अमेरिका को मिडल ईस्ट के तेल की ज़रूरत अब क्यों नहीं है?
ट्रंप का कहना है कि अमेरिका तेल और नेचुरल गैस के उत्पादन में नंबर 1 हो गया है.

ईरान. मिडिल ईस्ट का एक छोटा सा देश, जिसकी अर्थव्यवस्था वहां के कच्चे तेल पर निर्भर है. मिडल ईस्ट यानी भारत के पश्चिम में ईरान, कुवैत, टर्की जैसे 18 देश. इस वक़्त अमेरिका और ईरान के बीच माहौल गर्म है. क्योंकि 3 जनवरी को सुबह करीब 1.20 बजे ईरानी कुद्स फोर्स के चीफ मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी को अमेरिका ने मार डाला. क़ासिम ईरान के नंबर दो नेता थे. ईरान ने इसे ‘ऐक्ट ऑफ वॉर’ माना. ईरान ने कहा, हम बदला लेंगे. इसके बाद ईराक में अमेरिका के दो बेस पर हमला किया.
बगदाद इंटरनैशनल एयरपोर्ट के बाहर हुए हमले के निशाने पर था इसी Quds Force का मुखिया. नाम- मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी. (बायीं ओर) उम्र, 62 साल. (तस्वीर: AP)इस पूरे मामले की जानकारी आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं
. इसी के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने प्रेस ब्रीफिंग की. इसी ब्रीफिंग के दौरान कई महत्वपूर्ण बातें कही गई. वो ये थी कि अमेरिका तेल और नेचुरल गैस के उत्पादन में नंबर 1 हो गया है. अब उसे मिडल ईस्ट के तेल की ज़रूरत नहीं है. लोग कहा करते थे कि अमेरिका के पास तेल का बहुत बड़ा भंडार है. जब पूरी दुनिया में तेल ख़त्म हो जाएगा, तब अमेरिका अपने तेल का इस्तेमाल करेगा.
क्या डॉनल्ड ट्रंप की बात सही है?LIVE: President @realDonaldTrump
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एक तरह से हां. अमेरिका तेल और नैचरल गैस के उत्पादन में नंबर 1 देश है. हालांकि अभी भी वहां तेल इम्पोर्ट किया जा रहा है, क्योंकि उत्पादन से खपत थोड़ी-सी ज्यादा है. लेकिन निर्भरता नहीं है. आखिर ये बदलाव आया कैसे? इसके लिए तेल के बिजनेस को समझना होगा. बहुत गहराई में नहीं. पर बेसिक बातें.
कच्चा तेल यानी क्रूड आयल. क्रूड यानी जिसको रिफाइन नहीं किया गया है. टेक्निकल वाली हिंदी में पढ़ेंगे तो इसको अपरिष्कृत तेल कहा जाएगा. इसी क्रूड ऑइल में से निकलता है पेट्रोल, डीजल, केरोसिन का तेल (इसे मिट्टी का तेल भी कहते हैं), गैस, और वैसलीन. इसको ज़मीन या समुद्र के भीतर से निकाला जाता है.
अभी हाल में ही मेक्सिको के पास एक अमेरिकी तेल कंपनी ने एक नया भंडार खोज लिया है. अमेरिका को अगर तेल कम भी पड़े तो वो कनाडा और वेनेजुएला से तेल इम्पोर्ट कर सकता है. एशिया के देशों के पास ये सुविधा नहीं है. (सांकेतिक तस्वीर: रायटर्स)तेल का अधिकतर भंडार मिडल ईस्ट के देशों में हैं. इनके अलावा भी कुछ देश हैं जिनके पास तेल और गैस है. सबसे ज्यादा क्रूड आयल सप्लाई करने वाले देश इस वक़्त ये हैं:
रूस, कनाडा, सऊदी अरब, ईराक, ईरान, ब्राज़ील, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात. इन सबके ऊपर इस वक़्त अमेरिका मौजूद है. सबसे ज्यादा क्रूड आयल प्रोड्यूस करता है.
सबसे ज्यादा खपत इन देशों में होती है:
अमेरिका, चीन, भारत, जापान, रूस, सऊदी अरब, ब्राज़ील, साउथ कोरिया, जर्मनी, कनाडा. इस लिस्ट में भी अमेरिका सबसे ऊपर है. यानी उत्पादन सबसे ज्यादा और खपत भी सबसे ज्यादा.
अब वापस आते हैं अमेरिका पर.
अमेरिका 2013 से ही दुनिया में सबसे ज्यादा तेल और नेचुरल गैस का उत्पादन करता आ रहा है. ये इन प्रोडक्ट्स को एक्सपोर्ट (निर्यात) भी करता है. 2020 में पहली बार ऐसा होने की संभावना जताई जा रही है कि अमेरिका जितना तेल मंगाता है, उससे ज्यादा का उत्पादन करेगा. यही नहीं, अमेरिका के 'रिकवरेबल' तेल भंडार भी इस वक़्त दुनिया में सबसे बड़े बताये जा रहे हैं. यानी ऐसे भंडार जिनसे तेल निकालने की संभावना है. कितने? 293 बिलियन बैरल. एक बिलियन यानी 100 करोड़. यानी 29,300 करोड़. एक बैरल में 159 लीटर तेल होता है. यानी अमेरिका के पास कुल 46,587,000 करोड़ लीटर तेल है. उपलब्ध स्रोत यही बताते हैं.
तस्वीर में देखा जा सकता है कि किस तरह अमेरिका के आसपास कोई देश फटक भी नहीं सकता रिकवरेबल तेल भंडार के मामले में. सिवाय सऊदी अरब के. बाकी जो भी नंबर अमेरिका से ऊंचे दिख रहे हैं, वो समूहों के हैं. जैसे OPEC. (तस्वीर: Rystad Energy)अमेरिका के पास इतना तेल कहां से आया?
क्या अमेरिका ने अपने तेल का भंडार छुपा कर रखा था और अब जाकर सामने लाया है. जवाब है कि अमेरिका के पास तेल के भंडार पहले से थे. लेकिन तेल निकालने और इस्तेमाल के लायक बनाने की तकनीक इतनी बेहतर नहीं हो पाई थी जितनी अब है. अमेरिका में शेल आयल और गैस का उत्पादन पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है. इसमें मदद की फ्रैकिंग (हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग) ने. फ्रैकिंग एक प्रक्रिया होती है जिसमें जमीन के भीतर पानी, बालू, और केमिकल तेजी से भरे जाते हैं जिससे पत्थरों की तहें टूट जाती हैं. और उनके नीचे दबा तेल और गैस निकालने में आसानी होती है. इसकी वजह से अमेरिका में टेक्सस, नॉर्थ डकोटा और पेन्सिल्वेनिया जैसे राज्यों में इसका उत्पादन काफी बढ़ गया है. मिडल ईस्ट पर निर्भर ना होने की बात ट्रंप ने पहली बार नहीं कही है. इससे पहले भी सितंबर 2019 में ट्वीट करके वो यही बात कह चुके हैं.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मिडल ईस्ट से अमेरिका की निर्भरता पूरी तरह ख़त्म हो गई है. इसके पीछे कुछ वजहें हैं. जैसे:Because we have done so well with Energy over the last few years (thank you, Mr. President!), we are a net Energy Exporter, & now the Number One Energy Producer in the World. We don’t need Middle Eastern Oil & Gas, & in fact have very few tankers there, but will help our Allies!
— Donald J. Trump (@realDonaldTrump) September 16, 2019
# कई रिफाइनरीज अमेरिका के तेल का इस्तेमाल पसंद नहीं करतीं, क्योंकि वहां का तेल हल्का होता है. उसे रिफाइन करके दूसरे प्रोडक्ट बनाना फायदेमंद नहीं होता.
# अमेरिका का तेल का प्रोडक्शन बढ़ा है, लेकिन दुनिया में तेल की कीमतें अभी भी अमेरिका के हिसाब से तय नहीं होतीं. अगर कहीं से भी मांग बढ़ती है, या उत्पादन अचानक से घटता है तो अमेरिका इस हालत में नहीं है कि उसे पूरा कर सके. इसके लिए सऊदी अरब को मदद के लिए आना ही पड़ेगा. 2018 में जब ईरान पर पाबंदी लगी थी तेल एक्सपोर्ट करने की, तो उस कमी को पूरा करने के लिए सऊदी अरब को ही आगे आना पड़ा था.
# शेल फ्रैकिंग की प्रक्रिया पर रोक लगाने की भी बात चल रही है. कहा ये जा रहा है कि इससे धरती को नुकसान पहुंच रहा है. कुछ राज्यों जैसे न्यूयॉर्क, वर्मांट में इसे बैन भी किया गया है.
इसका बाकी देशों पर क्या असर पड़ेगा?अगर अमेरिका को मिडल ईस्ट से आने वाला तेल या गैस नहीं चाहिए, तो उस क्षेत्र से आने वाला उत्पादन एशिया के देशों की खपत में जाएगा. इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव होगा. लेकिन इस बढ़ते प्रोडक्शन का असर पर्यावरण पर सबसे ज्यादा पड़ेगा. 3 करोड़ 60 लाख टन ग्रीनहाउस गैस सालाना बढ़ जाएगी. आने वाले पांच सालों में. अगर बाकी जगहों पर हो रहे उत्पादन में बढ़त और दूसरे तेल और गैस प्रोडक्ट्स को जोड़ लिया जाए (जैसे पेट्रोकेमिकल,फर्टिलाइजर,प्लास्टिक) तो ये 227 करोड़ टन सालाना पहुंच जाएगी.
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