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बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के तार 1971 से किस तरह जुड़े हैं?

वहां की सरकार इसे लेकर क्या कदम उठा रही है?

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बांग्लादेश में हिंदू विरोधी प्रदर्शनों, हिंसा के बीच कई लोगों के मारे जाने की ख़बर है. 20 से अधिक जिलों में तनाव बना हुआ है. (फोटो- AP)
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अभिषेक
18 अक्तूबर 2021 (अपडेटेड: 18 अक्तूबर 2021, 03:14 PM IST)
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कट्टरता किसी एक संप्रदाय के लोगों की अमानत नहीं है. ये हर तरफ़ समान मात्रा में पाई जाती है. धर्म के नाम पर अधर्म करने वाले इधर भी हैं, उधर भी. उधर कहां? बांग्लादेश में. इन दिनों बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा चरम पर है. हिंदू मंदिरों और पूजा-पंडालों पर हमले और मूर्तियों की तोड़-फोड़ से शुरू हआ मामला हत्या और आगजनी तक पहुंच चुका है. बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक हैं. उन्हें अक्सर मज़हबी पागलपन का शिकार बनाया जाता है.
हालिया हिंसा की पूरी कहानी क्या है? हिंदुओं पर हो रहे हमलों के पीछे कौन लोग हैं? बांग्लादेश सरकार इस मसले में क्या कदम उठा रही है? और, इस हिंसा को रोकने के लिए भारत क्या कर रहा है? सब विस्तार से बताते हैं. दरअसल बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा का पुराना इतिहास रहा है. साल 1971 में जब पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया, तब उनका पहला निशाना हिंदू ही थे.
मशहूर इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने अपनी किताब ‘1971: ए ग्लोबल हिस्ट्री ऑफ़ द क्रिएशन ऑफ़ बांग्लादेश’ में पलायन पर एक बात दर्ज़ की है. उन्होंने लिखा है कि ऑपरेशन के शुरुआती दिनों में पूर्वी पाकिस्तान से पलायन करने वाले 80 फीसदी लोग हिंदू थे. बंगाली राष्ट्रवाद को कुचलने की शुरुआत 25 मार्च 1971 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन सर्चलाइट को हरी झंडी दिखाई थी. पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली राष्ट्रवाद के आंदोलन को कुचलने की शुरुआत की गई थी. आंदोलन के प्रणेता शेख़ मुजीबुर रहमान को गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसके बाद उनके साथियों को तलाश कर बेरहमी से मारा जाने लगा. अत्याचार के शिकार लोग भागकर भारत आने लगे. भारत ने पूर्वी पाकिस्तान से लगी अपनी सीमा खोल दी थी.
जो लोग भागने में कामयाब नहीं हो पाए, वे पाकिस्तान के खौफ़नाक कुकृत्यों का शिकार होने लगे. ‘जगन्नाथ हॉल’ ढाका यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक विद्यार्थियों और प्रफ़ेसर्स की रिहाइश है. 25 मार्च 1971 की रात जगन्नाथ हॉल में 42 लोगों की हत्या हुई थी. इनमें से 34 स्टूडेंट्स और चार प्रफ़ेसर थे. बाकी के चार वहां काम करने वाले कर्मचारी थे. इन लोगों को सिर्फ़ उनकी हिंदू पहचान के नाम पर मारा गया था.
16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने भारत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान का नया नामकरण हुआ. ‘बांग्लादेश’ के नाम से एक आज़ाद मुल्क़ का जन्म हो चुका था. भारत, बांग्लादेश को मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक था. भारत इस नए मुल्क़ के निर्माण का सबसे बड़ा सूत्रधार था. बांग्लादेश- धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र लड़ाई ख़त्म होने के बाद शेख़ मुजीब की अवामी लीग ने सरकार बनाई. शेख़ मुजीब आज़ाद बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति और फिर प्रधानमंत्री बने. उनकी सरकार ने बांग्लादेश को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ राष्ट्र घोषित किया.
शेख़ मुजीब कहा करते थे-
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शेख़ मुजीब को प्यार से लोग ‘बंगबन्धु’ भी कहते थे. उन्हें बांग्लादेश का राष्ट्रपिता माना जाता है. बंगबन्धु अपने देश को लोकतंत्र और मानवता की कसौटी पर कसना चाहते थे. लेकिन ये कुछ कट्टरपंथियों को रास नहीं आया. अगस्त 1975 में तख़्तापलट की साज़िश रची गई. इस तख़्तापलट में बंगबन्धु और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई.
1977 में मेजर जनरल ज़ियाउर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने. उन्होंने संविधान में से सेकुलर शब्द को बाहर निकाल दिया. ये बांग्लादेश की निष्पक्ष छवि पर पहली चोट थी. ज़ियाउर रहमान यहीं नहीं रुके. उन्होंने ‘जमात-ए-इस्लामी’ पर लगा बैन हटा दिया. जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में हुई थी. बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान इसने पाकिस्तान आर्मी का साथ दिया था. ये संगठन बांग्लादेश की आज़ादी के ख़िलाफ़ था. इसके अलावा, जमात का मकसद बांग्लादेश में शरिया कानून लागू करना था. इन्हीं वजहों से 1972 में शेख़ मुजीब की सरकार ने इस पर बैन लगा दिया था. बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए हालात बिगड़े  जब ज़ियाउर रहमान ने बैन हटाया, तब जमात ने एक नए नाम के साथ शुरुआत की. जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश. इस गुट का नाम भले ही बदल गया हो, लेकिन चरित्र बिल्कुल नहीं बदला. ज़ियाउर रहमान ने 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की स्थापना की. हालांकि, तीन साल बाद ही ज़ियाउर रहमान की हत्या हो गई. ज़ियाउर रहमान तो चले गए, लेकिन उन्होंने सांप्रदायिक कट्टरता का जो बीज बोया था, वो लगातार बढ़ता गया.
1988 में बांग्लादेश की मिलिटरी सरकार ने इस्लाम को ‘राष्ट्रीय धर्म’ घोषित कर दिया. 1991 में लोकतंत्र की वापसी हुई. चुनावों में BNP को जीत मिली. सत्ता की चाबी आई ज़ियाउर रहमान की विधवा ख़ालिदा ज़िया के हाथ में. उनके शासन के दौरान अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा में जमकर बढ़ोत्तरी हुई. दिसंबर 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई. इसके एक दिन बाद ही बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ दंगे भड़क गए. सात दिसंबर को ढाकेश्वरी मंदिर पर हमला हुआ. कई आश्रमों और आभूषण की दुकानों में भी लूटपाट की गई.
उसी दिन ढाका में इंडिया ए और बांग्लादेश के बीच मैच चल रहा था. इंडिया ए ने 8.1 ओवर में 30 रन बना लिए थे. सुरेंद्र श्रीराम भावे और नवजोत सिंह सिद्धू की ओपनिंग जोड़ी मैदान पर टिकी हुई थी. उसी समय पांच हज़ार से अधिक दंगाई लोहे का सरिया और बाकी हथियार लेकर स्टेडियम में घुस आए. भीड़ भारतीय क्रिकेटरों पर हमले के इरादे से आई थी. पुलिस काफी मशक्कत के बाद दंगाइयों को रोकने में कामयाब रही. हालांकि, वो मैच वहीं पर रोकना पड़ा. तय हुआ कि यही मैच तीन दिन बाद खेला जाएगा. लेकिन तब तक हालात इतने ख़राब हो चुके थे कि मैच रद्द करना पड़ा.
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बांग्लादेश सरकार एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच को सुरक्षा मुहैया करा पाने में नाकाम रही थी. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हालात कितने बुरे थे.

हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा मार्च 1993 तक चली. इस दौरान पलायन, हत्या, लूट और बलात्कार का अंतहीन सिलसिला चला. इन सबमें कहीं न कहीं सरकार का भी हाथ था. 1993 में बांग्लादेश के हिंदुओं ने दुर्गापूजा नहीं मनाया. इसी क्षोभ के चलते 1996 में सत्ता परिवर्तन हुआ. शेख़ मुजीब की बेटी शेख़ हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं. उन्होंने अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के ख़िलाफ़ लंबा कैंपेन चलाया था. अल्पसंख्यकों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया था. शेख़ हसीना का कार्यकाल शेख़ हसीना पहले कार्यकाल में कुछ खास नहीं कर पाई. उनके ऊपर लगातार भारत का पिट्ठू और इस्लाम-विरोधी होने के आरोप लगते रहे. 2001 में BNP की वापसी हुई. चुनाव जीतने के बाद BNP समर्थकों ने अपनी खुन्नस हिंदुओं से निकाली. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव के बाद हुई हिंसा में दो सौ से अधिक हिंदू महिलाओं का सामूहिक बलात्कार किया गया. कई इलाकों से हिंदू परिवारों को ज़बरदस्ती घरों से बाहर निकाला गया.
2009 में शेख़ हसीना दोबारा सत्ता में आई. तब जाकर 2001 में चुनाव के बाद हुई हिंसा की जांच शुरू हुई. रिपोर्ट से पता चला कि रेप की कुल संख्या 18 हज़ार से भी अधिक थी. इन वीभत्स घटनाओं में BNP और जमात के गठबंधन वाली सरकार के 25 से अधिक मंत्री भी शामिल थे. BNP ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया. कुछ मामलों में आरोपियों को सज़ा भी हुई. हालांकि, अधिकतर साज़िशकर्ता आसानी से छूट गए.
शेख़ हसीना ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने का वादा किया था. उन्होंने बांग्लादेश की सेकुलर छवि लौटाने का दम भी भरा था. उनकी सरकार ने ऐसा किया भी. संविधान के स्वरूप में सेकुलरिज़्म की वापसी हुई. हालांकि, वो इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म वाले कॉलम से हटाने में नाकाम रहीं है. बांग्लादेश का एक राष्ट्रीय धर्म है और ‘धर्मनिरपेक्षता’ का दावा भी करता है. बांग्लादेश इस मामले में एक अनोखा देश बन चुका है.
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1996 में शेख़ मुजीब की बेटी शेख़ हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं.
आज इन सबकी चर्चा की वजह क्या है? वजह है, बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी हिंसा की पुनरावृत्ति. 13 अक्टूबर को कोमिल्ला शहर में एक अफ़वाह फैली. कहा गया कि दुर्गा पूजा के एक पंडाल में क़ुरान को मूर्ति के पैर के नीचे रखा गया है. ख़बर आग की तरह फैल गई. किसी ने इसकी पुष्टि की ज़रूरत नहीं समझी. आवारा भीड़ को भड़काया गया. फिर हिंसा की एक श्रृंखला शुरू हो गई. कई इलाकों में मूर्तियों को तोड़ने की ख़बर आने लगी. पूजा पंडालों में आगजनी और हिंदुओं के घरों पर हमले की तस्वीरों और वीडियोज़ से सोशल मीडिया पर तैरने लगे.
हमले में चार लोगों की मौत की ख़बर है. कई लोग घायल भी हैं.  15 अक्टूबर को नोआखली इलाके में एक इस्कॉन मंदिर में भीड़ ने कथित तौर पर भक्तों पर हमला किया. इस्कॉन ने ट्वीट कर हमले की जानकारी दी. मृत श्रद्धालु पार्थ दास का शव एक दिन बाद पास के तालाब में मिला. इस्कॉन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बांग्लादेश सरकार से बात करने की अपील भी की. उन्होंने यूनाइटेड नेशंस को भी चिट्ठी लिखकर बांग्लादेश में चल रही हिंसा में हस्तक्षेप करने के लिए कहा है.
इस बीच भारतीय उच्चायुक्त ने बांग्लादेश को भारत की चिंताओं से अवगत कराया. इसके बाद बांग्लादेश सरकार हरकत में आई. बॉर्डर गार्ड्स के हज़ारों जवानों को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में लगाया गया है. चार हज़ार से अधिक अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है. सीसीटीवी फुटेज़्स को खंगाला जा रहा है. पुलिस ने कई हाई-प्रोफ़ाइल गिरफ़्तारियां भी कीं है. 65 घर जले, हिंसा भड़की 15 अक्टूबर को प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ढाकेश्वरी मंदिर में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए संबोधित किया. इसमें उन्होंने कहा कि दोषियों को किसी भी हालत में बख़्शा नहीं जाएगा. वो किसी भी मजहब के क्यों न हों, उन्हें उनके किए की सज़ा मिलेगी. इसी संबोधन के दौरान शेख़ हसीना ने भारत को एक नसीहत प्लस चेतावनी भी दी. उन्होंने कहा कि भारत को भी उपद्रवियों को लेकर सतर्क रहना चाहिए. भारत में भी ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिससे हमारा मुल्क प्रभावित हो. हमारे हिन्दुओं को मुश्किलों का सामना करना पड़े. भारत में कुछ होता है तो हमारे यहां के हिन्दू प्रभावित होते हैं.
शनिवार, 16 अक्टूबर को पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने दंगाईयों को काबू में कर लिया है. लेकिन 17 अक्टूबर की देर रात एक और भयानक घटना हुई. रंगपुर के पीरगंज़ में अफ़वाह फैली कि एक हिंदू युवक ने फ़ेसबुक पर इस्लाम-विरोधी बातें लिखी हैं. इसके बाद भारी संख्या में दंगाई युवक के घर के पास इकट्ठा हो गए. पुलिस उसी समय मौके पर पहुंच गई. उन्होंने युवक को तो बचा लिया. लेकिन इसी दौरान दंगाईयों ने आस-पास के घरों में आग लगा दी. इस आगजनी में 65 से अधिक घर जलकर खाक हो गए. आगजनी के बाद पुलिस और भीड़ में मुठभेड़ भी हुई.
ढाका ट्रिब्युन की रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले का आरोप ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ पर लगा है. ये जमात-ए-इस्लामी गुट का छात्र संगठन है. दुर्गा पूजा पंडालों पर हमले का आरोप जमात-ए-इस्लामी पर लग रहा है. अधिकारियों का कहना है कि ये सरकार को अस्थिर करने की साज़िश के तहत किया जा रहा है.  बांग्लादेश के गृहमंत्री ने कहा कि पूरी हिंसा के पीछे जमात और BNP का हाथ हो सकता है. दोनों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता. 2023 में बांग्लादेश में आम चुनाव होने वाले हैं. जानकारों का कहना है कि जमात तालिबान से प्रभावित है. उसने ‘बांग्लादेश बनेगा अफ़ग़ानिस्तान’ का नारा भी दिया है. वो सांप्रदायिक हिंसा कर सरकार पर दबाव डालना चाहता है. ताकि इसका फायदा कट्टर इस्लामिक पार्टियों को मिल सके.
अभी इस मामले की जांच चल रही है. लेकिन BNP और जमात का जैसा पिछला रेकॉर्ड रहा है, वैसे में इन आरोपों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.

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