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जब पाक पीएम की हत्या के सारे सबूत मिटा दिए गए!

पाकिस्तान में राजनैतिक हत्याओं का क्या इतिहास रहा है?

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लियाक़त अली खान और मोहम्मद अली जिन्ना (AFP)
लियाक़त अली खान और मोहम्मद अली जिन्ना (AFP)
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अभिषेक
4 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 4 नवंबर 2022, 08:39 PM IST)
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03 नवंबर को पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के कंटेनर पर गोलीबारी हुई. इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दस से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं. घायलों में इमरान ख़ान भी हैं. उनके दोनों पैरों में गोली लगी. उन्हें लाहौर के शौकत ख़ानम अस्पताल में भर्ती कराया गया. फिलहाल, उनकी हालत में सुधार है.

हमले के बाद पाकिस्तानी अख़बार ने द डॉन ने अपने संपादकीय की सुर्खी लगाई, Traged Averted. यानी, त्रासदी टली. डॉन ने आगे लिखा,

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पाकिस्तान का इतिहास राजनैतिक हत्याओं की कहानियों से भरा पड़ा है. वैसे में इस हादसे का टलना कम ऐतिहासिक नहीं है.

तो, आज हम जानेंगे,

- पाकिस्तान में राजनैतिक हत्याओं का क्या इतिहास रहा है?
- इमरान ख़ान पर हमले के पीछे कौन था?
- और, हमले के बाद पाकिस्तान में क्या चल रहा है?

अगर याद करें तो तीन बड़ी घटनाएं ध्यान में आती हैं.

नंबर एक. लियाक़त अली ख़ान.

16 अक्टूबर 1951 के रोज़ रावलपिंडी के ईस्ट इंडिया कंपनी गार्डेन में एक सभा चल रही थी. मुस्लिम सिटी लीग की इस मीटिंग में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान भी मौजूद थे. लियाक़त अली ख़ान पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के सबसे करीबी लोगों में से थे. वो हरियाणा के करनाल में पैदा हुए थे. लेकिन भारत के विभाजन ने एक मुल्क़ को दो टुकड़ों में बांट दिया था. लियाक़त दीवार के दूसरी तरफ़ रहने चले गए. उन्हें पाकिस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया. पाकिस्तान बनने के एक बरस बाद ही जिन्ना की मौत हो चुकी थी. उनके बाद लियाक़त अली ख़ान ही मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेता थे. साथ ही साथ, वो मुल्क़ के प्रधानमंत्री भी थे. इस लिहाज से कंपनी बाग में उनकी मौजूदगी के अपने मायने थे. उनकी सुरक्षा-व्यवस्था सबसे पुख़्ता थी. लेकिन उस दिन सारा इंतज़ाम धरा रह गया.

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लियाक़त अली ख़ान

जब लियाक़त अली ख़ान मंच पर बोलने आए, तभी सामने बैठे शख़्स ने बंदूक निकाली और सीधे उनके सीने में गोली मार दी. प्रधानमंत्री को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. लेकिन उनका इतना ख़ून बह चुका था कि उन्हें बचाया नहीं जा सका. हमलावर का नाम सैद अकबर था. वहां मौजूद लोगों ने उसे तुरंत पकड़ लिया. मिनटों के भीतर उसे गोली मार दी गई. गोली चलाने वाले पुलिसवाले ने बाद में बताया कि उसने एक सीनियर अधिकारी के कहने पर गोली चलाई थी. सैद अकबर को मारकर षडयंत्र के सबसे बड़े सबूत को हमेशा के लिए मिटा दिया गया. शुरुआत में पाकिस्तानी अधिकारियों ने कहा कि सैद अकबर अफ़ग़ान नागरिक था. अफ़ग़ानिस्तान ने कहा कि हमने सैद अकबर को बहुत पहले अपने यहां से निर्वासित कर दिया है. फिर पता चला कि वो पाकिस्तान बनने से पहले ख़ैबर-पख्तूनख़्वाह में रह रहा था. पाकिस्तान सरकार उसे 450 रुपये का मासिक भत्ता भी देती थी. कंपनी बाग की सभा में जिस कुर्सी पर सैद अकबर बैठा हुआ था, वो सीट सीआईडी के अधिकारियों के लिए रिजर्व्ड थी. इस सवाल का जवाब कभी नहीं मिला कि वो वहां पहुंचा कैसे?

हत्याकांड के दस दिन बाद सरकार ने एक कमीशन की स्थापना की. इस कमीशन का मकसद सुरक्षा के इंतज़ाम में कमी और पुलिस के रेस्पॉन्स की जांच करना था. वो ये पता कर रहे थे कि आगे ऐसी किसी घटना को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए? उन्हें हत्या की वजह तलाशने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. अगस्त 1952 में कमीशन ने अपनी रिपोर्ट पब्लिश की. लेकिन लियाक़त अली ख़ान की विधवा बेगम राणा ने इसे खारिज कर दिया.

रिपोर्ट आने के हफ़्ते भर बाद पाकिस्तान के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस नवाबज़ादा ऐताज़उद्दीन कराची बुलाए गए. उन्हें उस समय के पाक पीएम ख्वाजा नाज़िमुद्दीन ने बुलावा भेजा था. नवाबज़ादा लियाक़त हत्याकांड की जांच कर रहे थे. उनके पास केस से जुड़े कुछ ज़रूरी दस्तावेज भी थे. लेकिन वो कराची पहुंच पाते, उससे पहले ही उनका प्लेन क्रैश कर गया. इस क्रैश में लियाक़त अली ख़ान से जुड़े सभी दस्तावेज भी जल गए.

जब सरकार की आलोचना हुई, तब स्कॉटलैंड यार्ड की मदद ली गई. मगर इससे भी कुछ नहीं निकला. मामला दबता चला गया. फिर ये केस 1958 में खुला. लाहौर हाईकोर्ट में एक केस की सुनवाई के दौरान लियाक़त हत्याकांड की जांच पर रिपोर्ट मांगी गई. तब अटॉर्नी जनरल ने जज को कहा, फ़ाइल अभी तो मेरे पास नहीं है. लेकिन कुछ दिनों में आप तक पहुंचा दूंगा.
तय तारीख़ बीत गई. अटॉर्नी जनरल भूल गए. अदालत ने याद दिलाने के लिए चिट्ठी भेजी. जवाब आया कि फ़ाइल वेस्ट पाकिस्तान के चीफ़ सेक्रेटरी के पास है. कुछ दिनों के बाद कहा गया कि फ़ाइल खो गई है. तलाश चल रही है. इसके एक हफ़्ते बाद सीआईडी का एक अधिकारी कोर्ट में आया. उसने बताया कि फ़ाइल नहीं मिल रही है.
फिर सबने चुप्पी साध ली.

पाकिस्तान के दूसरे राष्ट्रपति और सैन्य शासक अयूब ख़ान ने अपनी आत्मकथा ‘फ़्रेंड्स नॉट मास्टर्स’ में लिखा,

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लियाक़त अली ख़ान की हत्या का रहस्य आज तक नहीं खुल पाया है. ये पाकिस्तान के राजनैतिक इतिहास की पहली बड़ी हत्या थी. लेकिन इकलौता नहीं.

अब नंबर दो की तरफ़ चलते हैं. ज़िया उल-हक़.

तारीख़, 17 अगस्त 1988. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़िया उल-हक़ सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बहावलपुर के दौरे पर थे. उनके साथ पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत और अमेरिका के मिलिटरी अटैचे भी थे. बहावलपुर में कुछ दिनों पहले एक अमेरिकी नन की हत्या हुई थी. जनरल ज़िया उनके करीबियों को सांत्ववा देने वाले थे. उन्हें एक स्कूल का दौरा भी करना था. उसके बाद वो तामेवाली में अमेरिकी एम-वन टैंक्स का करतब देखने वाले थे. पाकिस्तान इन टैंक्स को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहा था. इसके लिए जनरल ज़िया की हामी ज़रूरी थी. दिन का सारा कार्यक्रम निपटाने के बाद वे लोग बहावलपुर एयरबेस लौट आए. जनरल ज़िया ने सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों और अमेरिकी ऑफ़िसर्स को अपने साथ चलने का न्यौता दिया. सब मान गए. प्लेन उड़ा. लेकिन जल्दी ही ये हवा में गोते लगाने लगा. तीसरे गोते के बाद ये सीधा नीचे चला गया. प्लेन में भयानक विस्फोट हुआ. इसके बाद उसमें आग लग गई. प्लेन में शामिल कोई भी शख़्स ज़िंदा नहीं बचा. जनरल ज़िया की पहचान उनके काले मोज़े से हुई थी.

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ज़िया उल-हक़

आने वाले दिनों में प्लेन क्रैश को लेकर साज़िशों की अलग-अलग आशंकाएं जताईं गई. मसलन, मिसाइल का हमला, हवा में विस्फोट, गैस लीक, प्लेन में आग और भी बहुत कुछ. 19 अगस्त 1988 को अमेरिका ने छह लोगों की एक टीम भेजी. किसी की समझ में प्लेन क्रैश का कारण समझ में नहीं आ रहा था. प्लेन के कुछ मलबे जांच के लिए अमेरिका भी भेजे गए थे.

बहावलपुर में जनरल ज़िया को आम के बक्से गिफ़्ट में दिए गए थे. गिफ़्ट देने वालों को कई घंटों तक हिरासत में रखा गया. उनसे पूछताछ की गई. एयरबेस के क्रू को भी हिरासत में लिया गया. इसके अलावा, प्लेन के दोनों पायलटों के परिवार वालों से भी सवाल-जवाब किए गए. लेकिन कहीं से कोई पुख्ता चीज सामने नहीं आई.

ज़िया उल-हक़ के प्लेन क्रैश मामले में भारत, इज़रायल, रूस, इंटरनल पोलिटिक्स समेत कई फ़ैक्टर्स पर लांछन लगा. लेकिन पाकिस्तान सरकार ने कभी सच्चाई बाहर लाने में इंट्रेस्ट नहीं लिया.

दिसंबर 2012 में जनरल ज़िया के बेटे एजाज़ुल हक़ ने उस समय के वाइस आर्मी-चीफ़ मिर्ज़ा असलम बेग पर आरोप लगाया था. इस आरोप के संबंध में कोई सबूत पेश नहीं किया गया.

जनरल ज़िया उल-हक़ के प्लेन क्रैश की घटना भी रहस्य बनकर रह गई.

अब नंबर तीन की तरफ़ चलते हैं. बेनज़ीर भुट्टो.

2007 की बात है. 27 दिसंबर के दिन बेनज़ीर भुट्टो रावलपिंडी में एक चुनावी रैली कर रहीं थी. इसी दौरान उनके काफ़िले पर आत्मघाती हमला हुआ. इसके बाद हमलावरों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी. इस घटना में बेनज़ीर भुट्टो की जान चली गई. उनके अलावा 130 से अधिक और लोग मारे गए थे.

बेनज़ीर भुट्टो 1988 में पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं थी. उनके पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को जनरल ज़िया ने फांसी पर चढ़वा दिया था. उनके परिवार को कुछ दिनों तक नज़रबंद रखा गया. फिर कुछ दिनों के बाद पाकिस्तान से निर्वासित कर दिया. ज़िया ने 1988 में चुनाव कराने का वादा किया. तब बेनज़ीर वापस लौटी. उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की. हालांकि, उनकी जीत से पहले ही ज़िया उल-हक़ की मौत हो चुकी थी.
बेनज़ीर पहले कार्यकाल में 1988 से 1990 और दूसरे कार्यकाल में 1993 से 1996 तक पद पर रहीं. दोनों बार सेना से उनके रिश्ते बिगड़े. दोनों दफा ऐसा हुआ कि उनकी सरकार कार्यकाल पूरा होने से पहले ही बर्ख़ास्त कर दी गई.

अक्टूबर 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ का तख़्तापलट कर दिया. इसके बाद मुशर्रफ़ ने अपने राजनैतिक विरोधियों को निशाने पर लिया. बेनज़ीर के ख़िलाफ़ करप्शन के चार्जेज लगाए गए. इसी दौर में बेनज़ीर ख़ुद से निर्वासन में रहने चलीं गई.
अक्टूबर 2007 में मुशर्रफ़ ने नए चुनाव कराने का ऐलान किया. उन्होंने बेनज़ीर और दूसरे नेताओं को क्षमादान देने की बात भी कही. ये चुनाव जनवरी 2008 में होना था. बेनज़ीर समर्थन जुटाने के लिए 18 अक्टूबर 2007 को ही पाकिस्तान आ गईं थी. एयरपोर्ट पर उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ. हज़ारों लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए इकट्ठा हुए थे.
लेकिन उनके भाषण से पहले ही सभा में दो धमाके हुए. इसमें 179 लोग मारे गए. इसमें बेनज़ीर की जान तो बच गई. लेकिन इसने एक बड़े ख़तरे की आहट सुना दी थी.

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भाषण देती हुईं बेनज़ीर भुट्टो

इस घटना के पीछे साज़िश के कई पुट सामने आए. मसलन, जिस जगह पर धमाका हुआ था, वहां की स्ट्रीट लाइट अपने-आप बंद हो गई थी. बेनज़ीर के स्टाफ़्स के जैमर्स धमाके से ठीक पहले बंद हो गए थे. धमाके के कुछ ही मिनटों बाद पाकिस्तान पुलिस ने घटनास्थल को साफ़ कर दिया था. इस दौरान सभी ज़रूरी सबूत मिटा दिए गए थे. इस मामले में बेनज़ीर भुट्टो के अलावा कभी किसी और से पूछताछ नहीं की गई. बेनज़ीर ने स्कॉटलैंड यार्ड और एफ़बीआई से मामले की जांच कराने की मांग की. लेकिन मुशर्रफ़ ने उनकी मांग को ठुकरा दिया.

बेनज़ीर भुट्टो को किसी अनहोनी की आशंका पहले से ही थी. इसलिए, पाकिस्तान आने से दो दिन पहले ही उन्होंने अपनी राजनैतिक वसीयत लिख दी थी. इसमें उन्होंने लिखा था कि उनके बाद उनके पति आसिफ़ अली ज़रदारी को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का मुखिया बनाया जाए.

उधर, पाकिस्तान में उन्हें ज़ोरदार समर्थन मिला. सरकार ने उन्हें ज़रूरी सुरक्षा मुहैया कराने से मना कर दिया था. फिर भी उनकी रैलियों में जमकर भीड़ उमड़ रही थी. चुनावी पोल्स में उन्हें विजेता बताया जा रहा था.

फिर आई 27 दिसंबर 2007 की तारीख़. बेनज़ीर मुशर्रफ़ के गढ़ रावलपिंडी में रैली करने पहुंची. रावलपिंडी में पाकिस्तान आर्मी का हेडक़्वार्टर है.
बेनज़ीर की रैली उसी कंपनी बाग़ में थी, जहां 55 बरस पहले लियाक़त अली ख़ान की हत्या हुई थी. हत्या के बाद पार्क का नाम बदलकर लियाक़त बाग़ कर दिया गया था.
सभा खत्म होने के बाद बेनज़ीर बाग़ से निकलीं. वो अपनी कार में थीं. उन्होंने समर्थकों का जुनून देखकर बाहर आने का फ़ैसला किया. वो कार की छत से बाहर आकर हाथ हिलाने लगी. बेनज़ीर की आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ़ द ईस्ट’ में दावा किया गया है कि उसी समय पुलिस की गाड़ियां गायब होने लगीं थी. सुरक्षा घेरा हटा लिया गया था.
तभी बेनज़ीर के ऊपर गोलियां चलने लगी. जब तक कुछ समझ में आता, एक आत्मघाती हमलावर ने ख़ुद को उड़ा लिया. बेनज़ीर को रावलपिंडी के जनरल हॉस्पिटल ले जाया गया. वहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. पुरानी परंपरा की तरह ही घटनास्थल को फौरन साफ़ कर दिया गया था. सभी सबूत मिटा दिए गए थे. जिन डॉक्टर्स ने अस्पताल में उनका इलाज किया, उन्हें मीडिया से बात करने से रोक दिया गया.

2017 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने दावा किया था कि बेनज़ीर की हत्या में एस्टैबलिशमेंट के लोगों का हाथ हो सकता है. मुशर्रफ़ तब तक निर्वासन में रहने लगे थे.

एक तथ्य ये भी है कि बेनज़ीर की हत्या का आरोप मुशर्रफ़ के ऊपर भी लगा था. बेनज़ीर के एक करीबी ने दावा किया था कि पाकिस्तान आने से पहले बेनज़ीर को मुशर्रफ़ ने फ़ोन किया था. दावे के मुताबिक, उन्होंने बेनज़ीर को धमकाया था. कहा था कि पाकिस्तान आने की ग़लती मत करना. मुशर्रफ़ इस आरोप से इनकार करते हैं. उनका कहना है कि मैंने ऐसा कोई कॉल नहीं किया.

बेनज़ीर की सभा में आए आत्मघाती हमलावर का नाम बिलाल था. उसकी उम्र महज 15 साल थी. उसे मदद करने वाले पांच संदिग्धों ने बयान दिया कि बेनज़ीर को पाकिस्तानी तालिबान और अल-क़ायदा के कहने पर मारा गया.

बेनज़ीर के मामले में अभी तक सिर्फ दो पुलिसवालों को सज़ा हुई. बड़ी मछलियां आज़ भी आज़ादी में घूम रहीं है. वे सबके बीच हैं. लेकिन उनके ऊपर हाथ डालने की हिम्मत किसी में नहीं है. यही वजह है कि एक और राजनैतिक हत्या की फ़ाइल हमेशा के लिए दब चुकी है.

03 नवंबर को इमरान ख़ान के क़ाफ़िले पर हुआ हमला इसी कड़ी का हिस्सा बन सकता था. लेकिन हादसा टल गया. घटना के बाद पाकिस्तान का क्या माहौल है? इसके बारे में विस्तार से जान लेते हैं.
- इमरान ख़ान अभी भी अस्पताल में ही हैं. उनकी हालत में सुधार है. उन्होंने देश के नाम संबोधन देने की बात कही है. 
- PTI ने इमरान पर हुए हमले के लिए तीन लोगों को ज़िम्मेदार बताया है. ये तीन लोग हैं - प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, गृहमंत्री राणा सनाउल्लाह और खुफिया एजेंसी ISI के वरिष्ठ अधिकारी मेजर जनरल फ़ैसल नसीर. फ़ैसल नसीर के बारे में पब्लिक डोमेन में कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है.
- इस समय कराची, लाहौर, पेशावार, क़्वेटा, इस्लामाबाद, मुल्तान समेत कई शहरों से प्रोटेस्ट की ख़बर आ रही है. मीडिया रपटों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने पंजाब के गवर्नर के घर के बाहर आगजनी भी की है. कराची में पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पडे़. इस्लामाबाद में ट्रैफ़िक डाइवर्ट करना पड़ा है. आशंका है कि जल्दी ही ये प्रोटेस्ट बेकाबू हो स्थिति में पहुंच सकता है.

इज़रायल के चुनावों में किसकी जीत होगी?

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