तमाम शोध और चिंताओं को धता बताकर छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में चल रहा कोयले का खेल!
अडानी ग्रुप पर आरोप, फर्ज़ी कागज़ बनवाकर आदिवासियों की ज़मीनें छीनीं.

6 दिसंबर 2021 की इस पोस्ट में आलोक ने जो अंग्रेज़ी में लिखा है वो आपको बताए देते हैं–
‘छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में संचालित ‘परसा ईस्ट केट बेसन’ (PEKB) कोयला खदान में पहले फेज में 2028 तक 762 हेक्टेयर एरिया में खनन होगा और हर साल 10 मिलियन टन कोयला निकाला जाएगा. 2018 के बाद से इसकी कैपेसिटी को बढ़ाकर 15 मिलियन टन कर दिया गया है, जिसके मायने हैं कि इन तीन सालों में 15 मिलियन टन कोयला और निकाला गया है. अब अडानी ग्रुप ने सरकार से दूसरे फेज की माइनिंग के लिए परमीशन देने को कहा है जो साल 2029 से शुरू होने वाला है. कंपनी ने इसके पीछे वजह बताई है कि साल 2021-22 तक कोयला एक्सपायर हो जाएगा.आलोक शुक्ला की फेसबुक प्रोफाइल पर कई और पोस्ट भी हैं. कई अख़बारों की न्यूज़ कटिंग हैं, जिनमें छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य इलाके में कोयले के खनन से हो रही दिक्कतों को हाइलाइट किया गया है. ‘हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति’ और ऐसे ही दूसरे संगठन 'छत्तीसगढ़ बचाओ समिति' वगैरह कोरबा इलाके में कोयला खनन को बंद करने के लिए छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक आंदोलन कर रहे हैं. आंदोलन करने वाले आदिवासियों के आरोप हैं कि छत्तीसगढ़ में पर्यावरण और वन्यजीवों को लेकर रिसर्च करने वाली संस्थाओं की चेतावनी को हाशिये पर रख कर कोयला खनन को सरकारी मंजूरी दे दी गई है. ज़मीनों के उचित मुआवज़े नहीं मिले हैं, और ज़मीन अधिग्रहण में धांधली हुई है.
खदान के पहले फेज में 2028 तक 140 मीट्रिक टन कोयला निकलना था, 80 मीट्रिक टन कोयला कहां गया? ये खदान ‘कथित रिजेक्टेड कोयले’ का लार्ज स्केल पर खनन करती है जिसे कंपनी द्वारा बेचा जाता है. दिलचस्प बात ये है कि राजस्थान सरकार के पावर प्लांट्स इस रिजेक्शन की वजह से नहीं चलते हैं, लेकिन अडानी द्वारा खरीदे गए संयंत्र कोरबा बेस्ट और जीएमआर हैं.'

आन्दोलनरत आदिवासी (फोटो सोर्स -ट्विटर)
अब सवाल ये कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है. क्या वाकई में अलग-अलग रिसर्च रिपोर्ट्स को ताक पर रखकर कोयले की माइनिंग चल रही है? इसलिए हमने पड़ताल की. कई महत्वपूर्ण संस्थानों की रिपोर्ट्स हाथ लगीं जिन्हें सरकार ने तो सामने नहीं रखा, लेकिन संस्थानों ने सार्वजनिक किया है. ये रिपोर्ट्स क्या कहती हैं, उस पर जाने से पहले समझते हैं कि इस पूरे मामले का भौगोलिक केंद्र बिंदु क्या है और वहां बायो-डाइवर्सिटी किस तरह की है. हसदेव अरण्य की जियोग्राफी हसदेव अरण्य घना जंगली इलाका है. इसे ‘मध्य भारत के फेफड़े’ कहा जाता है. छत्तीसगढ़ के सेंट्रल-ईस्ट में बसा ये जंगल करीब 1500 वर्ग किलोमीटर में फैला है. दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु, तीनों को मिला लें उससे भी ज्यादा. बायो डाइवर्सिटी की बात करें तो भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक इस जंगल में हाथी, तेंदुआ और भालू जैसे जानवरों के अलावा पक्षियों की कुछ ऐसी प्रजातियां भी हैं जो लुप्त होने की कगार पर हैं.
हसदेव अरण्य में कई आदिवासी जातियां रह रही हैं. गोंड, पंडो और कोरवा जनजाति के लोगों की संख्या अच्छी खासी है. जंगल ही इन आदिवासियों की आजीविका का साधन है. यहां से इन्हें महुआ, साल, तेंदू पत्ता, चिरौंजी, खुंखड़ी जैसी चीज़ें मिल जाती हैं. तेंदू पत्ते से हर आदिवासी परिवार को सालाना 60 से 70 हज़ार रुपए की आमदनी हो जाती है. इसके अलावा यहां तमाम औषधीय मूल्य के करीब 3000 किस्म के पेड़-पौधे और जड़ी-बूटियां हैं. इनमें से कई बहुत दुर्लभ हैं. कुल मिलाकर आदिवासियों की अधिकतर आमदनी जंगल से ही होती है.
हसदेव ‘बांगो बैराज' का कैचमेंट इलाका भी है. यहां से छत्तीसगढ़ के करीब 4 लाख हेक्टेयर इलाके में खेतों की सिंचाई भी की जाती है. इस सबके अलावा सबसे ख़ास बात ये है कि इस जंगल में करीब 5 बिलियन टन 'काला सोना' दबा हुआ है, यानी कोयला जिसका खनन किया जा रहा है. सूरजपुर, सरगुजा और कोरबा जिले में कोयले के करीब 23 ब्लॉक हैं जिनमें से 5 अडानी ग्रुप को MDO के जरिए आवंटित हो चुके हैं. MDO यानी माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर.
‘परसा ईस्ट केते बेसन’ नाम के एक कोल ब्लॉक से पिछले कई सालों से कोयले की माइनिंग हो रही है. और आदिवासियों के मुताबिक यही उनके लिए समस्या की जड़ है.

प्रतीकात्मक फोटो साभार - ट्विटर #HasdeoBachao
क्या कहती हैं रिसर्च रिपोर्ट्स?
कोयला मंत्रालय और पर्यावरण एवं जल मंत्रालय के जॉइंट रिसर्च के आधार पर 2010 में हसदेव अरण्य को पूरी तरह से ‘नो गो एरिया’ घोषित किया गया था. लेकिन इसके बाद आई दो रिपोर्ट्स को न केवल नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि इनके खिलाफ़ जाकर हसदेव अरण्य में कोल माइनिंग के रास्ते भी खोले गए. Wildlife Institute of India की रिपोर्ट 2014 में हसदेव अरण्य इलाके में परसा ईस्ट केते बेसन कोल ब्लॉक को दी गई मंजूरी के खिलाफ़ एनजीटी ने आदेश दिया. उसने इलाके के बारे में एक स्टडी करने को कहा था ताकि हसदेव फ़ॉरेस्ट रीजन में एनवायरन्मेंट और बायो-डाइवर्सिटी की कंडीशंस का सही आकलन किया जा सके और पता लग सके कि इस इलाके में माइनिंग के क्या प्रभाव होंगे. इसके बाद Wildlife Institute of India (WII) यानी भारतीय वन्यजीव संस्थान ने 277 पन्ने की एक रिसर्च रिपोर्ट जारी की. इसमें NGT के पूछे गए सवालों के बहुत क्लियर जवाब दिए गए हैं.#रिपोर्ट में WII ने सिफारिश की है कि PEKB कोल ब्लॉक को एक्सेप्शन के बतौर चलाया जा सकता है, लेकिन इसके अलावा एक भी कोयला खदान हसदेव फ़ॉरेस्ट रीजन में नहीं खोली जानी चाहिए, और इस पूरे इलाके को 'नो-गो जोन' डिक्लेयर कर देना चाहिए.
#रिपोर्ट में दूसरी बात कही गई कि PEKB कोल ब्लॉक का कंजर्वेशन प्लान बहुत बेसिक है. इसे दुरुस्त किए जाने की ज़रूरत है. कहा गया कि ये इलाका विलुप्त होने की कगार पर खड़े कई दुर्लभ वन्य जीवों का पर्यावास रहा है. ऐसे में इस इलाके में ज़रा भी लापरवाही वन्यजीवों के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है.

अडानी माइनिंग लिमिटेड द्वारा किया जा रहा कोयला खनन (फोटो सोर्स - अतुल शुक्ला द्वारा पोस्ट वीडियो के स्क्रीनशॉट)
#ये भी कहा गया कि पिछले 7 सालों में PEKB कोल ब्लॉक की वजह से इस पूरे इलाके पर बहुत गंभीर असर हुआ है. जिनका सही असेसमेंट अभी तक नहीं हो पाया है. वन्य जीवों को लेकर कुछ कन्क्लूजन भी दिए गए हैं-
तारा, परसा, और केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक्स में मैमल्स की 9 ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिन्हें संकटग्रस्त प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है. जैसे हाथी, तेंदुआ, भालू, भेड़िया, धारीदार लकड़बग्घा वगैरह. भारत के वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन एक्ट में इनके संरक्षण को प्रायोरिटी दी गई है.इस रिपोर्ट के एक पूरे चैप्टर में PEKB कोल ब्लॉक के बुरे प्रभाव पर बात की गई है. जबकि दो चैप्टर्स उन पैरामीटर्स की बात करते हैं जो इस इलाके में PEKB कोल ब्लॉक से होने वाले इकोलॉजिकल नुकसान की भरपाई के लिए अपनाए जाने ज़रूरी हैं. इंसानों और हाथियों का संघर्ष इंसानों और हाथियों के संघर्ष पर WII की बायो-डाइवर्सिटी असेसमेंट की रिपोर्ट के पेज नंबर 52 पर साफ़ शब्दों में लिखा है कि कोल प्लांट्स की वजह से हाथियों और इंसानों में संघर्ष की स्थिति बन गई है. जिस इलाके में कोयले का खनन होना शुरू होता है, हाथी वहां से दूर जाने की कोशिश करते हैं. और इस तरह धीरे-धीरे हाथियों का नेचुरल हैबिटेट कम होने के चलते अब वो इंसानी बस्तियों में घुस रहे हैं. इसके चलते हर साल 60 आदिवासियों की जान चली जाती है.
हसदेव फ़ॉरेस्ट से सटे हुए कान्हा टाइगर रिज़र्व और बोरामदेव वाइल्ड-लाइफ सैंक्चुअरी के बीच जियोग्राफिक कनेक्ट के चलते यहां शेरों और बाकी जंगली जानवरों की आवाजाही से भी इनकार नहीं किया जा सकता.
लिमिटेड असेसमेंट के मुताबिक़ 40 से 50 हाथी हसदेव फ़ॉरेस्ट के अलग-अलग हिस्सों में आते-जाते रहते हैं. जिससे मानव और हाथी के बीच संघर्ष में बढ़ोत्तरी हुई है जो अपने आप में हाथियों के नेचुरल हैबिटेट से की गई छेड़छाड़ का नतीजा है. ये स्थिति आगे और डरावनी हो सकती है.
इस इलाके में कम से कम 82 चिड़ियों की ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं जिनमें से 6 अनुसूची-1 में शामिल हैं, यानी संकटग्रस्त हैं. सफेद आंखों वाली वजर्ड, ब्लैक सोल्जर्स काइट वगैरह. इनके अलावा तितलियों की कुछ स्पीशीज और कुछ रेप्टाइल्स भी विलुप्त होने के कगार पर हैं.
इस इलाके में पौधों की 18 स्पीशीज भी बेहद संवेदनशील और संकटग्रस्त हैं.
ये आंकड़ा ज्यादा इसलिए है क्योंकि देश के सिर्फ 1 फ़ीसद हाथी छत्तीसगढ़ में हैं जबकि हाथियों से संघर्ष में 15 प्रतिशत मौतें यहीं होती हैं.

छत्तीसगढ़ में हाथियों और आदिवासियों का आमना-सामना होना आम बात हो गई है (फोटो सोर्स -इंडिया टुडे)
ICFRE की रिपोर्ट एनजीटी के 2014 के आदेश के तहत इंडियन काउंसिल ऑफ़ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) को भी स्टडी करनी थी. लेकिन ये स्टडी शुरू हुई मई 2019 में. और फरवरी 2021 में पूरी कर दी गई. मोटे तौर पर इस स्टडी में भी यही कहा गया कि कोयले की माइनिंग का जंगल पर बुरा इफ़ेक्ट होगा. जंगल में हरियाली खत्म होने से जानवरों की आवाजाही का स्पेस कम होगा. खनन से यहां क्लाइमेट चेंज होंगे और पेड़-पौधों की वो प्रजातियां भी बढे़ंगी जो जंगल की बायो-डाइवर्सिटी के लिए ठीक नहीं हैं. ये स्टडी 23 कोल ब्लॉक्स में से 14 में कोयले की माइनिंग की सिफारिश नहीं करती.
WII से तुलना करें तो इस स्टडी में कुछ और फ़र्क भी हैं. इसकी रिपोर्ट की कुछ ख़ास बातें जान लेते हैं-
#माइनिंग का सीधा असर तो हाथियों के इलाके पर नहीं पड़ेगा. लेकिन इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष बढ़ सकता है. लेमरू एलिफैंट रिज़र्व के तौर पर हसदेव के एक हिस्से को अधिसूचित करने का निर्णय भी इसी संघर्ष को रोकने की एक कोशिश थी जो लम्बे वक़्त से अटकी हुई है.बात सिर्फ बायो-डाइवर्सिटी पर होने वाले इफ़ेक्ट की नहीं है. आदिवासी कोयले की माइनिंग से परेशान हैं इसकी दूसरी वजहें भी हैं. इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा. आदिवासियों का जंगल ज़मीन कॉर्पोरेट की भेंट चढ़ रहा? साल 2010. कांग्रेस की सरकार में परसा ईस्ट केते बेसन, तारा और परसा तीन कोल ब्लॉक्स को शुरुआती मंजूरी दी गई. NGT के हस्तक्षेप के बाद सिर्फ PEKB कोल ब्लॉक से कोयले का खनन शुरू हुआ. लेकिन इस एक कोल प्लांट का एनवायरन्मेंटल इफ़ेक्ट भी हैरान करने वाला है. साल 2012 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट के मुताबिक़
#खनन से जंगल की काफ़ी जमीन का इस्तेमाल ऐसे कामों में होगा जिनका सीधा सम्बन्ध जंगल से नहीं है, ऐसे में जमीन के भी अन्दर कई बदलाव होंगे और इसका असर आस-पास की नदियों पर भी हो सकता है.
#स्टडी के मुताबिक कोल ब्लॉक के कोर और बफर जोन से होकर बहने वाले ज्यादातर नाले बड़ी नदियों के लिए प्राइमरी और मीडियम जलस्रोत हैं. इनका बहाव कम हुआ या रुका तो इसका असर आने वाले समय में नदियों पर भी दिखेगा.
, 15-15 साल के दो फेज के लिए शुरू हुई इस माइनिंग से कुल 1898 हेक्टेयर जंगल और करीब 4 लाख पेड़ प्रभावित होंगे. इस पर तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि हसदेव फॉरेस्ट का बाकी इलाका ‘नो गो जोन’ रहेगा. यानी और कहीं कोयले की माइनिंग नहीं होगी. लेकिन इस एक खदान से कोयले का खनन शुरू होने के साथ ही आदिवासियों के गांवों की बर्बादी भी शुरू हुई.
2014 में NGT ने PEKB कोल ब्लॉक से कोयले का खनन रोक दिया, लेकिन इसे 2015 में दोबारा शुरू कर दिया गया. असर ये हुआ कि कई गांवों के आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा. और अगले पांच साल तक भी इन विस्थापित आदिवासियों को ठीक से रीहैबिलिटेट नहीं किया गया. जिन्होंने ज़मीन दी थी वो आदिवासी तो पछताए ही, बाकी गांव वाले भी सतर्क हो गए. 2015 में हसदेव अरण्य इलाके में कई और कोल ब्लॉक्स के लिए ऑक्शन शुरू किया गया. तबसे यहां के लोग कोल माइंस के नए ऑक्शन और अडानी माइनिंग लिमिटेड द्वारा संचालित PEKB कोल ब्लॉक से कोयले के खनन के खिलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं. अपने गांवों से निकलकर दिल्ली तक. लेकिन अभी तक इन आदिवासियों को झूटे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है. उल्टा अडानी ग्रुप PEKB कोल ब्लॉक के अलावा चार और खदानें हासिल कर चुका है.

हसदेव बचाओ पदयात्रा (फोटो सोर्स -ट्विटर आलोक शुक्ला एवं आज तक)
ज़मीन और जंगल की लड़ाई जंगल और अपना अस्तित्व बचाने की आदिवासियों की ये लड़ाई कई सालों से चल रही है. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. आदिवासियों के 30 गांवों से 3 अक्टूबर 2021 को करीब 300 लोग दिल्ली तक पैदल यात्रा पर निकले थे. ‘विनाश नहीं विकास चाहिए, कोयला नहीं अनाज चाहिए.’ ऐसे स्लोगन्स वाली तख्तियों के साथ. दिल्ली से कोई रास्ता नहीं निकला तो 13 अक्टूबर को वापस रायपुर चले गए.
आंदोलनकारी आदिवासियों की मांगें थीं-तपती धूप और धूल के गुबारे के बीच भी पदयात्रियों का हौसला बुलंद है। अपने घर, जंगल, जमीन, आजीविका संस्कृति को बचाने, हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल ब्लॉक निरस्त कर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु हसदेव बचाओ पदयात्रा आज बिलासपुर के रतनपुर पहुचेगी।#SaveHasdeo
— Alok Shukla (@alokshuklacg) October 8, 2021
pic.twitter.com/eNviHOt7yH
#हसदेव अरण्य क्षेत्र की सभी कोयला खनन परियोजनाओं को रद्द किया जाए.छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के कन्वीनर आलोक शुक्ला से हमने उनकी पदयात्रा के समय बात की थी. उनका कहना था-
#बिना ग्रामसभा की सहमति के हसदेव फ़ॉरेस्ट इलाके में कोल बेयरिंग एक्ट के तहत किए गए ज़मीनों के अधिग्रहण को तत्काल निरस्त किया जाए.
#पांचवी अनुसूची क्षेत्र में किसी भी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया से पहले ग्रामसभा से उचित सहमति ली जाए.
#परसा कोल ब्लाक के लिए ग्राम सभाओं के फर्जी प्रपोजल बनाकर हासिल की गई ज़मीन की स्वीकृति को तत्काल निरस्त किया जाए और ऐसा करने वाले ऑफिसर्स और कम्पनी पर FIR दर्ज हो.
#घाटबर्रा गांव के निरस्त सामुदायिक वन अधिकार को बहाल किया जाए और सभी गांवों में सामुदायिक वन अधिकार और व्यक्तिगत वन अधिकारों को मान्यता दी जाए
#अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून का पालन कराया जाए.
‘हमारी बात केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने नहीं सुनी तो हमने राजधानी जाने का रास्ता चुना. राज्यपाल से समय मिला है, लेकिन सीएम से नहीं मिला है. हम पहले धरना देंगे. उसके बाद गवर्नर से मिलेंगे. उम्मीद है कि सीएम समय देंगे. ये कांग्रेस का पॉलिटिकल कमिटमेंट हैं. लेकिन कॉर्पोरेट दबाव में वो अब पीछे हट रही है. हमारा सवाल है कि इतने संवेदनशील इलाके को क्यों उजाड़ रहे हैं?’रायपुर पहुंचने के बाद अगले ही दिन 14 अक्टूबर को आदिवासी छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिले. राज्यपाल अनुसुईया उईके ने कहा कि वो आदिवासियों की आवाज़ प्रधानमंत्री और कोयला मंत्री तक पहुंचाएंगी और उनके अधिकारों को बचाने का प्रयास करेंगी. भूपेश बघेल भी बोले कि हसदेव अरण्य से आए लोगों से सार्थक चर्चा हुई है.
आंदोलनकारियों को लगा कि उनकी मुहिम सफल होने के रास्ते पर है. लेकिन अगले ही हफ्ते 21 अक्टूबर 2021 को केंद्र सरकार ने अडानी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड के 'परसा ओपेन कास्ट कोल माइनिंग प्रोजेक्ट' को दूसरे फेज के लिए भी मंजूरी दे दी.आज निवास कार्यालय में हसदेव अरण्य क्षेत्र से आये लोगों से मुलाकात की।
मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ बैठकर उनकी बातें सुनीं एवं सार्थक चर्चा की। pic.twitter.com/KjkqgXvuyf
— Bhupesh Baghel (@bhupeshbaghel) October 14, 2021
एक लेटर जारी कर कह दिया कि ये मंजूरी राज्य सरकार की सिफारिशों के मुताबिक दी गई. यानी कांग्रेस शासित भूपेश बघेल की सरकार.
कॉर्पोरेट से जुगलबंदी
आलोक शुक्ला कहते हैं,
आलोक का आरोप कितना सही है इसे ऐसे समझिए कि 2019 में भूपेश बघेल की सरकार ने अडानी ग्रुप को MDO के जरिए ही कोरबा ज़िले में गिधमुड़ी और पतुरिया की कोयला खदानें सौंपीं. और अडानी ग्रुप के पास कुल खदानें हो गईं 5. जबकि इसके एक ही साल पहले यानी 2018 में भूपेश बघेल MDO के जरिए अडानी ग्रुप को कोल ब्लॉक दिए जाने पर भाजपा सरकार पर हमलावर थे. एक के बाद एक ट्वीट करके भाजपा और अडानी ग्रुप पर मिलीभगत का आरोप लगा रहे थे.'छत्तीसगढ़ में एक के बाद एक कोल खदानें अडानी को दी जा रही हैं. जंगल और आदिवासी हाशिये पर रख दिए गए हैं और कॉर्पोरेट के लाभ के लिए सरकार भी इस साजिश में शामिल है. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि भाजपा के शासनकाल के बाद ये सब अब कांग्रेस की सरकार में भी जारी है.’
एक ट्वीट में बघेल ने लिखा था,
‘राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में अडानी की MDO कंपनियों को खदानें मिलीं. और अब ये राज्य बाज़ार से भी महंगे दामों पर अडानी से कोयला खरीद रहे हैं. अडानी को पिछले दरवाज़े से कोयला खदानें देने के लिए मोदी सरकार ने MDO का रास्ता निकाला है.’
ज़मीन का मुआवजा आदिवासियों का आरोप है कि उनकी ज़मीनों का अधिग्रहण गलत तरीके से हुआ. उनकी ग्रामसभाओं के फर्जी प्रपोजल तैयार कर लिए गए और मुआवजा भी उतना नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था.राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात की #PSU
— Bhupesh Baghel (@bhupeshbaghel) March 27, 2018
को #CG
में खदानें मिलीं, MDO अडानी की कंपनियों को और अब ये राज्य बाज़ार से भी महंगे दामों पर अडानी से कोयला ख़रीद रही हैं. अडानी तो पिछले दरवाज़े से कोयला ख़दानें देने के लिए मोदी सरकार ने MDO का रास्ता निकाला है.
हालांकि मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार की तरफ से 24 दिसंबर, 2020 को Coal Bearing Areas (Acquisition and Development) Act, 1957 की धारा 7 के तहत एक अधिसूचना जारी की गई थी. इसमें क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों को अधिकारों पर आपत्तियां, (यदि कोई हों), प्रस्तुत करने के लिए 30 दिन का वक़्त दिया गया था. 8 फरवरी 2020 को केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा था कि,
मंत्रालय को 470 से अधिक आपत्ति पत्र मिले हैं, जिनमें राज्य सरकार के पत्र भी शामिल हैं. उन्होंने कहा था कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास में पारदर्शिता होगी. पुनर्वास अधिनियम, 2013 और छत्तीसगढ़ आदर्श पुनर्वास नीति 2007 के नियमों के तहत वैध मुआवजे का भुगतान किया जाएगा. लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि 1947 के कानून के मुताबिक, ग्रामसभा से सहमति लेने के बारे में कोई प्रावधान नहीं है.

आदिवासियों का आरोप है कि उनकी ज़मीनों का अधिग्रहण गलत तरीके से हुआ (प्रतीक चित्र - इंडिया टुडे)
पेसा अधिनियम और पांचवीं अनुसूची संविधान के आर्टिकल 244 के मुताबिक़ भारत के 13.6 प्रतिशत जिले पांचवें शेड्यूल इलाकों में आते हैं. और अनुमानों के मुताबिक ऐसे 60 फ़ीसद जिलों में खदानों से जुड़ी दिक्कतें हैं. छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला पांचवें शेड्यूल एरियाज़ में ही आता है. 1996 के पेसा अधिनियम यानी Panchayt (Extension to Scheduled Areas Act) के मुताबिक़ ऐसे जिलों में ज़मीन के अधिग्रहण के लिए ग्रामसभा का सहमत होना ज़रूरी है. लेकिन जब इस क़ानून का हवाला देकर आदिवासियों ने ज़मीन अधिग्रहण का विरोध किया तो उन्हें सरकार की तरफ़ से जवाब में एक और क़ानून का हवाला दे दिया गया. Coal Bearing Areas Act. जिसके मुताबिक ज़मीन का अधिग्रहण किया जा सकता है.

छत्तीसगढ़ के आदिवासी पेसा अधिनियम के खिलाफ ग्रामसभाओं के वनभूमि प्रस्ताव स्वीकृत किये जाने पर एकजुट हैं (फोटो सोर्स - ट्विटर #HasdeoBachao)
कुल मिलाकर सरकार के पास क़ानून हैं, और कॉर्पोरेट से जुगलबंदी की मजबूरियां. और ऐसा कॉर्पोरेट जिस पर कोयले के खनन से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप भी हैं. ऐसे में आदिवासियों की जंगल और ज़मीन की लड़ाई कहां तक पहुंचती है ये देखने वाली बात होगी.
संघर्ष का उत्सव ! संघर्ष तब तक नही रुकेगा जब तक सम्पूर्ण हसदेव के समस्त कोयला खदानों को निरस्त नही कर दिया जाता।#Savehasdeo
pic.twitter.com/MVQ8IV4Gyh
— Alok Shukla (@alokshuklacg) December 10, 2021आंदोलन से जुड़े आलोक शुक्ला का ये वीडियो शेयर करते हुए कहते हैं कि संघर्ष का उत्सव जारी रहेगा.

