The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • China taking 'aggressive' steps to gut Canada's democracy, warns Trudeau

कनाडा के आम चुनाव में चीन ने क्या कांड किया?

चीन दूसरे देशों के इंटरनल मैटर में इतनी दिलचस्पी क्यों लेता है?

Advertisement
कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो (AP)
कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो (AP)
pic
अभिषेक
8 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 8 नवंबर 2022, 08:15 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
Image embed

ये हम नहीं कह रहे, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो बता रहे हैं. उनका दावा चौंकाने वाला ज़रूर है, लेकिन दूसरे देशों के इंटरनल मैटर में टांग अड़ाने की चीन की आदत नई नहीं है.

उसके कारनामों की लंबी लिस्ट है. ज़्यादा पीछे नहीं जाते हैं. पिछले एक महीने की ही बात करें तो कनाडा और नीदरलैंड्स ने अपने यहां चल रहे चीनी पुलिस स्टेशनों की जांच शुरू की है. रिपोर्ट्स हैं कि चीन इन देशों में चुपके से अपना पुलिस थाना चला रहा है. उसकी अपनी पुलिस है, जो चीनी मूल के नागरिकों पर पूरा ज़ोर आजमाती है. चीनी पुलिस विदेशी ज़मीन पर बाकायदा ऑपरेशंस भी चलाती है.

तो, आज हम बात करेंगे,

- कनाडा के चुनाव में चीन ने क्या कांड किया?
- और, चीन दूसरे देशों के इंटरनल मैटर में इतनी दिलचस्पी क्यों लेता है?

ये 1930 के दशक की बात है. चीन में माओ ज़ेदोंग की चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) पर विलुप्ति का ख़तरा मंडरा रहा था. दरअसल, च्यांग काई-शेक के नेतृत्व वाली कुओमितांग (KMT) सरकार कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान चला रही थी. वे कम्युनिस्टों को जड़ से मिटाना चाहते थे. लेकिन वे इसमें पूरी तरह सफ़ल नहीं हो पाए. इसके पीछे एक वैचारिक वजह छिपी थी. CCP ने पूरे चीन में शिक्षकों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, छात्रों, उद्योगपतियों और दूसरे प्रभावशाली लोगों से दोस्ती गांठी थी. ये लोग कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर तो नहीं थे. लेकिन छोटे-बड़े मंचों पर पार्टी का समर्थन किया करते थे. वे CCP को महान बताने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. इसने कम्युनिस्ट पार्टी को प्रांसगिक बनाए रखा. इस सिस्टम को कालांतर में यूनाइटेड फ़्रंट वर्क डिपार्टमेंट (UFWD) का नाम मिला. 1949 में CCP चीन की सत्ता में आ गई. तब माओ ने यूनाइटेड फ़्रंट वाले सिस्टम को देश से बाहर लागू किया.

यूनाइटेड फ़्रंट विदेशों में क्या काम करती है?
ये चीन के लिए समर्थन जुटाती है.

कैसे? दो मुख्य तरीके हैं.

पहला, अगर कोई व्यक्ति या संस्था चीन के प्रति उदार है तो उसे अपनी तरफ़ मिला लो. कभी पैसे के ज़रिए. तो कभी ब्लैकमेलिंग करके.
दूसरा रास्ता प्रोपेगैंडा का है. जिनसे विरोध की आशंका हो, उनके ख़िलाफ़ झूठा प्रचार करो. तब तक प्रचार करो, जब तक कि सामने का ख़तरा टल ना जाए.

2017 में फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने यूनाइटेड फ़्रंट के मैनुअल को रिव्यू किया था. इस मैनुएल में एक जगह लिखा था,
“यूनाइटेड फ़्रंट एक चमत्कारी हथियार है, जो चीन को हज़ारों मुश्किलों से बाहर निकाल सकती है.”

आधुनिक चीन के संस्थापक माओ ने भी यूनाइटेड फ़्रंट को तीन चमत्कारी हथियारों में से एक बताया था. बाकी दो थे - सशस्त्र संघर्ष और पार्टी की रेगुलर गतिविधियां.

चीन का मौजूदा नेतृत्व यूनाइटेड फ़्रंट को लेकर क्या कहता है?

चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अगस्त 2022 में यूनाइटेड फ़्रंट को लेकर कहा था, हमें चीन से बाहर रहने वाले देशभक्त लोगों का हाथ मज़बूत करने और विदेशी जनता को चीन से दोस्ती सिखाने की ज़रूरत है. इस वजह से यूनाइटेड फ़्रंट की अहमियत बढ़ जाती है.

ये तो हुई यूनाइटेड फ़्रंट की कहानी. अब इनके कारनामे भी जान लेते हैं.

अंक 2.

13 जनवरी 2022 को ब्रिटेन के अख़बारों में छपी एक ख़बर ने लोगों का ध्यान खींचा था. ये ख़बर ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी MI5 की एक चेतावनी से जुड़ी थी. MI5 ने ब्रिटेन की संसद को कहा कि आपके सांसद ख़तरे में हैं. चीनी मूल की एक वकील हैं, क्रिस्टीन ली. वो यूनाइटेड फ़्रंट के लिए काम कर रही है. चेतावनी के मुताबिक, ली ब्रिटेन के सत्ता-प्रतिष्ठान में पकड़ रखतीं है. बहुत संभावना है कि उन्होंने चीन के समर्थन में नीतियों को प्रभावित किया हो.

ली ने समय-समय पर ब्रिटिश सांसदों, पोलिटिकल पार्टियों और उभरते हुए नेताओं के ख़ूब सारा डोनेशन दिया था. दिलचस्प ये था कि क्रिस्टीन ली को 2019 में उस समय की ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने अपने हाथों से अवॉर्ड भी दिया था.

Image embed
क्रिस्टीन ली

रिपोर्ट सामने आने के बाद अवॉर्ड वापस ले लिया गया था. इसके अलावा, MI5 ने कई सांसदों को पूछताछ के लिए भी बुलाया था. इस मामले पर क्रिस्टीन ली ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया है.

वैसे, इस तरह का मामला सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं है. इसका दायरा एशिया से लेकर अमेरिका, अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ है.
पांच उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं.

नंबर एक.

2011 में यांग जियान नाम का एक नेता न्यू ज़ीलैंड की संसद के लिए चुना गया था. यांग न्यू ज़ीलैंड की संसद तक पहुंचने से पहले 15 बरसों तक चीन की मिलिटरी इंटेलिजेंस के लिए काम कर चुके थे. यूनाइटेड फ़्रंट से भी उनका पुराना संबंध था. आरोप हैं कि सांसद के तौर पर उन्होंने चीन के पक्ष में नीतियां बनाने की पूरी कोशिश की. कई मौकों पर वो सफ़ल भी रहे.

नंबर दो.

दिसंबर 2017 की गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, CCP से जुड़े दानदाताओं ने ऑस्ट्रेलिया के कई दिग्गज नेताओं को डोनेशन दिया था. इसके बदले वे ऑस्ट्रेलिया की चीन-नीति को प्रभावित करना चाहते थे. जानकारी बाहर आने के बाद लेबर पार्टी के सेनेटर सैम दस्तारी ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

नंबर तीन.

जनवरी 2020 में ताइवान में राष्ट्रपति चुनाव हो रहा था. उस समय चीन ने ताइवान के मीडिया संस्थानों पर दबाव डाला था कि वे उसके पसंदीदा उम्मीदवार हान क्यो-यू के पक्ष में ख़बरें छापें. इन कोशिशों के बावजूद हान चुनाव हार गए.

नंबर चार.

डेमोक्रेसी इन अफ़्रीका की दिसंबर 2021 की एक रिपोर्ट गौर करने लायक है. इसमें बताया गया है कि चीन तीन तरीकों से अफ़्रीकी देशों की राजनीति को प्रभावित कर रहा है.

- पैसों का निवेश.
- कम्युनिस्ट सिस्टम का प्रचार-प्रसार.
- और, तीसरा रास्ता, चीन के प्रति हमदर्दी रखने वाले नेताओं को बढ़ावा देकर.

इसी रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने 2018 में सिएरा लियोन के राष्ट्रपति चुनाव में ऑल पीपल्स कांग्रेस (APC) की हर तरह से मदद की थी. चीनी मूल के नागरिकों को पार्टी की रैलियों में लाया जाता था. चीन अपने आधिकारिक हैंडल्स से उनके वीडियोज़ भी रिलीज़ करता था.

नंबर पांच.

ये केस ताज़ातरीन है. अमेरिका में सांसदों और गवर्नरों का चुनाव होने वाला है. इसे मिड-टर्म इलेक्शन के नाम से जाना जाता है. (मिड-टर्म पर दुनियादारी की एक मास्टरक्लास बहुत जल्द आपके सामने आने वाली है.) आज हम इसके चीन कनेक्शन पर बात करेंगे. कई इंटेलीजेंस रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि, चीन फ़र्ज़ी सोशल मीडिया अकाउंट्स के सहारे अपने मन के उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बना रहा है. इसके अलावा, वो टाइम, लॉस एंजिलिस टाइम्स, यूएसए टुडे, सीएनएन जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में पेड आर्टिकल्स भी छपवा रहा है. कई दफा इन आर्टिकल्स में पेड का मेन्शन भी नहीं होता.

एफ़बीआई की रिपोर्ट है कि चाइनीज़ हैकर्स ने 2016 और 2018 के चुनावों में झूठी ख़बरें प्लांट की थीं. ब्यूरो ने आशंका जताई है कि इस बार के मिड-टर्म इलेक्शन पर भी ख़तरा मंडरा रहा है. अमेरिका के लोगों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए.

अब बात हैकिंग की आ ही गई है तो एक और अपडेट दे देते हैं.

रूस पर इस तरह के ख़ूब सारे आरोप लगते हैं कि उसने 2016 और 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में धांधली की कोशिश की. अभी तक रूस इन आरोपों से इनकार करता था. लेकिन 07 नवंबर को पुतिन के एक करीबी ने इस आरोप को स्वीकार कर लिया. पुतिन के शेफ़ के नाम से मशहूर अलेक्जेंडर प्रिगोझिन ने रूसी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, टहमने अमेरिका के चुनाव में दखल दिया, हम दखल दे रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे. हम ये काम अपने तरीके से करते हैं. हमें अच्छे से पता है कि ये कैसे होता है?’

अंक चार.

अब आज की कहानी की तरफ़ चलते हैं. आज कनाडा की बात होने वाली है.

07 नवंबर 2022 को कनाडा के अख़बार ग्लोबल न्यूज़ में एक रिपोर्ट छपी. कनाडा की खुफिया एजेंसी है, कनेडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस (CSIS). रिपोर्ट के मुताबिक, CSIS जनवरी 2022 से प्रधानमंत्री और कैबिनेट को चीन के खेल के बारे में आगाह कर रही है. खेल क्या है? चीन चार तरीकों से कनाडा के पोलिटिकल सिस्टम को प्रभावित कर रहा है.

- CCP के प्रति उदारता बरतने वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने में मदद देकर.
- सांसदों के दफ़्तर में अपने एजेंट्स बिठाकर.
- रिटायर्ड अधिकारियों को घूस देकर.
- और, उन नेताओं के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा कैंपेन चलाकर, जो चीन के लिए ख़तरा बन सकते हैं.

ग्लोबल न्यूज़ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन से जुड़ी संस्थाओं ने 2019 के आम चुनाव में कम से कम 11 कैंडिडेट्स को पैसे दिए. इनके नाम के बारे में अभी कोई जानकारी बाहर नहीं आई है. इस वजह से ये पता लगाना मुश्किल है कि इन पैसों का असर क्या हुआ? कितने जीते या कितने हार गए? हालांकि, इतना ज़रूर पता चला है कि पैसा लेने वाले कैंडिडेट्स विपक्ष और सत्तापक्ष, दोनों तरफ़ के थे. कनाडा में फ़िलहाल लिबरल पार्टी की सरकार है. कंज़र्वेटिव्स मुख्य विपक्षी पार्टी है. CSIS की ब्रीफ़ में ये भी कहा गया है कि, पैसे ट्रांसफ़र करने का आदेश टोरंटो में चीन के दूतावास ने दिया था. कई चीनी एजेंट्स ने इन उम्मीदवारों के लिए कैंपेन भी किया था.

इस रिपोर्ट पर कनाडा सरकार ने क्या कहा है?

रिपोर्ट आई तो हंगामा मचा. सरकार से सवाल पूछे गए. जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ख़ुद आगे आए. उन्होंने कहा कि चीन कनाडा के लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करने की साज़िश रच रहा है. कनाडा सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एक टीम भी बनाई है. ट्रूडो ने कहा कि हम इस तरह की धांधली के ख़िलाफ़ लड़ते रहेंगे.

Image embed
कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडोk

चीन का क्या बयान आया है?
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाऊ लिजियान ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया है. उन्होंने कहा कि हमें इससे कनाडा के चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं है. कनाडा को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए जिससे दोनों देशों के रिश्ते ख़राब हो सकते हैं

कनाडा के चुनाव में चीन के हस्तक्षेप की रिपोर्ट उस समय सामने आई है, जब कुछ दिनों पहले ही कनाडा ने अवैध चीनी पुलिस स्टेशनों की जांच शुरू की है. इस तरह के चीनी पुलिस स्टेशनों से जुड़े खुलासे यूरोप के कई और देशों में भी हुए हैं. नीदरलैंड्स और आयरलैंड ने आधिकारिक तौर पर इन पुलिस स्टेशनों को बंद करने का आदेश भी दिया है.

चीन में गायब होने वाले लोगों पर नज़र रखने वाले संगठन सेफ़गार्ड डिफ़ेंडर्स ने सितंबर 2022 में एक रिपोर्ट रिलीज़ की थी. इसके अनुसार, चीन 30 से अधिक देशों में कम से कम 110 अवैध पुलिस स्टेशन चला रहा है. इनके ज़रिए चीन सीक्रेट ऑपरेशंस चला रहा है. ये पूरी तरह से अवैध है. लेकिन वो चीन ही क्या जो वैधता की चिंता करे.

तालिबान बनाने वाले मुल्ला उमर की कब्र का राज़ खुला!

Advertisement

Advertisement

()