन.

सोने जा रहे हो? फोन.

नींद नहीं आ रही? फोन.

मोबाइल ने हमारे दिमाग को "साइलेंस" से डरना सिखा दिया. और इसी वजह से आज लोग अकेलेपन की शिकायत ज्यादा करते हैं, जबकि उनके पास हर वक्त कनेक्शन मौजूद है.

भारत में मोबाइल की एंट्री: 1995 में पहली कॉल और मिनट के 16 रुपये

अब आते हैं अपने देसी भारत पर. भारत में मोबाइल फोन का पहला ऐतिहासिक क्षण आया 31 जुलाई 1995 को. उस दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने दिल्ली में केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम को पहली सेलुलर कॉल की थी.

mobile
भारत का पहला मोबाइल कॉल करते पश्चिम बंगाल के तत्कालिन सीएम ज्योति बसु (फोटो- विकिपीडिया)

और अब सुनिए असली झटका

उस वक्त एक मिनट बात करने का खर्च था करीब 16 रुपये. मतलब अगर आज कोई कहे कि भाई एक मिनट बात करने के 16 रुपये लगेंगे, तो जनता बोलेगी, "भाई फोन रखो, मैं चिट्ठी लिख दूंगा."

लेकिन 1995 में ये कॉल भारत के लिए एक नया युग था. मोबाइल धीरे धीरे अमीरों से निकलकर मिडिल क्लास तक पहुंचा. फिर सस्ते हैंडसेट आए. फिर रिचार्ज कल्चर आया. फिर डेटा आया. और अब तो हालत ये है कि गांव में भी लोग यूट्यूब देखकर खेती सीख रहे हैं..

मोबाइल ने बिजनेस की शक्ल बदल दी

मोबाइल ने सिर्फ बातचीत नहीं बदली. इसने बिजनेस का पूरा मॉडल बदल दिया. पहले दुकान खोलनी पड़ती थी. अब इंस्टाग्राम पेज खोलकर दुकान चल जाती है. पहले बैंक की लाइन में लगना पड़ता था. अब UPI से सब कुछ हो जाता है.

पहले नौकरी के लिए ऑफिस जाना पड़ता था. अब मोबाइल से मीटिंग हो जाती है. आज फ्रीलांसिंग, डिजिटल मार्केटिंग, ऑनलाइन क्लास, फूड डिलीवरी, कैब सर्विस, सब मोबाइल पर टिका है. मतलब मोबाइल ने एक नई इकॉनमी बनाई. और उसी इकॉनमी ने नई नौकरियां पैदा कीं. लेकिन इसी ने नई परेशानियां भी पैदा कीं. जैसे ऑनलाइन फ्रॉड, साइबर क्राइम, और डेटा चोरी.

मोबाइल डेटा ही असली राजा है: कॉल तो अब बस बहाना है

एक वक्त था जब मोबाइल का मतलब कॉल करना था. आज मोबाइल का मतलब है डेटा. लोग कॉल करने के बजाय व्हाट्सएप कॉल करते हैं. वीडियो कॉल करते हैं. मैसेज करते हैं. मीम भेजते हैं.

अब कॉल सिर्फ तब होती है जब कोई बहुत जरूरी बात हो. या जब मां का फोन आए और उठाना मजबूरी हो. और इस डेटा ने ही मोबाइल कंपनियों को सबसे ज्यादा ताकत दी. आज कंपनियां फोन बेचकर नहीं, डेटा और सर्विस बेचकर कमाती हैं.

और हम? हम हर महीने रिचार्ज करके अपनी डिजिटल गुलामी की फीस भर देते हैं.

मार्टिन कूपर ने तार काटे, लेकिन नई जंजीर पहना दी

अब कहानी का सबसे मजेदार और थोड़ा कड़वा हिस्सा. मार्टिन कूपर ने फोन को तार से आजाद किया. लेकिन उसी आजादी ने इंसान को स्क्रीन का गुलाम बना दिया.

आज लोग फोन के बिना रह नहीं सकते. और कंपनियां इसी आदत को कैश करती हैं. नोटिफिकेशन, लाइक, कमेंट, रील, ये सब हमारे दिमाग में डोपामिन का खेल खेलते हैं. हम हर कुछ मिनट में फोन चेक करते हैं. जैसे कोई जरूरी मिशन चल रहा हो.

असल में मोबाइल ने हमें सुविधा दी, लेकिन साथ में हमें आदतों का कैदी भी बना दिया. और यही टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा मजाक है. जो चीज हमें आजाद करने आई थी, वही चीज अब हमें बांध चुकी है.

mobile
मोबाइल फोन ने आजादी दी या बंदिशें

AT&T और Motorola की लड़ाई असल में किस चीज की थी?

मार्टिन कूपर और जोएल एंगेल की कहानी सिर्फ दो लोगों की नहीं थी. ये दो कंपनियों की लड़ाई थी. AT&T और Bell Labs उस वक्त टेलीकॉम के राजा थे. उनका नेटवर्क, उनका कंट्रोल, उनकी सरकारों तक पकड़.

मोटोरोला एक हार्डवेयर कंपनी थी. वो रेडियो और कम्युनिकेशन डिवाइस बनाती थी. लेकिन टेलीकॉम नेटवर्क पर उसका कंट्रोल नहीं था. तो ये लड़ाई सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं थी. ये लड़ाई कंट्रोल की थी.

AT&T चाहता था कि मोबाइल सर्विस कार में लगे फोन तक सीमित रहे. मतलब फोन कार में फिट होगा, और आदमी कार के साथ ही बंधा रहेगा. लेकिन मोटोरोला चाहता था हैंडहेल्ड फोन. यानी आदमी जहां जाए, फोन उसके साथ जाए.

अगर आप गौर करें तो ये लड़ाई आज भी चल रही है. फर्क बस इतना है कि तब AT&T और Motorola थे, आज Apple और Google हैं. कंट्रोल का खेल वही है.

डिजाइन का मजाक: आज का स्लिम फोन बनाम तब का डिब्बा

आज फोन इतने पतले हैं कि कभी-कभी लगता है हवा में उड़ जाएंगे. कंपनियां कैमरा बंप को लेकर बहस करती हैं, बॉडी के कर्व को लेकर प्रेजेंटेशन बनाती हैं. लेकिन 1973 में डिजाइन का मतलब था "चल जाए बस."

फोन बड़ा था. भारी था. ऊपर से एंटीना. देखने में ऐसा कि आप उससे बात कम और किसी को मार ज्यादा सकते थे. और शायद इसी वजह से लोग उसे "ब्रिक फोन" कहते थे. 

मजेदार बात ये है कि उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि भविष्य में फोन फैशन भी बनेगा. आज फोन सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, स्टेटस है. ब्रांड है. सोशल पहचान है.

mobile
साल दर साल सुधरता मोबाइल फोन डिजाइन

मोबाइल का भविष्य: आगे क्या?

अब सवाल ये है कि मोबाइल की कहानी यहां खत्म हो रही है या आगे बढ़ रही है? सच कहें तो मोबाइल अब अपने अगले रूप में जा रहा है. आज लोग स्मार्टवॉच, AR ग्लासेस, और वर्चुअल रियलिटी की बात कर रहे हैं. 

हो सकता है भविष्य में फोन जेब में रखने की जरूरत ही न पड़े. सब कुछ आंखों के सामने स्क्रीन बनकर आ जाए. लेकिन एक बात तय है. इंसान की जरूरत "कनेक्टेड" रहने की है. और यही जरूरत टेक्नोलॉजी को आगे धकेलती रहेगी.

पर सवाल ये भी है कि क्या हम टेक्नोलॉजी को कंट्रोल करेंगे, या टेक्नोलॉजी हमें कंट्रोल करेगी? यही असली लड़ाई है.

तार टूटे, पर क्या हम सच में आजाद हुए?

3 अप्रैल 1973 को मार्टिन कूपर ने दुनिया की पहली मोबाइल कॉल करके इतिहास बदल दिया. उस एक कॉल ने इंसान को दीवार से आजाद किया. अब फोन घर में नहीं रहा, फोन इंसान के साथ चलने लगा.

आज फोन हमारे साथ सिर्फ चल नहीं रहा, वो हमें चला भी रहा है

हम सुबह उठते हैं तो फोन देखना पहला काम. रात को सोते हैं तो फोन आखिरी चीज. बीच में पूरा दिन नोटिफिकेशन, स्क्रीन टाइम, रील, मीम, मैसेज, कॉल, सब कुछ. मार्टिन कूपर ने तार तो काट दिए, लेकिन हमें बिना तार वाले नेटवर्क का गुलाम बना दिया.

फोन जरूरी है या मजबूरी है, इस पर कुछ वक्त पहले लल्लनटॉप पर हमने एक लेख लिखा था, चाहे तो टाइटल आप फोन चला रहे हैं या फोन आपको? 'डिजिटल डिटॉक्स' का वो सच जो कोई नहीं बताता! पर क्लिक करके उस लेख को पढ़ सकते हैं.

तो चलिए अब अपनी खबर पर वापस आते हैं. आज मोबाइल का जन्मदिन है. बर्थडे गिफ्ट तो बनता है. कम से कम 5 मिनट के लिए इसे साइड में रखिए. एक गहरी सांस लीजिए. खिड़की से बाहर देखिए. या बस चुपचाप बैठ जाइए. क्योंकि असली आजादी शायद फोन रखने में नहीं, फोन से दूर रहने में है.

और हां, अगर आप इतना भी नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं. जन्मदिन है. कम से कम मोबाइल को चार्जिंग से निकालकर उसे भी थोड़ी सांस लेने दीजिए.

वीडियो: केवल मोबाइल नंबर से आधार कार्ड, पता सब लीक हो जा रहा, proxyearth का पूरा खेल समझिए!

Advertisement

Advertisement

()