एक नया पैसा: क्रिप्टोकरेंसी की टर्मिनोलॉजी जान लीजिए
ब्लॉकचेन, प्रूफ ऑफ़ वर्क, हैश, कार्बन फूट प्रिंट वगैरह क्या होता है?
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क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग से लेकर लेनदेन तक एक बड़ी जटिल प्रक्रिया है (फोटो सोर्स -आज तक)
एक नया पैसा: पार्ट-4द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी को हराना सिर्फ़ इसलिए मुश्किल नहीं हो रहा था कि उसके पास लुफ़्तवाफ़ा जैसे जहाज़ या यू बोट जैसी पनडुब्बी या ब्लिट्ज़क्रीग जैसी वॉर-टेक्निक थी. एक और चीज़ थी, जो जर्मन को एलाइड नेशंस की तुलना में स्ट्रॉन्ग बनाती थी. ‘इनिग्मा मशीन’. जो संदेशों को ऐसे इनक्रिप्ट करती थी कि दुश्मन देश के लिए उसके राज़ जानना मुश्किल हो गया था. महीनों की मेहनत के बाद जिस टीम ने ‘इनिग्मा मशीन’ का कोड ढूँढा उसे लीड कर रहे थे एलन ट्यूरिंग. जो इतने फ़ेमस हुए कि आज भी कंप्यूटर के जनक कहे जाते हैं. हालांकि होमोफोबिया से जूझ रहे देशों में से एक UK ने 21 वीं सदी में जाकर उन्हें वो सम्मान देना शुरू किया जिसके वो हमेशा से हक़दार थे.हमारी ख़ास सीरीज़ ‘एक नया पैसा’ का ये चौथा एपिसोड है. इस एपिसोड में क्रिप्टोकरेंसी की टर्मिनोलॉजी की बात करेंगे. क्रिप्टो. शाब्दिक अर्थ कूट. मतलब किसी संदेश को ऐसे बदल देना कि, जिसे वो भेजा गया है, उसके अलावा किसी और के लिए उसे पढ़ना असंभव की हद तक मुश्किल हो. आप देखते हैं वट्सऐप में, ‘ये संदेश एंड-टू-एंड इनक्रिप्टेड है.’ इसका मतलब भी वही हुआ और क्रिप्टो करेंसी में भी कुछ-कुछ ऐसा ही होता है. पहले तीन एपिसोड में हम आपको करेंसी, क्रिप्टोकरेंसी और बिटकॉइन के बारे में बता चुके हैं. पर एक सवाल आपके मन में बना हुआ होगा, ये क्रिप्टोकरेंसी और बिटकॉइन काम कैसे करता है? एक शब्द में इसका जवाब है- ब्लॉकचेन.# ब्लॉकचेन-पिछले एपिसोड में जिन सतोशी नाकामोटो का ज़िक्र आया था उन्होंने 2009 में बिटकॉइन के लेन देन का हिसाब रखने के लिए बहीखाते की जो तकनीक इस्तेमाल की, बस वह तकनीक ही ब्लॉकचेन है. इस ब्लॉकचेन को ईज़ाद करते वक्त उन्होंने नारा दिया: छोटा मिलाते जाओ लार्ज बनाते जाओ. हालांकि हम सब जानते हैं कि ये नारा नाकामोटो ने नहीं दिया लेकिन ये ब्लॉकचेन का भी नारा हो सकता है. कैसे? इसका उत्तर मिलेगा तब, जब हम जानेंगे कि ये काम कैसे करता है.
# ब्लॉक + चेन = बही + खाता-
80 के दशक की फ़िल्मों में गैंग के मुखिया के पास एक डायरी होती थी जिसमें सभी काले कारनामों का हिसाब होता था. काम चाहे बेईमानी का हो पर हिसाब पूरी ईमानदारी से रखा जाता था. अब गैंग के गुर्गे थे तो बदमाश ही. तो कभी ना कभी, कोई न कोई घपला कर ही जाता. जब भी हिसाब में कोई गड़बड़ी करता तो बॉस उसे मगरमच्छों से भरे तालाब में डलवा देता.
अब मान लीजिए किसी डॉन का कारोबार इतना बढ़ जाए कि उसको सँभालना मुश्किल हो जाए तो? एक तो डॉन को हर समय ये डर लगा रहे के किसी के हाथ बहीखाता लगे और वो उसमें हेराफेरी करे तो पकड़ना मुश्किल हो जाए. ऊपर से ये कि मगरमच्छों का पेट भी तो लिमिटेड है. आख़िर कितना ओवर टाइम करेंगे. तो यही हुआ, डॉन का कारोबार चल निकला. मतलब मल्टीनेशनल. अब डॉन ने बेईमानी की समस्या का यह इलाज निकाला कि उसने डायरी या कहें बहीखाते के 10 हिस्से किए और उन्हें अलग-अलग लॉकर में सम्भाल कर रख दिया. पूरी बही को 10 लॉकर में बांट देने से यह फ़ायदा हुआ कि किसी को हेरफेर करनी हो तो उसे 10 डब्बों की चाबियाँ चाहिये होंगी. क्यूंकि ‘एकाउंट के कैरी फ़ॉर्वर्ड’ के कॉन्सेप्ट को इंट्यूटिवली आप समझ ही गए होंगे.
लेकिन यदि ये दसों चाबियाँ एक साथ रखी हों तो बात वही पड़ी. मतलब, ढूंढ़ने वाले को पहले एक चाबी ढूँढनी थी अब चाबी का गुच्छा ढूँढना पड़ेगा. यानी कुल जमा सुरक्षा में कोई ख़ास बढ़त न हुई. तो अब डॉन क्या करे? वो दस चाबियों को अलग-अलग छुपाकर रखे? लेकिन ये भी कम दिक्कत और ज़ोखिम भरा नहीं है. अव्वल तो दस जगहों में से किसी एक जगह रखी हुई चाबी डॉन भूल सकता है. फिर डॉन का कारोबार भी दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहा है. मतलब 10 से कल 11 होंगी चाबियाँ, फिर 12. और तीसरी दिक्कत ये कि इन 10 चाबियों में से अगर एक भी चाबी किसी गुर्गे के हाथ लग गई तो बेशक गुर्गा तो अकाउंट में हेर फेर न कर पाएगा, लेकिन डॉन की चाबियों की चेन टूट जाएगी और वो सारे खातों में एक्सेस न कर पाएगा.
मग़र डॉन यूं ही अपने संस्थान का CEO न था. उसने बड़ा फूलप्रूफ़ इलाज निकाला. उसने पहले वाले लॉकर में बहीखाते का एक हिस्सा रखा, उसमें ताला लगाया. बहीखाते का दूसरा हिस्सा दूसरे लॉकर में रखा और साथ ही इस दूसरे लॉकर में पहले लॉकर की चाबी भी डाल दी. इसी तरह उसने तीसरे लॉकर में बहीखाते का तीसरा हिस्सा और दूसरे लॉकर की चाबी डाल दी. यूं डॉन के पास हमेशा केवल एक चाबी रहती, अंतिम लॉकर की.
अब मानिए किसी को अगर कहीं हेरफेर करनी है तो उसे उसी अनुसार पूरे बहीखाते में हेरफेर करनी होगी. उसे दसवां लॉकर खोलकर, उस लॉकर के बहीखाते में परिवर्तन करके इस दसवें लॉकर में पड़ी चाबी से नौवाँ लॉकर खोलना होगा और फिर इस नवें लॉकर के बहीखाते में बदलाव करके यहां पड़ी चाबी से आठवाँ लॉकर खोलना होगा… एंड सो ऑन… इस तरह उसे पहले डब्बे तक पहुँचना होगा. यह भी ध्यान में रखिए के इस दौरान नए डब्बे भी जुड़ते जा रहे हैं. मतलब कुल मिलाकर अब डॉन अपने बनाए तामझाम से इतना संतुष्ट है कि अंतिम लॉकर की चाबी छुपाकर भी नहीं रखता. गोया चैलेंज कर रहा हो: डॉन के खाते को हैक करने की कोशिश को 11 मुल्कों के गुर्गे कर रहे हैं, लेकिन एक बात समझ लो, डॉन के खाते को हैक करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.
अच्छा चलिए अब एनॉलोज़ी बिठाते हैं. तो ऊपर के उदाहरण में एक लॉकर को एक ब्लॉक मान लीजिए और उन्हें एक चेन से जोड़ते चलिए तो बन गयी ब्लॉकचेन. ब्लॉक की चाबी को क्रिप्टो की भाषा में कहा जाता है ‘हैश’. तो हुआ न ब्लॉकचेन का नारा स्मॉल मिलाते जाओ लार्ज बनाते जाओ. या वो क्या कहते हैं: डब्बे पे डब्बा, डब्बे में key, जैसे Me का बहुवचन हो गया We. (PJ को इग्नोर कीजिए, कॉन्सेप्ट पर गौर कीजिए).
सीधे-सीधे कहें तो ब्लॉकचेन हुआ किसी क्रिप्टो का बही खाता, जो इस डेमोक्रेटिक करेंसी की ही तरह सबके लिए सर्वसुलभ है. मतलब जो चाहे देख सकता है कि आख़िर इसमें चल क्या रहा है. यूं बेईमानी नहीं हो सकती. लेकिन ये बही खाता यानी ब्लॉकचेन है इतनी पेचीदा कि इसकी हैकिंग भी नहीं हो सकती.

ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी क्रिप्टो को साइबर हैकिंग से बचाती है, लेकिन कई बार इस तकनीक के बावजूद क्रिप्टोकरेंसी के लेनदेन में साइबर फ्रॉड भी हो जाता है (प्रतीकात्मक फोटो- आज तक)
# प्रूफ़ ऑफ़ वर्क-प्रेम की तरह ट्रांजिक्शन भी दो लोगों के बीच होता है. लेकिन डिजिटल ट्रांजिक्शन में एक तीसरा आदमी या संस्था भी होती है. ये तीसरी संस्था कौन है? मेरे देश की संसद...
लेकिन हम बताते हैं. जब पहले के कुछ एपिसोड में हमने डिजिटल करेंसी और सेंट्रलाइज़्ड करेंसी के बीच अंतर जाना था तो ये भी जाना था कि डिजिटल करेंसी का पूरा लेखा-जोख़ा एक केंद्रीय एजेंसी के पास होता है. जिस कारण करेंसी के हेरफेर और नक़ली करेंसी को पकड़ा जा सकता है. लेकिन दूसरी तरफ़ क्रिप्टोकरेंसी का एक मुख्य फ़ीचर यह है कि यह डिसेंट्रलाइज़्ड है. यानी लेन-देन या ट्रांजिक्शन को वैरिफ़ाई करने के लिए कोई केंद्रीय एज़ेंसी नहीं होती. तो क्रिप्टोकरेंसी में ट्रांजिक्शन का वैरिफ़िकेशन क्रिप्टोकरेंसी के यूज़र्स या हम आप जैसे आम-जन ही करते हैं.और वैरिफ़िकेशन होता कैसे है? इसके लिए एक कठिन गणितीय सवाल को हल करना होता है. और इसी के लिए होता है एक तरह का ऑनलाइन कंपटीशन. यूं इस दौरान लेनदेन वैरिफ़ाई भी हो जाते हैं और इस गणितीय पज़ल को सबसे पहले हल करने वाले को ‘प्रूफ़ ऑफ वर्क’ के रूप क्रिप्टोकरेंसी मिल जाती है.
इसे दूसरी तरह से भी समझिए. डॉन वाले उदाहरण से. आपको अगर नए बहीखाते स्टोर करने होंगे तो नए लॉकर या नए ब्लॉक चाहिए होंगे. तो नए लॉकर या नए ब्लॉक जोड़ने के लिए ही ट्रांजिक्शन वैरीफ़ाई करने वालों को कुछ बिटकॉइन रिवॉर्ड के रूप में या ‘प्रूफ़ ऑफ वर्क’ के रूप में दिए जाते हैं.
एक और इंट्रेस्टिंग बात:
# जहां डिजिटल करेंसी या डिजिटल लेनदेन में लेनदेन करने वालों या उनमें से किसी एक को ये ट्रांजिक्शन अमाउंट देना पड़ता है. (जैसे 100 रूपये किसी को ट्रांसफ़र करने हों तो 102 रूपये लगेंगे जिसमें से 2 रूपये केंद्रीय एजेंसी के पास चले जाएंगे.)
# वहीं क्रिप्टोकरेंसी के मामले में ‘प्रूफ़ ऑफ वर्क’ वाला अमाउंट लेनदेन करने वालों की जेब से नहीं जाता. मतलब अगर आप किसी को 100 क्रिप्टोकरेंसी ट्रांसफ़र कर रहे हैं तो आपको कुछ भी एक्स्ट्रा नहीं देना.
तो फिर सवाल ये कि क्रिप्टो के ट्रांजिक्शन वैरिफ़ाई करने वालों को उनका ‘प्रूफ़ ऑफ़ वर्क कैसे मिलता है? इसका उत्तर ये है कि वैरीफ़िकेशन करना दरअसल माइनिंग सरीखा है.

प्रूफ ऑफ़ वर्क, क्रिप्टो के ट्रांजिक्शन को वेरीफाई करने पर मिलने वाला ईनाम कहा जा सकता है (प्रतीकात्मक फोटो- आज तक)
# माइनिंग-
जब आप कोई क्रिप्टो ट्रांजिक्शन वेरिफ़ाई कर रहे हो तो दरअसल आप एक ऐसी जगह खुदाई कर रहे हो, जहां क्रिप्टोकरेंसी की खान है. और अगर आपने कोई ट्रांजिक्शन सबसे पहले वेरिफ़ाई कर दिया तो जान लीजिए कि आपको खुदाई के दौरान क्रिप्टोकरेंसी मिल गईं. इसलिए ही तो इस वैरीफ़िकेशन या नए ब्लॉक जोड़ने की प्रक्रिया को ‘माइनिंग’ और ट्रांजिक्शन का वैरीफ़िकेशन करने वालों को ‘माइनर्स’ कहा जाता है.
अच्छा, जैसे सोने या कॉपर की खान में अनंत मात्रा में सोना और कॉपर नहीं होता, वैसे ही किसी क्रिप्टो की खान में भी सिर्फ़ निश्चित मात्रा तक ही क्रिप्टो होते हैं. जैसे सबसे प्रसिद्ध क्रिप्टो, बिटकॉइन की कुल संख्या मात्र 2.1 करोड़ ही है और 30 जनवरी, 2021 तक, लगभग 1,86,14,806 बिटकॉइन अस्तित्व में आ चुके हैं और अब सिर्फ़ 23,85,193 बिटकॉइन्स का खनन होना बाकी है.
बिटकॉइन की इसी कमी के चलते ‘प्रूफ़ ऑफ़ वर्क’ का अमाउंट घटता जाता है. मतलब एक साल पहले जिस ट्रांजिक्शन को वेरिफ़ाई करने के लिए आपको 1 बिटकॉइन मिलता, अब शायद आधा या पौना ही मिले और भविष्य में वो भी घटकर 0.0001 बिटकॉइन हो जाए. इसे भी माइनिंग की तरह समझिए. अतीत में जितना ज़्यादा सोना या ताँबा किसी खान से निकाला जा चुका होगा, भविष्य में उस खान से सोना या ताँबा निकालना उतना ही मुश्किल होता चला जाएगा. इसीलिए तो आपने देखा होगा कि कई खनन कार्य बंद हो जाते हैं. इसलिए नहीं कि अब वहां धातु नहीं, बल्कि इसलिए, क्यूंकि उनकी माइनिंग अब घाटे का सौदा साबित हो रही है.

क्रिप्टो की माइनिंग बहुत बड़े आकार के कंप्यूटर पर की जाती है (फोटो सोर्स -आज तक)
# कार्बन फुटप्रिंट-अब ज़रा उस बात को रिकॉल कीजिए कि वैरीफ़िकेशन के लिए एक मुश्किल सवाल को हल करना पड़ता है. सोचिए ज़रा ये सवाल कितना मुश्किल होता? क्या इतना कि आप इसे अकेले हल न कर पाएँ? न! इससे भी मुश्किल. क्या इतना कि इसके लिए कंप्यूटर का सहारा लेना पड़े? न! इससे भी मुश्किल.
इतना मुश्किल कि बड़े बड़े हॉल बराबर साइज़ के कंप्यूटर भी मिलकर इसे हल कर रहे हों तो भी चिंदियों के भाव ही ‘प्रूफ़ ऑफ़ वर्क’ कमा पाते हैं. और करेले पे नीम चढ़ा ये कि ‘प्रूफ़ ऑफ़ वर्क’ अमाउंट घटता चला जा रहा है. मतलब ये कि क्रिप्टो माइनिंग की इस पूरी प्रक्रिया में अच्छी ख़ासी प्रॉसेसिंग पावर और काफ़ी ऊर्जा खर्च हो रही है. और जितनी ऊर्जा किसी काम के लिए खर्च होगी उतना कार्बन उत्सर्जन उस काम के हिस्से में जाएगा. इसी कार्बन उत्सर्जन को कहते हैं कार्बन फुटप्रिंट और इसी कारण पर्यावरणविदों के बीच क्रिप्टोकरेंसी एक चिंता का विषय बन गई है.
अकेले बिटकॉइन की माइनिंग में हर साल लगभग 220 लाख टन कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन होता है. ये सब कितना बड़े स्तर पर हो रहा है इसे ऐसे समझें कि सिर्फ़ बिटकॉइन की माइनिंग में लगभग इतनी ऊर्जा खर्च हो रही है जितनी कि नीदरलैंड्स जैसे एक देश में खपती है. बिटकॉइन माइनर्स की एक अच्छी ख़ासी संख्या चाइना से आती है, जहां बिजली बनाने में अधिकतर कोयले का उपयोग होता है. यानी कार्बन फुटप्रिंट और बड़े साइज़ के. इसी के चलते कनाडा जैसे देशों में यह कोशिश की जा रही है की केवल रिन्यूएबल एनर्जी से ही माइनिंग की जाए. इस तरह की क्रिप्टो को ‘ग्रीन बिटकॉइन’ का नाम दिया गया है.

बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है(प्रतीकात्मक फोटो - इंडिया टुडे)
देखिए, ऐसा होता है कि बच्चा बोलना पहले सीखता है और ग्रामर बाद में. यही बात किसी नई टेक्नोलॉजी के लिए भी लागू होती है. मतलब ये कि अभी क्रिप्टो की ये तकनीक अपने शैशव काल में है. एक दिन इसकी ग्रामर भी सही हो जाएगी. और इसकी माइनिंग को लेकर पर्यावरणविदों के जो कंसर्न हैं वो भी एड्रेस हो जाएंगे. लेट्स क्रॉस दी फ़िंगर्स, एंड मूव टू नेक्स्ट एंड लास्ट सेग्मेंट.# बिटकॉइन की माइनिंग से जुड़े कुछ और कॉन्सेप्ट समझें- हमने आपको बताया कि जैसे-जैसे माइनिंग होती रहती है, प्रूफ़ ऑफ़ वर्क घटता चला जाता है. स्पेसिफ़िकली अगर बिटकॉइन की बात करें तो हर चार साल में प्रूफ़ ऑफ़ वर्क आधा हो जाता है. और इसी के चलते बेशक 1 करोड़ 86 लाख बिटकॉइन माइन किए जा चुके हैं और अब सिर्फ़ 23-24 लाख के क़रीब बिटकॉइन माइनिंग के लिए बचे हैं लेकिन फिर भी ये साल 2140 तक के लिए पर्याप्त हैं.
एक और बात. हमने आपको ये भी बताया था कि जैसे पारंपरिक (सोने, कॉपर वाले) खनन अंतिम धातु के कण के निकाले जाने तक नहीं चलते रहते वैसे ही बिटकॉइन की माइनिंग भी 2140 से कहीं पहले ख़त्म हो जाएगी. क्यूंकि तब मिलने वाला प्रूफ़ ऑफ़ वर्क, खर्च हो रही ऊर्जा, श्रम और पैसों से कहीं कम हो जाएगा. तब, अगर हरिवंशराय बच्चन के शब्दों में पूछें तो, “उस पार क्रिप्टो का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा?” कन्फ़र्म तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे डिजिटल लेन-देन में लेन-देन करने वालों या उसमें से किसी एक को कुछ चार्ज़ देना पड़ता है ऐसा ही बिटकॉइन या बाकी सभी क्रिप्टो करेंसीज़ के मामले में भी होने लगेगा.
तो चलिए 4 एपिसोड्स की समाप्ति पर क्रिप्टो से जुड़े हमारे सारे कॉन्सेप्ट क्लियर हो जाते हैं. तो आगे बात करने के लिए क्या रह जाता है? क्रिप्टो की माइक्रोनॉमिक्स. मतलब एक इंडिविज़ुअल इस करेंसी को कैसे ले. इसकी बात करेंगे अगले एपिसोड में.

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