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किसान आंदोलनः मोदी सरकार ने देश से झूठ कहा कि सुप्रीम कोर्ट से?

किसान आंदोलन में अब सुप्रीम कोर्ट की एंट्री हो गई है.

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पीएम नरेंद्र मोदी (तस्वीर: पीटीआई)
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16 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 16 दिसंबर 2020, 01:55 PM IST)
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किसान आंदोलन का आज 21 वां दिन है. अब तक बात किसान संगठनों और मोदी सरकार के बीच थी. आज इसमें एंट्री हो गई सुप्रीम कोर्ट की. अदालत में एक याचिका लगाई गई है जिसमें मांग की गई है कि आंदोलनकारी किसानों को दिल्ली की सीमा से हटाया जाए. इस याचिका पर सुनावई की भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस ए बोबड़े की अध्यक्षता वाली ट्रिपल बेंच ने, जिसमें जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रह्मण्यम शामिल थे. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक अदालत ने मामले में केंद्र को नोटिस जारी कर दिया है. इसमें अदालत ने सुझाव दिया है कि किसान गुटों और सरकार के प्रतिनिधियों की एक कमेटी बनाई जाए जो गतिरोध दूर करने का प्रयास करे.
अदालत ने कहा कि वो किसान संगठनों का भी पक्ष सुनना चाहती है. इसके लिए किसान संगठनों को पक्षकार बनाने का आदेश दिया है. साथ ही सरकार से पूछा कि अब तक समझौता क्यों नहीं हुआ. CJI ने केंद्र से कहा कि किसानों को लगता है कि कानून उनके खिलाफ है. अगर आप खुले दिमाग से नहीं सोचते हैं तो आपकी बातचीत फिर फेल हो सकती है.
सरकार ने देश को क्या बताया कि विरोध करने वाले कौन हैं?
आज की अदालती कार्यवाही में एक ऐसी चीज़ हुई, जिसके बारे में आपको मालूम भी होना चाहिए. और जिसके बारे में आपको विचार भी करना चाहिए. भारत के प्रधान न्यायाधीश की बेंच ने भारत सरकार से एक सवाल किया - कौन-कौन पार्टी है जो विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं? सरकार ने अदालत को क्या बताया है, इससे पहले रिवीज़न किया जाए कि सरकार ने देश को क्या बताया कि विरोध करने वाले कौन हैं.
केंद्रीय रेल, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक प्रदर्शनकारियों में लेफ्टिस्ट और माओइस्ट हैं. वामपंथी और माओवादी. केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने भी यही कहा कि किसान में लेफ्टिस्ट घुस गए हैं. मानो ये कोई अपराध हो. उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री रावसाहब दानवे के मुताबिक प्रदर्शन चीन और पाकिस्तान समर्थित है. भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय के मुताबिक आंदोलनकारियों में खालिस्तानी हैं. मध्यप्रदेश में शिवराज कैबिनेट में कृषि मंत्री कमल पटेल के मुताबिक आंदोलन किसानों का नहीं, बिचौलियों का है. मध्य प्रदेश में शिवराज कैबिनेट की ही मंत्री उषा ठाकुर के मुताबिक किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पंजाब और हरियाणा के प्रतिनिधि उच्च कोटि के दलाल हैं. हरियाणा में भाजपा जेजेपी सरकार के कृषि मंत्री जेपी दलाल के मुताबिक कुछ विदेशी ताकतों को पीएम मोदी का चेहरा पसंद नहीं है. इसलिए ये विदेशी ताकतें किसानों को आगे कर बाधा डाल रही हैं. बिहार के नीतीश कुमार कैबिनेट में भूमि सुधार एवं राजस्व मंत्री रामसूरत राय के मुताबिक किसान बिल का विरोध करने वाले किसान नही दलाल हैं. उत्तराखंड में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुताबिक किसानों को बरगलाया जा रहा है और उनको बरगलाने वाले नक्सलाइड,लेफ्टिस और आलू से सोना निकालने वाले हैं. जो भाजपा विरोधी लोग हैं. केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के मुताबिक टुकड़े टुकड़े गैंग आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश कर रहा है.
हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 दिसंबर की कच्छ रैली में कहा-
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कच्छ के किसानों से पीएम मोदी ने 15 दिसंबर को मुलाकात की. (तस्वीर: इंडिया टुडे)

लेकिन मोदी सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत में भारत के मुख्य न्यायाधीश को क्या बताया?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आंदोलन भारतीय किसान यूनियन कर रही है. यहीं बात समझ से बाहर हो जाती है. राज्यों के मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री देश को कुछ बताते हैं और उनके वकील सुप्रीम कोर्ट को कुछ और बताते हैं. क्या तुषार मेहता नहीं जानते थे कि सरकार का रुख आंदोलनकारियों को लेकर क्या है? या फिर उन्होंने ये जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट को नहीं बताया? क्या ये कहा जाए कि मोदी सरकार देश विरोधी ताकतों के बारे में सुप्रीम कोर्ट को न बताकर उनका बचाव कर रही है. या फिर तुषार मेहता के जवाब को सरकार की आधिकारिक लाइन माना जाए. और अगर ये सरकार की आधिकारिक लाइन है, तो फिर ये बयान आए तो कहां से. सवाल बहुत सारे हैं, जिनके जवाब सरकार और उसके वकील को देने हैं. लेकिन क्या ये सरकार जवाब देने में विश्वास रखती है? छोड़िए. हम आगे बढ़ते हैं.
आप जानते ही हैं कि किसान गुट तीन कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग पर अडिग हैं और मोदी सरकार ने कहा है कि वो बातचीत के बाद कुछ रियायतें तो देना चाहती है, लेकिन कानून रद्द नहीं किए जाएंगे. आज अपनी बात पर अमल करते हुए किसान यूनियनों ने 9 दिसंबर को भेजे कृषि मंत्रालय के प्रस्ताव को खारिज कर दिया. इस बाबत यूनियनों ने एक खत केंद्रीय कृषि मंत्रालय भेज भी दिया है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय - जी हां - ये मंत्रालय का आधिकारिक नाम है - इसमें संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल को भेजे गए इस खत में संयुक्त किसान मोर्चा के दर्शन पाल ने लिखा कि प्रस्ताव इसलिए खारिज किया गया क्योंकि इसे कमोबेश उसी फॉर्मेट में लिखा गया था जो 5 दिसंबर की बैठक में सरकारी प्रस्ताव का था. तब मौखिक आश्वासन दिए गए थे, जिन्हें किसान संगठन पहले ही खारिज कर चुके थे.
दूसरी तरफ केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर लगातर प्रेस से बात कर रहे हैं. वो बार बार अपनी बात दोहरा रहे हैं कि वो बात करने को तैयार हैं. लेकिन उनकी बातों से आप समझ सकते हैं कि केंद्र आंदोलन से निपटने के लिए अब किस रणनीति को अपना रहा है. तोमर ने 15 दिसंबर को कहा कि वो ''असली'' किसान यूनियन्स से लगातार संपर्क में हैं और खुले मन से बात कर रहे हैं. इस असली शब्द के मायने टिप्पणीकार अलग अलग तरह से निकाल रहे हैं. हमने आपको बताया था कि कृषि मंत्री तोमर लगातार उन किसान संगठनों से भी मिल रहे हैं जिन्होंने कृषि कानूनों के समर्थन का ऐलान किया है.
आंदोलन अब तक अहिंसक रहा है. लेकिन इतने बड़े हुजूम के पंजाब और हरियाणा से दिल्ली आने में कई चुनौतियां हैं. रोड एक्सीडेंट. दिल्ली की हांड़ कंपाने वाली ठंड. बुज़ुर्ग किसानों के लिए उनकी उम्र ही कई तकलीफें लेकर आती है. अब तक 21 किसान या तो दिल्ली के रास्ते में हादसों की भेंट चढ़ चुके हैं, या तो प्राकृतिक कारणों से उनकी मौत दिल्ली बॉर्डर पर हुई है. 21 वां नाम था होशियारपुर के कुलविंदर सिंह का. दिल्ली तक के रास्ते में मंडी गोबंदगढ़ के पास एक हादसे में उनकी जान चली गई. हर मौत किसानों के न झुकने के जज़्बे को मज़बूत कर देती है. लेकिन परिवार जनों को होने वाली तकलीफ का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.
सुप्रीम कोर्ट में 17 दिसंबर को भी सुनवाई है. देखा जाएगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर पर गतिरोध का कोई हल निकाल पाएगा.

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