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पनवाड़ी कांड: दलित बारात पर हमले और 32 साल में आरोपी की तरक्की की कहानी

आगरा की एक अदालत ने बीती चार अगस्त को फतेहपुर सीकरी के बीजेपी विधायक बाबूलाल चौधरी को तीन दशक से भी ज्यादा पुराने इस मामले में बरी कर दिया.

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8 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 8 अगस्त 2022, 10:33 PM IST)
Baulal Chaudhari Bharat Singh Panwari
बाएं से दाएं. बाबूलाल चौधरी और भरत सिंह. (फोटो: सोशल मीडिया)
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आगरा की एक अदालत ने बीती चार अगस्त को फतेहपुर सीकरी के बीजेपी विधायक बाबूलाल चौधरी को एक तीन दशक से भी ज्यादा पुराने मामले में बरी कर दिया. उनके साथ इस मामले में सात और लोगों को बरी किया गया. ये मामला दलित समुदाय की एक बारात से जुड़ा था जिसमें बड़े स्तर पर हिंसा हुई थी. कहा जाता है कि इस हिंसक घटनाक्रम ने बाबूलाल चौधरी को इलाके में जाट समुदाय के नेता के तौर पर स्थापित कर दिया था.

Dalit की बारात पर हुआ था हमला

जून 1990 की घटना है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आगरा के पनवाड़ी गांव में रहने वाले भरत सिंह की बहन की शादी हो रही थी. लेकिन उनके यहां आ रही बारात की राह आसान नहीं रही. एक भीड़ ने बारात पर भयानक हमला कर दिया था. इस हिंसा की वजह से गांव में रहने वाले कई दलित परिवारों को हमेशा-हमेशा के लिए गांव छोड़ना पड़ा था.

इधर बाबूलाल चौधरी इस घटना के बाद राजनीतिक तौर पर लगातार सफल होते गए. जब ये हिंसा हुई, उस समय बाबूलाल चौधरी ब्लॉक प्रमुख स्तर के नेता थे. 1996 में उन्होंने फतेहपुर सीकरी विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा. इस सीट पर जाट समुदाय के लोगों की संख्या अच्छी खासी थी. चौधरी जीत गए. साल 2002 में उन्होंने RLD की टिकट से चुनाव लड़ा. फिर से जीते. अगला विधानसभा चुनाव हार गए. फिर BJP में शामिल हुए और फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट से 2014 का चुनाव जीता. आगे फिर 2022 में फतेहपुर विधानसभा सीट से जीत हासिल की.

इकट्ठा हो गई भीड़

वापस उस घटना पर लौटते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग तीन दशक पहले पनवाड़ी में तनाव तब बढ़ने लगा था, जब जाट समुदाय के लोगों ने ये ऐलान किया कि वो भरत सिंह की बहन मुंद्रा देवी की शादी के लिए आ रही बारात गांव में उनके इलाके से नहीं गुजर सकती. उनका कहना था कि इस जाट बहुल गांव में ऐसा कभी नहीं हुआ. मुंद्रा देवी की शादी पड़ोसी गांव के एक युवक के साथ होनी थी.

इस ऐलान के बाद भरत सिंह के पिता पुलिस के पास गए. प्रशासन ने कहा कि उनकी मदद की जाएगी. 21 जून, 1990 को उनके घर बारात आई. हालांकि, बारात को जाट समुदाय के लोगों ने घेर लिया. उनके पास लाठी-डंडो के साथ जानलेवा हथियार थे. इस बीच अधिकारियों ने दोनों समुदाय के लोगों से बात की. तय हुआ कि बारात अगले दिन आएगी. जाट समुदाय के लोगों ने कहा कि वो किसी भी तरह का विवाद नहीं करेंगे.

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अगले दिन भरत सिंह के यहां फिर से बारात आई. हालांकि, इस बार जाट समुदाय के हजारों लोग इकट्ठा हो गए. भीड़ ने गाली गलौज किया. बारात पर हमला किया. पीड़ित पक्ष ने कोर्ट को बताया कि भीड़ लाउडस्पीकर के जरिए इकट्ठा की गई थी जिसमें पड़ोसी गांवों के लोग भी शामिल थे.

इस भीड़ ने दलित समुदाय के 15 घरों को आग के हवाले कर दिया. इनमें भरत सिंह का घर भी शामिल था. हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं. आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. हालत ये रही कि पुलिस की सुरक्षा में ही शादी पूरी हुई. लगभग छह हजार अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई. एक महीने की जांच के बाद पुलिस ने 18 लोगों की पहचान की. इनके ऊपर आरोप लगा कि ये हिंसा करने वाली भीड़ में शामिल थे. इन 18 लोगों में एक नाम बाबूलाल चौधरी का भी था.

‘दलित समुदाय के सम्मान पर हमला’

घटना के बाद बाबूलाल चौधरी फरार रहे. बाद में सरेंडर किया और जमानत मिल गई. उन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया गया. 32 साल बाद बीती चार अगस्त को जिन लोगों को बाबूलाल चौधरी के साथ बरी किया गया है, उनके नाम मुन्ना पाल, रामवीर सिंह, रूप सिंह, देवी सिंह, शिवराज, श्यामवीर और सत्यवीर हैं.

इधर इस फैसले पर 64 साल के भरत सिंह ने निराशा जताई है. इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए भरत सिंह ने कहा,

"हिंसा ने केवल मेरी बहन की शादी पर ही असर नहीं डाला, बल्कि इसने दलित समुदाय के सम्मान पर हमला किया. हम लड़ाई नहीं छोड़ेंगे और इस फैसले को चुनौती देंगे."

भरत ने बताया कि हिंसा के बाद ज्यादातर दलित परिवार पनवाड़ी से चले गए. उनका परिवार कभी गांव लौटने की हिम्मत नहीं कर पाया. दूसरे भी वापस नहीं आए और उनकी जमीनें हड़प ली गईं. 

भरत सिंह का परिवार गांव से 10 किलोमीटर दूर आवास विकास इलाके में रहता है. उनका कहना है कि बाबूलाल चौधरी ने ही पूरी हिंसा की साजिश की रची थी. उन्होंने ही भीड़ को उकसाया था. वहीं भरत सिंह के वकील ने बताया कि मामले की सुनवाई के दौरान दलित समुदाय से आने वाले तीन गवाह पलट गए और केस डायरी के गुम होने की बात कही गई.

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इधर बाबूलाल चौधरी का कहना है कि उनका इस हिंसा में कोई हाथ नहीं था. बोले कि उनकी लोकप्रियता से डरने वालों ने उनके खिलाफ साजिश रची थी. ये भी कहा कि तनाव इस वजह से हुआ क्योंकि दलित समदुयाय के लोग बारात निकालने पर अड़ गए थे और कुछ लोगों को लगा था कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है.   

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