The Lallantop
Advertisement

कश्मीर में सरकार बुलडोजर क्यों चला रही है?

विपक्ष और स्थानीय लोगों का बुलडोजर एक्शन पर क्या कहना है?

Advertisement
 anti encroachment drive in kashmir
सरकारी जामनी पर बनी इमारत को गिराता बुल्डोजर
pic
नीरज कुमार
6 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 6 फ़रवरी 2023, 10:39 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

जम्मू कश्मीर में आजकल बुलडोजर खूब चर्चा में है. अवैध कब्जों पर बुलडोजर चला सरकार जमीनें वापस ले रही है. इसी साल 9 जनवरी को जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के दस्तखत से एक आदेश जारी हुआ. उसके बाद से जम्मू कश्मीर की फिजा में एक अलग सी हलचल नज़र आने लगी. ये आदेश था अतिक्रमण विरोधी अभियान को लेकर. जिसमें कहा गया कि 31 जनवरी तक सरकारी ज़मीनों को कब्ज़े से मुक्त कराया जाए, भले ही उस पर किसी आम आदमी का कब्ज़ा हो या किसी ख़ास का. जिसके बाद जम्मू और कश्मीर प्रशासन ने ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू हुई.

मसले के विस्तार पर जाएं,उससे पहले कुछ बातें समझते करते चलिए. रिपोर्ट समझने में आसानी होगी. हम आप जैसे लोग खुद के लिए अगर जमीनें खरीदते हैं तो उसका सौदा आमतौर पर स्क्वायर फीट में करते हैं. खेत वगैरह खरीदते हैं तो बीघा या बिसवा में बात होती है. लेकिन जम्मू कश्मीर में सरकारी जमीनों पर जो खेल हुआ है उसमें बात कैनाल और मालरा में होगी, जिसे हम आपको आसान भाषा में यानी एकड़ में समझाएंगे. जैसे

1 एकड़ जमीन का मतलब होता है- 8 कैनाल या 160 मालरा

अब आते हैं खबर पर. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जम्मू कश्मीर में जनवरी में शुरू हुए इस अतिक्रमण विरोधी अभियान में अब तक 15 लाख कनाल यानी 1.87 लाख एकड़ सरकारी ज़मीन को कब्ज़े से छुड़ा लिया गया है. इन जमीनों पर कब्ज़ा करने वालों में कई पार्टियों के बड़े नेता भी शामिल हैं. जो 15 लाख कनाल ज़मीन कब्ज़े से खाली कराई गई है उसमे से लगभग आधी जमीन यानी 7 लाख कनाल कश्मीर में है. ये आंकड़ा अगर एकड़ में देखें तो करीब 87 हजार एकड़ है.

करीब दो हफ्ते पिछले ही राजस्व अधिकारियों ने कुछ ज़मीनें ज़ब्त की थी. जिसके बारे में बताया गया कि रेवेन्यू रिकॉर्ड के मुताबिक़ जम्मू के घनिक गांव ये करीब 3 एकड़ ज़मीन बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री कविंदर गुप्ता की है. इसके अलावा श्रीनगर में पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूक और उमर अब्दुल्ला के एक रिश्तेदार के कब्जे 5 एकड़ जमीन को भी कब्ज़ा मुक्त कराया है. भाजपा नेता रिटायर्ड कर्नल महान सिंह और प्रेम सागर अजीज पर भी कार्रवाई हुई है. अधिकारियों का दावा किया है कि महान सिंह से कठुआ में 1.2 एकड़ जमीन वापस ली गई है. महान सिंह जिला विकास परिषद के अध्यक्ष थे, जिनका पद दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री के बराबर था. अधिकारियों ने कठुआ जिले में बसोहली इलाके में पूर्व मंत्री प्रेम सागर अजीज की भी करीब 0.5 एकड़ जमीन जब्त करने का दावा किया है. कर्नल महान सिंह का दावा है कि जब्त की गई जमीन उनके परिवार और 13 अन्य लोगों की 4.25 एकड़ पैतृक संपत्ति का हिस्सा है.

वहीं अजीज ने कहा कि उन्होंने 38 साल पहले ये  विवादित जमीन, रद्द हो चुके रोशनी कानून के प्रावधानों के तहत खरीदी थी. इसके लिए उन्होंने अधिकारियों को बाकायदा 44 हज़ार रुपये का भुगतान भी किया था ताकि मालिकाना हक उनके नाम पर ट्रांसफर किया जा सके. हालांकि अधिकारी इस जमीन को हाई वैल्यू बताते हुए इसकी कीमत 2.4 करोड़ रुपये बताते हैं. हमने जिस रोशनी कानून की बात की वो उसे साल 2001 में तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने जल विद्युत परियोजनाओं के लिए फंड एकत्रित करने के उद्देश्य से बनाया था. इसे जम्मू-कश्मीर राज्य भूमि अधिनियम, 2001 कहा गया, इसी कानून को 'रोशनी' नाम भी दिया गया था. कानून के मुताबिक, भूमि का मालिकाना हक उसके कब्जेदारों को इसी शर्त पर दिया जाएगा जब वो बाजार भाव पर सरकार को भूमि की कीमत का भुगतान करेंगे.

इसके लिए कटऑफ मूल्य साल 1990 की गाइडलाइन के अनुसार तय किए गए. शुरुआत में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले किसानों को कृषि के लिए मालिकाना हक दिया गया. इस अधिनियम में दो बार संशोधन किए गए, जो मुफ्ती मोहम्मद सईद और गुलाम नबी आजाद की सरकार के कार्यकाल में हुए. उस दौरान कटऑफ मूल्य पहले 2004 और बाद में 2007 के हिसाब से कर दिए गए. फिर साल 2014 में C.A.G यानी नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट आई, जिसमें खुलासा हुआ कि 2007 से 2013 के बीच जमीन ट्रांसफर करने के मामले में भारी गड़बड़ी हुई. इसके बाद 11 अक्टूबर 2022 को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा था कि रोशनी एक्ट को असंवैधानिक करार देते हुए, उसके तहत किए गए कामों को भी असंवैधानिक करार दिया. उस वक्त जो भी जमीन के सौदे हुए, जांच के दायरे में आ गए. नामकरण हुआ तो उसे रोशनी घोटाला कहा गया.

अब वापस आते हैं अतिक्रमण विरोधी अभियान पर. जम्मू प्रांत में भी दो वरिष्ठ नेताओं को भी नोटिस दिया गया. नोटिस पाने वालों में बीजेपी नेता अब्दुल गनी कोहली और जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के जुल्फिकार चौधरी भी हैं. दोनों साल 2014 से 2018 तक की पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. इसके अलावा श्रीनगर के प्रसिद्ध नेदो होटल से भी 5 एकड़ जमीन ज़ब्त की गई है. कई बार जब्ती के दौरान तकरार भी देखने को मिली. अब्दुल्ला परिवार के एक रिश्तेदार और अवामी नेशनल कांफ्रेंस के नेता मुजफ्फर शाह जमीन वापस लेने आए तो वो अधिकारियों से भिड़ गए. पूर्व मुख्यमंत्री सैयद मीर कासिम के परिवार से 1.8 एकड़, पीडीपी नेता हसीब द्राबू से शोपियां में हाई वैल्यू बाग की 1.8 एकड़ ज़मीन, चर्चित कश्मीरी पंडित, एमएल धर से करण नगर में डेढ़ एकड़ ज़मीन जब्त हुई. नेताओं से जमीन छुड़ाने की फेहरिस्त लंबी है.

विरोधी इसे चुनाव से जोड़ते हैं, मगर ये सत्य है कि अरसे बाद कब्जे वाली जमीनों से अवैध कब्जे को हटाया जा रहा है. इस कड़ी में हुर्रियत नेता मीरवाइज काज़िर यासिर के एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को डिमॉलिश किया गया. डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी के प्रमुख गुलाम नबी आजाद ने कहा कि अपने ही लोगों को बेघर करना, किसी सरकार की नीति नहीं हो सकती. वो रेगुलाइजेशन की मांग कर रहे हैं. राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के अलावा कई जगह लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया. मगर जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने साफ कर दिया है कि सरकारी जमीन के छोटे हिस्से पर जिनके घर बने हैं, उन पर कार्रवाई नहीं होगी.

सरकार की तरफ से ये दिशा निर्देश क्लीयर हैं कि बड़े कब्जों को छोड़ा नहीं जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे संज्ञान में लेने से मना कर दिया है. इस समय ये पूरे जम्मू कश्मीर का बड़ा मुद्दा है. अतिक्रमण को लेकर छिड़े विवाद के बीच एक दहशत भरी धमकी भी जारी हुई है. लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी संगठन TRF ने चिट्ठी के जरिए कहा है कि इस अतिक्रमण अभियान में शामिल जेसीबी के मालिकों और ड्राइवर को निशाना बनाकर हत्या की जाएगी. इसके अलावा राजस्व विभाग में प्यून से लेकर तहसीलदार तक जो भी इस विभाग में काम कर रहे हैं, उनकी टारगेट किलिंग की जाएगी. तो ऐसे में चुनौती दोहरी है. सरकार को सरकारी जमीनों से अवैध कब्जा भी हटाना है और लोगों की सुरक्षा भी करनी है. विरोधी भले ही बुलडोजर पॉलिटिक्स के आरोप लगाते हैं, मगर हमारी टीम जब भारत जोड़ो यात्रा की कवरेज के लिए कश्मीर गई थी. तो बातचीत के दौरान ऑफ कैमरा कई आम कश्मिरियों ने सरकार के कदम की सराहना की. वो ये मानते हैं लूट-खसोट की जमीनों को खाली कराया जाना चाहिए.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: बागेश्वर वाले धीरेंद्र शास्त्री के समर्थन में धर्म संसद करने वालों ने जो कहा उस पर कार्रवाई कब?

Advertisement

Advertisement

()