सबका अपना सलमान खान होता था. सब उसे 'छू' लेना चाहती थीं
होस्टलों में टीवी नहीं थे. लेकिन कैम्पस में हर पन्द्रह दिन पर सिनेमा का मेला भरता था. आंखे मिचमिचाकर टिमटिमाते सितारों के नीचे पुराने प्रोजेक्टर पर.

जिधर देखो, हर तरफ लड़कियां ही लड़कियां दिखती थीं. सड़क पर लड़की, पेड़ के नीचे लड़की. कैंटीन में लड़की, छतों पर लड़की. लाइब्रेरी में लड़की, खेल मैदानों में लड़की. स्कूल के गलियारों में लड़की, परेड के सिपहसालारों में लड़की. घोड़ा चलाती लड़की, हवाईजहाज़ उड़ाती लड़की. कैम्पस में आप चाहे हवा में किधर भी पत्थर उछालें, वैसे फूल भी उछाल सकते हैं, शर्तिया वो किसी लड़की को ही जाकर लगेगा. समूह में गाना गाती लड़कियां. अकेले साइकिल चलाती लड़कियां. सड़क किनारे कपड़े प्रेस करवाती लड़कियां. कैंटीन में दुकानदार को चूना लगाती लड़कियां.
हर अोर घनीभूत लड़कियों का समुच्च्य.
अौर सिनेमा. होस्टलों में टीवी नहीं थे. लेकिन कैम्पस में हर पन्द्रह दिन पर फिलम का मेला भरता था. कोई सिनेमा हाल नहीं था. रेती से भरे खुले मैदान में थी नाटकशाला, इसी नाटक शाला पर मटमैला परदा तानकर चलता था सिनेमा. आंखे मिचमिचाकर टिमटिमाते सितारों के नीचे पुराने प्रोजेक्टर पर चलता था सिनेमा. हर दूसरी फिल्म सलमान खान की हुआ करती थी.
अगर ना हो तो उसकी अनन्य चाह होती थी.
जनवरी के महीने में बफानी सर्दी के बीच अोपन एयर स्क्रीनिंग. 'सनम बेवफ़ा' में नीली जैकेट पहने घोड़े पर सवार सलमान की एंट्री होती है अौर ढाई हज़ार लड़कियां किसी बला की तेज़ी से अपनी गोद में रखे स्वेटर, चुन्नी, जैकेट, दुशाले हवा में उछालती हैं. पीछे से आ रही प्रोजेक्टर की रौशनी के मध्य स्याह आकृतियां चस्पां हो जाती हैं. नायक की छवि अंधेरे के धब्बों से भर जाती है. सलमान खान को परदे पर अनगिनत परछाइयां घेर लेती हैं.
अपने हीरो को 'छू लेने' का सुख.
अनगिनत लड़कियां थीं. सबके अपने सलमान खान थे. कुछ सच्चे, कुछ कल्पित. सबके मन में अपनी पिक्चर चल रही थीं.
परदे पर है घोड़े पर सवार सलमान खान, अौर हजारों लड़कियां स्वेटर उछालती हुईं. इन स्याह धब्बों से दुनिया की सबसे पवित्र रौशनी निकलती है. बस यही एक स्टिल इमेज अटक गई है कहीं स्मृतिपटल पर. यही 'घर' है मेरा.


