बेनिन की लूटी विरासत उसे वापस लौटाने की यूरोप की पहल कितनी ईमानदार?
यूरोपीय देशों द्वारा की गई कुछ कुख़्यात लूटों की कहानी.
क्वाई ब्रैनली म्यूजियम में एक कलाकृति की तस्वीर, साभार- यूट्यूब. और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो. (तस्वीर- पीटीआई)।
अभिषेक
29 अक्तूबर 2021 (Updated: 29 अक्तूबर 2021, 05:04 PM IST)
रसल हॉवर्ड ब्रिटेन के सबसे चर्चित कॉमेडियंस में गिने जाते हैं. 2018 में एक इंटरव्यू में उन्होंने एक बात कही थी.
The British Museum is great for seeing how excellent we were at stealing things.ब्रिटिश म्यूजियम इस तथ्य का सबसे शानदार उदाहरण है कि हम चुराने में कितने माहिर थे.
हॉवर्ड ने ये बात कटाक्ष के तौर पर कही थी. लेकिन इसमें सच कूट-कूट कर भरा था. ये इकलौती पंक्ति सिर्फ़ ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप का इतिहास बताने के लिए काफ़ी है.
यूरोप का ही एक देश है, फ़्रांस. ब्रिटेन की तरह ही उसके इतिहास वाले कॉलम में कुछ करतूतें दर्ज़ हैं. पहली, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उपनिवेश बनाकर अत्याचार करना. और दूसरी, उपनिवेश से लूटे पैसों और कलाकृतियों के सहारे ख़ुद को सभ्य और विकसित बताना.
आज उस स्याह इतिहास की चर्चा क्यों?
दरअसल, फ़्रांस ने अपने कुकृत्यों की लिस्ट घटाने की छोटी-सी पहल की है. 26 अक्टूबर 2021 को फ़्रांस ने बेनिन की 26 कलाकृतियों को लौटाने का ऐलान किया. 1892 में फ़्रांस ने बेनिन को अपना उपनिवेश बनाया था. इसी हमले के दौरान उसने रॉयल पैलेस से इन कलाकृतियों को लूटा था.
26 की संख्या रेगिस्तान से बालू का एक कण निकालने जैसा है. फ़्रांस में अफ़्रीकी महाद्वीप से लूटी गई कम-से-कम 90 हज़ार कलाकृतियां रखी हैं. फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ऐलान के समय कहा कि ये लौटाने की प्रक्रिया का अंत नहीं है. ये शुरुआत का ‘श’ मात्र है.
इस ख़बर के बहाने आज हम जानेंगे, बेनिन पर हमले का पूरा इतिहास क्या है? यूरोप के ताक़तवर देशों ने किस तरह से क़ीमती चीजों को लूटकर ख़ुद को अमीर बनाया? अब जबकि औपनिवेशिक दौर बीत चुका है, फिर भी इन कलाकृतियों को उनके असली मालिकों तक क्यों नहीं लौटाया जा रहा है? और, यूरोपीय देशों के द्वारा की गई कुछ कुख़्यात लूटों की कहानी भी सुनाएंगे.
सबसे पहले एक कन्फ़्यूजन दूर कर लेते हैं.
बेनिन एक संप्रभु देश है. अफ़्रीका के पश्चिम में. जबकि बेनिन सिटी एक शहर है. ये नाइजीरिया में पड़ता है.
बेनिन और बेनिन सिटी का आपस में कोई कनेक्शन नहीं है. बस एक समानता की डोर है. वो क्या है? पांच बरस के अंतराल में दोनों भयावह यूरोपियन लूट का शिकार बने. कैसे?
बेनिन शहर एक समय ‘एडो किंगडम ऑफ़ बेनिन’ का हिस्सा हुआ करता था.
2 जनवरी 1897 की बात है. जेम्स फ़िलिप्स नाम का एक ब्रिटिश अफ़सर किंगडम ऑफ़ बेनिन के राजा से मिलने पहुंचा. उसके साथ कई सैनिक भी थे. फ़िलिप्स एक धमकी देने गया था. धमकी कुछ यूं कि बेनिन के राजा ब्रिटेन के व्यापार में बाधा पहुंचाना बंद कर दें.
जब फ़िलिप्स राजमहल के बाहर पहुंचा, उस समय कोई धार्मिक अनुष्ठान चल रहा था. उसे कहा गया कि राजा साहब अभी नहीं मिल सकते. लेकिन फ़िलिप्स पर एक ज़िद सवार थी. वो ज़बरदस्ती अंदर घुस गया. इसके बाद वो और उसके साथी कभी बाहर नहीं निकल पाए. उनकी हत्या कर दी गई.
इससे ब्रिटेन नाराज़ हो गया. 18 फ़रवरी को उसने 12 सौ सैनिकों की फौज़ उतार दी. बेनिन के पास इसका कोई जवाब नहीं था. ब्रिटिश सैनिकों ने भयानक मार-काट मचाई. जब ख़ून से मन भर गया तो सैनिकों ने वहां लूट का तांडव मचा दिया. एक सैनिक ने अपनी डायरी में लिखा,
‘राजमहल और आस-पास के घरों में जो कुछ भी काम का मिला, उसे हम जमा कर अपने साथ ले गए.’
इनमें सजावटी हाथी दांत, धातु के बर्तन, आभूषण के अलावा हज़ारों कलाकृतियां थी. इनमें से कुछ बाद में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम पहुंचे. कुछ की नीलामी हुई. कुछ सामान जर्मनी से लेकर यूनाइटेड स्टेट्स की शोभा बढ़ाने के काम आए.
ये कलाकृतियां बेनिन की पहचान थीं. वहां सदियों से कलाकार इनका निर्माण करते आए थे. इनको लूटने का मतबल था, एक क्षेत्र से उसका गौरव छीन लेना.
किंगडम ऑफ़ बेनिन ने बाद में ब्रिटेन से इन्हें लौटाने के लिए कहा. लेकिन उस मांग का कोई असर नहीं हुआ. फिर आया 1960 का साल. एक अक्टूबर को नाइजीरिया आज़ाद हो गया. साथ में किंगडम ऑफ़ बेनिन भी. इसी किंगडम को अब बेनिन सिटी के नाम से जाना जाता है. ये क्षेत्रफल की दृष्टि से नाइजीरिया का चौथा सबसे बड़ा शहर है.
आगे बढ़ने से पहले एक ज़रूरी कहानी
साल 1977. नाइजीरिया के लागोस में ब्लैक कल्चर और आर्ट पर एक फ़ेस्टिवल का आयोजन तय हुआ. आयोजकों ने ब्रिटिश म्यूजियम से एक दरख़्वास्त की. उन्होंने कहा कि हमें कुछ समय के लिए एक चीज़ उधार दीजिए. फ़ेस्टिवल ख़त्म होते ही हम इसे लौटा देंगे. वो चीज़ हाथी दांत से बना एक मुखौटा था. ये 16वीं शताब्दी का आर्ट था. इसे बेनिन किंगडम के राजा पहना करते थे. ब्रिटिश सैनिक 1897 के हमले में इसे चुरा कर ले गए थे.
इस कलाकृति पर पूरा हक़ नाइजीरिया का था. इस मांग के आगे ब्रिटिश म्यूजियम को दरियादिल होना चाहिए था. पता है, उन्होंने क्या जवाब दिया? उन्होंने कहा कि ये बहुत नाजुक चीज़ है. अगर इसे नाइजीरिया ले जाया गया तो ये टूट सकता है.
ये जवाब पर्दे के आगे का था. असल में, ब्रिटिश म्यूजियम ने नाइजीरिया से 20 करोड़ रुपये का इंश्योरेंस मांगा था. इस घटना के बाद से नाइजीरिया के लोगों का मन खट्टा हो चुका है. वे आज भी ब्रिटेन से अपने गौरवशाली इतिहास का हिस्सा लौटाने की मांग कर रहे हैं.
अगस्त 2021 में जर्मनी ने बेनिन सिटी की चार सौ से अधिक कलाकृतियों को लौटाने का ऐलान किया था. लेकिन ब्रिटेन ने अपने कानों में रुई डाल रखी है.
बेनिन देश का इतिहास
अब आप बेनिन सिटी की कहानी समझ गए होंगे. अब बेनिन नाम के देश का इतिहास समझते हैं. इसको बीसवीं सदी की शुरुआत तक ‘किंगडम ऑफ़ डहौमी’ कहा जाता था. राजधानी का नाम ‘अबोमी’ था. इसी नाम पर किंगडम को अबोमी के नाम से भी जाना जाता था. (सुधी दर्शकगण उच्चारण की अशुद्धता के लिए माफ़ करें.)
बेनिन का दक्षिणी सिरा समंदर से लगता है. ‘ऐज़ ऑफ़ डिस्कवरी’ के दौरान सबसे पहले पुर्तगाली यहां पहुंचे थे. साल था 1473 का. लेकिन उन्होंने यहां ठीक से ध्यान दिया 1553 में. कालांतार में बेनिन का तट से ग़ुलामों का निर्यात किया जाने लगा. इस व्यापार में डच, ब्रिटिश, फ़्रेंच और दूसरे व्यापारी भी शामिल हुए. जिस अनुपात में ग़ुलामों को बेनिन के तट से यूरोप के देशों में भेजा जा रहा था, उसको देखते हुए इस इलाके को ‘दासों का किनारा’ कहा गया.
फ़्रांस ने डहौमी में पहली फ़ैक्ट्री 1670 में डाली थी. जैसे-जैसे उनका बिजनेस बढ़ा, उन्होंने नए इलाकों पर क़ब्ज़ा करना शुरू किया.
1889 में डहौमी की गद्दी पर बेहन्ज़िन राज़ा के तौर पर आसीन हुए. उन्होंने विदेशी विस्तारवाद को चुनौती देने का मन बनाया. लेकिन वो फ़्रांस के सामने टिक नहीं पाए. 1892 में फ़्रांस ने हमला किया. कुछ ही समय में उसने राजा को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. बेहन्ज़िन को गिरफ़्तार कर निर्वासन में भेज दिया गया. 1894 में फ़्रांस ने डहौमी किंगडम को अपना उपनिवेश घोषित कर दिया.
फ़्रेंच आर्मी ने इस अभियान के दौरान रॉयल पैलेस से अनगिनत कलाकृतियां लूटीं और उनकी नीलामी की. कुछ कलाकृतियों को इधर-अधर तोहफ़े के तौर पर बांट दिया गया. इनमें से अधिकांश 2003 से पेरिस के म्यूजियम की चमक-दमक बढ़ाने के काम आईं.
बेनिन अगस्त 1960 में आज़ाद हो गया. उसने तब से उसने इन्हें वापस लाने का अभियान चालू किया हुआ है. दुनियाभर के कई ऐक्टिविस्ट, नेता और सेलिब्रिटी भी इस मांग को समर्थन दे रहे हैं.
इस समर्थन का असर अब दिखने लगा है. फ़्रांस ने पिछले साल एक कानून बनाकर बेनिन और सेनेगल को कलाकृतियां लौटाने का रास्ता साफ़ किया. कानून बनाए जाने के लगभग एक बरस बाद फ़्रांस 26 कलाकृतियां लौटा रहा है. इसके अलावा, फ़्रांस बेनिन में एक म्यूजियम बनाने के लिए 25 करोड़ रुपये की मदद भी देगा. इस पूरे आदान-प्रदान को 09 नवंबर को पेरिस में आधिकारिक अमलीजामा पहनाया जाएगा.
बेनिन से पहले फ़्रांस ने सेनेगल को एक राजसी तलवार वापस की थी.
तो क्या ये माना जाए कि फ़्रांस अतीत के गुनाहों को पूरी तरह से धोने की कोशिश कर रहा है? क्या उसका हृदय-परिवर्तन हो चुका है?
ऐसा कहना ज़ल्दबाजी होगी. जब फ़्रांस ने कलाकृतियों को लौटाने को लेकर कानून बनाया था. उसमें एक बात जोड़ी गई थी कि घर-वापसी का कार्यक्रम सिर्फ़ 27 चीज़ों तक सीमित रहेगा. 26 बेनिन और 01 सेनेगल के लिए.
ये कानून किसी भी तरह से बाकी देशों को अपनी चीज़ें मांगने का अधिकार नहीं देता है. और, ना ही उनकी विरासत को फ़्रेंच म्यूजियम्स में रखने के अधिकार को चुनौती देता है.
मतलब ये कि हम दें तो हमारे सामने सज़दा करो, अगर ना दें तो भूल जाओ.
फ़्रांस का गुनाह कलाकृतियों को लूटने तक ही सीमित नहीं हैं. इसी साल जनवरी में उसने अल्जीरिया में औपनिवेशिक शासन के दौरान किए गए अपराधों के लिए माफ़ी मांगने से साफ़ मना कर दिया था. फ़्रांस ने साल 1830 से 1962 तक अल्जीरिया पर शासन किया. इस दौरान उसने हत्या, बलात्कार, टॉर्चर, लूट, शोषण जैसे अनगिनत अपराध किए. मगर जब बात माफ़ी की आई तो चुप्पे से मुंह फेर लिया.
अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि ये 21वीं सदी है. उपनिवेशवाद का दौर बीत चुका है. फिर भी ये देश लूटी हुई चीज़ों को उनके असली मालिकों को क्यों नहीं लौटा रहे हैं?
इसकी तीन बड़ी वजहें हैं
पहली वजह है, अनुपात. यूरोप के म्यूजियम्स में आधे से अधिक सामान बाहर से लूट कर लाया गया है. इन्हें वापस करने की मांग दशकों से चल रही है. अगर एक की बात मानी गई तो दूसरे देश भी इसी तरह दबाव बनाएंगे. अगर दरियादिली दिखाई गई तो यूरोप के म्यूजियम्स खाली हो जाएंगे. ये उनकी कथित वैभव का प्रतीक है. भले इन्हें ही लूटकर लाया गया हो.
जैसे, एक उदाहरण ब्रिटिश म्यूजियम का है. 16वीं सदी से ही ब्रिटेन ने अपना साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया था. एक समय दुनिया के एक-चौथाई हिस्से पर उसका शासन चल रहा था. ब्रिटेन इन इलाकों से बाकी चीज़ों के अलावा कलाकृतियां भी चुरा रहा था. इन्हें रखने के लिए 1753 में ब्रिटिश म्यूजियम की स्थापना की गई. जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ा, वैसे-वैसे स्टॉक बढ़ा. इसके लिए बार-बार नए निर्माण करने पड़े. ब्रिटिश म्यूजियम में इस समय 80 लाख से अधिक कलाकृतियां रखीं है. इनमें अधिकतर सामान भारत, चीन, नाइजीरिया, ऑस्ट्रेलिया, ईजिप्ट आदि देशों से आया है. इन जगहों पर ब्रिटेन ने सदियों तक शासन किया था.
ब्रिटिश म्यूजियम इस लूट का भंडार करने के मामले का एक सटीक उदाहरण है. किंतु ये इकलौता नहीं है. यूरोप के कई और देशों ने भी ये उपलब्धि हासिल कर रखी है.
दूसरी वजह है, श्रेष्ठता का दंभ. विकसित देश मानते हैं कि ऐतिहासिक कलाकृतियां उनके पास ही सुरक्षित रह सकतीं है. अफ़्रीका के अधिकतर देश ग़रीबी और अस्थिरता का सामना कर रहे हैं. वहां सरकार का ठिकाना नहीं रहता, कलाकृतियों का ख़्याल कौन रखेगा! इन देशों में ज़रूरी इंफ़्रास्ट्रक्चर नहीं है.
लेकिन प्रश्न ये है कि ग़रीबी या प्रशासनिक समस्या को आधार बनाकर किसी की विरासत को बंधक बनाकर रखा जाना कहां तक उचित है.
तीसरी वजह एक तय मैकेनिज़्म की कमी है. अभी तक आप ये समझ चुके होंगे कि लूटने वाले अधिकतर देश आज विकास के पायदान में बहुत ऊपर पहुंच चुके हैं. वहीं पीड़ित देश या तो विकासशील हैं या अल्प-विकसित.
लूटी कलाकृतियों को लौटाने का पूरा दायित्व शोषक का होना चाहिए. इस मामले में विकसित देश शोषक हैं. उन्हें पूरी विनम्रता के साथ आगे आकर इसकी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए.
लेकिन हो क्या रहा है? ब्रिटेन ने 1964 में ब्रिटिश म्यूजियम ऐक्ट पास किया था. ये ऐक्ट ब्रिटिश म्यूजियम को लूटी गई चीज़ों को असली मालिक को लौटाने से रोकता है.
ये म्यूजियम्स एक अजीब किस्म का पेच भी फंसाते हैं. वे कहते हैं कि इस बात की जांच की जाएगी कि सामान सच में लूटा गया या सहमति से सौंपा गया. अगर लूट वाली बात सही साबित हुई तो लौटाने के बारे में विचार किया जाएगा.
सवाल ये है कि दूसरों का इतिहास लूटने वालों को अपना इतिहास तक नहीं मालूम. ये विडंबना नहीं तो और क्या है?
अब कुछ चर्चित लूटों की कहानी
- पहली घटना साल 1868 की है. मगदला के मैदान में ब्रिटेन और इथियोपिया के बीच लड़ाई हुई. इस युद्ध में ब्रिटेन जीत गया. गिरफ़्तार किए जाने के डर से टेवोड्रोस द्वितीय ने आत्महत्या कर ली. इसके बाद ब्रिटिश आर्मी ने राजमहल को लूट लिया. इनमें अनोखी कलाकृतियों और ऐतिहासिक पांडुलिपियां भी शामिल थीं.
ब्रिटेन ये दावा करता है कि उसके सैनिकों को इथियोपियाई सम्राट ने बंदी बना लिया था. उसकी सेना तो बस उन्हें छुड़ाने के लिए गई थी. लेकिन सच ये है कि ब्रिटिश सैनिक लूट की तैयारी के साथ गए थे. ब्रिटिश म्यूजियम के डायरेक्टर ने सैन्य अभियान से पहले ही इथियोपिया से आने वाली चीज़ों को रखने के लिए तैयारी शुरू कर दी थी.
ब्रिटेन समारोह मनाकर इनकी प्रदर्शनी आयोजित करता है. लेकिन जब बात इन सामानों को लौटाने की आती है, वो कहता है - हम रहिते कहां हैं!
- दूसरी घटना पेरू से है. 1911 में अमेरिका के एक गवर्नर ने माचू पिचू की पहाड़ियों में खुदाई शुरू की. उन्हें इंसानी कंकालों के अलावा बहुत सारी कलाकृतियां हाथ लगी. वो जनाब सारा सामान चुपके से उठाकर अमेरिका ले गए. इनमें से बहुत सारा सामान येल यूनिवर्सिटी पहुंच गया. स्टडी के लिए.
पेरू लंबे समय तक उन्हें लौटाने की गुहार लगाता रहा. लेकिन कुछ नहीं हुआ. 2008 में पेरू ने अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. येल ने इसके बावजूद कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
फिर पेरू के राष्ट्रपति ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पोप से मदद मांगी. तब जाकर दोनों पक्षों में समझौता हुआ. वो सभी कलाकृतियां पेरू को लौटाईं गई और उन्हें रखने के लिए एक म्यूजियम बनाने पर सहमति बनी.
इसके अलावा भारत के कोहिनूर को लेकर भी बहस चलती रहती है. ऑस्ट्रेलिया के मूलनिवासियों से लूटे गए 32 हज़ार सामान ब्रिटेन के म्यूजियम्स में रखे हैं. कहानियां और भी हैं, उनकी चर्चा फिर कभी विस्तार से करेंगे.
म्यूजियम का हिंदी में मतलब होता है, अजायबघर. अजायब माने अद्भुत. ऐसी जगह जहां अजूबी चीज़ों का कलेक्शन हो. एक आदर्श म्यूजियम संबंधित देश के अद्वितीय इतिहास, विरासत, संस्कृति का पोस्टर प्लेस होगा.
यूरोप के अधिकतर म्यूजियम्स का दायरा वैश्विक है, लेकिन उनमें ‘लूट’ वाला पक्ष सारे अनोखेपन को गौण कर देता है.