जीडीपी के आंकड़े बुरे आए हैं फिर भी शेयर मार्केट बमबम क्यों है?
जीडीपी इतनी गिरती जा रही है कि इसके शुरू में जी लगाने का भी मन नहीं करता.
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शेयर मार्केट (सांकेतिक तस्वीर: AP)
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जीडीपी के नए आंकड़े आए हैं. 29 मई, 2020 को. वित्त वर्ष 2019-20 के चौथी तिमाही के. मतलब जनवरी 2019 से मार्च 2020 तक के. और चूंकि चौथी तिमाही किसी वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही होती है तो कहा जा सकता है कि वित्त वर्ष 2019-20 के जीडीपी के आंकड़े आ गए हैं. ‘कहा जा सकता है’ शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया क्यूंकि अभी पूरे वित्तीय वर्ष के लिए ये एक प्रोविजनल डेटा है, जिसमें बाद में सुधार किया जाएगा.
तो
जीडीपी में पिछली तिमाही की तुलना में 1.0 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
और
सकल का मतलब सभी. घरेलू माने घर संबंधी. यहां घर का आशय देश है. उत्पाद का मतलब है उत्पादन. प्रोडक्शन. कुल मिलाकर देश में हो रहा हर तरह का उत्पादन. उत्पादन कहां होता है? कारखानों में, खेतों में. कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया. इस तरह उत्पादन और सेवा क्षेत्र की तरक्की या गिरावट का जो आंकड़ा होता है, उसे जीडीपी कहते हैं.
अब की बात क्या करें, पिछली की पिछली तिमाही, 2019 की जुलाई -सितम्बर में जीडीपी 4.5 फीसद तक गिर गई थी. (फ़ाइल फ़ोटो: इंडिया टुडे)
जब आम के आम और गुठलियों के भी दाम लगा लिए जाएं तो समझो जीडीपी की गणना हो गई. (गेट्टी इमेजेस)
जीडीपी की गणना हर तिमाही होती है. जिम्मेदारी मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिक्स ऐंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के तहत आने वाले सेंट्रल स्टेटिक्स ऑफिस की. यानी हर तीन महीने में देखा जाता है कि देश का कुल उत्पादन पिछली तिमाही की तुलना में कितना कम या ज्यादा है. भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीन अहम हिस्से हैं, जिनके आधार पर जीडीपी तय की जाती है. इसके लिए देश में जितना भी प्रोडक्शन होता है, जितना भी व्यक्तिगत उपभोग होता है, व्यवसाय में जितना निवेश होता है और सरकार देश के अंदर जितने पैसे खर्च करती है उसे जोड़ दिया जाता है. इसके अलावा कुल निर्यात (विदेश के लिए जो चीजें बेची गईं है) में से कुल आयात (विदेश से जो चीजें अपने देश के लिए मंगाई गई हैं) को घटा दिया जाता है. जो आंकड़ा सामने आता है, उसे भी ऊपर किए गए खर्च में जोड़ दिया जाता है. यही हमारे देश की जीडीपी है.
वैसे जानकारों का मानना है कि अगर एक बार जीडीपी 5 प्रतिशत के नीचे गिर जाए, तो उसे वापिस खींचकर स्थापित कर पाना बहुत मुश्किल है.
निफ़्टी 50. भारत की 50 सबसे बड़ी कंपनियों की सेहत बताता है. फ़रवरी के महीने में निफ़्टी 50, अपने उच्चतम स्तर पर था. साढ़े बारह हज़ार पॉइंट्स के लगभग पर. फिर ‘कित्थो आया कोरोना?’. फिर लॉकडाउन. इस सबके चलते बाज़ार में ऐसा हाहाकर मचा कि निफ़्टी 50 सिर्फ़ एक महीने में ही साढ़े सात हज़ार के क़रीब पहुंच गया. यानी इसकी सेहत में 40 प्रतिशत की गिरावट देखते ही देखते हो गई. जून 2014 वो पहला मौक़ा था तब निफ़्टी साढ़े सात हज़ार में पहुंचा था. यानी लगभग 6 सालों में आपको मार्केट ने शून्य रिटर्न दिया. इतने में तो एफडी में भी पैसे दुगने के क़रीब पहुंच जाते.
बहरहाल, 23 मार्च, 2020 के बाद ये थोड़ा सुधरना शुरू हुआ और घटते-बढ़ते, गिरते-पड़ते, अंततः 01 जून, 2020 को 9,826 में बंद हुआ. यानी-
4-5 दिनों से लगातार तेज़ी में चल रहा शेयर मार्केट, 1 जून, 2020 को भी लगभग वहीं खड़ा है, जहां 9 जून, 2017 को खड़ा था. (ये गूगल फ़ाईनेंस से लिया गया स्क्रीन शॉट है.)
यानी ये नहीं हुआ कि शेयर मार्केट पूरी तरह स्वस्थ होकर दौड़ने लगा है. ये ज़रूर हुआ है कि आईसीयू से निकल चुका है और स्वास्थ्य लाभ ले रहा है. हो सकता है, किसी दिन चलने फिरने लगे और फिर कुछ दिनों बाद दौड़ भी लगाए. लेकिन दिल्ली अभी…
#2) छुई मुई-
कुछ बच्चे होते हैं, जिनका इम्यून सिस्टम बड़ा बिगड़ा रहता है. उनके मां बापों को चिंता लगी रहती है, कहीं आइसक्रीम न खा ले, सर्दी लग जाएगी. कहीं बाहर का न खा ले, फ़ूड पॉईज़निंग हो जाएगी. शेयर मार्केट भी इकॉनमी का जाया वही संवेदी बच्चा है. इसलिए ही तो सेंसेक्स (30 टॉप शेयर्स से बना सूचकांक) को संवेदी सूचकांक भी कहते हैं.
मतलब एक कंपनी के सीईओ के एक ट्वीट भर से कंपनी की मार्केट में वैल्यू अरबों में घट जाती है. हम यहां पर एलन मस्क की बात कर रहे हैं.
तो अबकी बार भी यही हुआ है. लॉकडाउन के बाद 1 जून ही वो तारीख़ थी जिस दिन के बाद इसमें सबसे ज़्यादा ढील हो गई है. साथ ही 1 जून को पहला दिन नहीं है, जब शेयर मार्केट में रैली चली. पिछले 4 दिनों से मार्केट में तेज़ी है, और ये 9,000 से 9,826 तक पहुंच गया. चार दिन पहले यूएस में कोरोना के टीके को प्रारंभिक सफलता मिल गई बताई गई. तो ये और ऐसे ‘छोटे-छोटे’ दो तीन कारणों ने मिलकर शेयर मार्केट को ‘शॉर्ट टर्म’ में बढ़ा दिया. शॉर्ट टर्म में क्यूं? इसकी बात आगे करेंगे.
#3) -(आशंका) = उम्मीद-
इंट्रेस्टिंग गणित है. समझकर मज़ा आएगा. शेयर मार्केट आशंकित था कि GDP बहुत ज़्यादा घटेगी. और इसके एवज़ में पहले ही डाउन थी. और GDP घटी तो सही, लेकिन उतनी नहीं, जितनी आशंका थी. बची हुई आशंका का बफ़र उम्मीद में बदल गया. और शेयर मार्केट बम-बम हो गया.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज. दो ऐसी जगहें जहां शेयर्स की ट्रेडिंग होती है. मतलब इनके दाम तय होते हैं.
#4) अभी तो ये अंगड़ाई है-
कहा जाता है कि शेयर मार्केट में दो तरह के लोग होते हैं. एक, जो पैसा लेकर आते हैं दूसरे जो अनुभव लेकर आते हैं. पैसा लेकर आने वाले अनुभव लेकर जाते हैं और अनुभव लेकर आने वाने मार्केट से पैसे लेकर विदा लेते हैं. तो जिन्हें लग रहा है कि शेयर मार्केट का बुरा दौर ख़त्म हुआ चाहता है, विशेषज्ञों की नज़रों में वो पहली कैटेगरी में आते हैं. यानी अभी तो असली गिरावट शुरू हाई नहीं हुई है. यूं कि-
#5) हाथी के दांत-
और अंत में सवाल ये भी है कि क्या शेयर मार्केट देश की इकॉनमी से ‘क्यू’ लेता है? लंबी अवधियों के लिए तो यक़ीनन लेता है, क्यूंकि जब देश की कंपनियां और अलग-अलग सेक्टर्स बढ़ेंगे तो देश बढ़ेगा. लेकिन छोटी अविधियों में शेयर मार्केट और देश की इकॉनमी, एक दूसरे से अगर पूरी तरह नहीं भी तो काफ़ी हद तक, डिटेच्ड रहती हैं. गाफ़िल रहती हैं. असंबद्ध रहती हैं.
अब यही देख लीजिए, हमने आपको बताया था न कि फ़रवरी 2020 में शेयर मार्केट अपने जीवन के उच्चतम स्तर पर था. देश की आर्थिक स्थिति तो तब भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. ऑटो सेक्टर से शुरू हुई मंदी सभी सेक्टर्स और पूरे देश को अपनी गिरफ़्त में ले रही थी. जीडीपी, तब भी गिरने के रिकॉर्ड तोड़ रही थी. इसका असर धीरे-धीरे शेयर मार्केट पर भी पड़ना ही था, ऑटो सेक्टर्स वाले शेयर्स तो धड़ाम होना शुरू भी हो गए थे, लेकिन लोग तब भी आश्चर्य जता रहे थे कि देश नीचे जा रहा है और मार्केट ऊपर. ऐसा कैसे?
ऐसा इसलिए क्यूंकि मार्केट, डेली या वीकली बेसेस पर देश की आर्थिक स्थिति का रिज़ल्ट नहीं देता. लेकिन अगर लंबी अवधि, जैसे या साल भर की या तीन साल की, स्टडी करेंगे तो पाएंगे कि देश और शेयर मार्केट एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं. कभी कोई लीड ले लेता है, कभी कोई, पर रास्ता और मंज़िल दोनों की एक होती है.
अब आप कहेंगे कि एक बार तो हमने मार्केट के लिए ‘संवेदी’ कहा था और अब इसे तटस्थ कह रहे हैं. चलिए और स्पेसिफ़िक होकर कहते हैं-
शॉर्ट टर्म में सूचकांक संवेदी और तटस्थ दोनों ही है. लेकिन लॉन्ग रन में ये देश के आर्थिक बुख़ार को नापने का बढ़िया थर्मामीटर है.
शेयर मार्केट (सांकेतिक तस्वीर)
कैसे?
सुबह 9 बजे मार्केट खुलता है. यानी 29 मई को, सिर्फ़ 3 घंटे में, या 12 बजे तक आइडिया के शेयर 32% से ज़्यादा बढ़ गए. (गूगल फ़ाईनेंस)
अब ज़रा वोडाफ़ोन शेयर का 5 सालों परफ़ोर्मेंस भी देख लें. (गूगल फ़ाईनेंस)
अतः आपसे अंत में ये अनुरोध है कि इस वाली स्टोरी को दो एक साल बाद फिर से ज़रूर पढ़िएगा. तब, जैसा जावेद अख़्तर कहते हैं, ‘इतिहास की किताब का एक पन्ना पलटने में सौ-दो सौ साल निकल जाते हैं’ वैसे ही कभी बाद में 5 या 10 साल के ग्राफ़ में ये तेज़ी शायद ढूंढ़ने से भी न मिले.
तो
# 2019-20 की चौथी तिमाही में जीडीपी रही 3.1 प्रतिशत. ये कम है या ज़्यादा? चलिए तुलना करके बताते हैं. पिछली तिमाही में ये ये 4.1 प्रतिशत थी. और जब ये 4.1 रही थी तभी इसने निचले स्तर के कई सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, तो अबकि बार तो स्थिति और भी भीषण ठहरी.
जीडीपी में पिछली तिमाही की तुलना में 1.0 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.और
# 2019-20 की वार्षिक जीडीपी रही 4.2 प्रतिशत. अब आप पूछेंगे ये कम है या ज़्यादा? तो गौर करें कि पिछले वित्त वर्ष में ये 6.1 प्रतिशत रही थी. और इससे पहले के सालों यानी वित्तीय वर्ष 18-19, 17-18, 16-17 और 15-16 में ये क्रमशः 6.1, 7, 8.3, और 8 प्रतिशत रही थी.
# क्या होती है जीडीपी?
जीडीपी को हिंदी में कहते हैं सकल घरेलू उत्पाद.सकल का मतलब सभी. घरेलू माने घर संबंधी. यहां घर का आशय देश है. उत्पाद का मतलब है उत्पादन. प्रोडक्शन. कुल मिलाकर देश में हो रहा हर तरह का उत्पादन. उत्पादन कहां होता है? कारखानों में, खेतों में. कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया. इस तरह उत्पादन और सेवा क्षेत्र की तरक्की या गिरावट का जो आंकड़ा होता है, उसे जीडीपी कहते हैं.
अब की बात क्या करें, पिछली की पिछली तिमाही, 2019 की जुलाई -सितम्बर में जीडीपी 4.5 फीसद तक गिर गई थी. (फ़ाइल फ़ोटो: इंडिया टुडे)# और आसान तरीके से जानिए
मान लीजिए किसी खेत में एक पेड़ है. पेड़ है, तो बस छाया देता है. पेड़ आम का है, फल देता है तो किसान आम बेचकर पैसे कमाता है. ये पैसा किसान के खाते में जाता है, इसलिए पैसा देश का भी है. अब इस पेड़ को काट दिया जाता है. काटने के बाद पेड़ से जो लकड़ी निकलती है, उसका फर्नीचर बनता है. फर्नीचर का पैसा बनाने वाले के पास जाता है, यह पैसा भी देश का है. अब इस फर्नीचर को बेचने के लिए कोई दुकानवाला खरीदता है. दुकान वाले से कोई आम आदमी खरीद लेता है. आम आदमी पैसा खर्च करता है और दुकानदार के पास पैसा आ जाता है. खड़े पेड़ के कटने के बाद से कुर्सी-मेज बन जाती है, जिसे कोई खरीद लेता है. इसे खरीदने में पैसे खर्च होते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में जो पैसा आता है, वही जीडीपी है.# इसकी नपाई कैसे होती है?
सबसे पहले तय होता है बेस ईयर. यानी आधार वर्ष. एक आधार वर्ष में देश का जो उत्पादन था, वो इस साल की तुलना में कितना घटा-बढ़ा है? इस घटाव-बढ़ाव में का जो रेट होता है, उसे ही जीडीपी कहते हैं. गर उत्पादन बढ़ा है तो जीडीपी बढ़ी है. अगर तुलनात्मक रूप से उत्पादन घटा है तो जीडीपी में कमी आई है. इसे कॉन्स्ट्रैंट प्राइस कहते हैं, जिसके आधार पर जीडीपी तय की जाती है. यानी कि कीमत स्थिर रहती है. इसके अलावा एक और तरीका भी है. इसे करेंट प्राइस कहते हैं. चूंकि हर साल उत्पादन और अन्य चीजों की कीमतें घटती-बढ़ती रहती हैं, इसलिए इस तरीके को भी जीडीपी नापने के काम में लाया जाता है, जिसमें महंगाई दर भी शामिल होती है. हालांकि अपने देश में अभी करेंट प्राइस पर जीडीपी नहीं नापी जाती है. लेकिन इसकी मांग लंबे वक्त से हो रही है. केंद्र सरकार ने देश को जो पांच ट्रिलियन इकनॉमी बनाने की बात कही है, उसके लिए करेंट प्राइस को ही आधार बनाया गया है. जीडीपी का आंकलन देश की सीमाओं के अंदर होता है. यानी गणना उसी आंकड़े पर होगी, जिसका उत्पादन अपने देश में हुआ हो. इसमें सेवाएं भी शामिल हैं. मतलब बाहर से आयातित चीज़ों का जीडीपी में कोई बड़ा हाथ नहीं है.
जब आम के आम और गुठलियों के भी दाम लगा लिए जाएं तो समझो जीडीपी की गणना हो गई. (गेट्टी इमेजेस)जीडीपी की गणना हर तिमाही होती है. जिम्मेदारी मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिक्स ऐंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के तहत आने वाले सेंट्रल स्टेटिक्स ऑफिस की. यानी हर तीन महीने में देखा जाता है कि देश का कुल उत्पादन पिछली तिमाही की तुलना में कितना कम या ज्यादा है. भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीन अहम हिस्से हैं, जिनके आधार पर जीडीपी तय की जाती है. इसके लिए देश में जितना भी प्रोडक्शन होता है, जितना भी व्यक्तिगत उपभोग होता है, व्यवसाय में जितना निवेश होता है और सरकार देश के अंदर जितने पैसे खर्च करती है उसे जोड़ दिया जाता है. इसके अलावा कुल निर्यात (विदेश के लिए जो चीजें बेची गईं है) में से कुल आयात (विदेश से जो चीजें अपने देश के लिए मंगाई गई हैं) को घटा दिया जाता है. जो आंकड़ा सामने आता है, उसे भी ऊपर किए गए खर्च में जोड़ दिया जाता है. यही हमारे देश की जीडीपी है.
# जीडीपी क्यों ज़रूरी है?
जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है. अधिक जीडीपी का मतलब है कि देश की आर्थिक बढ़ोतरी हो रही है. अगर जीडीपी बढ़ती है तो इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था ज्यादा रोजगार पैदा कर रही है. इसका ये भी मतलब है कि लोगों का जीवन स्तर भी आर्थिक तौर पर समृद्ध हो रहा है. इससे ये भी पता चलता है कि कौन से क्षेत्र में विकास हो रहा है और कौन का क्षेत्र आर्थिक तौर पर पिछड़ रहा है.वैसे जानकारों का मानना है कि अगर एक बार जीडीपी 5 प्रतिशत के नीचे गिर जाए, तो उसे वापिस खींचकर स्थापित कर पाना बहुत मुश्किल है.
# लेकिन फिर शेयर मार्केट क्यूं बढ़ता जा रहा है?
#1) शेयर मार्केट का बढ़ना और रिकवरी करना दोनों अलग चीज़ें हैं-निफ़्टी 50. भारत की 50 सबसे बड़ी कंपनियों की सेहत बताता है. फ़रवरी के महीने में निफ़्टी 50, अपने उच्चतम स्तर पर था. साढ़े बारह हज़ार पॉइंट्स के लगभग पर. फिर ‘कित्थो आया कोरोना?’. फिर लॉकडाउन. इस सबके चलते बाज़ार में ऐसा हाहाकर मचा कि निफ़्टी 50 सिर्फ़ एक महीने में ही साढ़े सात हज़ार के क़रीब पहुंच गया. यानी इसकी सेहत में 40 प्रतिशत की गिरावट देखते ही देखते हो गई. जून 2014 वो पहला मौक़ा था तब निफ़्टी साढ़े सात हज़ार में पहुंचा था. यानी लगभग 6 सालों में आपको मार्केट ने शून्य रिटर्न दिया. इतने में तो एफडी में भी पैसे दुगने के क़रीब पहुंच जाते.
बहरहाल, 23 मार्च, 2020 के बाद ये थोड़ा सुधरना शुरू हुआ और घटते-बढ़ते, गिरते-पड़ते, अंततः 01 जून, 2020 को 9,826 में बंद हुआ. यानी-
# बेशक, निफ़्टी में अपने न्यूनतम स्तर (साढ़े सात हज़ार) से 30 प्रतिशत का सुधार हुआ है लेकिन अभी भी फ़रवरी, 2020 में बनाए अपने पीक से ये 20 प्रतिशत नीचे है.
# बेशक, जून 2014 वाली स्टेज से ये बढ़कर जून 2017 पर आ गया है (क्यूंकि निफ़्टी ने अपने जीवनकाल में 9,826 वाले लेवल को सबसे पहले जून 2017 में ही छुआ था) लेकिन अभी भी फ़रवरी, 2020 के लेवल से लगभग 3 साल पीछे चल रहा है.
4-5 दिनों से लगातार तेज़ी में चल रहा शेयर मार्केट, 1 जून, 2020 को भी लगभग वहीं खड़ा है, जहां 9 जून, 2017 को खड़ा था. (ये गूगल फ़ाईनेंस से लिया गया स्क्रीन शॉट है.)यानी ये नहीं हुआ कि शेयर मार्केट पूरी तरह स्वस्थ होकर दौड़ने लगा है. ये ज़रूर हुआ है कि आईसीयू से निकल चुका है और स्वास्थ्य लाभ ले रहा है. हो सकता है, किसी दिन चलने फिरने लगे और फिर कुछ दिनों बाद दौड़ भी लगाए. लेकिन दिल्ली अभी…
#2) छुई मुई-
कुछ बच्चे होते हैं, जिनका इम्यून सिस्टम बड़ा बिगड़ा रहता है. उनके मां बापों को चिंता लगी रहती है, कहीं आइसक्रीम न खा ले, सर्दी लग जाएगी. कहीं बाहर का न खा ले, फ़ूड पॉईज़निंग हो जाएगी. शेयर मार्केट भी इकॉनमी का जाया वही संवेदी बच्चा है. इसलिए ही तो सेंसेक्स (30 टॉप शेयर्स से बना सूचकांक) को संवेदी सूचकांक भी कहते हैं.
मतलब एक कंपनी के सीईओ के एक ट्वीट भर से कंपनी की मार्केट में वैल्यू अरबों में घट जाती है. हम यहां पर एलन मस्क की बात कर रहे हैं.
तो अबकी बार भी यही हुआ है. लॉकडाउन के बाद 1 जून ही वो तारीख़ थी जिस दिन के बाद इसमें सबसे ज़्यादा ढील हो गई है. साथ ही 1 जून को पहला दिन नहीं है, जब शेयर मार्केट में रैली चली. पिछले 4 दिनों से मार्केट में तेज़ी है, और ये 9,000 से 9,826 तक पहुंच गया. चार दिन पहले यूएस में कोरोना के टीके को प्रारंभिक सफलता मिल गई बताई गई. तो ये और ऐसे ‘छोटे-छोटे’ दो तीन कारणों ने मिलकर शेयर मार्केट को ‘शॉर्ट टर्म’ में बढ़ा दिया. शॉर्ट टर्म में क्यूं? इसकी बात आगे करेंगे.
#3) -(आशंका) = उम्मीद-
इंट्रेस्टिंग गणित है. समझकर मज़ा आएगा. शेयर मार्केट आशंकित था कि GDP बहुत ज़्यादा घटेगी. और इसके एवज़ में पहले ही डाउन थी. और GDP घटी तो सही, लेकिन उतनी नहीं, जितनी आशंका थी. बची हुई आशंका का बफ़र उम्मीद में बदल गया. और शेयर मार्केट बम-बम हो गया.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज. दो ऐसी जगहें जहां शेयर्स की ट्रेडिंग होती है. मतलब इनके दाम तय होते हैं.#4) अभी तो ये अंगड़ाई है-
कहा जाता है कि शेयर मार्केट में दो तरह के लोग होते हैं. एक, जो पैसा लेकर आते हैं दूसरे जो अनुभव लेकर आते हैं. पैसा लेकर आने वाले अनुभव लेकर जाते हैं और अनुभव लेकर आने वाने मार्केट से पैसे लेकर विदा लेते हैं. तो जिन्हें लग रहा है कि शेयर मार्केट का बुरा दौर ख़त्म हुआ चाहता है, विशेषज्ञों की नज़रों में वो पहली कैटेगरी में आते हैं. यानी अभी तो असली गिरावट शुरू हाई नहीं हुई है. यूं कि-
# जब भी मार्केट गिरती है, एक झटके में नहीं गिरती है, आप 2008 की मंदी देख लें. तब मार्केट अपने पीक, यानी 6,300 के लेवल से 2,500 के लेवल में आ गई थी. 60 प्रतिशत के लगभग की गिरावट के साथ. लेकिन ये सब एक-दो महीने में ही नहीं हो गया. मार्केट उठ-उठ के गिरा. जनवरी 2008 से फ़रवरी 2009 तक ये सिलसिला चलता रहा. कुल तेरह महीने. और ये केवल 2008 ही नहीं हर गिरावट की कहानी है.लब्बोलुआब ये कि मार्केट की ये तेज़ी, बनावटी है. शॉर्ट-लिव्ड है. और जल्द ही मार्केट लाल निशानों पर ट्रेड करना शुरू होगा.
# सोचिए अभी तो 2019-20 की चौथी तिमाही के नतीजे आए हैं. जिसमें सिर्फ़ एक महीने लॉकडाउन हुआ है. तब क्या होगा जब 2020-21 की पहली तिमाही के नतीजे आएंगे. वो काल जब हम पूरे समय लॉकडाउन में थे और सब कुछ ठप्प पड़ा था
# बाज़ार का टेक्निकल एनेलिसिस करने वाले भी कह रहे हैं कि अभी मार्केट 7,500 के लेवल को टेस्ट करने ज़रूर आएगा. और टेक्निकल एनेलिसिस करने वाले अपनी बात के सपोर्ट में डेटा पॉइंट्स से लेकर ग्राफ़ वग़ैरह, सब खोल कर दिखा दे रहे. ध्यान रहे कि टेक्निकल एनेलिसिस करने वाले ये विशेषज्ञ खबरों और बाज़ार के फ़ंडामेंटलस से नहीं ग्राफ़ और सांख्यिकी से पूर्वानुमान लगाते हैं. और इनके अनुसार शेयर के भावों का या निफ़्टी 50 जैसे इंडेक्स का बेस ऐसे नहीं बनता, कि छूकर निकल गए, जैसा निफ़्टी ने 7500 के स्तर पर किया था. बेस तो तब बनता है जब कोई शेयर या इंडेक्स उस निचले लेवल पर कुछ देर टिके. या फिर बार-बार उस लेवल को छूए. मतलब W शेप सरीखा बने. क्यूंकि, तेज़ी का काम शैतान का.इस ग्राफ़ में दो चीज़ों पर गौर कीजिए. पहली, 2008 की मंदी जनवरी से शुरू होकर नवंबर तक चली. और दूसरी, उसके बाद भी बाज़ार सीधे नहीं चढ़ने लगा. उसने नीचे के लेवल्स पर कंसोलिडेट किया, समय बिताया. नवंबर से 2008 से लेकर फ़रवरी 2009 तक का समय.
#5) हाथी के दांत-
और अंत में सवाल ये भी है कि क्या शेयर मार्केट देश की इकॉनमी से ‘क्यू’ लेता है? लंबी अवधियों के लिए तो यक़ीनन लेता है, क्यूंकि जब देश की कंपनियां और अलग-अलग सेक्टर्स बढ़ेंगे तो देश बढ़ेगा. लेकिन छोटी अविधियों में शेयर मार्केट और देश की इकॉनमी, एक दूसरे से अगर पूरी तरह नहीं भी तो काफ़ी हद तक, डिटेच्ड रहती हैं. गाफ़िल रहती हैं. असंबद्ध रहती हैं.
अब यही देख लीजिए, हमने आपको बताया था न कि फ़रवरी 2020 में शेयर मार्केट अपने जीवन के उच्चतम स्तर पर था. देश की आर्थिक स्थिति तो तब भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. ऑटो सेक्टर से शुरू हुई मंदी सभी सेक्टर्स और पूरे देश को अपनी गिरफ़्त में ले रही थी. जीडीपी, तब भी गिरने के रिकॉर्ड तोड़ रही थी. इसका असर धीरे-धीरे शेयर मार्केट पर भी पड़ना ही था, ऑटो सेक्टर्स वाले शेयर्स तो धड़ाम होना शुरू भी हो गए थे, लेकिन लोग तब भी आश्चर्य जता रहे थे कि देश नीचे जा रहा है और मार्केट ऊपर. ऐसा कैसे?
ऐसा इसलिए क्यूंकि मार्केट, डेली या वीकली बेसेस पर देश की आर्थिक स्थिति का रिज़ल्ट नहीं देता. लेकिन अगर लंबी अवधि, जैसे या साल भर की या तीन साल की, स्टडी करेंगे तो पाएंगे कि देश और शेयर मार्केट एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं. कभी कोई लीड ले लेता है, कभी कोई, पर रास्ता और मंज़िल दोनों की एक होती है.
अब आप कहेंगे कि एक बार तो हमने मार्केट के लिए ‘संवेदी’ कहा था और अब इसे तटस्थ कह रहे हैं. चलिए और स्पेसिफ़िक होकर कहते हैं-
शॉर्ट टर्म में सूचकांक संवेदी और तटस्थ दोनों ही है. लेकिन लॉन्ग रन में ये देश के आर्थिक बुख़ार को नापने का बढ़िया थर्मामीटर है.
शेयर मार्केट (सांकेतिक तस्वीर)कैसे?
# असल में ये शॉर्ट टर्म में संवेदी है छोटी-छोटी खबरों के लिए. जैसे 29 मई को सिर्फ़ इस एक खबर से वोडाफ़ोन के शेयर्स आसमान छूने लगे थे कि गूगल इसमें हिस्सेदारी ख़रीद सकता है. हालांकि खबर झूठ निकली और उसका असर भी अगले ट्रेडिंग सेशन में यानी 01 जून को फुर्र हो गया.
सुबह 9 बजे मार्केट खुलता है. यानी 29 मई को, सिर्फ़ 3 घंटे में, या 12 बजे तक आइडिया के शेयर 32% से ज़्यादा बढ़ गए. (गूगल फ़ाईनेंस)# और ये शॉर्ट टर्म में इसी के चलते बड़ी वास्तविकताओं से अनमूव्ड रहता है. मतलब आप देखिए न वोडाफ़ोन कंपनी की असल में हालत क्या है? टेलीकॉम सेक्टर की हालत क्या है? जो 29 मई के इस शेयर ये परफ़ॉरमेंस से तो नहीं ही पता चलती. लेकिन आप अगर वोडाफ़ोन शेयर को दो या तीन सालों के लिए ज़ूम आउट करके देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि शेयर मार्केट का डेटा और वास्तविकता कैसे एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं.
अब ज़रा वोडाफ़ोन शेयर का 5 सालों परफ़ोर्मेंस भी देख लें. (गूगल फ़ाईनेंस)अतः आपसे अंत में ये अनुरोध है कि इस वाली स्टोरी को दो एक साल बाद फिर से ज़रूर पढ़िएगा. तब, जैसा जावेद अख़्तर कहते हैं, ‘इतिहास की किताब का एक पन्ना पलटने में सौ-दो सौ साल निकल जाते हैं’ वैसे ही कभी बाद में 5 या 10 साल के ग्राफ़ में ये तेज़ी शायद ढूंढ़ने से भी न मिले.

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