टिटवाल का कुत्ता सआदत हसन मंटो--------------------------------------------------------------------------------कई दिनों से दोनों तरफ से सिपाही अपने-अपने मोर्चे पर जमे हुए थे. दिन में इधर औरउधर से दस-बारह गोलियां चल जातीं, जिनकी आवाज़ के साथ कोई इनसानी चीख बुलन्द नहींहोती थी. मौसम बहुत खुशनुमा था. हवा जंगली फूलों की महक में बसी हुई थी. पहाडिय़ोंकी ऊंचाइयों और ढलानों पर लड़ाई से बेखबर कुदरत, अपने रोज के काम-काज में व्यस्तथी. चिडियां उसी तरह चहचहाती थीं. फूल उसी तरह खिल रहे थे और धीमी गति से उडऩे वालीमधुमक्खियां, उसी पुराने ढंग से उन पर ऊंघ-ऊंघ कर रस चूसती थीं. जब गोलियां चलने परपहाडिय़ों में आवाज़ गूंजती और चहचहाती हुई चिड़ियां चौंककर उडऩे लगतीं, मानो किसीका हाथ साज के गलत तार से जा टकराया हो और उनके कानों को ठेस पहुंची हो. सितम्बर काअन्त अक्तूबर की शुरूआत से बड़े गुलाबी ढंग से गले मिल रहा था. ऐसा लगता था किजाड़े और गर्मी में सुलह-सफाई हो रही है. नीले-नीले आसमान पर धुनी हुई रुई जैसे,पतले-पतले और हल्के-हल्के बादल यों तैरते थे, जैसे अपने सफेद बजरों में नदी की सैरकर रहे हैं. पहाड़ी मोर्चों पर दोनों ओर से सिपाही कई दिनों से बड़ी ऊब महसूस कररहे थे कि कोई निर्णयात्मक बात क्यों नहीं होती. ऊबकर उनका जी चाहता किमौका-बे-मौका एक-दूसरे को शेर सुनाएँ. कोई न सुने तो ऐसे ही गुनगुनाते रहें. वेपथरीली ज़मीन पर औंधे या सीधे लेटे रहते और जब हुक्म मिलता, एक-दो फायर कर देते.दोनों मोर्चे बड़े सुरक्षित स्थान पर थे. गोलियां पूरे जोर से आतीं, और पत्थरों कीढाल से टकराकर, वहीं चित्त हो जातीं. दोनों पहाडिय़ों की ऊँचाई, जिन पर ये मोर्चेथे, लगभग एक ही जैसी थीं. बीच में छोटी-सी हरी-भरी घाटी थी, जिसके सीने पर एक नाला,मोटे सांप की तरह लोटता रहता था. हवाई जहाजों का कोई खतरा नहीं था. तोपें न इनकेपास थीं, न उनके पास, इसलिए दोनों तरफ बेखटके आग लगाई जाती थी. उससे धुएँ के बादलउठते और हवाओं में घुल-मिल जाते. रात को चूँकि बिलकुल खामोशी थी, इसलिए कभी-कभीदोनों मोर्चों के सिपाहियों को, किसी बात पर लगाए हुए, एक-दूसरे के ठहाके सुनाई देजाते थे. कभी कोई लहर में आकर गाने लगता तो दूसरी आवाज़ गूँजती तो ऐसा लगता, मानोपहाड़ियां सबक दोहरा रही हों. चाय का दौर ख़त्म हो चुका था. पत्थरों के चूल्हे मेंचीड़ के हल्के-हल्के कोयले करीब-करीब ठंडे हो चुके थे. आसमान साफ था. मौसम मेंखुनकी थी. हवा में फूलों की महक नहीं थी, जैसे रात को उन्होंने अपने इत्रदान बन्दकर लिये थे. अलबत्ता, चीड़ के पसीने, यानी बिरोजे की बू थी. पर यह भी कुछ ऐसीनागवार नहीं थी. सब कम्बल ओढ़े सो रहे थे, पर कुछ इस तरह, कि हल्के-से इशारे परउठकर लडऩे-मरने के लिए तैयार हो सकते थे. जमादार हरनाम सिंह खुद पहरे पर था. उसकीरासकोप घड़ी में दो बजे तो उसने गंडासिंह को जगाया और पहरे पर खड़ा कर दिया. उसकाजी चाहता था कि सो जाएे, पर जब लेटा तो आंखों से नींद को इतना दूर पाया जितने किआसमान में सितारे थे. जमादार हरनाम सिंह चित लेटा उनकी तरफ देखता रहा. और फिरगुनगुनाने लगा.कुत्ती लेनी आ सितारेयाँ वाली...सितारेयाँ वाली...वे हरनाम सिंहा, ओ यारा, भावें तेरी महीं बिक जाएेऔर हरनाम सिंह को आसमान पर हर तरफ सितारों वाले जूते बिखरे नज़र आये जोझिलमिल-झिलमिल कर रहे थे.जुत्ती ले देआँ सितारेयाँ वाली...सितारेयाँ वाली...नी हरनाम कौर, ओ नारे, भावें मेरी महीं बिक जाएेयह गाकर यह मुस्कराया; फिर यह सोचकर नींद नहीं आएगी, उसने उठकर और सबको जगा दिया.नार के जिक्र ने उसके दिमाग में हलचल पैदा कर दी थी. वह चाहता था कि ऊटपटाँग बातेंहों, जिससे इस गीत की हरनामकौरी कैफियत पैदा हो जाएे. चुनाँचे बातें शुरू हुई, परउखड़ी-उखड़ी रहीं. बन्तासिंह, जो उन सब में कम उम्र था और जिसकी आवाज़ सबसे अच्छीथी, एक तरफ हटकर बैठा गया. बाकी अपनी जाहिरा तौर पर मजेदार बातें करते और जम्हाइयाँलेते रहे. थोड़ी देर के बाद बन्तासिंह ने एकदम सोज़भरी आवाज़ में 'हीर' गाना शुरूकर दिया...हीर आख्या जोगिया झूठ बोले, कौन रूठड़े यार मनाउँदा ईऐसा कोई न मिलेया मैं ढूँढ़ थक्की जेहड़ा गयाँ नूँ मोड़ ल्याउँदा ईइक बाज तों काँग ने कूँज खोही बेक्खां चुप है कि कुलाउँदा ईदुक्खां वालेयाँ नूँ गल्लाँ सुख दियाँ नी किस्से जोड़ जहान सुनाउँदा ईफिर कुछ रुक कर उसने हीर की इन बातों का जवाब, राँझे की ज़बान में गाया...जेहड़े बाज तो काँग ने कूँज खोही सब्र शुक्र कर बाज फनाह होयाऐवें हाल है एस फकीर दा नी, धन माल गया ते तबाह होयाकरें सिदक ते कम मालूम होवे तेरा रब्ब रसूल गवाह होयादुनिया छड्ड उदासियाँ पहन लइयाँ सैयद वारिसों हुन वारिस शाह होयाबन्तासिंह ने जिस तरह एकदम गाना शुरू किया था, उसी तरह वह एकदम खामोश हो गया. ऐसालगता था कि खाकी पहाडिय़ों ने भी उदासियाँ पहन ली हैं. जमादार हरनाम सिंह ने थोड़ीदेर के बाद किसी अनदेखी चीज को मोटी-सी गाली दी और लेट गया. सहसा रात के आख़िरी पहरकी उदास-उदास फिजा में एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ गूँजी. सब चौंक पड़े; आवाज़करीब से आयी थी. सूबेदार हरनाम सिंह ने उठकर कहा, ''यह कहां से आ गया, भौंकू?''कुत्ता फिर भौंका. अब उसकी आवाज़ और भी नज़दीक से आयी थी. कुछ पलों के बाद, दूरझाडिय़ों में आहट हुई. बन्तासिंह उठा और उसकी तरफ बढ़ा. जब वापस आया तो उसके साथ एकआवारा-सा कुत्ता था, जिसकी दुम हिल रही थी. वह मुस्कराया, ''जमादार साहब! मैं'हूकम्ज इधर' बोला तो कहने लगा-मैं हूँ चपड़ झुनझुन.'' सब हँसने लगे. जमादार हरनामसिंह ने कुत्ते को पुचकारा, ''इधर आ चपड़ झुनझुन.'' कुत्ता दुम हिलाता, हरनाम सिंहके पास चला गया और यह समझकर कि शायद खाने की कोई चीज फेंकी गयी है, ज़मीन के पत्थरसूँघने लगा. जमादार हरनाम सिंह ने थैला खोलकर एक बिस्कुट निकाला और उसकी तरफ फेंका.कुत्ते ने उसे सूँघकर मुँह खोला, लेकिन हरनाम सिंह ने लपककर उसे उठा लिया, ''ठहरकहीं पाकिस्तानी तो नहीं.'' सब हँसने लगे. सरदार बन्तासिंह ने आगे बढक़र कुत्ते कीपीठ पर हाथ फेरा और जमादार हरनाम सिंह से कहा, ''नहीं जमादार साहब, चपड़ झुनझुनहिंदुस्तानी है.'' जमादार हरनामसिंह हँसा और कुत्ते से मुखातिब हुआ, ''निशानी दिखाओये.'' कुत्ता दुम हिलाने लगा. हरनाम सिंह ज़रा खुलकर हँसा, ''यह कोई निशानी नहीं.दुम तो सारे कुत्ते हिलाते हैं.'' बन्दा सिंह ने कुत्ते की काँपती दुम पकड़ ली,''शरणार्थी है बेचारा.'' जमादार हरनाम सिंह ने बिस्कुट फेंका, जो कुत्त ने झट दबोचालिया. एक जवान ने अपने बूट की एड़ी से ज़मीन खोटते हुए कहा, ''अब कुत्तों को भी यातो हिंदुस्तानी होना पड़ेगा. या पाकिस्तानी.'' जमादार ने अपने थैले से एक औरबिस्कुट निकाला और फेंका, ''पाकिस्तानियों की तरह पाकिस्तानी कुत्ते भी गोली सेउड़ा दिये जाएँगे.'' एक ने जोर से नारा लगाया-''हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद.'' कुत्ता,जो बिस्कुट उठाने के लिए आगे बढ़ा था, डरकर पीछे हट गया. उसकी दुम टाँगों के अन्दरघुस गयी. जमादार हरनाम सिंह हँसा, ''अपने नारे से क्यों डरता है. चपड़झुनझुन...खा...ले, एक और ले.'' उसने थैले से एक और बिस्कुट निकाल कर उसे दिया.बातों-बातों में सुबह हो गयी. सूरज निकलने का इरादा ही कर रहा था कि चारों ओर उजालाहो गया. जिस तरह बटन दबाने से एकदम बिजली की रोशनी होती है, उसी तरह सूरज की किरणेंदेखते-ही-देखते, उस पहाड़ी इलाके में फैल गयीं, जिनका नाम टिटवाल था. इस इलाके मेंकाफी देर से लड़ाई चल रही थी. एक-एक पहाड़ी के लिए दर्जनों जवानों की जानें जातीथीं, फिर भी क़ब्जा गैर-यकीनी होता था. आज यह पहाड़ी उनके पास है, कल दुश्मन केपास, परसों फिर उनके क़ब्जे में इसके दूसरे दिन वह फिर दूसरों के पास चली जाती थी.जमादार हरनाम सिंह ने दूरबीन लगाकर आसपास का जायजा लिया. सामने पहाड़ी में धुआँ उठरहा था. इसका मतलब यह था कि चाय वगैरह तैयार हो रही है. इधर भी नाश्ते की फिक्र होरही थी. आग सुलगायी जा रही थी. उधर वालों को भी निश्चय ही उधर से धुआँ उठता दिख रहाथा. नाश्ते पर सब जवानों ने थोड़ा-थोड़ा कुत्ते को दिया, जो उसने खूब पेट भरकेखाया. सब उसमें दिलचस्पी ले रहे थे, जैसे वे उसको अपना दोस्त बनाना चाहते हों.पुचकार कर 'चपड़ झुनझुन' के नाम से पुकारता और उसे प्यार करता. शाम के करीब, दूसरीतरफ, पाकिस्तानी मोर्चे में, सूबेदार हिम्मत खां अपनी बड़ी-बड़ी मूँछों को, जिनकेसाथ बेशुमार कहानियाँ जुड़ी हुई थीं, मरोड़े दे-देकर, टिटवाल के नक्शे को बड़ेध्यान से देख रहा था. उसके साथ ही वायरलैस आपरेटर बैठा था और सूबेदार हिम्मत खां केलिए प्लाटून कमांडर के निर्देश प्राप्त कर रहा था. कुछ दूर, एक पत्थर से टेक लगायेऔर अपनी बन्दूक लिये, बशीर धीमे-धीमे गुनगुना रहा था... ''चन्न कित्थे गवाई आयी रातवे... चन्न कित्थे गवाई आयी...'' बशीर ने मजे में आकर आवाज़ ज़रा ऊँची की तोसूबेदार हिम्मत खां की कडक़दार आवाज़ बुलन्द हुई-''ओये, कहां रहा है तू रात-भर?''बशीर ने सवालिया नज़रों से हिम्मत खां को देखना शुरू किया, तो बशीर की बजाय किसी औरसे मुखातिब था, ''बता ओये.'' बशीर ने देखा-कुछ फासले पर वह आवारा कुत्ता बैठा था,जो कुछ दिन हुए उनके मोर्चे में बिन बुलाये मेहमान की तरह आया था और वहीं टिक गयाथा. बशीर मुस्कराया और कुत्ते को सम्बोधित कर बोला- ''चन्न कित्थे गँवाई आयी रात येचन्न कित्थे गँवाई आयी...'' कुत्ते ने जोर से दुम हिलाना शुरू किया, जिससे पथरीलीज़मीन पर झाड़ू-सी फिरने लगी. सूबेदार हिम्मत खां ने एक कंकड़ उठाकर कुत्ते की तरफफेंका, ''साले को दुम हिलाने के सिवा और कुछ नहीं आता!'' बशीर ने एकदम कुत्ते कीतरफ गौर से देखा, ''इसकी गर्दन में क्या है?'' यह कहकर वह उठा, पर इससे पहले एक औरजवान के कुत्ते को पकडक़र, उसकी गर्दन में बँधी हुई रस्सी उतारी. उसमें गत्ते का एकटुकड़ा पिरोया हुआ था, जिस पर कुछ लिखा था. सूबेदार हिम्मत खां ने यह टुकड़ा लियाऔर अपने जवानों से कहा-''......... हैं. जानता है तुममें से कोई पढऩा?'' बशीर नेआगे बढक़र गत्ते का टुकड़ा लिया, ''हां...कुछ-कुछ पढ़ लेता हूँ.'' और उसने बड़ीमुश्किल से अक्षर जोड़-जोडक़र यह पढ़ा-''चप...चपड़ झुन...झुन...चपड़ झुनझुन...यहक्या हुआ?'' सूबेदार हिम्मत खां ने अपनी बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक मूँछों को ज़बरदस्तमरोड़ दिया, ''कोडवर्ड होगा कोई.'' फिर उसने बशीर से पूछा, ''कुछ और लिखा हैबशीरे?'' बशीर ने, जो अक्षर जोडऩे में लगा था, जवाब दिया, ''जी हां...यह...यह...हिन...हिन्द...हिंदुस्तानी...यह हिंदुस्तानी कुत्ता है.'' सूबेदार हिम्मत खांने सोचना शुरू किया, ''मतलब क्या हुआ इसका? क्या पढ़ा था तुमने-चपड़...?'' बशीर नेजवाब दिया, ''चपड़ झुनझुन.'' एक जवान ने बहुत बुद्धिमान बनते हुए कहा, ''जो बात है,इसी में है.'' सूबेदार हिम्मत खां को यह बात माकूल लगी, ''हां, कुछ ऐसा ही लगताहै.'' बशीर ने गत्ते पर लिखी हुई पूरी इबारत पढ़ी-''चपर झुनझुन...यह हिंदुस्तानीकुत्ता है.'' सूबेदार हिम्मत खां ने वायरलैस सेट लिया और कानो पर हैडफोन लगामरप्लाटून कमांडर से खुद उस कुत्ते के बारे में बातचीत की. वह कैसे आया था, किस तरहउनके पास कई दिन पड़ा रहा, फिर एकाएक गायब हो गया और रात-भर गायब रहा. अब आया है तोउसके गले में एक रस्सी नज़र आयी, जिसमें गत्ते पर एक टुकड़ा था. उस पर जो इबारतलिखी थी, वह उसने तीन-चार बार दोहराकर प्लाटून कमांडर को सुनायी, पर कोई नतीजाहासिल न हुआ. बशीर अलग कुत्ते के पास बैठकर उसे कभी पुचकार कर, कभी डरा-धमकाकरपूछता रहा कि वह रात कहां गायब रहा था और उसके गले में वह रस्सी और गत्ते का टुकड़ाकिसने बाँधा था, पर कोई मनचाहा जवाब न मिला. वह जो सवाल न करता, उसके जवाब मेंकुत्ता अपनी दुम हिला देता. आखिर गुस्से में आकर बशीर ने उसे पकड़ लिया और जोर काझटका दिया. कुत्ता तकलीफ़ के कारण 'चाऊँ-चाऊँ' करने लगा. वायरलैस से निपटकर सूबेदारहिम्मत खां ने कुछ देर नक्शे को गौर से देखा और फिर निर्णयात्मक भाव से उठा औरसिगरेट की डिबिया का ढकना खोलकर बशीर को दिया, ''बशीरे, लिख इस पर गुरमुखी में...उनकीड़े-ककोड़ों में...'' बशीर ने सिगरेट की डिबिया का गत्ता लिया और पूछा-''क्यालिखूँ सूबेदार साहब?'' सूबेदार हिम्मत खां ने मूँछों को मरोड़े देकर सोचना शुरूकिया, ''लिख दे...बस, लिख दे.'' यह कहकर उसने जेब से पेंसिल निकालकर बशीर को दी,''क्या लिखना चाहिए?'' उसने जैसे खुद से पूछा. बशीर पेंसिल की नोक को होंठ से लगाकरसोचने लगा, फिर एकदम सवालिया अन्दाज में बोला-''सपड़ सुनसुन...?'' लेकिन फौरन हीसन्तुष्ट होकर उसने निर्णय-भरे लहजे में कहा-''चपड़ झुनझुन का जवाब सपड़ सुनसुन हीहो सकता है...क्या याद करेंगे अपनी माँ के सिखड़े.'' बशीर ने पेंसिल सिगरेट कीडिबिया पर जमायी, ''सपड़ सुनसुन!'' ''सोला आने! लिख...सप...सपड़...सुनसुन.'' यहकहकर सूबेदार हिम्मत खां ने जोर का ठहाका लगाया,'' और आगे लिखा, ''यह...पाकिस्तानीकुत्ता है.'' सूबेदार हिम्मत खां ने गत्ता बशीर के हाथ से ले लिया. पेंसिल से उसमेंएक छेद किया और रस्सी में पिरोकर कुत्ते की तरफ बढ़ा, ले जा यह अपनी औलाद के पास.''यह सुनकर सब जवान खूब हँसे. सूबेदार हिम्मत खां ने कुत्ते के गले में रस्सी बाँधदी. वह इस बीच अपनी दुम हिलाता रहा. इसके बाद सूबेदार ने उसे कुछ खाने को दिया औरनसीहत करने के अन्दाज़ में कहा-''देखो दोस्त, गद्दारी मत करना...याद रखो, गद्दारीकी सजा मौत होती है.'' कुत्ता दुम हिलाता रहा. जब वह अच्छी तरह खा चुका तो सूबेदारहिम्मत खां ने रस्सी से पकडक़र उसका रुख पहाड़ी की इकलौती पगडंडी की तरफ फेरा औरकहा, ''जाओ, हमारा खत दुश्मनों तक पहुँचा दो...मगर देखो, वापस आ जाना...यह तुम्हारेअफसर का हुक्म है, समझे?'' कुत्ते ने अपनी दुम हिलायी और आहिस्ता-आहिस्ता पगडण्डीपर, जो बल खाती हुई, नीचे पहाड़ी के दामन में जाती थी, चलने लगा. सूबेदार हिम्मतखां ने अपनी बन्दूक उठायी और हवा में फायर किया. फायर और उसकी गूँज दूसरी तरफहिन्दुस्तानियों के मोर्चे में सुनी गयी. इसका मतलब उनकी समझ में न आया. जमादारहरनाम सिंहा पता नहीं किस बात पर चिड़चिड़ा हो रहा था, यह आवाज़ सुनकर और भीचिड़चिड़ा हो गया. उसने फायर का हुक्म दे दिया. आधा घंटे तक दोनों मोर्चों सेगोलियों के बेकार बारिश होती रही. जब इस शगल से उकता गया तो जमादार हरनाम सिंह नेफायर बन्द करा दिया और दाढ़ी में कंघी करनी शुरू कर दी. इससे छुट्टी पाकर उसने जालीके अन्दर सारे बाल बड़े सलीके से जमाये और बन्ता सिंह से पूछा, ''ओय बन्ता सिंहा!चपड़ झुनझुन कहां गया?'' दन्ता सिंह ने चीड़ की भूखी लकड़ी से बिरोजे को अपनेनाखूनों से अलग करते हुए कहा, ''पता नहीं.'' जमादार हरनाम सिंह ने कहा, ''कुत्ते कोघी हजम नहीं हुआ?'' बन्ता सिंह इस मुहावरे का मतलब नहीं समझा, ''हमने तो उसे घी कीकोई चीज नहीं खिलायी थी.'' यह सुनकर जमादार हरनाम सिंह बड़े जोर से हँसा, ''ओयेअनपढ़! तेरे साथ तो बात करना, पंचानबे का घाटा है.'' तभी वह सिपाही, जो पहरे पर थाऔर दूरबीन लगाए, इधर-उधर देख रहा था, एकदम चिल्लाया, ''वह...वह आ रहा है.'' सब चौंकपड़े. जमादार हरनाम सिंह ने पूछा, ''कौन?'' पहरे के सिपाही ने कहा, ''क्या नाम थाउसका-चपड़ झुनझुन!'' ''चपड़ झुनझुन?'' यह कह कर जमादार हरनाम सिंह उठा, ''क्या कररहा है वो?'' पहरे के सिपाही ने जवाब दिया, ''आ रहा है.'' जमादार हरनाम सिंह नेदूरबीन उसके हाथ से ली और देखना शुरू किया, इधर ही आ रहा है....रस्सी बँधी हुई हैगले में...लेकिन यह तो उधर से आ रहा है, दुश्मन के मोर्चे से.'' कह कर उसने कुत्तेकी माँ को बहुत बड़ी गाली दी. इसके बाद उसने बन्दूक उठायी और निशाना बाँधकर फायरकिया. निशान चूक गया. गोली कुत्ते के कुछ फासले पर पत्थरों की किरचें उड़ाती, ज़मीनमें दफन हो गयी. कुत्ता सहम कर रुक गया. दूसरे मोर्चे में सूबेदार हिम्मत खां नेदूरबीन में से देखा कि कुत्ता पगडंडी पर खड़ा है. एक और फायर हुआ तो वह दुम दबाकरउल्टी तरफ भागा-सूबेदार हिम्मत खां के मोर्चे की तरफ. सूबेदार ने जोर से पुकारा,''बहादुर, डरा नहीं करते...चल वापस.'' और उसने डराने के लिए एक फायर किया. कुत्तारुक गया. उधर से जमादार हरनाम सिंह ने बन्दूक चलाई. गोली कुत्ते के कान के पास सेसनसनाती हुई गुजर गयी. उसने उछलकर ज़ोर-ज़ोर से दोनों कान फटफटाने शुरू किये. उधरसे सूबेदार हिम्मत खां ने दूसरा फायर किया. गोली उसके अगले पंजों के पास पत्थरोंमें धँस गयी. बौखलाकर कभी वह इधर दौड़ा, कभी उधर. उसकी इस बौखलाहट से हिम्मत खां औरहरनाम सिंह, दोनों बहुत खुश हुए और खूब ठहाके लगाते रहे. कुत्ते ने जमादार हरनामसिंह के मोर्चे की तरफ भागना शुरू किया. उसने यह देखा तो बड़े ताव में आकर मोटी-सीगाली दी और अच्छी तरह निशान बाँधकर फायर किया. गोली कुत्ते की टाँग में लगी. आसमानको चीरती हुई एक चीख बुलन्द हुई. कुत्ते ने अपना रुख बदला. लँगड़ा-लँगड़ाकर सूबेदारहिम्मत खां के मोर्चे कि तरफ दौडऩे लगा तो उधर से भी फायर हुआ, पर वह सिर्फ डरानेके लिए किया गया था. हिम्मत ख़ाँ फायर करते ही चिल्लाया, ''बहादुर...बहादुर परवाहनहीं किया करते ज़ख्मों की. खेल जाओ अपनी जान पर...जाओ...जाओ.'' कुत्ता फायर सेघबराकर मुड़ा. उसकी एक टाँग बिल्कुल बेकार हो गयी थी. बाकी तीन टाँगों की मदद सेउसने खुद को चन्द कदम दूसरी ओर घसीटा था कि जमादार हरनाम सिंह ने निशाना ताककर गोलीचलाई, जिसने उसे वहीं ढेर कर दिया. सूबेदार हिम्मत खां ने अफसोस के साथ कहा-''च...च...च...! शहीद हो गया बेचारा.' जमादार हरनाम सिंह ने बन्दूक की गर्म-गर्मनाली अपने हाथ में ली और कहा, 'वही मौत मरा, जो कुत्ते की होती है.''--------------------------------------------------------------------------------कल एक कहानी रोज़ में आपने पढ़ा था क्या सचमुच जवान लड़की की आवाज को सुनकर अनसुनाकिया जा सकता है?