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अफगानिस्तान वॉर में अफ़सर का कांड, जिसने ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका तक हड़कंप मचाया!

सबसे अधिक अवॉर्ड जीतने वाला सैनिक वॉर क्राइम का आरोपी कैसे बना?

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सबसे अधिक अवॉर्ड जीतने वाला सैनिक वॉर क्राइम का आरोपी कैसे बना?
सबसे अधिक अवॉर्ड जीतने वाला सैनिक वॉर क्राइम का आरोपी कैसे बना?
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अभिषेक
31 मई 2023 (अपडेटेड: 31 मई 2023, 08:35 PM IST)
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तारीख़, 11 सितंबर 2012. जगह, अफ़ग़ानिस्तान के उरुज़गान प्रांत का दरवान. उस रोज़ तड़के सुबह लोगों की नींद मिलिटरी हेलिकॉप्टर्स के शोर से खुली थी. इसमें ऑस्ट्रेलिया की स्पेशल एयर सर्विस रेजिमेंट (SASR) और अफ़ग़ान नेशनल आर्मी (ANA) के सैनिक बैठे थे. ये सैनिक हाजी मोहम्मद गुल का घर तलाश रहे थे. दरअसल, कुछ दिनों पहले ANA के एक सार्जेंट हिकमतुल्लाह ने तीन ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों की हत्या कर दी थी. ये सैनिक वॉर ऑन टेरर के लिए अफ़ग़ानिस्तान गई गठबंधन सेना का हिस्सा थे. इस हत्याकांड के बाद ऑस्ट्रेलिया ने पूरा फ़ोकस हिकमतुल्लाह पर शिफ़्ट कर दिया था. उसकी तलाश में सुदूर गांवों में पर्चे गिराए गए थे. उसकी सूचना देने वाले के लिए इनाम का ऐलान हुआ था. यही पर्चा देखकर दरवान से किसी ने फ़ोन कर बताया कि हाजी गुल का परिवार उसको पनाह दे रहा है. 

जिस रोज़ उसके घर छापेमारी हुई, उस रोज़ हाजी गुल के दो रिश्तेदार भी आए हुए थे. एक का नाम था, अली जान फक़ीर. वो एक दिन पहले घर का कुछ सामान खरीदने दरवान आया था. लौटने में देर हुई तो वो हाजी गुल के घर ही रुक गया था. दरवान आए सैनिकों ने घर में घुसते ही पुरुषों को एक तरफ़ जमा किया. वे हाजी मोहम्मद गुल और उसके भाई हाजी नज़र गुल को स्टोर रूम में ले गए. वहां से फिर उनकी लाश ही निकली.

इसके बाद उन्होंने सर्च ऑपरेशन शुरू किया. तब तक अली जान अपने गांव की तरफ़ निकल चुका था. लेकिन हेलिकॉप्टर्स का शोर सुनकर वो रास्ते में रुक गया था.उसको शक़ के आधार पर पकड़ लिया. कुछ घंटों के बाद वे वापस लौट गए. फिर गांववालों ने अली जान को खोजना शुरू किया. उन्हें एक खेत में उसकी डेड बॉडी मिली.
छह बरसों तक ये घटना दुनिया से छिपी रही. फिर 2018 ऑस्ट्रेलिया में एक के बाद एक मीडिया रिपोर्ट्स छपीं. इसमें दरवान की घटना की पोल खोलकर रख दी. इसके बाद सवाल पूछा गया,

क्या सबसे बहादुर सैनिक युद्ध-अपराधी है?
क्या उसने मासूम नागरिकों की बेरहमी से जान ली?
या, क्या अख़बारों ने उसको साज़िश के तहत फंसाया?

इन सवालों के केंद्र में जो सैनिक था, उसका नाम था - बेन रॉबर्ट्स स्मिथ. उन्हें ऑस्ट्रेलिया के सबसे सम्मानित सैनिकों में गिना जाता है. बेन को 2011 में विक्टोरिया क्रॉस मिल चुका है. ये ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा मिलिटरी अवॉर्ड है. प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठा तो बेन बोले, आरोप झूठे हैं. मैंने कभी कोई ग़लत काम नहीं किया. मीडिया को जवाब देना होगा.
फिर उन्होंने तीन अख़बारों पर मानहानि का मुकदमा ठोक दिया. हर्ज़ाने में लगभग 200 करोड़ रुपये मांगे. दिलचस्प ये है कि वो इस मुकदमे को कर्ज़ के पैसे से लड़ रहे हैं. इस डील में 200 करोड़ के अलावा उनका विक्टोरिया क्रॉस और ऑस्ट्रेलियाई सेना की विश्वसनीयता दांव पर है.

अदालत 01 जून 2023 को इस केस का फ़ैसला सुनाने वाली है. इस पर ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ अफ़ग़ानिस्तान में लड़ने वाले पश्चिमी देशों की नज़रें भी टिकी हुई हैं.

तो आइए जानते हैं,

- बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ की पूरी कहानी क्या है?
- सबसे अधिक अवॉर्ड जीतने वाला सैनिक वॉर क्राइम का आरोपी कैसे बना?
- और, किस तरह इस केस ने अफ़ग़ानिस्तान में हुए युद्ध-अपराध की पोल खोली?

बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ 01 नवंबर 1978 को ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में पैदा हुए थे. पिता सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस थे. बेन की पढ़ाई-लिखाई पर्थ में ही हुई. 18 की उम्र में आर्मी में चले गए. ट्रेनिंग के बाद उन्हें पहले मिशन पर ईस्ट तिमोर भेजा गया. यूएन पीसकीपिंग फ़ोर्स का हिस्सा बनाकर.

ईस्ट तिमोर एक द्वीपीय देश है. ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के बीच में बसा है. ये एक समय तक पुर्तगाल की कॉलोनी हुआ करता था. अगस्त 1975 में पुर्तगाल ने उसे आज़ाद करने का फ़ैसला किया. दिसंबर 1975 में इंडोनेशिया ने हमला कर ईस्ट तिमोर को अपना प्रांत घोषित कर दिया. इसके ख़िलाफ़ विद्रोह हुआ. 1999 में इंडोनेशिया ने जनमत-संग्रह कराने का फ़ैसला किया. ईस्ट तिमोर ने आज़ादी चुनी. इसे इंडोनेशिया का समर्थन करने वाले गुटों ने नकार दिया. फिर हिंसा शुरू कर दी. तब यूएन ने पीसकीपिंग फ़ोर्स भेजने का फ़ैसला किया. इनका काम सुरक्षा और शांति सुनिश्चित करना था. इस पीसकीपिंग मिशन में सबसे ज़्यादा सैनिक ऑस्ट्रेलिया के ही थे. बेन इसी टीम में थे.

ईस्ट तिमोर से लौटने के बाद उन्होंने स्पेशल एयर सर्विस रेजिमेंट (SASR) के लिए अप्लाई किया. वो चुन लिए गए. SASR ऑस्ट्रेलियन आर्मी की स्पेशल यूनिट है. इन्हें ख़तरनाक ऑपरेशंस के लिए बुलाया जाता है. ये यूनिट वियतनाम, सोमालिया से लेकर इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में काम कर चुकी है.

बेन ने SASR के लिए फ़िजी, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में काम किया. सबसे ज़्यादा चर्चा अफ़ग़ानिस्तान वाली पोस्टिंग की हुई. क्योंकि इसी ने उन्हें सबसे मशहूर और सबसे विवादित बनाया. बेन को 2006 से 2012 के बीच छह बार अफ़ग़ानिस्तान भेजा गया. पहले फ़्रंटलाइन सोल्ज़र और बाद में पट्रोल कमांडर के तौर पर. 2011 में उन्हें बहादुरी के लिए विक्टोरिया क्रॉस से नवाजा गया. ये ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा मिलिटरी अवॉर्ड है. उससे पहले भी उन्हें कई अवॉर्ड मिल चुके थे. लेकिन विक्टोरिया क्रॉस का रुतबा कुछ और ही था.

ये अवॉर्ड उन्हें जून 2010 में कंधार में दिखाई गई बहादुरी के लिए मिला था. उस रोज़ बेन की टीम एक तालिबानी कमांडर को पकड़ने गई थी. जैसे ही वे ऑपरेशन वाली जगह पहुंचे, उनके ऊपर मशीन गन से फ़ायरिंग होने लगी. दो सैनिक घायल भी हो गए. मगर बेन ने अपना मोर्चा नहीं छोड़ा. हमलावरों का ध्यान भटकाने के लिए वो कवर छोड़कर बाहर आ गए. उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मनों का सामना किया और उन्हें मार गिराया. बेन और उनकी टीम के ऑपरेशन के चलते तालिबान को वो इलाका छोड़कर भागना पड़ा.

2015 तक बेन रिजर्व आर्मी का हिस्सा बने रहे. उन्होंने एक्टिव ड्यूटी 2013 में ही छोड़ दी थी. उसके बाद वो मोटिवेशनल स्पीकिंग के पेशे में चले गए. उनके पास फ़ील्ड ऑपरेशन, लीडरशिप और मुश्किल परिस्थितियों से निपटने का अनुभव था. उन्हें हाथोंहाथ लिया गया. प्रधानमंत्री ने मेंटल हेल्थ पर अपना एडवाइजर बनाया. 2013 में उन्हें ‘फ़ादर ऑफ़ द ईयर’ का खिताब भी मिला.

फिर 2015 में एक रीजनल चैनल ‘सेवेन क़्वींसलैंड’ ने उन्हें डिप्टी जनर मेनेजर बनाया. कुछ समय के अंदर ही वो चैनल के जनरल मेनेजर हो चुके थे. उनकी पर्सनल और प्रोफ़ेशनल लाइफ़ बढ़िया चल रही थी. फिर 2016 में बड़ा धमाका हुआ.

ऑस्ट्रेलियन डिफ़ेंस फ़ोर्स (ADF) के इंस्पेक्टर-जनरल ने अफ़ग़ानिस्तान में हुए वॉर क्राइम्स की जांच शुरू की. इसकी ज़िम्मेदारी न्यू साउथ वेल्स की अदालत में जज पॉल बेरेटन को सौंपी गई. इसलिए, इस रिपोर्ट को बेरेटन रिपोर्ट भी कहते हैं. इनकी फ़ाइनल रिपोर्ट नवंबर 2020 में जारी हुई. इसमें क्या दर्ज़ था?

- स्पेशल फ़ोर्स के 25 जवानों ने अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध अपराध किए हैं.

- जवानों ने निर्दोष लोगों की हत्या के बाद लाश के आस-पास हथियार रखे, ताकि हत्या को जायज ठहराया जा सके.

- जूनियर सैनिकों को अपना खाता खोलने के लिए मज़बूर किया गया. उन्हें हिरासत में रखे गए लोगों को गोली मारने के लिए कहा जाता था. अफ़सरों के लिए ये एक खेल भर था. उन्होंने इसे ‘ब्लडिंग’ का नाम दिया था.

- इन घटनाओं में शामिल जवानों को युद्ध के नियमों की सारी जानकारी थी. इसका मतलब ये कि कि इन निहत्थे लोगों को जान-बूझकर मारा गया.

- जांच में दोषी पाए गए 25 जवानों में से अधिकतर स्पेशल एयर सर्विस (SASR) रेजिमेंट में तैनात थे.
बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ इसी रेजिमेंट का हिस्सा थे.

रिपोर्ट पेश करने के बाद ADF के तत्कालीन चीफ़ ऐंगस कैम्पबेल ने माफ़ी मांगी. बोले, हमने अफ़ग़ान लोगों का भरोसा तोड़ा है. इसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा.
उन्होंने दूसरी माफ़ी अपने देश के लोगों से मांगी. कहा, मैं ऑस्ट्रेलिया के लोगों से माफ़ी मांगता हूं. मैं शर्मिंदा हूं. आप भरोसा रखिए, हमारी सेना राष्ट्रीय मूल्यों और कानून के दायरे में रहकर ऑस्ट्रेलिया और उसके हितों की रक्षा करेगी.

फिलहाल, हम बेन की तरफ़ वापस लौटते हैं.

2017 में दिग्गज ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार क्रिस मास्टर्स ने एक किताब पब्लिश की. नो फ़्रंट लाइन: ऑस्ट्रेलियाज़ स्पेशल फ़ोर्स एट वॉर इन अफ़ग़ानिस्तान. इसमें बेन का नाम पहली बार किसी वॉर क्राइम से जुड़ा था. क्रिस ने दावा किया कि बेन और उनके एक साथी मैथ्यू लॉक ने एक बेगुनाह अफ़ग़ान लड़के की हत्या की. ये घटना 2006 में घटी थी. क्रिस के मुताबिक, बेन और लॉक ने लड़के को तालिबानी समझकर गोली मारी. जबकि उससे किसी को कोई ख़तरा नहीं था.

क्रिस की किताब पर ख़ूब बवाल हुआ. बेन ने जवाब दिया, मैंने किसी नाबालिग लड़के की हत्या नहीं की है. स्पेशल फ़ोर्स पर सवाल उठाना गद्दारी है. तब एबीसी न्यूज़ के डेन ओक्स ने एक रिपोर्ट लिखी थी. इसका टाइटल था,

It's not 'un-Australian' to investigate the actions of special forces in Afghanistan
अफ़ग़ानिस्तान में स्पेशल फ़ोर्सेज़ की गतिविधियों की जांच करना ‘देशद्रोह’ नहीं है.

ओक्स ने अपने आर्टिकल में दो मार्के की बात बताई थी,

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दूसरी, ओक्स ने किताब में दर्ज एक लेफ़्टिनेंट कर्नल के बयान के हवाले से लिखा,

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बेन ने अपने ऊपर लग रहे आरोपों को खारिज कर दिया था. लेकिन उनके दामन पर दाग लगने की शुरुआत हो चुकी थी. उसके बाद तो ये सिलसिला बढ़ता ही गया. जुलाई 2018 में सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड, द ऐज और कैनबरा टाइम्स ने बेन स्मिथ पर सिलसिलेवार ढंग से रिपोर्ट्स की सीरीज़ पब्लिश की. एक रिपोर्ट में एक बेनाम सैनिक पर गंभीर आरोप लगाए गए. रिपोर्ट के मुताबिक, उस सैनिक ने हिरासत में रखे गए अफ़ग़ान क़ैदी को लात मारकर 10 मीटर नीचे फेंक दिया. बाद में गोली मारकर हत्या भी कर दी थी. शुरुआती कुछ रपटों में आरोपी सैनिक का नाम नहीं लिया गया था. इतना ज़रूर कहा गया कि, ये हरक़त जेनेवा कन्वेंशन के ख़िलाफ़ है. ये कन्वेंशन वॉर ज़ोन में आम नागरिकों और हिरासत में लिए गए दुश्मनों की सुरक्षा का वादा करता है.

फिर 06 जुलाई 2018 को सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड ने पर्दा उठा दिया. क्रिस मास्टर्स और निक मैकेेंजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, अफ़ग़ान नागरिक को लात मारने वाला सैनिक विक्टोरिया क्रॉस विजेता बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ है. इस खुलासे ने ऑस्ट्रेलिया में तहलका मचा दिया. एक वॉर हीरो पर वॉर क्राइम के संगीन आरोप लग रहे थे. मीडिया ने यहां तक लिखा कि, पूरे मुल्क का सिर शर्म से झुक गया है.

ये वही घटना थी, जिसका ब्यौरा हमने ऐपिसोड की शुरुआत में दिया था. दरवान गांव. अली जान फ़क़ीर और 06 बरस की चुप्पी. इस बीच में बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच चुके थे. जब इंक़्वायरी शुरू हुई और अख़बारों ने रिपोर्ट्स छापनी शुरू की, तब गंभीरता का पता चला.

गवाहों ने दावा किया था, अली जान को पहले बेरहमी से पीटा गया. फिर बेन ने उसको लात मारी, जिससे वो 10 मीटर नीचे गिर गया. वहां पर सूखा नाला था. गिरने से उसकी कमर टूट गई. इसके बाद बेन ने उसको घसीट कर खेत में लाने का ऑर्डर दिया. वहां पर उसे एक पेड़ के सहारे खड़ा किया गया. फिर बेन के आदेश पर अली जान को गोली मार दी गई. हत्या के बाद उसके पास वायरलेस रेडियो रखा गया. ये जताने के लिए कि वो तालिबान का स्पॉटर था. स्पॉटर आम लोगों की तरह रहते हैं. वे बिना पहचान में आए दुश्मन की गतिविधि पर नज़र रखते हैं. ख़तरा महसूस होने पर वे अपने संगठन को अलर्ट करते हैं. गवाहों ने कहा कि अली जान को टेक्नोलॉजी के बारे में कुछ भी पता नहीं था. वायरलेस रेडियो चलाना तो बहुत दूर की बात है.

अख़बारों ने इन्हीं गवाहों और लीक डॉक्यूमेंट्स के आधार पर रिपोर्ट्स पब्लिश की थीं. उन्होंने 2006 से 2012 के बीच कुल पांच हत्याओं में बेन की भागीदारी का दावा किया था.
फिर अगस्त 2018 में एक महिला ने बेन पर मारपीट का आरोप लगाया. दावा किया कि दोनों छह महीने तक रिलेशनशिप में थे. उस समय बेन शादीशुदा थे. अख़बारों ने इस आरोप को भी छापा. इन सबने बेन का आभामंडल बिखेर दिया था. उनकी छवि तार-तार हो रही थी.

बचाने के लिए बेन ने मानहानि का केस करने का फ़ैसला किया. कहा, रिपोर्ट्स झूठी हैं. इससे मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ है. तीनों अख़बारों ने पीछे हटने से मना कर दिया. बोले, हमारी रिपोर्ट तथ्यात्मक है. हम मुकदमा लड़ेंगे. 2021 में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई. इस दौरान कई गवाह और सबूत अदालत के सामने पेश किए गए. अख़बारों की तरफ़ से अली जान के गांववालों और बेन की टीम के एक सैनिक ने गवाही दी. उन्होंने दावा किया कि अली जान को लात मारने वाला बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ ही था.

बेन ने अदालत में दो चीजों पर ज़ोर दिया. पहला, उन्होंने कहा- उस जगह पर कोई पत्थर का टीला नहीं था. ब्यौरा भ्रामक है. और, दूसरी चीज़, अली जान रेडियो पर तालिबान से बात कर रहा था. वो ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के लिए ख़तरा था. इसलिए, उसे मारना ज़रूरी हो गया था. इस केस की सुनवाई अब पूरी हो चुकी है. 01 जून को फ़ैसला आने वाला है.
इस फ़ैसले में क्या-क्या दांव पर लगा है?

- पहला, बेन रॉबर्ट्स-स्मिथ का रुतबा.

अगर फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ आया तो वॉर क्राइम और घरेलू हिंसा का आरोप सच साबित हो जाएगा. फिर उन मामलों में उनके ऊपर मुकदमा चल सकेगा.
बेन ये केस अपने चैनल के मालिक कैरी स्टोक्स से क़र्ज़ लेकर लड़ रहे हैं. उन्होंने अपना विक्टोरिया क्रॉस दांव पर लगाया है. अगर वो केस हारते हैं तो उन्हें ये अवॉर्ड स्टोक्स को देना पड़ेगा.

- दूसरा, प्रेस की प्रतिष्ठा.

अगर कोर्ट बेन के हक़ में फ़ैसला सुनाती है तो तीनों अख़बारों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी. ये ऑस्ट्रेलिया की पूरी प्रेस के लिए झटका होगा. वे आगे ऐसी रिपोर्ट्स करने से हाथ खींच सकते हैं.

- तीसरी चीज़ दांव पर लगी है, सेना का सम्मान.

अगर बेन पर लगे आरोप सही साबित हुए तो सेना की छवि पर बड़ा धब्बा लगेगा. बेरेटन रिपोर्ट पहले ही उनका दामन दागदार कर चुकी है. लेकिन बेन का मामला थोड़ा अलग है. वो अफ़ग़ानिस्तान गई ऑस्ट्रेलियाई सेना का चेहरा बन चुके हैं. वो इस कैंपेन के सबसे सम्मानित मेंबर हैं. ऑस्ट्रेलियन वॉर मेमोरियल में उनकी वर्दी आज भी टंगी हुई है. अगर उनका सबसे बहादुर सैनिक युद्ध-अपराधी निकला तो सेना के लिए अपना चेहरा बचाना मुश्किल हो जाएगा.

कहा जा रहा है कि, ये ऑस्ट्रेलिया के इतिहास का सबसे बड़ा मुकदमा है. फ़ैसला सुनाते वक़्त अदालत को न्याय के साथ-साथ मुल्क की सेना और प्रेस की प्रतिष्ठा को भी ध्यान में रखना होगा. इस दुविधापूर्ण जंग में किसकी जीत होती है? उसकी अपडेट आपको लल्लनटॉप पर मिलती रहेगी.

जाते-जाते एक और कहानी सुन लीजिए.

आपके मन में सवाल होगा कि हिकमतुल्लाह के साथ क्या हुआ?

वो कई महीनों तक छिपा रहा. 2013 में उसे पाकिस्तान से अरेस्ट किया गया. मुकदमा चला. मौत की सज़ा सुनाई गई. उसको बगराम की जेल में रखा गया था. 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ. इस डील के तहत अमेरिका ने 5000 तालिबानी कै़दियों को रिहा किया था. इनमें हिकमतुल्लाह भी था.
अगस्त 2022 में उसने ब्रिटिश अख़बार गार्डियन को इंटरव्यू दिया. उस वक़्त वो काबुल के एक आलीशान होटल में रह रहा था. इस इंटरव्यू में वो बोला, अगर मुझे मौका मिला तो मैं विदेशियों की फिर से हत्या करूंगा. मुझे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है.

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