The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Cheetahs will be brought from Namibia at Madhya Pradesh's Kuno National Park on the occasion of birthday of PM Narendra Modi

पीएम मोदी अपने जन्मदिन पर MP को ये सॉलिड गिफ्ट देने वाले हैं

चीतों को दोबारा भारत में बसाने के लिए क्या क्या तैयारियां की गई हैं?

Advertisement
cheetah
चीता (फोटो: इंडिया टुडे)
pic
निखिल
16 सितंबर 2022 (अपडेटेड: 16 सितंबर 2022, 11:13 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

1947. सरगुजा की कोरिया रियासत के महाराजा रामनुज प्रताप सिंहदेव को शिकायत मिली कि कोई जंगली जानवर मवेशियों को मार रहा है, कुछ ग्रामीणों को भी मार चुका है. इसके बाद महाराज शिकार पर निकले और उन्होंने एक नहीं, दो नहीं, तीन चीतों को ढेर कर दिया.

एक वक्त था, जब भारत में खूब जंगल थे और उनमें खूब सारे चीते. राजा-महाराजा और रसूखदार उन्हें जंगल से पकड़ लाते और अपने महलों में बड़े जतन से पाला करते. एक चीते पर एक उस्ताद होता जो चीते की खुराक से लेकर सेहत का ध्यान रखता. फिर शिकार के रोज़ चीते की आंख पर पट्टी बांधकर उसे बैलगाड़ी पर चढ़ाया जाता. और महाराज या युवराज के कारवां के साथ ये बैलगाड़ी पहुंचती उन खुले मैदानों में जहां काले हिरणों के झुंड होते. जैसे ही हिरण नज़दीक आता, चीते की आंखों से पट्टी खोलकर उसे आज़ाद कर दिया जाता. चीता सधे कदमों से हिरण के नज़दीक जाता और धावा बोल देता.

हर शिकार में सफल होने पर चीते का इनाम - एक प्याला खून. और दिन ढलने के बाद पूरी खुराक. सुनने में बढ़िया इंतज़ाम लगता है. लेकिन इसके बावजूद समय के साथ चीते कम होते गए. और फिर ओझल. हम नहीं जानते कि कोरिया रियासत के महाराज को किसी खूंखार जानवर के होने की सूचना वाकई मिली थी या नहीं. लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि उनके मारे तीन नर चीतों को भारत के आखिरी तीन चीते माना जाता है. इस शिकार की तस्वीर महाराज के सचिव जर्नल ऑफ बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी को दे दी थी. ये आखिरी बार था कि भारत में चीतों को ज़िंदा या मुर्दा रिकॉर्ड पर लिया गया. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इक्के-दुक्के चीते बाद के सालों में भी देखे गए, लेकिन 1952 में भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से चीतों को विलुप्त मान लिया.

अब ठीक 70 साल बाद भारत की ज़मीन पर चीते फिर दौड़ते नज़र आएंगे. 17 सितंबर को नामीबिया से 5 चीते मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान लाए जाएंगे. सारी तैयारियां पूरी हो गई हैं और अब कुछ घंटों का इंतज़ार बाकी है. 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जन्म दिन पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ चीतों को दोबारा भारत में बसाने की शुरुआत करने वाले हैं. और इस मौके पर दी लल्लनटॉप आपको बताएगा कि काले हिरण को भी पछाड़ देने वाला चीता, जिसे धरती पर सबसे तेज़ प्राणी माना जाता है, जिसे भारत में शौकीन लोग पाला भी करते थे, वो विलुप्त कैसे हो गया? और चीते को दोबारा भारत में बसाने के लिए क्या क्या तैयारियां की गई हैं.

सबसे पहले तो कुछ कंफ्यूज़न ही दूर कर लिया जाए. आपने किताब में पढ़ा होगा बाघ, शेर, तेंदुआ, चीता आदि बिल्ली की प्रजाति के हैं. सही पढ़ा था. लेकिन भारत में इन सबके नामों में बहुत घालमेल कर दिया जाता है. हम आपको नाम और चित्र के साथ भारत में मिलने वाले बिग कैट्स के बारे में बता देते हैं.

बाघ 
Image embed

बिल्ली प्रजाति का सबसे बड़ा जानवर होता है बाघ. अंग्रेज़ी में टाइगर. जिसपर काली पट्टियां होती हैं. इंडिया. GOV.IN के मुताबिक भारत का राष्ट्रीय पशु. बाघ भारत के ज़्यादातर हिस्सों में बने टाइगर रिज़र्व्स में बसते हैं.

सिंह
Image embed

सादी भाषा में कहें, तो शेर. बिल्ली प्रजाति का दूसरा सबसे बड़ा जानवर. गिर के जंगलों में जो अयाल वाला रौबीला प्राणी आप देखते हैं, वो है सिंह. मादा सिंह की अयाल नहीं होती. लेकिन दोनों भूरे रंग के होते हैं, और इनपर पट्टियां नहीं होतीं. भारत में सिंह सिर्फ गुजरात के गिर में हैं. और हां, हम शेर और बब्बर शेर वाली बहस में नहीं पड़ रहे हैं, क्योंकि जैसा कि हमने पहले कहा, हम कंफ्यूज़न खत्म करना चाहते हैं.

तेंदुआ  
Image embed

बाघ और सिंह से तुलना में छोटा जानवर. हल्के पीले रंग या भूरे रंग पर काले धब्बों वाला तेंदुआ अंग्रेज़ी में कहलाता है लेपर्ड. भारतीय तेंदुए कहलाते हैं इंडियन लेपर्ड.

चीता 
Image embed

चीते के बारे में सबसे पहली बात जो आपको जाननी है, वो ये है कि वो अंग्रेज़ी में भी चीता ही कहलाता है. हल्के भूरे रंग का होता है, काले धब्बे इसपर भी होते हैं, लेकिन अपने को तेंदुए और चीते में कंफ्यूज़ नहीं होना है. चीता के शरीर की बनक और लचक तेज़ रफ्तार के लिए होती है और देखते ही बनती है. तेंदुए से तुलना करेंगे, तो आपको चीता ज़्यादा चुस्त लगेगा. छोटा, गोल सिर होता है, पतला बदन और लंबी पूंछ.

तो अब आप समझ गए होंगे, कि हम किस जानवर की बात कर रहे हैं - चीता. अब ये जान लीजिए कि चीते और बाकी बिग कैट्स की रफ्तार में कितना फर्क होता है.
चीता - 120 प्रति घंटा 
सिंह या शेर - 80 प्रति घंटा 
जैगुआर - 80 प्रति घंटा 
कूगर - 75 प्रति घंटा 
बाघ - 65 प्रति घंटा 

चीता, पहले भारत के बड़े हिस्से में आसानी से मिलता था. अब एक बात समझने वाली है. हमें लगता है कि सारे जानवर बस घने जंगलों में ही बसते हैं. और घने जंगलों से हमारा मतलब खूब सारे हरे-भरे पेड़ों से ही होता है. बाघ और तेंदुए भी कुछ-कुछ इसी तरह के जंगलों में मिलते हैं.

लेकिन सिंह और चीता विरल वन में बसते हैं. जैसे आप गिर में देखते हैं. बीच-बीच में पेड़ों और झाड़ियों के झुरमुट. कुछ घास के मैदान. चीते घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में भी पनप जाते हैं, लेकिन वो खुले इलाकों को पसंद करते हैं. और इसका एक कारण है. हमने आपको बताया था कि काले हिरण के शिकार के लिए चीतों का इस्तेमाल होता था. अब काला हिरण एक बहुत तेज़ दौड़ने वाला प्राणी है. ज़ोर लगाए तो 110 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ सकता है. इसे पकड़ने वाला चीता 120 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार पार कर सकता है. स्वाभाविक ही है कि इतना तेज़ दौड़ने के लिए खुली जगह चाहिए. जैसे अफ्रीका में लंबे चौड़े घास के मैदान होते हैं. भारत जैसे विशाल देश में खुले घास के मैदानों की कोई कमी नहीं थी. सो चीते पूरे देश में मिलते थे.

लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ी और तकनीक का विकास हुआ, इंसान एक-एक कर मैदानों को खेतों और शहरों में बदलने लगे. तो चीते को जो खुले मैदान पसंद थे, वो कम होने लगे. तो चीतों की संख्या भी घटी. अंग्रेज़ों के आते-आते चीतों की संख्या काफी घट चुकी थी. अंग्रेज़ आए तो उन्होंने चीतों के सिर पर इनाम रख दिया. 6 रुपए छोटू चीते के लिए और 18 रुपए वयस्क चीते के लिए. इसने चीते के शिकार को एक खेल बना दिया. और चीते भी धड़ल्ले से मारे जाने लगे.  

अब आप पूछेंगे कि चीते तो महलों में भी पल रहे थे, तो वो क्यों नहीं बचे? तो जवाब ये है कि चीते पालतू होकर परिवार नहीं बढ़ा पाते. जिस तरह कुत्तों को पेशेवर तरीके से ब्रीड किया जाता है, अलग-अलग नस्लों का विकास किया जाता है, उस तरह चीतों की संख्या बढ़ाना बहुत ही मुश्किल है. इसीलिए चीते कम होते गए. जब वो जंगलों से ओझल होने लगे, तो राजे रजवाड़े उन्हें अफ्रीका से भी मंगवाने लगे. लेकिन ये प्रयास सफल नहीं हो पाए.

चीते सिर्फ ईरान और अफ्रीका में रह गए. ईरान में चीता लुप्तप्राय ही है. लेकिन अफ्रीका में बायोलॉजिस्ट्स ने चीतों की ब्रीडिंग में कुछ सफलता पाई है. और इसी ने भारत में चीते बसाने के विचार को फिर से ऊर्जा दी. आप पूछेंगे फिर से मतलब? पहले भी कोई प्रयास हुआ था क्या? तो जवाब है, हां. 1970 के दशक में भारत ईरान से चीते लाना चाहता था. लेकिन अपने यहां लग गई एमरजेंसी और ईरान में शाह का तख्त चला गया. और बात चली गई ठंडे बस्ते में. बाद के सालों में ईरान में ही इतने कम चीते बचे, कि वहां से उन्हें भारत लाना संभव नहीं रह गया. तब भारत ने अफ्रीका की तरफ देखना शुरू किया.

चीतों को अफ्रीका से लाने के लिए अगला प्रयास हुआ 2009 में. तब मनमोहन सिंह की UPA सरकार थी. कागज़ी कार्यवाही होने लगी. मंत्रियों के दौरे होने लगे. जयराम रमेश की ऐसी ही एक तस्वीर आज वायरल भी हुई. 

Image embed

National Tiger Conservation Authority ने इस बाबत 2010 में सुप्रीम कोर्ट की रज़ामंदी मांगी. लेकिन 2013 में न्यायालय ने ये कहते हुए चीतों के भारत आने पर रोक लगा दी, कि वो एक फॉरेन स्पीशीज हैं. जानवरों की दुनिया के हिसाब से कहें, तो विदेशी नागरिक.

ये मामला घिसटता रहा. फिर 2019 में NTCA ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि International Union for Conservation of Nature को भी चीतों के भारत आने में कोई समस्या नहीं है. इसके बाद 2020 में जाकर सर्वोच्च न्यायालय ने अनुमति दे दी. और नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से बात शुरू हुई. नामीबिया के साथ कार्यवाही पूरी हो गई, तो वहां से चीते पहले आ रहे हैं. आने वाले समय में दक्षिण अफ्रीका से भी चीते भारत आएंगे.

ये पहले से तय था कि चीते मध्यप्रदेश के श्योपुर और मुरैना में पड़ने वाले कूनो राष्ट्रीय उद्यान में लाए जाएंगे. क्यों, इसकी कहानी लंबी है. लेकिन हम संक्षेप में आपको बता देते हैं. हुआ ये कि भारत सरकार गिर के शेरों को कहीं और भी बसाना चाहती थी. ताकि अगर गिर के शेरों पर कोई आपदा आए, तब भी भारत में शेरों की आबादी बनी रहे. इसके लिए कूनो को चुना गया. क्योंकि वहां का माहौल बिलकुल गिर जैसा था. वैसे ही खुले-खुले विरल वन. जब ये प्रस्ताव आया, तो मध्यप्रदेश सरकार ने कूनो के इलाके को नोटिफाई कर वहां से 24 गांव हटवा दिए. लेकिन गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार ने ये कहकर अड़ंगा लगा दिया कि शेर तो गुजरात की शान हैं, वो मध्यप्रदेश कैसे जा सकते हैं. तो ये मामला फंसा रहा.

फिर जब चीतों के लिए किसी उपयुक्त जगह की तलाश चल रही थी, तो कूनो का नाम सबसे ऊपर आया. पहली बात तो यही थी कि कूनो का माहौल नामीबिया से काफी मिलता जुलता था. फिर कूनो में शेरों की आमद के लिए गावों को हटाने आदि की कार्यवाही भी लगभग पूरी हो चुकी थी. इसीलिए चीते कूनो आ रहे हैं. नामीबिया से कुल 8 चीते आएंगे. 5 मादाएं और तीन नर. ये सब एक विशेष विमान से ग्वालियर पहुंचेंगे, और फिर हवाई रास्ते से ही कूनो तक. जहां इन्हें पहले एक छोटे इलाके में रखा जाएगा. चीतों के पुनर्वास की प्रोग्रेस देखी जाएगी. जब संतोषजनक लगेगी, तब उन्हें बड़े इलाके में छोड़ा जाएगा. उनके लिए खुराक कम न हो, इसीलिए पूरे मध्यप्रदेश से लगातार चीतल कूनो पहुंचाए जा रहे हैं.

मध्यप्रदेश के श्योपुर और मुरैना ज़िले अपेक्षाकृत पिछड़े हैं. शिक्षा और रोज़गार के अवसर कम हैं. श्योपुर के लोग तो इलाज के लिए भी कोटा जाते हैं. सो चीतों के आने से लोगों को कुछ उम्मीद है. कि पर्यटन बढ़ेगा, रोज़गार मिलेगा. कूनो के मुख्य द्वार के आसपास बसे गावों में तो अभी से ज़मीन के भाव तीन से चार गुना हो चुके हैं. तो बात सिर्फ चीतों की आमद की ही नहीं है. लोग आस लगाए हुए हैं, कि उनके लिए भी कुछ बदलेगा.

वीडियो: अफ्रीका के जंगलों से PM मोदी के जन्मदिन पर चीते लाने की वजह क्या है?

Advertisement

Advertisement

()