खट्टर या मान दिल्ली की जहरीली हवा के लिए कौन जिम्मेदार?
दिल्ली के प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता.

दिल्ली और आसपास के इलाकों में आप बाहर निकलेंगे तो आसमान पीले रंग का दिखाई देगा. और धुंध सी दिखाई देगी. कुछेक सौ मीटर से आगे की चीज इस धुंध में नहीं दिखाई देगी. हो सकता है कि आपकी आंखें जलने लगें. हो सकता है कि आपको खांसी आने लगे. गला भारी होने लगे. आपको सांस लेने में दिक्कत होने लगे. आपको लगातार एक गंधैली-सी महक आती रहेगी. जैसे कुछ जल-सा रहा हो.
ये दिल्ली की हवा की महक है. ये सरकारों की नाकामियों की भी महक है और साथ ही ये महक है हमारी टूट चुकी जिम्मेदारियों की, जिसके तहत हम अपनी हवा नहीं बचा सके.
तो कैसी है दिल्ली की हवा? हवा का हाल बताने के लिए एक पैरामीटर का उपयोग होता है - AQI. AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स. यानी हवा की गुणवत्ता का सूचकांक. इसको सबसे पहले अमरीका की एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी यानी USEPA ने बनाया था, जिसका इस्तेमाल अब दुनिया के बहुत सारे देश करते हैं. ये AQI हवा में मौजूद प्रदूषण की वजह से AQI बदलता है. जितना ज़्यादा AQI, यानी उतना ज़्यादा प्रदूषण. इसी AQI के बढ़ने-घटने पर तमाम सरकारें प्रदूषण रोकने-थामने की कोशिश में जुट जाती हैं.
इसकी रेंज शुरू होती है शून्य से. और तमाम रेंज में हवा को अलग-अलग केटेगरी में बांटा जाता है. जैसे-
AQI 0 से 50 है - हवा की क्वालिटी GOOD है
51 से 100 - संतोषजनक यानी SATIFACTORY है
101-200 - कम प्रदूषित यानी MODERATELY POLLUTED है
201-300 - मतलब हवा ख़राब यानी POOR है
301-400 - हवा बहुत ख़राब यानी VERY POOR है
401 के ऊपर हवा का स्तर - गंभीर यानी SEVERE स्थिति में चला जाता है
इसको नापने का काम हमारे देश में एक एजेंसी के पास है. एजेंसी का नाम - सेंट्रल पोल्युशन कंट्रोल बोर्ड. इस एजेंसी के पास देश में हर जगह फैले या सुधरे प्रदूषण का डेटा होता है. ये डेटा एजेंसी को शहरों में अलग-अलग जगह पर लगे पोल्युशन मॉनिटरिंग सिस्टम से मिलता है. और ये जो सिस्टम होते हैं,उनमें एक सेंसर होता है, जो आसपास की हवा का आकलन करता है. तमाम शहरों से ये डेटा सीधे एजेंसी के पास जाता है, जो उनकी वेबसाइट या एप पर जाकर आसानी से देखा जा सकता है.
अब दिल्ली की हवा पर वापिस आते हैं. आज की तारीख यानी 7 नवंबर को दिल्ली के तमाम इलाकों में कितना AQI दर्ज किया गया? 4 अलग-अलग स्टेशन का जिक्र करते हैं-
आनंद विहार - 432
आरके पुरम - 437
पंजाबी बाग - 439
मोती बाग - 410
यानी दिल्ली के 4 स्टेशन मिलाजुलाकर हवा की स्थिति घातक या गंभीर स्थिति में दर्शा रहे थे. लेकिन प्रदूषण का ये मामला केवल दिल्ली की सीमा का नहीं है. दिल्ली की सीमा से सटे दूसरे इलाके भी हैं, जिनको मिलाकर दिल्ली NCR का निर्माण होता है. इन इलाकों में कैसा रहा हवा का हाल?
नोएडा - औसतन AQI रहा 350 यानी बहुत खराब
ग्रेटर नोएडा - औसतन AQI रहा 440 यानी गंभीर
गाजियाबाद - औसतन AQI रहा 360 यानी बहुत खराब
फरीदाबाद - औसतन AQI रहा 380 यानी बहुत खराब
गुरुग्राम - औसतन AQI रहा 370 यानी बहुत खराब
हम आपको औसत बता रहे हैं कि यानी किसी एक स्टेशन पर AQI बहुत ज्यादा रहा होगा, और किसी पर बहुत कम. तभी एक ये औसत की संख्या बनी.
प्रदूषण इतना है, लेकिन इसकी वजह क्या है? और हर साल अक्टूबर-नवंबर के महीने में ही प्रदूषण की समस्या क्यों बढ़ जाती है? खासकर दिल्ली NCR के हिस्से में. हमने विशेषज्ञों की मदद से और रिसर्च आर्टिकल की मदद से कुछ कारण इकट्ठा किए हैं. जानते हैं इन्हें-
1 - वाहन - देश के इस हिस्से में अर्बन आबादी ज़्यादा है. इस आबादी के पास कारें हैं. और दूसरे किस्म के बड़े छोटे वाहन हैं. इनमें एक बड़ी संख्या डीजल या पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों की है. इसमें सामान ढोने वाले बड़े वाहनों को भी जोड़ लें. इनके चलने से प्रदूषण होता है.
2 - निर्माण - इस अर्बन आबादी को रहने के लिए घर चाहिये. यहाँ बनी कंपनियों को ऑफिस चाहिए. मॉल और दूसरे दुकान और जगहें चाहिए. सबही को चाहिए एक बिल्डिंग. और जब ये बिल्डिंग बनाए जाते हैं तो ईंट, बालू, मिट्टी, सीमेंट का इस्तेमाल होता है. और भवन निर्माण के समय ये चीज़ें उड़ने लगती हैं, तो हवा में बैठ जाती हैं. इनकी वजह से भी प्रदूषण होता है.
3 - त्यौहार - इसी मौसम में देश के बड़े त्यौहार पड़ते हैं. दुर्गापूजा, दशहरा, दीवाली, छठ. इन मौकों पर आतिशबाजी और उत्सवसंबंधी दूसरी चीज़ें होती हैं, जो थोड़ा ही सही, लेकिन प्रदूषण में इजाफा करती हैं.
प्रदूषण के इस कारण पर धार्मिक क़िस्म की बहसें होती हैं, ‘हिंदुओं के ही त्यौहार से दिक़्क़त क्यों” मार्का सवाल पूछे जाते हैं. जबकि ये कलेक्टिव ज़िम्मेदारी की बहस है. इस पर एक समाज के तौर पर हमारा ध्यान होना चाहिये. बहरहाल, अगले कारण पर चलते हैं.
4 - पराली - ये ज़्यादा बड़ा कारण है. धान की फ़सल में से जब चावल के दाने निकाल लिए जाते हैं तो ठूंठ बच जाती है, जो मिट्टी में लगी रहती है. उसे कहते हैं पराली. अब अगली फसल तभी लग पाएगी, जब इस पराली को हटा न लिया जाए. मिट्टी खोदकर पूरी पराली को हटाना एक लंबा और खर्चीला काम है. तो किसान एक सस्ता और आसान रास्ता अपनाते हैं. वो पराली लगे खेत को आग के हवाले कर देते हैं. आग से पराली जल जाती है. और खेत अगली बुवाई के लिए किसानों को ख़ाली मिल जाता है.
वापिस आते हैं पराली पर. क्योंकि ये अभी बहस का मुद्दा है. ये पराली जलाने का काम इक्का-दुक्का किसान नहीं करते हैं. अगर इक्का-दुक्का किसान करते तो इतनी राजनीति नहीं होती. पंजाब, हरियाणा, उतर प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखण्ड, राजस्थान के बहुतेरे किसान ये काम करते हैं. वो खेतों के एक कोने में आग लगाते हैं. आग धीरे-धीरे पूरे खेत में बढ़ती जाती है. ये खेत के साइज़ पर डिपेंड करता है कि उसमें लगी आग कितनी देर जलेगी. कभी कभी एक दो दिन. और कभी कभी कुछेक हफ़्तों तक आग जलती रहती है. धुआं फैलता रहता है. और हमने अभी जिन राज्यों का ज़िक्र किया, ये राज्य दिल्ली को चारों ओर से घेरे रहते हैं लिहाज़ा यहां के खेतों से उठी धुएं की चादर दिल्ली को ढंक लेती है. इसे प्रदूषण से जो धुंध उपजता है, उसे स्मॉग कहते हैं. वही स्मॉग जो अभी दिल्ली के ऊपर छाया हुआ है.
सर्दियां आने पर हवा की गति भी कम होती है. लिहाज़ा ये स्मॉग हवा के साथ बहने में समय लेता है. और कई दिनों तक आसमान में छाया रहता है. इसमें बहुत सारे ऐसे पार्टिकल होते, जिन्हें सिर्फ़ माइक्रोस्कोप की मदद से ही देखा जा सकता है. इन्हें पार्टीकुलेट मैटर कहा जाता है. ये न ज़मीन पर बैठते हैं, न गैस की तरह ऊपर उठते हैं. इतने हल्के होते हैं कि हवा में लटके ही रहते हैं. जब हम साँस लेते हैं तो ये साँसों के साथ अंदर फेफड़े तक जाते हैं और दिक़्क़त पैदा करते हैं. कैसी दिक्कत पैदा करते हैं? ये दिक्कत फेफड़ों से शुरू होकर हमारे दिमाग तक जाती है.
साफ है कि हमारी तबीयत इन वजहों से खराब होगी और हो रही है. हम अपने दफ्तर से ही आपको उदाहरण दे देते हैं. हमारी टीम में लगभग 90 लोग हैं. हमारी टीम का एक बड़ा हिस्सा नोएडा में बैठता है. और रोजाना हमारे कई साथी इस प्रदूषण से होने वाली दिक्कतों की वजह से दफ्तर नहीं आ पा रहा.
अब पराली वाली समस्या में दो राज्यों पर फोकस ज्यादा है. पंजाब और हरियाणा. ये ही दो राज्य क्यों? क्योंकि इन दो राज्यों में सबसे अधिक पराली जलाई जाती है. पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और हरियाणा में भाजपा की. दोनों ही राज्य एक दूसरे पर सबसे अधिक पराली जलाने का इल्जाम लगा रहे हैं. और सच ये है कि दोनों ही राज्य बेधड़क पराली जला रहे हैं. दोनों राज्यों की तुलना करें तो दोनों ही राज्यों में कमी आई है. लेकिन प्रदूषण को देखते हुए हम कह सकते हैं कि ये कम, अब भी बहुत ज्यादा है. और आंकड़े कहते हैं कि पराली से लगी आग का कुल 65 प्रतिशत अकेले पंजाब में है. यानी पंजाब में ज्यादा पराली जलाई जा रही है.
अब पराली को लेकर ये जो झगड़ा हो रहा है, वो सुप्रीम कोर्ट में चला गया है. 7 नवंबर 2023 को जस्टिस संजय किशन कौल और सुधांशु धूलिया की बेंच ने स्वतः संज्ञान के तहत मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने कुछ कठोर टिप्पणियाँ कीं -
1 - दिल्ली के लोग बीमार हो रहे हैं क्योंकि वो हर साल इसी मौसम में प्रदूषण का सामना करते हैं. ये मौसम बीत जाता है और फिर लौटकर अगले साल आता है. ऐसा पाँच साल से लगातार हो रहा है.
2 - अब समय है कि इस पर कुछ किया जाए, बजाय कि इसको अगले साल पर टाल दिया जाए.
3 - हम चाहते हैं कि पराली जलाना बंद किया जाए. हमें नहीं पता कि आप कैसे करेंगे, लेकिन इसे करिए.
जस्टिस कौल ने एक वाकया सुनाया. मैं एक वीकेंड पर पंजाब यात्रा पर था. मैंने रोड के दोनों ओर खेत जलते हुए देखे.
सुनवाई में पंजाब सरकार ने दावा ठोंका - "पिछले साल के मुकाबिले इस साल पराली जलाने के मामले में 40 परसेंट की कमी आई है"
इस पर जस्टिस कौल ने संदेह जताया और कहा
"कहां है कमी? केवल इतना अंतर आया है कि आप दूसरे राज्यों पर ब्लेम डाल रहे हैं. ज़ाहिर है कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं. लेकिन हमेशा ये राजनीतिक लड़ाई नहीं हो सकती है."
फिर लपेटे में आई दिल्ली सरकार. क्योंकि कुछ दिनों पहले खबर आई कि दिल्ली में स्मॉग से निपटने के लिए लगाए गए स्मॉग टावर काम नहीं कर रहे हैं. कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा कि टॉवर क्यों काम नहीं कर रहे है. दिल्ली सरकार का जवाब - अधिकारियों पर उचित कार्रवाई की जाएगी. कोर्ट ने कहा - टॉवर को जल्द चलायमान बनाएं. साथ ही आदेश दिया कि दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमिटी के चेयरमैन कोर्ट के सामने हाजिर हों.
इसके साथ ही कोर्ट ने पंजाब, दिल्ली, यूपी और राजस्थान के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को आदेश जारी किये. कहा कि पराली जलाने पर तत्काल रोक लगाएं. और इसके लिए हर थाना क्षेत्र के SHO को जिम्मेदार बनाएं.
ये तो हो गई कोर्ट की बात. सरकारें कितना काम कर रही हैं? पहले दिल्ली की बात करते हैं. दिल्ली में 6 नवंबर को odd-even सिस्टम लागू कर दिया गया है. 13 नवंबर से लेकर 20 नवंबर तक दिल्ली में ODD तारीखों वाले दिन ODD नंबर की कारें निकलेंगी, और EVEN नंबर वाले दिन EVEN नंबर वाली कारें. 13 नवंबर की तारीख क्यों? अभी क्यों नहीं? क्योंकि इसके पहले दिल्ली समेत पूरा देश दीपावली का त्यौहार मना रहा होगा. और लोगों को इसकी तैयारियों के लिए समय और गाड़ियां दोनों चाहिए, साथ ही दीपावली के बाद हवा और बिगड़ेगी, इसका अंदेशा जताया जा रहा है.
इसके साथ ही दिल्ली में GRAP का फेज 4 लागू कर दिया गया है. GRAP यानी GRAP यानी Graded Response Action Plan का दूसरा फ़ैज़ लागू कर दिया गया है. ये केंद्र सरकार के अधीन आने वाले Commission for Air Quality Management का बनाया हुआ एक्शन प्लान है, जो दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए लागू किया जाता है. इसका फेज 4 तब लागू किया जाता है, जब AQI 450 के पार हो. इसमें क्या-क्या एक्शन लिए जाते हैं -
1 - होटल और रेस्तरां में तंदूर में कोयले और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाती है.
2 - राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पार्किंग की फ़ीस बढ़ा दी जाती है. साथ ही CNG बसों, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और मेट्रो की संख्या बढ़ा दी जाती है. इन कदमों से लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने पर बाध्य होते हैं या हो सकते हैं.
3 - दिल्ली-एनसीआर में बीएस फोर डीज़ल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है. ज़रूरी सरकारी कामों को छोड़कर बाक़ी कंस्ट्रक्शन और डेमोलिशन की गतिविधियों को पूरी तरह रोक दिया जाता है
4 -सारे कंस्ट्रक्शन के काम रोक दिये जाते हैं. ज़िलाधिकारियों और सरकारों को ये अधिकार मिल जाते हैं कि वो स्कूलों की छुट्टियाँ घोषित करें. दफ़्तरों में वर्क फ्रॉम होम लागू करने के लिए भी कंपनियों से बात करे.
अब बात नोएडा की. नोएडा प्रशासन ने आंशिक पाबंदियों की घोषणा की है. ग्रेप 4 लागू कर दिया गया है. नर्सरी से लेकर कक्षा 9 तक के स्कूल बंद रहेंगे.
अब बात गुरुग्राम की. नगर प्रशासन ने भी स्कूलों को 10 नवंबर तक बंद कर दिया गया है. साथ ही दिल्ली की तरफ जाने वाले ट्रकों को भी रोका जाएगा, इसका भी ऐलान किया गया है. दिल्ली में रजिस्टर किये गए मीडियम और हेवी वाहनों की एंट्री रोकी जाएगी, बशर्ते वो एसेंशियल सर्विस से जुड़े न हों. साथ ही सभी किस्म की निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है.
इन कदमों के साथ एक उम्मीद मौसम ने भी दी है. उम्मीद ये कि दिल्ली और आसपास के इलाकों में ठंड बढ़ने वाली है, बारिश होने वाली है. आशा है कि प्रदूषण नालियों से बह जाएगा.
अगर हमारी हवा साफ नहीं है, और घर में हवा साफ करने की मशीनें लगाई जा रही हैं तो साफ है कि दिक्कत है. हम अपने नागरिक अधिकारों के लिए हकदार हैं तो हम साफ हवा और साफ पानी के लिए भी हैं. हम सरकारों को कोसते हैं. हम अपनी जिम्मेदारी उठाने से भी बचते हैं. अलबत्ता जिम्मेदारी उठाने की बात को हम अपनी धार्मिक आस्था पर हमले की तरह ले लेते हैं. लेकिन हमें जानना होगा कि साफ हवा हमारी भी जिम्मेदारी है.


