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बिलकिस बानो के संघर्ष की कहानी, जीवन का एक बड़ा हिस्सा न्याय पाने में कट गया

परिवार की हत्या, गर्भावस्था में सामूहिक बलात्कार, 3 साल की बेटी को पटक-पटक कर मार डाला गया, पेट में पल रहे बच्चे को भी नहीं बख्शा, इसके बाद बाकी था बिलकिस बानो का न्याय पाने का संघर्ष.

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8 जनवरी 2024 (अपडेटेड: 11 जनवरी 2024, 03:57 PM IST)
bilkis bano case history all convicts bail petition rejetects supreme court explained
बिलकिस बानो (तस्वीर आजतक)
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पहले ये 11 नाम जान लीजिए.
जसवंत नाई
गोविंद नाई
शैलेश भट्ट
राधेश्याम शाह
बिपिनचंद्र जोशी
केसरभाई वोहानिया
प्रदीप मोरढिया
बाकाभाई वोहानिया
राजूभाई सोनी
मितेश भट्ट
रमेश चंदाना

ये वो 11 लोग थे, जिन्होंने 3 मार्च 2002 के दिन गुजरात के दाहोद जिले के रंधिकपुर गांव की रहने वाली बिलकिस याकूब रसूल बानो का सामूहिक बलात्कार किया था. 27 फरवरी 2002 के दिन गुजरात के गोधरा स्टेशन पर खड़ी साबरमती एक्सप्रेस में आग लगा दी गई थी. इस ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे दर्जनों कारसेवक और रामभक्त सवार थे. इस आगजनी में बच्चों-महिलाओं समेत पांच दर्जन लोग जलकर मारे गए.

इस घटना के तुरंत बाद गुजरात के कई इलाकों में सांप्रदायिक दंगे भड़के. 28 फरवरी 2002 के दिन दाहोद तक हिंसा पहुँच गई. रंधिकपुर गांव में रहने वाली बिलकिस और उनके परिवार को लगा कि जल्द ही आंच यहाँ तक आ जाएगी. लिहाजा 17 लोगों के कुनबे ने घर छोड़ना जरूरी समझा. परिवार को लगा कि कुछ ही दिनों पहले बकरीद के दिन जो हिंसा और लूटपाट हुई थी, वो फिर से ना दोहराई जाए.

रेप के बाद बच्चे को भी मार दिया

लिहाजा परिवार रवाना हुआ. इस समय बिलकिस की उम्र 21 साल की थी. उनकी गोद में साढ़े तीन साल की बेटी सालेहा थी, पेट में पाँच महीने का गर्भ. 3 मार्च 2002. ये परिवार छप्परवाड नाम के गाँव पहुंचा. चार्जशीट के मुताबिक इस दिन इस परिवार पर लाठी, हंसिया और तलवार से लैस लगभग 30 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया. इस भीड़ में वो 11 लोगों के नाम भी थे, जो अभी आपको ऊपर गिनाए. फिर शुरू हुई हिंसा. बिलकिस, उनकी माँ और तीन अन्य महिलाओं का इन 11 लोगों ने एक के बाद एक रेप किया.

बिलकिस की साढ़े तीन साल की बच्ची की भी हत्या कर दी गई. बिलकिस के गर्भस्थ शिशु को भी मार डाला गया. 17 लोगों के कुनबे से 8 लोग मरे पड़े मिले. 6 लोग गायब हो गए. बिलकिस, एक पुरुष और एक अन्य 3 साल का बच्चा जिंदा बचे मिले.
सामूहिक बलात्कार के समय बिलकिस बेहोश हो गईं. तीन घंटे बाद उन्हें होश आया. होश में आने के बाद उन्होंने एक आदिवासी महिला से कपड़े मांगे और होम गार्ड के एक जवान के साथ लिमखेड़ा पुलिस थाने तक गईं. थाने पर मौजूद हेड कॉन्स्टेबल सोमाभाई गोरी ने ढंग से तहरीर ही नहीं लिखी. चार्जशीट के मुताबिक, कांस्टेबल ने तहरीर लिखने में तथ्यों को तोड़-मरोड़ दिया और केस की गलत कहानी पेश की.

शवों की खोपड़ी गायब थी

बिलकिस की मेडिकल जांच तभी हो सकी, जब वो गोधरा के रिलीफ़ कैंप पहुंचीं. सीबीआई ने अपनी जांच में दावा किया कि आरोपियों को बचाने के लिए मारे गए लोगों की पोस्ट मॉर्टम जांच में भी धांधली बरती गई थी. सीबीआई के अधिकारियों ने मारे गए लोगों के शवों को खोदकर बाहर निकाला तो पाया कि सात के सातों शवों की खोपड़ी गायब थी. सीबीआई ने कहा कि पोस्टमॉर्टम के बाद मारे गए लोगों की खोपड़ियां नष्ट कर दी गई थीं ताकि उनके शवों को पहचाना न जा सके.

साल 2002 में सबूतों के अभाव का बहाना देकर मामले की जांच बंद कर दी गई थी. फिर हंगामा हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केस की जांच सीबीआई ने शुरू की. गुजरात में न्याय की संभावना न देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सूबे से बाहर चलवाया. और जनवरी 2008 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने इन 11  लोगों को रेप और हत्या का दोषी पाया. और सभी को उम्र कैद की सजा सुनाई.

इसके बाद सभी बलात्कारियों ने अपने कानूनी रास्ते तलाशने शुरू किये. उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में स्पेशल कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की, जो मई 2017 में खारिज कर दी गई.

ये भी पढें-बिलकिस बानो पर SC के फैसले के बाद भी छूट सकते हैं बलात्कारी, क्या कहते हैं नियम?

लेकिन इसी बीच गुजरात सरकार ने बिलकिस को मुआवजे की राशि ऑफर की. राज्य सरकार ने सामूहिक बलात्कार, हत्या, और न्याय प्राप्त की असाधारण यात्रा की कीमत 5 लाख रुपये रखी थी. बिलकिस ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और सुप्रीम कोर्ट के सामने उचित मुआवजे के लिए याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2019 में राज्य सरकार को आदेश दिया - बिलकिस को 50 लाख रुपये मुआवज़ा, एक घर और एक नौकरी दी जाए.

लेकिन इसके कुछेक सालों बाद सभी दोषियों को जेल से निकालने की जुगत शुरू हो चुकी थी. इस केस के एक दोषी राधेश्याम शाह ने मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि उसे सजा में रियायत दी जाए. इस रियायत को कहते हैं रिमीशन. इसमें दोष या सज़ा का चरित्र नहीं बदलता. बस अवधि कम हो जाती है. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिस राज्य में अपराध हुआ है, उस राज्य की नीतियों के मुताबिक सजा में रियायत की याचिका पर विचार किया जा सकता है. साथ ही ये भी कहा कि गुजरात सरकार एक समिति रिमीशन पर विचार करे. ध्यान रहे कि ये आदेश विचार तक सीमित था, execution पर साफ बात नहीं कही गई थी.

ये भी पढ़ें- बिलकिस बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दोषियों की रिहाई का आदेश निरस्त

बस सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को ढाल बनाकर गुजरात सरकार ने 9 लोगों की एक कमिटी बनाई, जिसमें से पाँच लोग भाजपा के नेता थे. कमिटी की डिटेल्स देखिए- 

> पंचमहल पुलिस अधीक्षक
> गोधरा जेल के सुपरिटेंडेंट
> पंचमहल के ज़िला कल्याण अधिकारी
> गोधरा सेशन्स जज
> गोधरा से भाजपा विधायक सीके राउलजी
> कलोल से भाजपा विधायक सुमनबेन चौहान
> भाजपा की गुजरात कार्यकारिणी के सदस्य पवन सोनी
> गोधरा तहसील की भाजपा इकाई के अध्यक्ष सरदार सिंह बारिया पटेल
> गोधरा में भाजपा की महिला इकाई की उपाध्यक्ष विनीताबेन लेले

इस कमिटी ने एक फैसला लिया 14 अगस्त के दिन, कि सभी 11 बलात्कारियों को जेल से रिहा किया जाएगा. आप जानना चाहेंगे कि कारण क्या गिनाए गए थे. तब गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राज कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, ''छूट देते वक्त, सज़ा के 14 साल पूरे होने, उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार जैसे कारकों पर विचार किया गया था.''

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