सर सैयद अहमद खान. मुसलमानों के लिये एक नाम, जो 200 साल पहले पैदा हुआ और 200 सालआगे की बात करता था. विरोधी कहते रहे कि ये आदमी अंग्रेजियत का मारा था. अंग्रेजीसिर में घुसी थी. पुराने जमाने के नॉस्टैल्जिक लोगों को ये इस्लाम को डुबाने वालेलगते थे. औरतों के बारे में इनके विचार को लेकर इनके ऊपर प्रश्न उठाये गये. किसी केलिये ये पहले आदमी बने, जिसने भारत को तोड़ दो देशों की कल्पना की थी. फिर किसी केलिये ये बातों से पलटने वाले आदमी बने. इस्लाम के ठेकेदारों के हाथ में नाचने वालेबने. 1857 की क्रांति के बाद के भारत का माहौल वही था, जो मधुमक्खियों के छत्ते काहोता है. आग लगने के बाद. ब्रिटिश राज ने इसी माहौल में हिंदुओं और मुसलमानों कोबांटने की पूरी कोशिश की थी. पहले तो दिल्ली में सिर्फ मुसलमानों को मारा गया. कहाजाता है कि एक ही दिन में 22 हजार मुसलमानों को फांसी दे दी गई. फिर 10-15 साल बादपॉलिसी चेंज कर दी गई. अब मुसलमानों को फेवर किया जाने लगा. पर मॉडर्न बनाने केलिये नहीं. सदियों के सड़े-गले नियमों के साथ ही जीने के लिये बढ़ावा दिया जानेलगा. सैयद अहमद खान ने इसी माहौल में पहले तो खूब पढ़ाई की. फिर मुसलमानों को इसस्थिति से बाहर निकालने के लिये कोशिश करने लगे. अब उनको अंग्रेज और इस्लाम केठेकेदार दोनों से निबटना था. मुगल राज खत्म होने के बाद मुसलमान समाज का अपर क्लासअस्तित्व बचाने के लिये लड़ रहा था. वहीं लोअर क्लास जो कि कारीगर था, ब्रिटिशइंडस्ट्रियल सामान के मार्केट में आने से बेरोजगार हो रहा था. उधर बंगाल मेंराममोहन राय और उनके बाद के लोगों के कामों के चलते हिंदू समाज पढ़-लिख के नौकरियोंमें आ रहा था. तो अपने बादशाहों की शानो-शौकत को याद कर आहें भरने के अलावा कुछ नजरनहीं आ रहा था मुस्लिम समाज को. सैयद अहमद खान ने इसके लिये एक प्लान बनाया.साइंटिफिक सोसाइटीज, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट चलाने शुरू किये. साइंटिफिक चीजों काअनुवाद होने लगा. मैगजीन आने लगी, जिसमें सोशल रिफॉर्म पर बात हो रही थी. तरीका यहीथा कि अचानक से सब कुछ बदलने की बात ना कर ट्रेडिशन और मॉडर्निटी दोनों को एक साथरखा जाये. और धीरे-धीरे बदला जाये. अब अगर इस चीज को आज के नजरिये से देखें, तो यहीलगेगा कि सैयद अहमद खान परंपरा को तोड़ने से डरते थे. फूंक-फूंक कर कदम रखते थे.अंग्रेजी राज के हिमायती थे. 1857 में कहां थे. कांग्रेस से चिढ़ते क्यों थे. औरतोंके मामले में इस्लाम के ठेकेदारों से दो-दो हाथ करने में डरते थे. पर ऐसा नहीं था.उस वक्त की स्थिति आमूल-चूल बदलाव लायक नहीं थी. सैयद अहमद खान ने लिखा था: पर्शियनभाषा अपने शुरुआती दौर में आग की पूजा करने वालों की थी. पर मुस्लिमों ने इसे अपनालिया था. अब ये उनकी भाषा बन गई है. अब अंग्रेजी भाषा से दिक्कत क्यों है. इसमेंधर्म कहां से आ गया. फिर, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है, जो साइंस के खिलाफ जाता हो.सैयद अहमद खान दोषी थे अपनी बात को प्यार से कहने के. क्योंकि वो सबसे लड़ना नहींचाहते थे. ये उनका स्वभाव था. क्योंकि जब सर विलियम मियर ने Life of Mahomet लिख केइस्लाम के खिलाफ लिखा, तो सैयद अहमद खान ने गोलियां नहीं चलाईं बल्कि उनके दावों परबहस करने इंग्लैंड गये. सैयद अहमद खान का सबसे बड़ा योगदान था अलीगढ़ आंदोलन. 1859में उन्होंने मुरादाबाद में गुलशन स्कूल खोला. 1863 में गाजीपुर में विक्टोरियास्कूल खोला. 1867 में मुहम्मडन एंग्लो-ओरियंटल स्कूल खोला. उसी दौरान वो इंग्लैंडभी गये. और वहां की एजुकेशन से बड़े प्रभावित हुये. लौटने के बाद अपने स्कूलों कोवैसा ही बनाने की कोशिश करने लगे. ये स्कूल 1875 में कॉलेज बन गया. सैयद की मौत केबाद 1920 में ये यूनिवर्सिटी बन गया. सैयद अहमद खान एक और जगह फंसे थे. उनका माननाथा कि अपने हक के लिये मुसलमानों को अंग्रेजों के साथ मिलकर रहना चाहिये. य़े चीज उसवक्त के लोगों को नागवार गुजरती थी, क्योंकि लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने मेंबहुत कुछ गंवा दिया था. सैयद ने इस अंतर को पाटने के लिये दो पैंपलेट भी लिखे.Loyal Muhammadans of India और Cause of Indian Revolt. बाइबल पर भी लिखा जिसमें येबताने की कोशिश की कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी काफी क्लोज हैं. फिर उन्होंनेमुसलमानों को कांग्रेस जॉइन करने से मना भी किया. खुद को ऑफर मिलने के बाद भी नहींगये. वजह दी कि पहले पढ़ाई जरूरी है. जब तक ब्रिटिश सिस्टम को समझेंगे नहीं,पार्टिशिपेट कैसे करेंगे. सैयद का पूरा फोकस था मुस्लिम समाज को पढ़ाई के जरियेबदलने पर. किसी से गिला-शिकवा ना रहे. बल्कि अपने दम पर सब कुछ हासिल किया जाये.अगर ध्यान से देखें तो यही एप्रोच आज भी जरूरी है. अगर ISIS और आतंकवाद से निबटनाहै तो. पर सैयद को अपने जीवन में ही मात खानी पड़ी. इकबाल पैदा हो चुके थे. और येले के आये वीर-रस की बातें. दीन-ईमान की बातें. शेर-ए-दिल बनने की बातें. वतनपरस्तीकी बातें. ये बातें सुनने में अच्छी तो थीं पर साइंस और रीजन से दूर थीं. बेहदइमोशनल और उत्तेजित करने वालीं. धीरे-धीरे इकबाल मुसलमानों में लोकप्रिय होते गयेऔर सैयद अहमद खान पीछे छूटते गये. कोई चाहे कुछ भी कहे, सैयद अहमद खान ने मुसलमानोंके लिये जो सोचा था, वो कोई सोच नहीं पाया है. आज भी इंडिया में मुसलमान नेता केनाम पर लोग तो हैं पर उस टक्कर का कोई नहीं है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:अफरीदी-मियादांद की कुकुरझांव में समधी दाऊद का कूटनीतिक हस्तक्षेप!प्रियंका चोपड़ा पाक एक्टर्स के पक्ष में, पर उन्हें गद्दार बोला तो देशभक्ति छिनजाएगी!