पीएम मोदी पर आरोप लगाकर क्यों पलटा ये श्रीलंकाई?
MMC फ़र्डीनाण्डो के आरोपों के पीछे की कहानी क्या है?

नाव में सवार हैं. इसके पीछे की वजह है, एक आरोप. किसका? सीलोन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (CEB) के चेयरमैन MMC फ़र्डीनाण्डो का. फ़र्डीनाण्डो के मुताबिक, राष्ट्रपति गोटबाया ने एक विंड पावर प्रोजेक्ट अडानी ग्रुप को देने के लिए कहा था. ये पावर प्रोजेक्ट 500 मेगावाट की क्षमता वाला था. फ़र्डीनाण्डो के आरोप में सबसे चौंकाने वाला बयान नरेंद्र मोदी से जुड़ा था. बकौल बयान, अडानी ग्रुप को प्रोजेक्ट अलॉट करने के पीछे नरेंद्र मोदी का प्रेशर था. उनके कहने पर ही गोटबाया ने फ़र्डीनाण्डो को बुलाकर आदेश दिया था. जब ये रिपोर्ट छपी तो श्रीलंका के साथ-साथ भारत में भी हंगामा मचा. दोनों जगहों पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की. कहा गया कि पूरी सरकार एक बिजनेसमैन के इशारों पर काम कर रही है.
जिस समय पूरा बवाल आकार ले रहा था, उसी बीच में MMC फ़र्डीनाण्डो ने अपना बयान बदल लिया. बोले कि वो भावनाओं में बह गए थे. उनके मुंह से ग़लती से उल्टा-सीधा निकल गया.
आज हम जानेंगे,
- MMC फ़र्डीनाण्डो के आरोपों के पीछे की कहानी क्या है?
- पूरे मसले पर श्रीलंका सरकार क्या कह रही है?
- और, आगे क्या कुछ हो सकता है?
हम शो को आगे बढ़ाते हैं. जहां बात श्रीलंका के राजनैतिक संकट की होगी. जिसके तार भारत से भी जुड़ रहे हैं.
श्रीलंका की संसद की एक कमिटी है. द कमिटी ऑन पब्लिक इंटरप्राइजेज़ (COPE). इसकी स्थापना जुलाई 1979 में की गई थी. COPE का काम क्या है? कमिटी सरकारी और अर्ध-सरकारी कंपनियों और संस्थाओं में वित्तीय अनियमतिता पर नज़र रखती है. देखती है कि कहीं पर फ़र्ज़ीवाड़ा तो नहीं हुआ है. किसी ने पैसा खाकर नियमों को ताक पर तो नहीं रख दिया है. इस कमिटी का दायरा उन कंपनियों और संस्थाओं तक सीमित है, जिनमें श्रीलंका सरकार का शेयर हैं.
10 जून 2022 को इसी कमिटी के सामने एक सुनवाई हो रही थी. इसमें सीलोन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (CEB) के चेयरमैन को बुलावा भेजा गया था. उन्हीं से पूछताछ होनी थी. इसी सुनवाई के दौरान मन्नार पावर प्रोजेक्ट का मसला उठा. द मॉर्निंग की रिपोर्ट के अनुसार, फ़र्डीनाण्डो ने कमिटी के सामने नवंबर 2021 की एक घटना सुनाई. उनके मुताबिक, राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने उनको बुलाकर कहा कि CEB मन्नार पावर प्रोजेक्ट का टेंडर अडानी ग्रुप को दे दे. गोटबाया ने ये भी कहा कि उन्होंने कैबिनेट का अप्रूवल पहले ही ले लिया है. फ़र्डीनाण्डो के मुताबिक, गोटबाया ने उन्हें कैबिनेट की चिट्ठी भी दी थी.

बकौल फ़र्डीनाण्डो, उन्होंने राष्ट्रपति को सूचित किया कि टेंडर ऑफ़र करने का अधिकार उनके या CEB के पास नहीं है. टेंडर पर अंतिम फ़ैसला बोर्ड ऑफ़ इन्वेस्टमेंट लेता है. फ़र्डीनाण्डो ने फ़ाइनेंस मिनिस्ट्री में एक चिट्ठी भी लिखी. इसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने मुझे ऐसा-ऐसा करने के लिए कहा है. इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है. आगे का मामला आप देखिए.
फ़र्डीनाण्डो ने अपने बयान में नरेंद्र मोदी का नाम भी लिया था. उनके मुताबिक, गोटबाया मोदी के दबाव में ही उन्हें ये आदेश दे रहे थे.
फ़र्डीनाण्डो की गवाही के बाद श्रीलंका सरकार की सफ़ाई आई. गोटबाया के ऑफ़िस की तरफ़ से बयान जारी हुआ. सरकार ने फ़र्डीनाण्डो के बयान को पूरी तरह से नकार दिया. उन्होंने कहा,
“इस समय श्रीलंका बिजली की कमी से जूझ रहा है और राष्ट्रपति बड़े पावर प्रोजेक्ट्स को जल्द से जल्द शुरू करना चाहते हैं. हालांकि, इन्हें अलॉकेट करने में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप नहीं है. री-न्युएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए सीमित संख्या में प्रस्ताव आते हैं. उनके सेलेक्शन में विशेष ध्यान दिया जाता है. पूरा प्रोसेस श्रीलंका सरकार की तय पारदर्शी और जवाबदेह नीति के तहत किया जाता है.”
12 जून को गोटबाया राजपक्षे ने भी ट्वीट कर CEB चेयरमैन के आरोपों को नकार दिया.
सरकार की सफ़ाई के बाद फ़र्डीनाण्डो ने अपना बयान वापस ले लिया. उन्होंने कहा कि कमिटी मेरे ऊपर संगीन आरोप लगा रही थी. मेरे ऊपर दबाव बनाया जा रहा था. इसी वजह से परेशान होकर मैंने भारत के प्रधानमंत्री का नाम लिया. मैं इसके लिए बिना किसी शर्त के माफ़ी मांगता हूं.
इस मामले में एक और अपडेट है. 13 जून की शाम MMC फ़र्डीनाण्डो ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
ये तो हुई आरोप और सफ़ाई. श्रीलंका में अडानी ग्रुप का नाम इतना उछल क्यों रहा है?
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका ने बिजली से जुड़े कानूनों में भारी फेरबदल किया है. अब एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगाने का प्रोसेस लगभग खत्म कर दिया है. विपक्ष का आरोप है कि इसके जरिए अडानी ग्रुप जैसी कंपनियों के लिए रास्ता बनाया जा रहा है.
इससे पहले मार्च 2022 में भी विपक्षी पार्टियों ने CEB और अडानी ग्रुप के बीच हुए पावर प्रोजेक्ट डील की आलोचना की थी. आरोप लगाया गया था कि गोटबाया अडानी ग्रुप की बैकडोर से एंट्री करवा रहे हैं. ये कानूनसम्मत नहीं है.
अडानी ग्रुप श्रीलंका में एनर्जी प्रोजेक्ट्स के अलावा भी कई क्षेत्रों में काम कर रहा है. गौतम अडानी और गोटबाया राजपक्षे ने अक्टूबर 2021 में मुालक़ात भी की थी. उस दौरान उन्होंने साथ मिलकर श्रीलंका में इंफ़्रास्ट्रक्चर का विकास करने का वादा किया था. इन सबके अलावा, श्रीलंका के मौजूदा आर्थिक संकट में भारत सबसे बड़े मददगार के तौर पर सामने आया है. हालिया आरोप-प्रत्यारोप इन संबंधों में क्या गुल खिलाते हैं, ये देखने वाली बात होगी.
इस मामले में जो भी अपडेट्स होंगी, उन्हें हम आप तक पहुंचाते रहेंगे.
अब सुर्खियों की बारी.
पहली सुर्खी चीन से है. ताइवान को लेकर चल रहा विवाद नए मोड़ पर पहुंच चुका है. ताइवान के मसले पर चीन ने पहली बार खुले तौर पर युद्ध की धमकी दी है. सिंगापुर में एशियन सिक्योरिटी समिट के मौके पर रक्षामंत्री वेई फ़ेंग्हे ने चीन का रुख साफ़ कर दिया है. उन्होंने कहा कि अगर किसी ने ताइवान को हमसे अलग करने की कोशिश की तो युद्ध होगा. ऐसी स्थिति में हमारे पास कोई विकल्प नहीं रहेगा. हम किसी भी कीमत पर ताइवान की आज़ादी और अपनी राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा करेंगे. उनका इशारा अमेरिका की तरफ़ था. मई में टोक्यो में हुई क्वाड समिट के दौरान जो बाइडन ने कहा था कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया तो अमेरिका अपनी सेना उतार देगा. इससे पहले तक दोनों देश बलप्रयोग की धमकी देने से बच रहे थे.
चीनी रक्षामंत्री के बयान पर अमेरिका का भी बयान आया. अमेरिका के रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टिन सिंगापुर में ही थे. उन्होंने कहा कि चीन उकसावे वाली बयानबाज़ी कर रहा है. अमेरिका यथास्थिति बरकरार रखने के पक्ष में है.

लॉयड ऑस्टिन और वेई फ़ेंग्हे ने अलग से भी मुलाक़ात की. दोनों नेताओं ने कम्युनिकेशन लाइन मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया. ताकि किसी भी तरह की ग़लतफहमी से बचा जा सके.
जहां तक चीन और ताइवान के आपसी रिश्ते की बात है, उसके बारे में हम पहले भी बता चुके हैं. एक बार फिर से बैकग्राउंड समझा देते हैं.
1949 में माओ की कम्युनिस्ट पार्टी ने च्यांग काई-शेक की कुओमितांग पार्टी को फ़ारमोसा द्वीप पर धकेल दिया. फ़ारमोसा को ही ताइवान के नाम से जाना जाता है. चीन इसको अपना प्रांत बताता है. 1992 में दोनों पक्षों के बीच एक आम सहमति बनी थी. ये समझौता चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) और कुओमितांग पार्टी (KMT) के बीच हुआ था. इसमें तय हुआ कि ताइवान ‘वन चाइना पॉलिसी’ का पालन करेगा. KMT की मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी, डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) ने इस समझौते को कभी रज़ामंदी नहीं दी. ताइवान की मौजूदा राष्ट्रपति साई इंग-वेन DPP की ही नेता हैं. उन्होंने भी 1992 के समझौते को मानने से मना कर दिया है.
चीन, यूएन की एजेंसियों और दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में ताइवान की सदस्यता का विरोध करता है. ताइवान WHO का हिस्सा भी नहीं है. ताइवान को WHO का हिस्सा बनाने के लिए G7 देश भी पहल कर चुके हैं. ताइवान चालीस से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सदस्य है. इनमें एशियन डेवलपमेंट बैंक, एशिया पैसिफ़िक इकोनॉमिक कॉपरेशन फ़ोरम कोपरेशन और वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन जैसे संगठन शामिल हैं.
जहां तक अमेरिका-ताइवान संबंधों की बात है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध मज़बूत हुए. उनके कार्यकाल में अमेरिका ने ताइवान को लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये के हथियार बेचे.
ट्रंप के बाद जो बाइडन ने ताइवान को हथियार बेचना जारी रखा है .बाइडन पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अपने शपथग्रहण में ताइवान सरकार के प्रतिनिधियों को बुलाया था.
दूसरी सुर्खी ऑस्ट्रेलिया से है. ऑस्ट्रेलिया को एक डील तोड़ने के लिए लगभग पांच हज़ार करोड़ रुपये का फटका लगा है. ये मामला फ़्रांस के साथ हुए सबमरीन डील से जुड़ा है. साल 2016 में ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस से 12 डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां खरीदने का सौदा किया था. इसके लिए ऑस्ट्रेलिया लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये चुकाने वाला था.
फ़ाइनल डेलिवरी 25 सालों में पूरी होने वाली थी. फ़्रांस ने काम शुरू भी कर दिया था. फिर सितंबर 2021 में ऑस्ट्रेलिया ने अचानक से सौदा छोड़ दिया. वो भी फ़्रांस को बिना बताए. इसकी बजाय उसने अमेरिका और यूके के साथ सौदा कर लिया. इस डील को ऑकस का नाम दिया गया है. ऑकस के तहत ऑस्ट्रेलिया को डीजल-इलेक्ट्रिक की जगह परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां मिलेंगी. अचानक डील तोड़ने से फ़्रांस बेहद नाराज़ हुआ. उसने कहा कि ऑस्ट्रेलिया ने हमारी पीठ में छुरा घोंपा है. फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ऑस्ट्रेलिया के उस समय के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन को झूठा तक बता दिया था. फ़्रांस ने ऑस्ट्रेलिया से अपना राजदूत भी वापस बुला लिया था. कुल जमा बात ये कि दोनों देश एक-दूसरे से भयंकर गुस्सा हो गए थे.
अब ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस का गुस्सा ठंडा करने की कोशिश की है. ऑस्ट्रेलिया नुकसान की भरपाई के तौर पर पांच हज़ार करोड़ रुपये की रकम चुकाएगा. ऑस्ट्रेलिया के मौजूदा प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ जुलाई में फ़्रांस के दौरे पर भी जाएंगे. इस दौरान पुराने मतभेदों को भुलाकर आगे बढ़ने की कोशिश की जाएगी.
तीसरी सुर्खी पाकिस्तान से है. पाकिस्तान में सिविलियन सरकार पर मिलिटरी एस्टैबलिशमेंट का कंट्रोल और बढ़ गया है. 04 जून को प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सरकारी अधिकारियों की स्क्रीनिंग की ज़िम्मेदारी खुफिया एजेंसी ISI को सौंप दी. जिनकी नियुक्ति के लिए ISI की हरी झंडी की ज़रूरत होगी, उनमें सुप्रीम कोर्ट के जज, टॉप के सिविल अधिकारी और यूनिवर्सिटीज़ के प्रफ़ेसर जैसे पद शामिल हैं. उनकी नियुक्ति से लेकर प्रमोशन तक में अंतिम फ़ैसला ISI का होगा. ऐसे लोग किसी भी हालत में मिलिटरी एस्टैबलिशमेंट के ख़िलाफ़ नहीं जा पाएंगे. पाकिस्तान में अहम पदों पर नियुक्ति के लिए ISI और IB की रिपोर्ट पहले भी ली जाती थी. लेकिन इसे औपचारिकता का जामा नहीं पहनाया गया था. पाकिस्तान में कोई खुलकर इस फ़ैसले का विरोध नहीं कर रहा है. लेकिन अंदर ही अंदर नाराज़गी पनप रही है. कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चेताया है कि इससे देश में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा.
पाकिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य शासन का लंबा इतिहास रहा है. अयूब ख़ान से लेकर परवेज़ मुशर्रफ़ तक, सेना ने सीधे हाथ से सत्ता चलाई. बाकी समय जब सिविलियन सरकार रही, उस समय भी सेना का हस्तक्षेप बरकरार रहा. हालिया उदाहरण इमरान ख़ान का है. उन्होंने साढ़े तीन साल तक सेना के वरदहस्त से सरकार चलाई. फिर रिश्ता बिगड़ा और उन्हें बेआबरू होकर कुर्सी छोड़नी पड़ी. जानकारों की मानें तो जिस ग़लती ने इमरान ख़ान की पोलिटिक्स में पलीता लगाया, शहबाज़ शरीफ़ वही ग़लती दोहरा रहे हैं. लेकिन उनके पास दूसरा कोई विकल्प भी तो नहीं है.
चौथी सुर्खी ईरान से है. ईरान रेवॉल्युशनरी गार्ड्स कोर (IRGC) के अफ़सरों की रहस्यमयी मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. ईरान की स्टेट मीडिया के मुताबिक, 12 जून को एयरोस्पेस डिविजन के दो अधिकारियों की ड्यूटी पर मौत हो गई. उनमें से एक सड़क दुर्घटना में मारा गया. ईरान ने उन्हें शहीद का दर्ज़ा दिया है. ईरान अपने सैनिकों को शहीद का दर्ज़ा तब देता है, जब उनकी हत्या की पुष्टि हो. ईरान ने इस दावे का कोई जवाब नहीं दिया है.
जून में ही अली इस्माइलज़ादेह नाम का एक अफ़सर बालकनी से गिरकर मर गया. लंदन से चलने वाले एक ईरानी चैनल ने दावा किया कि ये एक्सीडेंट नहीं, बल्कि हत्या थी. कहा गया कि रेवॉल्युशनरी गार्ड्स ने जान-बूझकर अपने अफ़सर को रास्ते से हटा दिया. उसके ऊपर एक ईरानी कर्नल की हत्या की साज़िश रचने का आरोप लग रहा था.
इससे पहले, 31 मई को एयरोस्पेस इंजीनियर अयूब एंतेज़ारी एक डिनर पार्टी में गया. लौटने के बाद उसे बेचैनी हुई. अस्पताल में पता चला कि उसे ज़हर दिया गया है. एंतेज़ारी को बचाया नहीं जा सका. जिस पार्टी में एंतेज़ारी गया था, उसका मेज़बान उसी रोज़ देश छोड़कर भाग गया. सरकारी बयान आया कि एंतेज़ारी एक साधारण स्टाफ़ था. उसका IRGC से कोई लेना-देना नहीं था. इज़रायल की मीडिया में उसके बारे में कुछ और ही जानकारी छपी. वहां लिखा गया कि एंतेज़ारी ईरान के मिसाइल एंड ड्रोन प्रोग्राम के लिए काम करता था.

एंतेज़ारी से पहले 26 मई को डिफ़ेंस मिनिस्ट्री का एक इंजीनियर ड्रोन हमले में घायल हो गया था. उसी ज़ख्म से उसकी मौत हो गई. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वो इज़रायल के ड्रोन हमले का शिकार हुआ था.
हालिया दिनों में सबसे हाई-प्रोफ़ाइल हत्या 22 मई को हुई. उस दिन क़ुद्स फ़ोर्स के कर्नल हसन खोदाई को उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी. IRGC के कमांडर-इन-चीफ़ हुसैन सलामी ने इस हत्या के लिए इज़रायल को ज़िम्मेदार ठहराया. इससे पहले भी इज़रायल का नाम ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में आया है. ईरान ने इन हत्याओं का बदला लेने की धमकी भी दी है. हालांकि, अभी तक उनकी तरफ़ से कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है.
आज की पांचवीं और अंतिम सुर्खी बोलीविया से है. बोलीविया की एक अदालत ने तख्तापलट के आरोप में पूर्व राष्ट्रपति जेनिन अनीज़ को 10 साल की सज़ा सुनाई है. उनपर संविधान के ख़िलाफ़ काम करने का इल्ज़ाम भी था. जेनिन नवंबर 2019 से नवंबर 2020 तक बोलीविया की राष्ट्रपति रहीं.
नवंबर 2019 में इवो मोरेल्स मास बोलीविया के राष्ट्रपति थे. उसी समय उनके ख़िलाफ़ देशभर में हिंसक प्रोटेस्ट शुरू हो गए. मास देश छोड़कर भाग गए. खाली कुर्सी पर अनीज़ ने क़ब्ज़ा कर लिया. उन्होंने वादा किया कि वो बस कार्यवाहक राष्ट्रपति हैं. जल्दी ही देश में चुनाव कराए जाएंगे. अनीज़ ने ये भी कहा कि वो इस चुनाव में खड़ी नहीं होंगी. वादा पूरा करने की बजाय उन्होंने मास के समर्थकों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी. सरकारी दफ़्तरों में धार्मिक निशान लगाने लगीं. बोलीविया की विदेश नीति को बदलना शुरू कर दिया. उनकी सरकार ने मास के ख़िलाफ़ राजद्रोह और आतंकवाद का केस भी लगा दिया.
इन सबके बीच मास के समर्थक नाराज़ हो रहे थे. अनीज़ को चुनाव कराने पड़े. अक्टूबर 2020 में हुए चुनाव में मास के समर्थन से लुईस आर्क जीत गए. अनीज़ को कुर्सी छोड़कर जाना पड़ा. फिर उनके ऊपर तख़्तापलट के आरोप लगे. मार्च 2021 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. अब उन्हें इस मामले में सज़ा सुना दी गई है. जेनिन अनीज़ का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई की गई है. उनके वकील इंटरनैशनल कम्युनिटी में अपील करने वाले हैं.

