को-लेंडिंग क्या है, जिसमें बैंक और कॉरपोरेट मिलकर आपको लोन देंगे?
SBI और Adani Capital अब मिलकर देंगे लोन.
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CLM मॉडल के तहत SBI और Adani Capital मिलकर लोन देंगे (फोटो सोर्स -आज तक, ट्विटर पर उपलब्ध लोगो)
पुराने वक़्त में गांवों की जमींदारी प्रथा के बारे में तो आपने सुना ही होगा. ज़मींदारी की एक छोटी सी कहानी से शुरुआत करते हैं. एक गांव में एक बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे. नाम था- हीरा. उनके गांव और आस-पास के लोग उनसे ब्याज पर पैसे लिया करते थे. हीरा के घर हर महीने एक मोटी रकम बतौर ब्याज आती थी. पड़ोस के गांव में एक और जमींदार थे- सेठ लालाराम. ये भी ब्याज से खूब कमाई करते थे. लेकिन दोनों लोगों में थोड़ा अंतर था. हीरा ज्यादा पैसे वाले आदमी थे, रसूख भी लालाराम से ज्यादा था. और ये ज़मीन गिरवी रखने से लेकर बाकी तमाम कामों के लिए भी ज़रूरतमंद लोगों को पैसा दे देते थे. व्यापार बड़ा था तो पैसा वसूलने में कुछ दिक्कत भी आती थी. जबकि लालाराम बहुत सीमित मदों के लिए ही लोगों को पैसा देते थे. और इन्हें वसूली भी करनी अच्छे से आती थी.
एक दिन दोनों ज़मींदार मिले, और बात-बात में बात निकली कि क्यों न मिलकर ब्याज का धंधा किया जाए. इस तरह से धंधे में बरकत तो बढ़ेगी ही, बल्कि ज्यादा लोगों को ब्याज दे पाएंगे. इससे इलाके में रसूख भी बढ़ेगा. आइडिया दोनों लोगों को जंच गया और धंधे की हिस्सेदारी का एग्रीमेंट हो गया. इस कहानी का हमारी खबर से क्या ताल्लुक? दरअसल खबर को-लेंडिंग (Co-Lending) के कॉन्सेप्ट से जुड़ी है. ‘Co’ किसी भी शब्द के आगे लग जाए तो अर्थ जुड़ जाता है सहभागिता या साहचर्य. और Lending के मायने हैं- उधार देना. दोनों को मिला लें तो को-लेंडिंग का मतलब हुआ 'मिलकर उधार देना'.
साहूकारी व्यवस्था अभी भी ग्रामीण इलाकों में चलती है, महंगी ब्याज दरों पर आज भी कई बार गरीब किसान ऋण लेने को विवश होते हैं (प्रतीकात्मक फोटो-आज तक)
दरअसल RBI के एक निर्णय के मुताबिक अब बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) दोनों मिलकर ज़रूरतमंद लोगों को क़र्ज़ दे सकते हैं. पहले ये काम दोनों अलग-अलग कर रहे थे, लेकिन अब कई बैंक और NBFC मिलकर ऐसा कर रहे हैं. NBFCs. बैंक से किस तरह अलग हैं ये भी समझ लें, साल 1956 के कंपनीज़ एक्ट के तहत रजिस्टर्ड ये कंपनीज़ लोन, स्टॉक, बॉन्ड्स, इंश्योरेंस, चिटफंड वगैरह का व्यापर करती हैं. जबकि बैंक, आप सब जानते ही हैं कि मुख्य रूप से आपके-हमारे पैसे को सुरक्षित रखने और उसके लेन-देने का काम करती हैं. क्या है को-लेंडिंग मॉडल? खबर के पहले डिस्क्लेमर ये है कि जब भी हम आप से NBFC की बात करें तो इसका मतलब NBFC के साथ HFC (HOUSING FINANCE COMPANY) भी होगा.
21 सितंबर 2018 को RBI ने एक नोटिफिकेशन जारी किया
. इसमें उसने बैंक और NBFC द्वारा सम्मिलित रूप से प्रायोरिटी सेक्टर के ग्राहकों को लोन देने के कुछ नियम तय किए थे. लोन का को-ओरिजिनेशन कैसे होगा, लोन में हिस्सेदारी क्या होगी, सब कुछ बताया गया था. इस अरेंजमेंट में ये भी बताया गया था कि बैंक और NBFC मिलकर रिस्क और रिवॉर्ड को शेयर करेंगे.
5 नवंबर 2020 को RBI ने एक और नोटिफिकेशन जारी किया
. इसमें लिखा था- यहां Unserved और Underserved Sector सेक्टर का मतलब है वो छोटे बिज़नेस जिन्हें प्रॉफिट कमाने वाले बड़े फाइनेंस आर्गेनाईजेशंस से पूंजी, पैसा और दूसरे संसाधन आसानी से नहीं मिल पाते हैं. कह सकते हैं कि इस मामले में इन्हें इग्नोर किया जाता है. और इसीलिए ये फंड्स की कमी का सामना करते हैं.
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (प्रतीकात्मक फोटो - gettyimages)
बैंक-NBFC का गठजोड़ RBI की इस मंजूरी के बाद बैंक और NBFCs मिल-जुलकर लोन देने के इस धंधे में उतर चुके हैं. कई बैकों और NBFCs ने इसके लिए आपस में एग्रीमेंट कर लिए हैं और कुछ अभी पाइपलाइन में हैं, यानी होने वाले हैं.
2 दिसंबर 2021 को देश के सबसे बड़े बैंक SBI ने अडानी कॉरपोरेट हाउस के NFBC अडानी कैपिटल (Adani Capital) के साथ एक डील की है. इस को-लेंडिंग डील के तहत किसानों को ट्रैक्टर्स और खेती के लिए उपयोगी इम्प्लीमेंट्स खरीदने के लिए लोन दिया जाएगा. हालांकि इसमें बड़ा हिस्सा SBI का ही रहेगा. यूं भी करीब 22 हजार ब्रांच और 64 हजार ATM के साथ SBI का देश भर में काफ़ी बड़ा नेटवर्क है, जबकि अडानी कैपिटल की वेबसाइट के मुताबिक देश भर में इसकी सिर्फ 60 ब्रांच हैं.
इसके पहले भी SBI कई और NBFCs जैसे Vedika Credit, Save Microfinance और Paisalo Digital वगैरह के साथ भी को-लेंडिंग के एग्रीमेंट कर चुका है.
भारतीय स्टेट बैंक सबसे बड़ी क़र्ज़ देने वाला बैंक है (फोटो - आज तक)
इसी तरह यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया (Union Bank Of India) ने कैप्री ग्लोबल कैपिटल लिमिटेड (CGCL) के साथ को-लेंडिंग मॉडल के तहत डील की है. दोनों का उद्देश्य है MSMEs को 10 लाख से लेकर 1 करोड़ तक के लोन देना. इसके लिए देश के 100 सेंटर्स से काम शुरू किया जाएगा. और इसके पहले पंजाब नेशनल बैंक (PNB), बैंक ऑफ़ बड़ौदा (BOB) वगैरह भी को-लेंडिंग एग्रीमेंट कर चुके हैं. बड़े कॉरपोरेट्स की बैंकिंग सेक्टर में एंट्री हालांकि आरबीआई ने आधिकारिक तौर पर बड़े कॉरपोरेट घरानों को बैंकिंग क्षेत्र में आने की परमीशन नहीं दी है, लेकिन ज्यादातर NBFCs कॉरपोरेट घरानों द्वारा ही शुरू किए गए हैं. और इनके पास पब्लिक का पैसा भी ठीक-ठाक जमा है. ऐसे में ये कॉरपोरेट हाउस को-लेंडिंग कॉन्सेप्ट के तहत ज्यादा ज़रूरतमंदों को अधिक पैसा दे सकते हैं.
एक और बात ध्यान में रखने वाली ये है कि को-लेंडिंग कॉन्सेप्ट पर RBI का फैसला ऐसे वक़्त पर आया है जब चार बड़ी फाइनेंस कंपनीज़- IL&FS, DHFL, SREI और रिलायंस कैपिटल पिछले तीन सालों में कोलैप्स कर चुकी हैं. इन सभी पर इन्वेस्टर्स का ढेर सारा पैसा बकाया है. करीब 1 लाख करोड़ रुपए. वो भी RBI की सख्त मॉनिटरिंग के बावजूद.
कई बैंकर्स का भी कहना है कि बैंकों की पहुंच NBFCs की तुलना में कहीं ज्यादा है. और बैंक पहले से ऐसे सेक्टर्स में फाइनेंशियल सर्विसेज़ दे रहे हैं जहां फंड्स की ज़रूरत है. और इसी के चलते बैंकों और NBFCs की साझा क़र्ज़ देनवाली इस जुगलबंदी में कुछ खामियां और खतरे भी हैं. वो भी समझेंगे लेकिन पहले ये जान लें कि किन कारणों से बैंक NFBCs के साथ इस मॉडल को शुरू कर रही हैं. NBFC क्यों ज़रूरी? NBFCs के साथ मिलकर को-लेंडिंग कॉन्सेप्ट के तहत ग्राहकों को लोन देने के पीछे बैंक की क्या सोच है, ये जानने के लिए हमने SBI द्वारा जारी एक पेपर पढ़ा. 11 पेज का ये दस्तावेज़ Policy for Co-Lending by BANK and NFBCs के टाइटल के साथ इंटरनेट पर उपलब्ध है.
इसमें SBI की तरफ़ से कुछ कारण बताए गए कि वो NBFCs के साथ मिलकर ये कारोबार क्यों शुरू कर रहे हैं. संक्षिप्त में जान लेते हैं. को-लेंडिंग के खतरे- बड़े बैंकों और NBFCs के इस टाई-अप की कई ज़रूरी बिन्दुओं के आधार पर आलोचना हो रही है. दरअसल CLM के तहत दिए जाने वाले लोन में 20 फ़ीसद हिस्सा NBFCs का रहेगा और लोन का बाकी यानी 80 फ़ीसद हिस्सा बैंक देगा. इसका मतलब हुआ कि लोन डिफ़ॉल्ट होने की स्थिति में 80 फ़ीसद रिस्क बैंक का रहेगा. अब इस मास्टर एग्रीमेंट में बैंकों के लिए दिक्कत ये है कि या तो वे NBFCs द्वारा दिए जा रहे हर लोन में अपना हिस्सा अनिवार्य रूप से अलग से अपने खातों में रखें या फिर अपने विवेक से कुछ लोन्स को रिजेक्ट ही कर दें.
इसके अलावा एक बड़ी दिक्कत ये है कि भले ही लोन का बड़ा हिस्सा बैंक दे रहे हैं, लेकिन RBI की गाइडलाइन्स के मुताबिक लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए पॉइंट ऑफ़ इंटरफेस NBFCs ही रहेंगे. माने कस्टमर के लिए लोन अप्रूव करना, लोन एग्रीमेंट करना, किसी थर्ड पार्टी KYC करवाना, अकाउंट खोलना और बाकी कागजी कार्रवाई करना. ये सारा काम इन्हीं का रहेगा. और ऐसा करना को-लेंडिंग मॉडल में बैंक और NBFCs की अपनी-अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों में अव्यवस्था पैदा करने जैसा होगा. बैंक और NBFCs का क्या कहना है? इस बारे में हमने को-लेंडिंग मॉडल के तहत बैंकों के साथ मिलकर व्यापार शुरू करने जा रहे नए NBFCs से संपर्क किया. अडानी कैपिटल को हमने ईमेल के माध्यम से कुछ सवाल भेजे हैं. खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं मिला. इसके अलावा अडानी कैपिटल की तरफ़ से Whatsapp पर SBI की पॉलिसी का वही दस्तावेज भेजा गया जिसका ज़िक्र हम खबर की शुरुआत में ही कर चुके हैं. इसी तरह CGCL की तरफ़ से भी खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया.
हमने जब SBI के मुंबई स्थित हेड ऑफिस के उच्चाधिकारियों से बात करने की कोशिश की तो SBI की वेबसाइट पर दिए किसी भी नंबर से संपर्क नहीं हो सका. इसके बाद हमने SBI के लखनऊ रीजन के रीजनल मैनेजर S.K. जायसवाल से बात की. उनसे SBI के रिस्क फैक्टर के बारे में सवाल पूछा, ये भी पूछा कि इंटरेस्ट रेट क्या रहेगा, उन्होंने जवाब दिया, एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं हमने भारती विद्यापीठ इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एंड रिसर्च की डायरेक्टर यामिनी अग्रवाल से बात की, उन्होंने कहा, इंटरेस्ट रेट्स कैसे तय होंगें, इस पर यामिनी कहती हैं,
SBI और अडानी कैपिटल मिलकर कृषि क्षेत्र में लोन देंगे (फोटो सोर्स -आज तक)
SBI और अडानी कैपिटल- को-लेंडिंग मॉडल में आने वाली संभावित दिक्कतों की बहस से अलग SBI और अडानी कैपिटल इसे लेकर उत्साहित हैं. अडानी कैपिटल के साथ टाई-अप की घोषणा करते हुए SBI चेयरमैन ने कहा, अडानी कैपिटल के MD और CEO गौरव गुप्ता ने भी कहा कि कंपनी का उद्देश्य माइक्रो ऑन्त्रप्रेन्योर्स को क्रेडिट उपलब्ध कराना है. उन्होंने कहा कि SBI के साथ मिलकर हम कृषि क्षेत्र में उत्पादकता और इनकम बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे.
तमाम दावों और आशंकाओं के बाद अब देखने वाली बात ये होगी कि आने वाले वक़्त में किसानों की आय कितनी बढ़ती है, छोटे उद्योगों के लिए लोन लेना कितना आसान होगा और फंड्स की कमी की दिक्कतें कितनी कम होती हैं.
एक दिन दोनों ज़मींदार मिले, और बात-बात में बात निकली कि क्यों न मिलकर ब्याज का धंधा किया जाए. इस तरह से धंधे में बरकत तो बढ़ेगी ही, बल्कि ज्यादा लोगों को ब्याज दे पाएंगे. इससे इलाके में रसूख भी बढ़ेगा. आइडिया दोनों लोगों को जंच गया और धंधे की हिस्सेदारी का एग्रीमेंट हो गया. इस कहानी का हमारी खबर से क्या ताल्लुक? दरअसल खबर को-लेंडिंग (Co-Lending) के कॉन्सेप्ट से जुड़ी है. ‘Co’ किसी भी शब्द के आगे लग जाए तो अर्थ जुड़ जाता है सहभागिता या साहचर्य. और Lending के मायने हैं- उधार देना. दोनों को मिला लें तो को-लेंडिंग का मतलब हुआ 'मिलकर उधार देना'.
साहूकारी व्यवस्था अभी भी ग्रामीण इलाकों में चलती है, महंगी ब्याज दरों पर आज भी कई बार गरीब किसान ऋण लेने को विवश होते हैं (प्रतीकात्मक फोटो-आज तक)
दरअसल RBI के एक निर्णय के मुताबिक अब बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) दोनों मिलकर ज़रूरतमंद लोगों को क़र्ज़ दे सकते हैं. पहले ये काम दोनों अलग-अलग कर रहे थे, लेकिन अब कई बैंक और NBFC मिलकर ऐसा कर रहे हैं. NBFCs. बैंक से किस तरह अलग हैं ये भी समझ लें, साल 1956 के कंपनीज़ एक्ट के तहत रजिस्टर्ड ये कंपनीज़ लोन, स्टॉक, बॉन्ड्स, इंश्योरेंस, चिटफंड वगैरह का व्यापर करती हैं. जबकि बैंक, आप सब जानते ही हैं कि मुख्य रूप से आपके-हमारे पैसे को सुरक्षित रखने और उसके लेन-देने का काम करती हैं. क्या है को-लेंडिंग मॉडल? खबर के पहले डिस्क्लेमर ये है कि जब भी हम आप से NBFC की बात करें तो इसका मतलब NBFC के साथ HFC (HOUSING FINANCE COMPANY) भी होगा.
21 सितंबर 2018 को RBI ने एक नोटिफिकेशन जारी किया
. इसमें उसने बैंक और NBFC द्वारा सम्मिलित रूप से प्रायोरिटी सेक्टर के ग्राहकों को लोन देने के कुछ नियम तय किए थे. लोन का को-ओरिजिनेशन कैसे होगा, लोन में हिस्सेदारी क्या होगी, सब कुछ बताया गया था. इस अरेंजमेंट में ये भी बताया गया था कि बैंक और NBFC मिलकर रिस्क और रिवॉर्ड को शेयर करेंगे.
5 नवंबर 2020 को RBI ने एक और नोटिफिकेशन जारी किया
. इसमें लिखा था- यहां Unserved और Underserved Sector सेक्टर का मतलब है वो छोटे बिज़नेस जिन्हें प्रॉफिट कमाने वाले बड़े फाइनेंस आर्गेनाईजेशंस से पूंजी, पैसा और दूसरे संसाधन आसानी से नहीं मिल पाते हैं. कह सकते हैं कि इस मामले में इन्हें इग्नोर किया जाता है. और इसीलिए ये फंड्स की कमी का सामना करते हैं.
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (प्रतीकात्मक फोटो - gettyimages)
बैंक-NBFC का गठजोड़ RBI की इस मंजूरी के बाद बैंक और NBFCs मिल-जुलकर लोन देने के इस धंधे में उतर चुके हैं. कई बैकों और NBFCs ने इसके लिए आपस में एग्रीमेंट कर लिए हैं और कुछ अभी पाइपलाइन में हैं, यानी होने वाले हैं.
2 दिसंबर 2021 को देश के सबसे बड़े बैंक SBI ने अडानी कॉरपोरेट हाउस के NFBC अडानी कैपिटल (Adani Capital) के साथ एक डील की है. इस को-लेंडिंग डील के तहत किसानों को ट्रैक्टर्स और खेती के लिए उपयोगी इम्प्लीमेंट्स खरीदने के लिए लोन दिया जाएगा. हालांकि इसमें बड़ा हिस्सा SBI का ही रहेगा. यूं भी करीब 22 हजार ब्रांच और 64 हजार ATM के साथ SBI का देश भर में काफ़ी बड़ा नेटवर्क है, जबकि अडानी कैपिटल की वेबसाइट के मुताबिक देश भर में इसकी सिर्फ 60 ब्रांच हैं.
इसके पहले भी SBI कई और NBFCs जैसे Vedika Credit, Save Microfinance और Paisalo Digital वगैरह के साथ भी को-लेंडिंग के एग्रीमेंट कर चुका है.
भारतीय स्टेट बैंक सबसे बड़ी क़र्ज़ देने वाला बैंक है (फोटो - आज तक)
इसी तरह यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया (Union Bank Of India) ने कैप्री ग्लोबल कैपिटल लिमिटेड (CGCL) के साथ को-लेंडिंग मॉडल के तहत डील की है. दोनों का उद्देश्य है MSMEs को 10 लाख से लेकर 1 करोड़ तक के लोन देना. इसके लिए देश के 100 सेंटर्स से काम शुरू किया जाएगा. और इसके पहले पंजाब नेशनल बैंक (PNB), बैंक ऑफ़ बड़ौदा (BOB) वगैरह भी को-लेंडिंग एग्रीमेंट कर चुके हैं. बड़े कॉरपोरेट्स की बैंकिंग सेक्टर में एंट्री हालांकि आरबीआई ने आधिकारिक तौर पर बड़े कॉरपोरेट घरानों को बैंकिंग क्षेत्र में आने की परमीशन नहीं दी है, लेकिन ज्यादातर NBFCs कॉरपोरेट घरानों द्वारा ही शुरू किए गए हैं. और इनके पास पब्लिक का पैसा भी ठीक-ठाक जमा है. ऐसे में ये कॉरपोरेट हाउस को-लेंडिंग कॉन्सेप्ट के तहत ज्यादा ज़रूरतमंदों को अधिक पैसा दे सकते हैं.
एक और बात ध्यान में रखने वाली ये है कि को-लेंडिंग कॉन्सेप्ट पर RBI का फैसला ऐसे वक़्त पर आया है जब चार बड़ी फाइनेंस कंपनीज़- IL&FS, DHFL, SREI और रिलायंस कैपिटल पिछले तीन सालों में कोलैप्स कर चुकी हैं. इन सभी पर इन्वेस्टर्स का ढेर सारा पैसा बकाया है. करीब 1 लाख करोड़ रुपए. वो भी RBI की सख्त मॉनिटरिंग के बावजूद.
कई बैंकर्स का भी कहना है कि बैंकों की पहुंच NBFCs की तुलना में कहीं ज्यादा है. और बैंक पहले से ऐसे सेक्टर्स में फाइनेंशियल सर्विसेज़ दे रहे हैं जहां फंड्स की ज़रूरत है. और इसी के चलते बैंकों और NBFCs की साझा क़र्ज़ देनवाली इस जुगलबंदी में कुछ खामियां और खतरे भी हैं. वो भी समझेंगे लेकिन पहले ये जान लें कि किन कारणों से बैंक NFBCs के साथ इस मॉडल को शुरू कर रही हैं. NBFC क्यों ज़रूरी? NBFCs के साथ मिलकर को-लेंडिंग कॉन्सेप्ट के तहत ग्राहकों को लोन देने के पीछे बैंक की क्या सोच है, ये जानने के लिए हमने SBI द्वारा जारी एक पेपर पढ़ा. 11 पेज का ये दस्तावेज़ Policy for Co-Lending by BANK and NFBCs के टाइटल के साथ इंटरनेट पर उपलब्ध है.
इसमें SBI की तरफ़ से कुछ कारण बताए गए कि वो NBFCs के साथ मिलकर ये कारोबार क्यों शुरू कर रहे हैं. संक्षिप्त में जान लेते हैं. को-लेंडिंग के खतरे- बड़े बैंकों और NBFCs के इस टाई-अप की कई ज़रूरी बिन्दुओं के आधार पर आलोचना हो रही है. दरअसल CLM के तहत दिए जाने वाले लोन में 20 फ़ीसद हिस्सा NBFCs का रहेगा और लोन का बाकी यानी 80 फ़ीसद हिस्सा बैंक देगा. इसका मतलब हुआ कि लोन डिफ़ॉल्ट होने की स्थिति में 80 फ़ीसद रिस्क बैंक का रहेगा. अब इस मास्टर एग्रीमेंट में बैंकों के लिए दिक्कत ये है कि या तो वे NBFCs द्वारा दिए जा रहे हर लोन में अपना हिस्सा अनिवार्य रूप से अलग से अपने खातों में रखें या फिर अपने विवेक से कुछ लोन्स को रिजेक्ट ही कर दें.
इसके अलावा एक बड़ी दिक्कत ये है कि भले ही लोन का बड़ा हिस्सा बैंक दे रहे हैं, लेकिन RBI की गाइडलाइन्स के मुताबिक लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए पॉइंट ऑफ़ इंटरफेस NBFCs ही रहेंगे. माने कस्टमर के लिए लोन अप्रूव करना, लोन एग्रीमेंट करना, किसी थर्ड पार्टी KYC करवाना, अकाउंट खोलना और बाकी कागजी कार्रवाई करना. ये सारा काम इन्हीं का रहेगा. और ऐसा करना को-लेंडिंग मॉडल में बैंक और NBFCs की अपनी-अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों में अव्यवस्था पैदा करने जैसा होगा. बैंक और NBFCs का क्या कहना है? इस बारे में हमने को-लेंडिंग मॉडल के तहत बैंकों के साथ मिलकर व्यापार शुरू करने जा रहे नए NBFCs से संपर्क किया. अडानी कैपिटल को हमने ईमेल के माध्यम से कुछ सवाल भेजे हैं. खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं मिला. इसके अलावा अडानी कैपिटल की तरफ़ से Whatsapp पर SBI की पॉलिसी का वही दस्तावेज भेजा गया जिसका ज़िक्र हम खबर की शुरुआत में ही कर चुके हैं. इसी तरह CGCL की तरफ़ से भी खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया.
हमने जब SBI के मुंबई स्थित हेड ऑफिस के उच्चाधिकारियों से बात करने की कोशिश की तो SBI की वेबसाइट पर दिए किसी भी नंबर से संपर्क नहीं हो सका. इसके बाद हमने SBI के लखनऊ रीजन के रीजनल मैनेजर S.K. जायसवाल से बात की. उनसे SBI के रिस्क फैक्टर के बारे में सवाल पूछा, ये भी पूछा कि इंटरेस्ट रेट क्या रहेगा, उन्होंने जवाब दिया, एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं हमने भारती विद्यापीठ इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एंड रिसर्च की डायरेक्टर यामिनी अग्रवाल से बात की, उन्होंने कहा, इंटरेस्ट रेट्स कैसे तय होंगें, इस पर यामिनी कहती हैं,
SBI और अडानी कैपिटल मिलकर कृषि क्षेत्र में लोन देंगे (फोटो सोर्स -आज तक)
SBI और अडानी कैपिटल- को-लेंडिंग मॉडल में आने वाली संभावित दिक्कतों की बहस से अलग SBI और अडानी कैपिटल इसे लेकर उत्साहित हैं. अडानी कैपिटल के साथ टाई-अप की घोषणा करते हुए SBI चेयरमैन ने कहा, अडानी कैपिटल के MD और CEO गौरव गुप्ता ने भी कहा कि कंपनी का उद्देश्य माइक्रो ऑन्त्रप्रेन्योर्स को क्रेडिट उपलब्ध कराना है. उन्होंने कहा कि SBI के साथ मिलकर हम कृषि क्षेत्र में उत्पादकता और इनकम बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे.
तमाम दावों और आशंकाओं के बाद अब देखने वाली बात ये होगी कि आने वाले वक़्त में किसानों की आय कितनी बढ़ती है, छोटे उद्योगों के लिए लोन लेना कितना आसान होगा और फंड्स की कमी की दिक्कतें कितनी कम होती हैं.

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