अपने गुनाहों को ढकने के लिए हिटलर ने क्या तिकड़म भिड़ाई थी?
भारत के खिलाफ बांग्लादेशी मीडिया का किस तरह इस्तेमाल कर रही है आईएसएआई?
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फोटो - thelallantop
मीन काम्फ़. हिंदी में मतलब होता है ‘मेरा संघर्ष’. ये जर्मन तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर की आत्मकथा है. मीन काम्फ़ में हिटलर लिखता है,
साल 1933 में हिटलर जर्मनी का चांसलर बन गया. दो साल बाद उसने एक फ़िल्म बनवाई. Triumph of the Will. यानी ‘संकल्प की जीत’. बाद में ये जर्मन लोगों के संकल्प का ‘वशीकरण-मंत्र’ साबित हुई. इसने हिटलर के दूसरे स्याह पक्ष पर से लोगों का ध्यान हमेशा के लिए हटा दिया. इस फ़िल्म को प्रोपेगैंडा का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. इसमें हिटलर ने उन सभी सिद्धांतों को धरातल पर उतारा, जिसे उसने ‘मीन काम्फ़’ में कलमबद्ध किया था.
‘ट्रायम्फ़ ऑफ़ द विल’ की पूरी कहानी क्या है? 86 बरस बाद भी इस फ़िल्म का प्रभाव खत्म क्यों नहीं हुआ है? दुनियाभर में प्रोपेगैंडा के इस्तेमाल का पैटर्न क्या रहा है? और, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI किस तरह से भारत के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा कैंपेन चलाती है? सब आपको विस्तार से बताते हैं.
हिटलर और प्रोपेगैंडा
साल 1919. जून महीने की 28वीं तारीख़ को वर्साय के महल में जर्मनी और मित्र राष्ट्रों के बीच संधि हुई. पहले विश्व युद्ध के बाद की स्थिति तय करने के लिए. जर्मनी पराजितों वाली साइड में था. इसलिए, विजेता देशों ने उसके ऊपर कई निष्ठुर शर्तें थोप दीं. मसलन, वर्ल्ड वॉर से पहले जर्मनी के पास 19 लाख सैनिक थे. उसे इसे घटाकर एक लाख करने के लिए कहा गया. जर्मनी को अपने हथियार सरेंडर करने पड़े. कई इलाकों पर से दावा छोड़ना पड़ा. इसके अलावा, उसे लड़ाई में हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए भी कहा गया. जर्मनी के पास इन शर्तों को मानने के सिवा कोई और रास्ता नहीं था.
जिस समय वर्साय में जर्मनी अपमानित हो रहा था, उस समय हिटलर एक मिलिटरी अस्पताल में भर्ती था. पहले विश्व युद्ध के दौरान एक हमले में वो घायल हो गया था. अस्पताल के बिस्तर पर लेटा हिटलर मन मसोस कर रह गया. वो बहुत कुछ करना चाहता था. लेकिन उस समय ना तो उसके पास साधन थे और ना ही उसे कोई जानता था. उसने बाद में लिखा,
अस्पताल से निकलने के बाद हिटलर वापस सेना में जाना चाहता था. लेकिन वहां उसके लिए कोई जगह नहीं थी. तब हिटलर ने जर्मन वर्कर्स पार्टी जॉइन कर ली. यही पार्टी आगे चलकर नेशनलिस्ट सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी कहलाई. इसी को नाज़ी पार्टी के नाम से भी जाना जाता है.
हिटलर पार्टी की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा था. उसके भाषणों से लोग पार्टी की तरफ़ आकर्षित हो रहे थे. वो पार्टी के लिए पोस्टर बनाने और स्लोगन तैयार करने का काम भी कर रहा था. हिटलर को लगता था कि जर्मनी की सेना अजेय है. उसे कोई हरा नहीं सकता. लेकिन मित्र सेनाओं ने उसका ये भ्रम तोड़ दिया था. हिटलर को महसूस हुआ कि इस मित्र सेनाओं के पास कुछ तो ऐसा है जो जर्मनी के पास नहीं है. गहन चिंतन-मनन के बाद उसने वो चीज़ ढूंढ़ ली. हिटलर के मुताबिक, हार और जीत का अंतर तय करने वाली चीज़ ‘प्रोपेगैंडा’ थी. उसने इसका ज़िक्र अपनी आत्मकथा में भी किया है.
ट्रायम्फ़ ऑफ़ द विल
1933 में हिटलर जर्मनी का चांसलर बना. चांसलर बनने के बाद न्यूरेम्बर्ग में नाज़ी पार्टी की रैली हुई. इस रैली पर एक डॉक्यूमेंट्री बनी. विक्ट्री ऑफ़ द फ़ेथ. इसे बनाने वाली थी, लेनी रिफ़ेनस्टाफ़. ‘विक्ट्री ऑफ़ द फ़ेथ’ हिटलर के चांसलर बनने के मोमेंट को कैप्चर करने के लिए बनाई गई थी. लेकिन इसमें नाज़ी नेता एर्स्ट होम को मुख्य किरदार के तौर पर दिखाया गया था. होम नाज़ी पार्टी के मिलिटरी विंग का कमांडर था. हिटलर से उसकी अच्छी-खासी दोस्ती थी. लेकिन फिर हिटलर को शक होने लगा. उसे लगा कि उसके करीब मौज़ूद लोग उसके लिए ख़तरा बन सकते हैं. इस ख़तरे को टालने के लिए ऐसे लोगों को रास्ते से हटाने का आदेश दिया गया. इसी क्रम में एक जुलाई 1934 को होम की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
हिटलर ने ‘विक्ट्री ऑफ़ द फ़ेथ’ की सभी कॉपीज़ को जलाने का आदेश दिया. हालांकि, इसकी एक कॉपी पांच दशक बाद ईस्ट जर्मनी में मिली थी. अगस्त 1934 में जर्मनी के राष्ट्रपति पॉल हिन्डेनबर्ग की भी मौत हो गई. अब हिटलर को चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा था. उसने चांसलर और राष्ट्रपति के पद को मिला दिया. हिटलर ने नई उपाधि धारण की. फ़्यूहरर. लीडर और गाइड.
हिटलर सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत कर चुका था. उसे इस बादशाहत को जनता के दिलों में भी स्थापित करना था. साथ ही, आने वाले समय की गतिविधियों को वैधता का चोला भी पहनाना था. इसके लिए उसने फ़िल्म का माध्यम चुना. हिटलर रिफ़ेनस्टाफ़ से खासा प्रभावित था. उसने उसे मिलने के लिए बुलाया. मीटिंग में तय हुआ कि 1934 में होने वाली नाज़ी पार्टी की रैली पर फ़िल्म बनाई जाएगी. रिफ़ेनस्टाफ़ राज़ी हो गई. सितंबर 1934 में हुई रैली को बखूबी कैमरे में क़ैद किया गया. एडिटिंग के बाद ‘ट्रायम्फ़ ऑफ़ द विल’ को 1935 में रिलीज़ कर दिया गया. ये फ़िल्म हिटलर की उम्मीदों पर पूरी तरह से खरी उतरी थी.
प्रोपेगैंडा का असर
पहले सीन में कैमरा न्यूरेम्बर्ग के ऊपर है. इसमें शहर की ऐतिहासिक इमारतों पर लगे नाज़ी झंडे दिखते हैं. अगले दृश्य में हिटलर प्लेन से उतरता है. इसे इस तरह से दिखाया गया है, मानो कोई ईश्वरीय अवतार धरती पर प्रकट हो रहा हो. जिधर से भी हिटलर गुज़रता है, वहां लाखों की संख्या में लोग उसकी झलक पाने के लिए बेताब दिखते हैं. फ़िल्म में लयबद्ध परेड करती सेना दिखती है. बार-बार नाज़ी झंडे को दिखाया जाता है. पूरी फ़िल्म में कोई कमेंट्री नहीं है. इसमें हिटलर और नाज़ी पार्टी के नेताओं के भाषण हैं. नाज़ी नेता अपने भाषणों में हिटलर को मसीहा बताते हैं और उसके प्रति वफ़ादारी की कसमें खाते हैं.
रुडोल्फ़ हेस अपने भाषण में ज़ोर देकर कहता है -
पार्टी हिटलर है
हिटलर जर्मनी है
क्योंकि जर्मनी ही हिटलर है.
फ़िल्म में ये ज़ोर देकर बताया गया है कि अगर जर्मनी को कोई उसका गौरव लौटा सकता है तो वो हिटलर है. अगर हिटलर नहीं रहा तो जर्मनी ख़त्म हो जाएगा. इस तरह एक राष्ट्र के अस्तित्व को एक व्यक्ति से जोड़ दिया गया. इस फ़िल्म को सफ़ल बनाने के लिए भयानक प्लानिंग की गई थी. पूरे न्यूरेम्बर्ग में पुल और सड़कें बनाई गई थी. लोगों को लंबी-चौड़ी ट्रेनिंग दी गई थी. पूरा इवेंट बेहतरीन तरीके से कोरियोग्राफ़्ड था. फ़िल्म अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब हुई. जिस समय न्यूरेम्बर्ग में शूटिंग चल रही थी, उस समय तक जर्मनी में यहूदी, अश्वेत, रोमा और दूसरे कथित अशुद्ध लोगों पर अत्याचार शुरू हो चुके थे. यहूदियों को घेट्टो में बंद किया जाने लगा था. ट्रायम्फ़ ऑफ़ द विल में उस अत्याचार का एक हिस्सा तक नहीं है. ये हिटलर के प्रोपेगैंडा का पहला उसूल था. जो हिस्सा तुम्हारे फायदे के लिए ख़तरा हो, उसे गायब कर दो.
जब नाज़ी जर्मनी सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान अवांछित लोगों को गैस चैंबर में जला रहा था. उनका सामूहिक नरसंहार कर रहा था. उस दौरान जर्मन जनता इसे एक भ्रम समझती रही. उन्हें ये लगता रहा ये उनके प्यारे फ़्यूहरर को बदनाम करने की साज़िश है. उन्होंने इसे झूठ मानकर टाल दिया. जो मानवता के ख़िलाफ़ हो रहे अपराध से वाक़िफ़ थे, वे इसका हिस्सा बन गए. ऐसे लोग इसे वाज़िब ठहरा रहे थे. उन्हें ये लगा कि अगर हिटलर कुछ कर रहे हैं तो सोच-समझकर ही कर रहे होंगे. इस फ़िल्म की कथित सफ़लता का आलम ये है कि आज भी नाज़ी-समर्थक लोग इसे देखने के बाद ‘यहूदियों के नरसंहार’ की बात मानने से इंकार कर देते हैं. हिटलर युग बीतने के दशकों बाद ये स्थिति प्रोपेगैंडा के असर को समझाने के लिए पर्याप्त है.
प्रोपेगैंडा का इतिहास
जहां तक प्रोपेगैंडा के इतिहास की बात है, इसका इस्तेमाल सदियों से होता आया है. प्राचीन ग्रीक और एथेंस के समय ये अस्तित्व में आ चुका था. इसका प्रयोग कमोबेश मत-भिन्नताओं को खत्म करने के लिए किया जाता था. 20वीं सदी की शुरुआत में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ. उस दौरान प्रोपेगैंडा वॉर चरम पर पहुंच गया. पोस्टर्स, स्लोगन्स, फ़िल्म, गाने आदि के ज़रिए दुश्मन को हतोत्साहित करने की कोशिश की जाती थी. इसके जरिए सेना में नए लोगों को लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था. लोगों में देशभक्ति का जुनून भरा जाता था. ताकि युद्ध के समय राष्ट्रीय एकता कायम रहे. एक पोस्टर में जर्मन सैनिक को राक्षस के तौर पर दिखाया गया था. वो एक महिला को उठाकर भाग रहा होता है. इस पोस्टर के जरिए जर्मन सेना को आततायी दिखाने की कोशिश हुई थी.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने फ़ैक्ट्री में काम करती महिलाओं की तस्वीरों का ख़ूब प्रचार किया था. इसके जरिए घरेलू मोर्चे पर समर्थन जुटाया गया था. युद्ध के दौरान विरोधी सेनाएं एक-दूसरे की सीमाओं में लीफ़लेट गिराती हैं. इनमें फ़र्ज़ी अफ़वाहें लिखी होती हैं. ऐसा दुश्मन सेनाओं या लोगों में अस्थिरता पैदा करने के लिए किया जाता है. वर्ल्ड वॉर ख़त्म होने के बाद भी प्रोपेगैंडा का इस्तेमाल नहीं रुका है. या यूं कहें कि नए माध्यमों के आने से इसका दायरा और विस्तृत हुआ. तानाशाहों ने अपने राज को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के हरसंभव उपाय किए. उन्होंने प्रोपेगैंडा फैलाकर लोगों को भरम में रखा. जब भरम का जाल हटा तो कुछ और ही सच्चाई बाहर आई.
जैसे, कंबोडिया के पोल पॉट को ‘किलिंग फ़ील्ड्स’ के लिए याद किया जाता है. उसके शासन काल में कम-से-कम 25 लाख लोग बेमौत मारे गए थे. जब तक पोल पॉट शासन में रहा, उसने इस सच्चाई को बाहर नहीं आने दिया. वो फ़िल्में बनवाता था, जिसमें किसान हंसते-गाते दिखते थे. वो पत्रकारों को चुनिंदा जगहों पर ले जाता था. जहां सब चंगा दिखता था.
इसी तरह इराक़ में सद्दाम हुसैन ने अपनी ईश्वरीय छवि बना रखी थी. हर जन्मदिन के मौके पर वो अपने लोगों को अपनी एक मूर्ति का तोहफ़ा देता था. कहते हैं एक समय इराक़ में जितने लोग थे, उतनी ही संख्या में सद्दाम के पोस्टर भी लगे थे. वो ये साबित करना चाहता था कि उसके सिवा इराक़ में किसी और की सत्ता नहीं चलेगी.
एक और उदाहरण सुन लीजिए. हेती का. वहां 50 के दशक में पापा डॉक नाम का एक तानाशाह हुआ. अपने शासन के अंतिम दिनों में उसने अपना एक पोस्टर पूरे हैती में लगाया. इस पोस्टर में पापा डॉक प्रेसिडेंट की कुर्सी पर बैठा था और पीछे ईसा मसीह आशीर्वाद की मुद्रा में खड़े दिखते. पोस्टर पर बस एक लाइन लिखी होती-
I have chosen him.
इंसान, इंसान को तो चुनौती दे सकता है. लेकिन यहां तो ईश्वर का फ़ैसला था. लोगों को इस प्रोपेगैंडा पर भरोसा करना पड़ा. जब पापा डॉक की मौत हुई. पोस्टर में दो बदलाव किए गए. कुर्सी पर बैठे पापा डॉक की जगह उनके बेटे बेबी डॉक ने ले ली. जबकि ईसा मसीह के स्थान पर पापा डॉक की फोटो लगाई गई. लाइन वही रही-I have chosen him.
ये प्रोपेगैंडा का चरम है. जहां इंसान ख़ुद को ईश्वर साबित कर दे. ताकि उसे चुनौती देने वाला ईश्वर-विरोधी लगने लगे. आज हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? दरअसल, आज की ख़बर प्रोपेगैंडा से ही जुड़ी है. मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI भारत को बदनाम करने के लिए बांग्लादेशी मीडिया का इस्तेमाल कर रही है. संडे गार्डियन की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ISI ने इसके लिए एक करोड़ बांग्लादेशी टका का फ़ंड भी जारी किया है. रिपोर्ट के अनुसार, जांच अधिकारियों ने कहा है कि ISI ने कुछ सोशल मीडिया इंफ़्लुएंसर्स को भी टारगेट किया है. उनके जरिए भारत के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की साज़िश रची जा रही है. अभी इसको लेकर सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. हालांकि, इसमें अविश्वसनीयता की गुंज़ाइश बेहद कम है. 27 सितंबर 2021 को उरी में लश्कर-ए-तैयबा का एक आतंकी पकड़ा गया था. उसने बताया कि ISI कश्मीर के बारे में दुष्प्रचार करती रहती है. ISI ये प्रचार करती है कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना मुस्लिमों का नरसंहार कर रही है. इसी दुष्प्रचार के जरिए नए लोगों को घुसपैठ करने या भारत में आतंकी हमला करने के लिए तैयार किया जाता है. जुलाई 2021 में फ़ेसबुक ने 40 से अधिक अकाउंट्स सस्पेंड किए थे. इन अकाउंट्स से भारत में मुस्लिमों के साथ होने वाले व्यवहार को लेकर अनाप-शनाप अफ़वाहें फैलाईं जा रही थी. मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कई अकाउंट्स अल्फ़ा प्रो नाम की एक पाकिस्तानी पीआर फ़र्म से जुड़े थे. इसके क्लाइंट्स में DG-ISPR का भी नाम है. ये पाकिस्तान आर्मी का इंफ़ॉर्मेशन विंग है. ये विंग ISI को भी रिपोर्ट करता है. पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा की लिस्ट बड़ी लंबी है. पाकिस्तान के इस पहलू पर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे. प्रोपेगैंडा अपने आप में नकारात्मक शब्द नहीं है. इसका शाब्दिक अर्थ होता है, किसी संदेश को सटीक तरीके से टारगेट ऑडियंस तक पहुंचाना. लेकिन जिस तरह से नेताओं और कुछ देशों ने इसका इस्तेमाल ग़लत फायदे के लिए किया है. प्रोपेगैंडा शब्द सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं.
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