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ISI के पूर्व मुखिया गिरफ्तार, इमरान ख़ान से दोस्ती भारी पड़ी?

इतिहास में पहली बार ISI के किसी पूर्व या मौजूदा चीफ़ का कोर्ट मार्शल हो रहा है. इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (ISI) के पूर्व मुखिया फैज़ हमीद अब सलाखों के पीछे हैं. क्या है उनकी कहानी?

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13 अगस्त 2024 (अपडेटेड: 14 अगस्त 2024, 11:17 AM IST)
Faiz Hameed
Faiz Hameeed
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ये कहानी एक फ़ौजी की है. जो अपने मुल्क की ख़ुफ़िया एजेंसी का मुखिया बना. अगर सब ठीक चलता तो फ़ौज का सबसे बड़ा अफ़सर बन सकता था. मगर रास्ते में पत्थर मिले. जो उसकी किस्मत पर भी पड़े. जिसके चलते बीच में कुर्सी छोड़नी पड़ी. फिर 12 अगस्त 2024 को ख़बर आई कि उस अफ़सर को गिरफ़्तार कर लिया गया है. उसके ख़िलाफ़ कोर्ट मार्शल चलाने की तैयारी हो रही है.  

ये कहानी पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के पूर्व डायरेक्टर-जनरल फ़ैज हमीद की है. इतिहास में पहली बार ISI के किसी पूर्व या मौजूदा चीफ़ का कोर्ट मार्शल हो रहा है.  फैज़ हमीद इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (ISI) के पूर्व मुखिया थे.  जून 2019 से सितंबर 2021 तक इस पद पर रहे. अब सलाखों के पीछे हैं. 

ISI की कहानी क्या है?

भारत के विभाजन से पहले तक ख़ुफ़िया जानकारियां जुटाने का काम इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) का था. अगस्त 1947 के बाद दोनों मुल्क़ों में IB ने नए सिरे से काम शुरू किया. IB में पुलिसवालों को रखा जाता था. इसका मुखिया पुलिस डिपार्टमेंट का सीनियर अफ़सर होता था. 1947-48 में कश्मीर के मसले पर भारत और पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध हुआ. इसमें पाकिस्तानी IB अक्षम साबित हुई. इसलिए, पाकिस्तान के हुक्मरानों ने तय किया कि एक ऐसी ख़ुफ़िया एजेंसी बनाई जाए, जिसका फ़ोकस भारत पर हो. इसी मकसद से 1948 में इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की स्थापना की गई. आमतौर पर इसमें तीनों सेनाओं के लोगों को शामिल किया जाता है. इसलिए इसको इंटर-सर्विसेज कहा जाता है. हालांकि, ISI आम लोगों को भी काम पर लगाती है.

जासूसी को अक्सर अज्ञात बने रहने की कला के तौर पर देखा जाता है. लेकिन ये बात ISI पर लागू नहीं होती. इसके कई उदाहरण मिलते हैं. मसलन, जब पहले राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा ने रात के अंधेरे में पाकिस्तान छोड़ा, तब अयूब ख़ान सत्ता में आए. अयूब ख़ान मिलिटरी से थे. ISI का अनुशासन भी मिलिटरी वाला ही था. अयूब को ये साथ रास आया. वो ISI के जरिए अपने विरोधियों पर नज़र रखने लगे.

उसी दौर में पूर्वी पाकिस्तान में स्वायत्तता की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ. पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा था. उनकी भाषा और संस्कृति को दबाया जा रहा था. पश्चिमी पाकिस्तान में बैठे सत्ताधीशों ने आवाज़ सुनने की बजाय दबाने की साज़िश रची. शुरुआती दौर में ये काम ISI को सौंपा गया. इस तरह एजेंसी इंटरनल पॉलिटिक्स में शामिल हो गई. वो पूर्वी पाकिस्तान के राजनेताओं, पत्रकारों, आलोचकों आदि पर नज़र रखने लगी. 

1971 के युद्ध में पाकिस्तान की करारी हार हुई. पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया. पाकिस्तान में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सत्ता में आए. उन्होंने भी ISI का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया. भुट्टो बड़े शौक से अपने करीबियों के फ़ोन टैप कराते थे. फिर ऐसे लोगों को मिलने के लिए बुलाया जाता था. उनके सामने ही टेप बजाया जाता. और, फिर उनसे इस्तीफ़ा ले लिया जाता था. भुट्टो को उनके ही वफ़ादार जनरल ज़िया उल-हक़ ने ठिकाने लगा दिया. फिर जनरल ज़िया ने भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) को काबू में करने के लिए ISI का इस्तेमाल किया. 1980 के दशक में जब बेनज़ीर भुट्टो निर्वासन में लंदन में थीं, तब उनके घर के बाहर ISI के एजेंट्स पहरा देते थे. 

बेनज़ीर 1986 में चुनाव लड़ने पाकिस्तान लौटीं. जनरल ज़िया को डर था कि बेनज़ीर चुनाव जीत लेंगी. उन्होंने उस समय ISI के डायरेक्टर जनरल हामिद गुल को मिलने के लिए बुलाया. इस मुलाक़ात के कुछ समय बाद ‘इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद’ (IJI) की स्थापना की गई. ये नौ पार्टियों का संगठन था. इसको पर्द के पीछे से ISI चला रही थी.
1988 में बेनज़ीर चुनाव जीतीं. मगर उनके पास बस सत्ता आई थी, शक्ति नहीं. उन्हें मिलिटरी लीडरशिप की कई शर्तें भी माननीं पड़ी. इनमें से एक शर्त ये थी कि ISI चीफ़ के पद से हामिद गुल को नहीं हटाया जाएगा.
1989 में बेनज़ीर भुट्टो का हामिद गुल के साथ टकराव हुआ. बेनज़ीर ने गुल को बर्खास्त कर दिया. ISI चीफ़ की कुर्सी पर वो अपने विश्वासपात्र को ले आईं. इससे पहले कि नए चीफ़ ऑफ़िस में दाखिल होते, सारे अहम कागज़ात ISI के हेडक़्वार्टर से उठाकर सेना मुख्यालय में पहुंचाए जा चुके थे.
1999 में जब नवाज़ शरीफ़ को आर्मी चीफ़ परवेज़ मुशर्रफ़ से ख़तरा महसूस हुआ, तब उन्होंने ISI चीफ़ ज़ियाउद्दीन बट्ट से मदद मांगी थी. ये अलग बात है कि उनकी ये कोशिश फ़ेल हो गई. मुशर्रफ़ ने शरीफ़ का तख़्तापलट कर दिया. शरीफ़ को पहले जेल और बाद में निर्वासन में जाना पड़ा.

इन सबके अलावा, सोवियत-अफ़ग़ान वॉर और फिर वॉर ऑन टेरर में ISI ने अहम भूमिकाएं निभाई. एक समय उसने अमेरिका के पैसों से मुजाहिदीनों को मदद दी. फिर उसी ने तालिबान बनवाया. जब अमेरिका ने वॉर ऑन टेरर शुरू किया, तब ISI ने अमेरिका की मदद भी की. कई आतंकियों को अरेस्ट भी कराया. उसी समय ISI पर तालिबान और दूसरे घोषित आतंकियों को पनाह देने के आरोप भी लगते रहे.

ISI की कुछ और बातें जान लीजिए

- ये पाकिस्तान की सबसे बड़ी और सबसे ख़ास ख़ुफ़िया एजेंसी है. इसका बजट क्लासीफ़ाईड है. यानी, इसके बारे में पब्लिक डोमेन में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. माना जाता है कि एजेंसी के पाकिस्तान के अंदर और पाकिस्तान से बाहर 10 हज़ार से अधिक एजेंट हैं.
- ISI की जवाबदेही सेना के प्रति है. सिविलियन सरकार के प्रति नहीं. इस वजह से ये अक्सर बेलगाम घोड़े की तरह काम करती है.
- 2008 में तत्कालीन पाक पीएम युसुफ़ रज़ा गिलानी ने ISI को गृह मंत्रालय के अंदर लाने की कोशिश की थी. मगर सेना ने इसका विरोध किया. कुछ घंटों के अंदर ही गिलानी को अपना फ़ैसला बदलना पड़ा था.

- ISI का डायरेक्टर-जनरल आर्मी का कोई थ्री-स्टार जनरल होता है. उसकी नियुक्ति आर्मी चीफ़ करते हैं. परंपरा ये रही है कि आर्मी चीफ़ तीन नाम प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं. प्रधानमंत्री उनमें से अपनी पसंद के व्यक्ति को नियुक्त करते हैं. ये प्रथा चली आ रही है. लेकिन माना जाता है कि प्रधानमंत्री हमेशा ही आर्मी चीफ़ की पसंद पर हामी भर देते हैं. उनके पास बहस की गुंज़ाइश नहीं होती.


मगर इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री रहते हुए इस प्रथा को चुनौती देने की कोशिश की. जिसके चलते उनका फ़ौज से झगड़ा हुआ. अंत में इमरान को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी.
झगड़े का बैकग्राउंड क्या था?
अगस्त 2018 में इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. उस समय आसिम मुनीर ISI के मुखिया हुआ करते थे. जो अभी पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ हैं. इमरान को प्रधानमंत्री बनवाने में फ़ौज ने अहम भूमिका निभाई थी.

ख़ैर, 2019 में ISI चीफ़ के तौर पर मुनीर का कार्यकाल खत्म हो गया. तब फैज़ हमीद को ISI की कमान दी गई. इमरान और फ़ैज हमीद के बीच अच्छा तालमेल था. इमरान इस दोस्ती का इस्तेमाल अपने विरोधियों पर नियंत्रण रखने के लिए कर रहे थे. वो पाकिस्तान और अफ़ग़ान तालिबान के बीच पुल का काम भी कर रहे थे. जब अगस्त 2021 में अमेरिका की फ़ौज ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ा, तब इमरान ने तालिबान की ख़ूब तारीफ़ की थी. कहा था कि तालिबान ने ग़ुलामी की जंज़ीरें तोड़ीं है. इसके कुछ दिनों बाद ही फ़ैज हमीद काबुल गए. तालिबान के नेताओं से मिलने. इमरान ने उन्हें पाकिस्तान सरकार का प्रतिनिधि बनाकर भेजा था. इससे हमीद की क़रीबी का अंदाज़ा मिल रहा था.

फिर आया अक्टूबर 2021. नए ISI चीफ़ की नियुक्ति का समय आया. चर्चा चली कि हमीद को एक्सटेंशन मिलेगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. फ़ौज ने बिना प्रधानमंत्री को बताए नदीम अंज़ुम को ISI का मुखिया नियुक्त कर दिया. इससे इमरान नाराज़ हो गए. उन्होंने नोटिफ़िकेशन जारी करने से मना कर दिया. हालांकि, बाद में उन्हें फ़ौज की बात माननी पड़ी. कहा जाता है कि यहीं से फ़ौज और इमरान के बीच संबंध ख़राब होने लगे. आख़िरकार, अप्रैल 2022 में विपक्ष उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया. इमरान को कुर्सी छोड़नी पड़ी. उसके बाद दो बार उनको गिरफ़्तार किया गया. पहली बार मई 2023 में. उस दफ़ा गिरफ़्तारी के बाद हिंसा भड़की थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उनको छोड़ दिया गया.
दूसरी दफ़ा इमरान अगस्त 2023 में अरेस्ट हुए. तब से जेल में ही हैं. कुछ मामलों में सज़ा भी मिली. जबकि सौ से अधिक केस अलग से चल रहे हैं.


फ़ैज हमीद की कहानी 

नवंबर 2021 में वो पेशावर कोर के कमांडर बन गए. अगस्त 2022 तक पद पर रहे. फिर उनको बहावलपुर कोर का कमांडर बनाया गया. उसी समय पाकिस्तान में आर्मी चीफ़ की नियुक्ति पर विचार चल रहा था. लिस्ट में फ़ैज हमीद का भी नाम था. मगर उनको नहीं चुना गया. 29 नवंबर 2022 को आसिम मुनीर ने आर्मी चीफ़ के तौर पर शपथ ली. उसी रोज़ फ़ैज हमीद ने अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. जबकि उनका कार्यकाल अप्रैल 2023 तक का था.

ये तो हुई फ़ैज हमीद की नियुक्ति और रिटायरमेंट की कहानी. उनको गिरफ़्तार क्यों किया गया है?

दो आरोप लगे हैं. 
- पहला आरोप पाकिस्तान आर्मी एक्ट के उल्लंघन का है. इसको लेकर कोई और जानकारी बाहर नहीं आई है.
- दूसरा आरोप लूटपाट का है.

ये मामला नवंबर 2023 में चर्चा में आया था. तब मोइज़ ख़ान नाम के एक बिल्डर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दर्ज कराई.  मोइज़ खान, टॉप सिटी नाम की हाउसिंग सोसाइटी के मालिक हैं. ये महंगे और आलीशान घर बेचती है. मोइज़ ने ये आरोप लगाया कि मार्च 2017 में फ़ैज हमीद के आदेश पर पाकिस्तानी रेंजर्स ने उनके घर रेड डाली. वहां से महंगे आभूषण और कैश ज़ब्त करके ले गए. आरोप के मुताबिक़, हमीद ने उनसे चार करोड़ पाकिस्तानी रुपये की रिश्वत भी ली. बाद में हमीद के भाई सरदार नज़फ़ ने समझौता करने के लिए संपर्क किया. सरदार नज़फ़ भी पाकिस्तानी सेना में अफ़सर रह चुके हैं. उनको मार्च 2024 में भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ़्तार किया जा चुका है.

ख़ैर, मोइज़ ख़ान की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय को जांच करने का आदेश दिया. अप्रैल 2024 में पाक फ़ौज ने हाई लेवल कमिटी बनाई. फिर 12 अगस्त को स्टेटमेंट जारी कर बताया कि फ़ैज हमीद को गिरफ़्तार कर लिया गया है. उनके ख़िलाफ़ आर्मी एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाएगा.

आगे चलने से पहले फ़ैज हमीद की कहानी जान लेते हैं. पाकिस्तानी सेना के इतिहास में उन अफ़सरों को उंगलियों पर गिना जा सकता है, जो दो अलग-अलग कोर के कमांडर रहे. पिछले 75 बरसों में सिर्फ़ 11 लेफ्टिनेंट जनरलों ने एक से ज़्यादा कोर की कमान संभाली है. फैज़ हमीद उनमें से एक थे.
फैज़ का जन्म चकवाल के लतीफाल गांव में हुआ था. 1987 में उन्होंने पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में दाखिला लिया. ISI के मुखिया बनने से पहले वो काउंटर-इंटेलिजेंस विंग के हेड हुआ करते थे. 2021 में ISI से फारिग होने के बाद उन्होंने 8 महीने तक पेशावर के कोर कमांडर के रूप में काम किया. कुछ हफ्तों के लिए बहावलपुर के कोर कमांडर भी बने. नवंबर 2022 में जनरल आसिम मुनीर के सेना प्रमुख बनने के अगले दिन उन्होंने सेना से इस्तीफ़ा दे दिया था.
फैज़ हमीद की सबसे बड़ी उपलब्धियों में अफ़ग़ान पीस टॉक्स मानी जाती हैं. तालिबान के आने के बाद अमेरिका वहां से निकल गया था. इस पूरी पीस प्रोसेस में अमेरिका ने पाकिस्तान को भी शामिल किया था. पाकिस्तान की तरफ से जनरल फैज़ हमीद ने तालिबान के साथ बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

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