स्टालिन ने जलाई बिल की कॉपी, रेड्डी-सिद्धारमैया ने दी चेतावनी! दक्षिण भारत के राज्य परिसीमन पर क्यों आग बबूला?
Delimitation Bill 2026: इस बिल का दक्षिण के राज्य विरोध कर रहे हैं. नॉर्थ बनाम साउथ का नैरेटिव क्यों चल रहा है? और क्या वाकई इससे साउथ की सीटों को नुकसान पहुंचेगा? इसे जानने की कोशिश करेंगे.

केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन अहम बिल संसद में पेश किए हैं. इन्हीं बिलों में शामिल है- डिलिमिटेशन यानी परिसीमन बिल 2026, जिसका दक्षिण के राज्य विरोध कर रहे हैं. बिल पास होने के बाद लोकसभा में सांसदों की संख्या 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएगी. फिर इन्हीं सांसदों में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.
विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिलाओं के रिजर्वेशन का समर्थन करते हैं लेकिन इसे डिलिमिटेशन से जोड़ने का विरोध करते हैं. जो बिल सरकार लेकर आ रही है, उससे संसद कैसे बदलने वाली है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? नॉर्थ बनाम साउथ का नैरेटिव क्यों चल रहा है? और क्या वाकई इससे साउथ की सीटों को नुकसान पहुंचेगा? ऐसे सारे सवालों के जवाब जानें.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुरुवार, 16 अप्रैल को ‘परिसीमन बिल 2026’ की कॉपी जलाकर अपना विरोध जताया. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, DMK अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ने इसे एक ‘साजिश और काला कानून’ बताया. उन्होंने लोगों से गुरुवार को हर घर और सार्वजनिक जगह पर काले झंडे फहराने की अपील की.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने स्टालिन से अपील की कि वे दक्षिणी राज्यों को एकजुट कर केंद्र के प्रस्ताव के खिलाफ साझा मोर्चा बनाएं. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव की टाइमिंग के पीछे बीजेपी की राजनीतिक मंशा है. उन्होंने कहा कि यह कोशिश उन दक्षिणी राज्यों के महत्व को कम करने की है, जहां बीजेपी को जीत नहीं मिलती है.
कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 15 अप्रैल को दिल्ली में अपने आवास पर INDIA गठबंधन की सर्वदलीय बैठक बुलाई. इस बैठक में महिला आरक्षण बिल और डिलिमिटेशन को लेकर चर्चा हुई. खरगे ने साफ कहा कि परिसीमन वाले बिल का विरोध करेंगे और सब विपक्षी पार्टियां मिलकर संसद में इसका विरोध करेंगी.
क्या है इस विरोध की वजह?द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर तीनों प्रस्ताव लागू हो जाते हैं तो हिंदी भाषी राज्यों (हिंदी हार्टलैंड) की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगी. लेकिन साउथ के राज्यों की हिस्सेदारी घटकर 24.3% से 20.7% रह जाएगी. रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रस्ताव के लागू होने पर उत्तर प्रदेश की लोकसभा में हिस्सेदारी 14.73% से बढ़कर 16.24% हो जाएगी, जबकि केरल की हिस्सेदारी 3.68% से घटकर 2.7% रह जाएगी.
बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 72 यानी 7.37% से बढ़कर 8.47% हो जाएंगी. महाराष्ट्र में सीटें 48 से बढ़कर 78 हो जाएंगी और तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 50 होंगी. लेकिन बावजूद इसके तमिलनाडु की कुल हिस्सेदारी घटकर 7.18% से 5.88% हो जाएगी. इसे ऐसे समझिए कि जो लोग यूपी, बिहार ,मध्यप्रदेश और राजस्थान में रहते हैं उनकी आवाज उठाने वाले संसद में बढ़ जाएंगे. लेकिन जो गैर-हिंदी भाषी राज्य है, वहां सीटें तो बढ़ेंगी, लेकिन संसद में प्रतिनिधित्व घट जाएगा.
अभी यह साफ नहीं है डिलिमिटेशन के बाद किस राज्य में कितने सांसद होंगे? अनुमान पर बात की जा रही है. हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक, डिलिमिटेशन से जिन्हें सबसे ज्यादा फायदा होगा वो पांच राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र.
सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा? तमिनलाडु, केरल, आंध्र प्रदेश+तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना साथ में लिया गया है क्योंकि 2011 में आंध्र प्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था.
यूपी-बिहार के सांसदों का प्रतिनिधित्व 22.1 परसेंट से बढ़कर 25.1 परसेंट हो जाएगा यानी करीब एक चौथाई. लेकिन तमिलनाडु, केरल, आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक की सीटें मिलाकर देखें तो 20.1 परसेंट रिप्रजेंटेशन से घटकर 18 परसेंट हो जाएगा. यानी दक्षिण के राज्यों के प्रतिनिधि घट जाएंगे. यही वजह है जिसकी वजह से परिसीमन को लेकर उत्तर बनाम दक्षिण का नैरेटिव चल रहा है.
परिसीमन का मुद्दा पिछले 50 साल से राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता रहा है. दक्षिण भारत के राज्यों का कहना है कि अगर सीटों का बंटवारा सिर्फ जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उन्हें नुकसान होगा, क्योंकि वे जनसंख्या नियंत्रण पर सफल रहे हैं. उत्तर भारत के कई राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. इसी वजह से 1976 और 2001 में संविधान संशोधन कर सीटों में बदलाव को टाल दिया गया था. अभी यह रोक 2026 तक लागू है. अब सरकार इस व्यवस्था को बदलना चाहती है. परिसीमन के समय किसी खास जनगणना से जोड़ने की बाध्यता हटाना चाहती है, जो अभी संविधान में लिखी हुई है. उसे बदलना चाहती है.
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प्रोपोर्शन यानी समानुपात के आधार पर किन राज्यों को फायदा होगा?
यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र इन पांचों राज्यों में बीजेपी की अगुवाई में NDA की सरकार है. तीन राज्यों में तो बीजेपी की अकेले पूर्ण बहुमत की सरकार है. लेकिन जिन राज्यों को अनुपात के हिसाब से नुकसान हो रहा है, आंध्र प्रदेश को छोड़कर उन सभी राज्यों में बीजेपी की विरोधी पार्टी की सरकारें हैं. आंध्र प्रदेश में NDA की सरकार है। बीजेपी यहां चंद्रबाबू नायडू की TDP और पवन कल्याण की पार्टी के साथ सहयोग में सरकार चला रही है. नायडू ने जाहिर तौर पर दक्षिण भारत में अलग रुख अपनाया है. उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि सबलोग मतभेद भुलाकर महिला आरक्षण बिल का समर्थन करें. हालांकि, उन्होंने परिसीमन के प्रस्तावों पर या उससे जुड़ी चिंताओं पर कोई बयान नहीं दिया है.
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