सैटेलाइट के जमाने में 'जासूसी बलून' का इस्तेमाल क्यों हो रहा है?
चीन का बलून अमेरिका के एयरस्पेस में कैसे घुसा?

बीते दिनों एक संदिग्ध 'जासूसी बलून' (Spy Balloon) के कारण चीन और अमेरिका (US China Conflict) के बीच तनातनी बढ़ी. सबसे पहले अमेरिका के मोंटाना में ये बलून देखा गया था. अमेरिका ने इसे 'जासूसी बलून' बताते हुए कहा कि यह देश की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है. चीन ने जासूसी वाली बात से इनकार कर दिया. राजनयिक स्तर पर तल्खी भरे संवाद हुए. फिर अमेरिका ने फाइटर जेट से मिसाइल दागकर बलून को गिरा दिया. इस घटनाक्रम के बाद सबका ध्यान इस पर गया कि आखिर ये 'जासूसी बलून' क्या है और स्पेस टेक्नोलॉजी के जमाने में इसका इस्तेमाल क्यों हो रहा है.
क्या है स्पाय बलून?अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई कि अमेरिका में दिखा बलून जासूसी के लिए ही था. फिर भी इसे समझने की कोशिश करते हैं. बड़े आकार के ऐसे बलून में हीलियम गैस भरी होती है. निगरानी वाले ये बलून कैमरों और आधुनिक तकनीकों से लैस होते हैं. बलून उसी ऊंचाई के आसपास रहते हैं जितनी ऊंचाई पर हवाई जहाज उड़ा करते हैं. ये बलून फोटोग्राफी के जरिए किसी खास इलाके की जानकारी इकट्ठा करने में सक्षम होते हैं. लेकिन सैटेलाइट के जमाने में इस तरह के बलून पर भरोसा क्यों? जबकि इसे आसानी से स्पॉट किया जा सकता है.
एयरोस्पेस के जानकार इसके पीछे कई कारण बताते हैं. पहला, सैटेलाइट धरती से बहुत दूर होते हैं. 'द कन्वर्सेशन' में एयरोस्पेस के प्रोफेसर इयान ब्यॉड लिखते हैं कि सैटेलाइट से जो तस्वीरें आती हैं वो ज्यादा साफ नहीं होती हैं. धरती की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में जो सैटेलाइट घूमते वो धरती का एक चक्कर 90 मिनट में लगा लेते हैं. अब आप सैटेलाइट के घूमने की स्पीड का अंदाजा लगा सकते हैं. निचली कक्षा की दूरी धरती से 2 हजार किलोमीटर दूर होती है. वहीं सैटेलाइट जिस दूसरी कक्षा में घूमते हैं उसकी दूरी धरती से 35 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा है. हालांकि, निगरानी के लिए ज्यादातर लो अर्थ ऑर्बिट का ही इस्तेमाल होता है. इसके उलट, बलून बहुत कम ऊंचाई पर होते हैं. साथ ही सैटेलाइट के मुकाबले एक खास इलाके में ज्यादा समय बिता सकते हैं क्योंकि बलून की स्पीड काफी कम होती है.
दूसरा कारण ये है कि बलून वाली तकनीक कम खर्चीली है. ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में अंतराष्ट्रीय सुरक्षा और इंटेलिजेंस स्टडीज के प्रोफेसर जॉन ब्लैक्सलैंड बताते हैं कि ऐसे बलून का इस्तेमाल सैटेलाइट के मुकाबले काफी सस्ता होता है. एक सैटेलाइट को स्पेस में भेजने के लिए स्पेस लॉन्चर की जरूरत होगी जिसके लिए करोड़ों रुपये खर्च होंगे.
प्रोफेसर जॉन के मुताबिक, ऐसा हो नहीं सकता कि चीन ने नहीं सोचा होगा कि वो पकड़ा जाएगा. जॉन मानते हैं कि चीन का लक्ष्य जासूसी के साथ-साथ अमेरिका को शर्मिंदा करना भी हो सकता है. चीन लंबे समय से अमेरिका पर आरोप लगाता रहा है कि वो अपने जहाजों और जासूसी विमानों के जरिये उसपर नजर रखता है. यह अमेरिका को बताना भी है कि आप जो कर सकते हैं, हम उससे बेहतर कर सकते हैं. जॉन कहते हैं कि इसकी कोई सीमा नहीं है कि आप बलून में किस तरह की तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं.
युद्ध के दौरान खूब इस्तेमाल हुआसैटेलाइट और ड्रोन युग में इन बलून्स का इस्तेमाल काफी कम हो गया. लेकिन पिछली सदी में सभी ताकतवर देशों ने दुश्मन देशों पर निगरानी के लिए इसका खूब इस्तेमाल किया. खासकर युद्ध के दौरान. द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, इन बलून्स का यूज सबसे पहले फ्रांसीसी क्रांति के दौरान युद्धों में किया गया था. 1794 में आस्ट्रियाई और डच सैनिकों के बीच बेल्जियम में लड़ाई के दौरान फ्रांस ने ऐसे बलून का इस्तेमाल किया था.
इसके बाद 1860 के दशक में अमिरेकी गृह युद्ध के दौरान भी इसका इस्तेमाल हुआ. समय के साथ इस तकनीक बेहतर हुई, तो इसका इस्तेमाल भी बढ़ा. इस 'स्पाय बलून' का इस्तेमाल पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी खूब हुआ. इसके बाद भी कई सालों तक ये सिलसिला जारी रहा. शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका ने सोवियत संघ और चीन के क्षेत्र में इस तरह के सैकड़ों बलून भेजे थे.
अमेरिका में कैसे घुसा?अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस बलून को सबसे पहले 28 जनवरी को अमेरिकी हवाई क्षेत्र में देखा गया था. रक्षा मंत्रालय ने बयान में बताया कि बलून कनाडा से होते हुए अमेरिकी एयरस्पेस में घुसा था. हालांकि, बाइडन प्रशासन ने इस बलून को लेकर 2 फरवरी को जानकारी सार्वजनिक की थी. बताया गया था कि मोंटाना राज्य में चीन का एक 'जासूसी गुब्बारा' दिखा है. इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने अपना चीन दौरा कैंसिल कर दिया था. ब्लिंकन 5 फरवरी को दो दिन की बीजिंग यात्रा पर निकलने वाले थे.
इधर चीन ने जासूसी के आरोपों से इनकार किया था. चीन के विदेश मंत्रालय ने सफाई दी थी कि इस बलून का इस्तेमाल मौसम की जानकारी और रिसर्च के लिए किया जा रहा है. विदेश मंत्रालय ने खेद जताते हुए कहा कि ये बलून नियंत्रण से बाहर होकर अमेरिकी हवाई क्षेत्र में घुस गया था.
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