पिछले कई सालों से यह एक बड़ी बहस बनी हुई है कि पेड़ काटना पर्यावरण की दृष्टि मेंउचित नहीं है, लेकिन विकास कार्यों के लिए पेड़ों को काटने की इजाजत दी जा सकती है.इसकी गूंज संसद, न्यायालयों, शिक्षण संस्थानों और यहां तक कि हमारे आसपास भी सुनाईदेती रहती है. जब दुनिया भर के तमाम बड़े-छोटे मंचों से जलवायु परिवर्तन से बचने केलिए पेड़ों की कटाई को रोकने और अत्यधिक पेड़ लगाने की आवाज बुलंद की जा रही है, तोऐसे में विकास के नाम पर पेड़ों को काटना किस हद तक जायज है, इस पर एकमत होना अभीबाकी है.बहरहाल भारत सरकार ने पेड़ों की कटाई को लेकर संसद में एक आंकड़ा पेश किया है, जोकि काफी चौंकाने वाला है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने लोकसभा में बताया है किसिर्फ वर्ष 2020-21 में ही देश के विभिन्न हिस्सों में 30 लाख 97 हजार 721 पेड़काटे गए थे. लगभग 31 लाख. मंत्रालय ने वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के तहत इसकीमंजूरी दी थी. केंद्र की दलील गुजरात के अहमदाबाद पश्चिम से भाजपा सांसद डॉ. किरीटप्रेमजीभाई सोलंकी ने इस संबंध में सवाल पूछा था, जिसे लेकर 21 मार्च को सरकार नेसदन में लिखित जवाबपेश किया.केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, 'संबंधित राज्यसरकारों/केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा विभिन्न कानूनों, नियमों और माननीय न्यायालयोंके निर्देश पर पेड़ों को काटने की इजाजत दी जाती है. हालांकि वर्ष 2020-21 में वन(संरक्षण) कानून 1980 के तहत मंत्रालय द्वारा 30.97 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरीदी गई थी.'वित्त वर्ष 2020-21 में पेड़ों की कटाई का आंकड़ा. (सोर्स: लोकसभा)किस राज्य में कितने पेड़ काटे गए? सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में. तकरीबन 16.40 लाखपेड़ों को काटने की इजाजत दी गई. इसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर आता है, जहां 3.11लाख पेड़ काटने की मंजूरी दी गई थी.इसके अलावा ओडिशा में 2.23 लाख, तेलंगाना में 1.53 लाख, महाराष्ट्र में 1.45 लाख,झारखंड में 1.04 लाख, गुजरात में 86 हजार 887, आंध्र प्रदेश में 69 हजार 969,कर्नाटक में 40 हजार 231, उत्तराखंड में 53 हजार 739, बिहार में 61 हजार 244 पेड़ोंको काटने की इजाजत दी गई थी.वहीं हरियाणा में 27 हजार 612, गोवा में 27 हजार 249, हिमाचल प्रदेश में 26 हजार886, राजस्थान में 8 हजार 619, तमिलनाडु में 7 हजार 691 और त्रिपुरा में 17 हजार686 पेड़ काटे गए थे.पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 में चंडीगढ़, दमन और दीव, दिल्ली,लक्षद्वीप, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, पुदुचेरी, सिक्किम और पश्चिम बंगाल में वनसंरक्षण कानून, 1980 के तहत कोई पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी गई थी.पर्यावरण मंत्रालय में 21 मार्च को एक और आंकड़ापेश किया. इसमें उन्होंने बताया कि वर्ष 2016-17 से 2020-21 यानी कि पांच सालों में1.20 करोड़ पेड़ों को काटने की इजाजत दी गई है. पेड़ काटने के एवज में कितने पौधेलगाए गए? केंद्र ने संसद में प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) का भी आंकड़ा पेश किया है.प्रतिपूरक वनीकरण का मतलब है कि संबंधित विकास कार्य के लिए जितने पेड़ काटे गए,उसके बदले में कितने पेड़ लगाए गए हैं. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहतप्रतीपूरक वनीकरण करना एक अनिवार्य शर्त है. इसमें वन भूमि को गैर-वन वाले कार्योंके लिए ट्रांसफर की जाती है.(फोटो: इंडिया टुडे)मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 में विभिन्न राज्यों में पेड़ों की कटाई केबदले 3 करोड़ 64 लाख 87 हजार पौधे लगाए गए थे. यह कार्य प्रतिपूरक वनीकरण के तहतकिया गया था. इसमें 358.87 करोड़ रुपये का खर्चा आया है.सरकार द्वारा सदन में पेश किए गए जवाब के मुताबिक झारखंड में 45 लाख पौधे लगाए गएथे. वहीं मध्य प्रदेश में 35.55 लाख, मणिपुर में 35.42 लाख, मिजोरम में 13.60 लाख,ओडिशा में 19.51 लाख, तेलंगाना में 41.03 लाख, उत्तराखंड में 32.08 लाख, उत्तरप्रदेश में 13.17 लाख, राजस्थान में 17.05 लाख, हरियाणा में 12.40 लाख, गुजरात में11.33 लाख पौधे लगाए गए थे. वनों को काटकर पौधे लगाना कितना लाभकारी है? पेड़ों कोकाटने को लेकर जब भी सवाल उठता है तो प्रशासन की यह दलील रहती है कि वे कानून केअनुसार पौधे लगाकर इसकी भरपाई कर रहे हैं. केंद्र सरकार भी संसद में यही जवाब देकरखुद को आरोपमुक्त करती आई है.हालांकि प्रतिपूरक वनीकरण कितना लाभकारी है, यह हमेंशा सवालों के घेरे में रहा है.ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जिसमें यह पता चला है कि वनों को काटकर जो पेड़ लगाएजाते हैं, उसमें से या तो अधिकतर सूख जाते हैं या मवेशी वगैरह उन्हें खा जाते हैंऔर उनका रखरखाव अच्छे से नहीं किया जाता है.खुद सरकारी आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं. पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 13 दिसंबर2021 को संसद में पेश किए गए एक लिखित जवाब के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 से2020-21 के बीच देश भर में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत जितने पौधे लगाए गएथे उसमें से 4.84 करोड़ पौधे खत्म हो गए.उन्होंने दावा किया कि इन पांच वर्षों में कुल 20.81 करोड़ पौधे लगाए गए थे, जिसमेंसे 15.96 करोड़ पौधों को ही बचाया जा सका है. इस आधार पर यदि राष्ट्रीय औसत देखेंतो प्रतिपूरक वनीकरण के तहत वन कटाई के बदले जितने पौधे लगाए जा रहे हैं, उसमें से24 फीसदी पौधे तमाम कारणों से खत्म हो जाते हैं.दूसरे शब्दों में कहें तो यदि सरकार यह दावा करती है कि उसने इतने पेड़ों को काटकरइतने पौधे लगाए हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि उसमें से सभी पौधे, पेड़ में तब्दीलहो जाएंगे. विशेषज्ञों का कहना है कि पौधों को पेड़ों में तब्दील होने का आंकड़ा औरभी कम है.मंत्रालय के मुताबिक साल 2016-17 में देश के 32 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशोंमें कुल 3.70 करोड़ पौधे लगाए गए थे, जिसमें से 1.25 करोड़ पौधे खत्म हो गए, उन्हेंबचाया नहीं जा सका. इसी तरह वर्ष 2017-18 में 4.68 करोड़ पौधे लगाए गए थे, जिसमेंसे 1.26 करोड़ पौधे खत्म हो गए. वहीं 2018-19 में 3.68 करोड़ पौधे लगाए गए थे,जिसमें से 79 लाख से अधिक पौधों को बचाया नहीं जा सका.इसके अलावा वित्त वर्ष 2019-20 में 4.70 करोड़ पौधे लगाए गए और उसमें से 81.19 लाखपौधे खत्म हो गए. इसी तरह 2020-21 में 4.04 करोड़ पौधे लगाए गए थे, जिसमें से 72.47लाख पौधों को बचाया नहीं जा सका था.मंत्रालय का कहना है कि प्रतिपूरक वनीकरण मैनेजमेंट और प्लानिंग अथॉरिटी (काम्पा याCAMPA) के तहत लगाए गए पौधों का रखरखाव पांच से दस सालों के लिए किया जाता है. इसअवधि के दौरान राज्यों के वन विभागों द्वारा वृक्षारोपण की नियमित निगरानी की जातीहै और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार किए जाते हैं. नए पौधों को जलवायु मिट्टी एवंअन्य संबंधित कारकों से बचाना होता है.