26 अगस्त 1978 का दिन शुरू से ही अंधड़ भरा था. सुबह से ही पानी की झिड़की पड़ रही थी.धौलाकुआं के ऑफिसर एन्क्लेव से दो बच्चे शाम के सवा छह बजे घर से निकले. उन्हें ऑलइंडिया रेडियो के लिए संसद मार्ग जाना था. बच्चों का नाम गीता और संजय चोपड़ा था.नेवल ऑफिसर पिता मदन मोहन चोपड़ा और मां रोमा चोपड़ा के बच्चे. गीता साढ़े सोलह साल कीथी. चिबिल्ली सी लड़की. खेलने, वेस्टर्न म्यूजिक और नाचने की शौक़ीन. जीसस एंड मैरीकॉलेज में सेकंड इयर में कॉमर्स पढ़ती थी. भाई संजय चौदह साल का था. 5 फुट 10 इंच केलमटंगे से स्कूली लड़के का सपना नेवी में जाने का था. मॉडर्न स्कूल में दसवीं मेंपढ़ता था. और गजब का बॉक्सर था.तय ये हुआ था कि ये घर से निकले हैं. सात बजे तक ऑल इंडिया रेडियो के केंद्र पहुंचजाएंगे. वहां उन्हें वेस्टर्न गानों के एक फरमाइशी प्रोग्राम In the Groove मेंहिस्सा लेना था. वहां से नौ बजे उनके पापा उनको वापस घर के लिए पिक कर लेते. 8 बजेप्रोग्राम आना था. घरवालों ने रेडियो खोला तो कोई और ही बोल रहा था. मां-बाप कोलगा. शायद स्टेशन गलत है. या प्रोग्राम रद्द हो गया. पापा मदन मोहन नौ बजे ऑलइंडिया रेडियो पहुंचे. बच्चों को खोजा तो नहीं मिले. पता किया तो पता चला बच्चे तोरिकॉर्डिंग के लिए आए ही नहीं. मदन मोहन वापस घर पहुंचे. घर पर बीवी रोमा से पतालगा बच्चे तो घर भी नहीं आए. न ही उनका कोई फोन आया.गाड़ी के नंबर में कन्फ्यूज रही पुलिसवहीं पुलिस में पहले से ही एक मामला दर्ज हो चुका था. दो बच्चों के अपहरण का. दोलोग एक फिएट में बच्चों को जबरन ले जा रहे थे. पुलिस के पास जो पहली जानकारी आई,वो भगवान दास से. भगवान दास की बिजली के सामान की दुकान थी. वो बंगला साहबगुरूद्वारे से नॉर्थ एवेन्यू की ओर अपने स्कूटर से जा रहे थे. उन्होंने जो देखा वोशाम 6:45 के आस-पास नॉर्थ दिल्ली पुलिस के सेंट्रल कंट्रोल रूम में फोन कर बताया.उनके मुताबिक़ नींबू के कलर की एक फिएट गोल मार्केट चौराहे पर उनके पास से गुजरी.उसकी पिछली सीट में दो टीनएजर थे. जिसमें लड़की मदद के लिए चिल्ला रही थी. भगवान दासके बताए और फोन ऑपरेटर के लिखे अनुसार गाड़ी का नंबर था MRK 8930. उन्होंने गाड़ी रोकने की कोशिश की, एक दूसरा आदमी गाड़ी रोकने के लिए हैंडल से लटकगया, लेकिन गाड़ी नहीं रोक पाया. गाड़ी अब के राम मनोहर लोहिया अस्पताल की ओर भाग गई. इस जानकारी के बाद कंट्रोल रूम ने एक रूटीन सा वायरलेस सारी पेट्रोलिंग जीप्स केलिए भेज दिया.उसी दिन राजिंदर नगर पुलिस थाने के ड्यूटी ऑफिसर हरभजन सिंह के पास एक ऐसी हीशिकायत और लिखाई गई. 23 साल के इन्दरजीत सिंह ने एक शिकायत दर्ज कराई थी. इन्दरDDA में जूनियर इंजीनियर थे. उन्होंने बताया शाम साढ़े छह बजे के करीब लोहियाअस्पताल के पास एक तेज रफ़्तार कार उनके स्कूटर के पास से गुजरी. गाड़ी में दो लोगआगे बैठे हुए थे. एक लड़का और लड़की पिछली सीट पर थे और लड़की चीख रही थी. उन्होंनेगाड़ी का पीछा किया. चौराहे पर कार धीमी हुई तो उन्होंने कार के पास जाकर पूछा"क्यों भाई, क्या हो रहा है?" अंदर का जो सीन दिखा. वो ये कि लड़का अपनी खून मेंभीगी शर्ट और कंधे की ओर इशारा कर रहा था और लड़की कार ड्राइवर के बाल खींच रही थी.ड्राइवर एक हाथ से कार चला रहा था. और दूसरे हाथ से लड़की को मार रहा था. शंकर रोडतक इन्दर ने गाड़ी का पीछा भी किया, तभी भीड़ बढ़ी. ड्राइवर ने गाड़ी दौड़ा दी और लालबत्ती तोड़कर भाग गया. इन्दरजीत के मुताबिक़ कार मस्टर्ड के रंग की थी और उसका नंबरथा HRK 8930. हरभजन सिंह और उस टाइम एसएचओ रहे गंगा स्वरूप ने इस शिकायत के बाद भीकोई एक्शन नहीं लिया. उनका कहना था क्योंकि ये मामला मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन काथा और वो इलाका उनके कार्यक्षेत्र से बाहर का था तो वो कैसे एक्शन ले सकते हैं?एक्शन तभी लिया जा सकता था, जब मेरठ हाईकोर्ट कहे. वो तो इस मामले को किडनैपिंगमानने को भी तैयार नहीं थे. उनका मानना था ये कोई पर्सनल रिलेशनशिप की प्रॉब्लम रहीहोगी. बाद में इन दोनों अफसरों को सस्पेंड होना पड़ा था. दूसरी तरफ इन सब बातों सेअंजान नेवी ऑफिसर कैप्टन चोपड़ा अपने लेवल पर कोशिश कर रहे थे. अपने नेवी के कुछसाथियों की मदद ली और धौलाकुआं थाने में बच्चों के गुमने की रिपोर्ट लिखाई. रिपोर्टके मुताबिक कैप्टन चोपड़ा ने रात के दस बजे पुलिस कंट्रोल रूम में कॉल करके बताया किउनके बच्चे गुम गए हैं. पंद्रह मिनट बाद पुलिस की गाड़ी उनके घर पहुंची. जहां सेकैप्टन चोपड़ा को लेकर हर उस जगह तलाश की गई. जहां बच्चे हो सकते हैं. दोस्तों के घरसे लेकर अस्पतालों और रेस्टोरेंट तक. जब बच्चे नहीं मिले तो कैप्टन चोपड़ा ने शकजाहिर किया कि हो सकता है बच्चों को मारकर रिज में घने पेड़-पौधों के बीच फेंक दियागया हो. रिज उस जगह के पास ही थी, जहां DDA के इंजीनियर इन्दरजीत ने कार को देखाथा. उस वक़्त बच्चों का कॉम्बिंग ऑपरेशन साउथ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के.के. पॉलदेख रहे थे. उन तक ये बात पहुंची.संजय का बैग देखते हुए मदन मदन चोपड़ा और दूसरी फोटो में रोमा चोपड़ातब 30 से ज्यादा गाड़ियां, 140 पुलिसवाले और ढेरों नेवी के अफसर बच्चों को सारीदिल्ली में खोज रहे थे. अब सारी खोज रिज की ओर केन्द्रित हो गई. अंधेरे और बरसातने उनका काम और मुश्किल कर दिया था. रात ढ़ाई बजे तक तलाश हुई लेकिन बच्चे नहींमिले. फ्लेयर गन चलाकर उजाले में खोजने की कोशिश हुई. लेकिन कारतूस नहीं चले. गायबहुई गाड़ी और बच्चों की तलाश ने अगले कुछ दिनों में और विस्तार लिया. खोजने का कामपड़ोसी राज्यों में भी शुरू हो गया. सर्च पार्टियां आगरा, मथुरा और हरियाणा तक गईं.28 अगस्त को पुलिस कमिश्नर जे.एन.चतुर्वेदी ने बच्चों या किडनैपर्स का सुराग देनेवाले के लिए 2000 के ईनाम की घोषणा भी कर डाली. लेकिन बच्चों के गुमने के तीन दिनबाद तक उनका कहीं पता नहीं लग रहा था.लेकिन सवाल ये था कि बच्चे और कार गई कहां?पुलिस के पास कार का नंबर था. उस कार और कार के मालिक को खोजने के लिए पुलिस नेट्रांसपोर्ट विभाग की मदद ली. उनके रिकॉर्ड से पता चला कि कार पानीपत में रहने वालेकिसी रविंदर गुप्ता की है. पुलिस पानीपत पहुंची. उसे कार मिल गई. नंबर भी वही HRK8930. लेकिन वो फिएट नहीं थी. उस गाड़ी ही हालत भी ऐसी नहीं थी कि वो दिल्ली तकपहुंच सके. पुलिस को समझ आ गया जिस गाड़ी को वो खोज रही है. उस पर फर्जी नंबर प्लेटलगी थी. 29 अगस्त के दिन एक चरवाहे को रिज में घुमते हुए एक लड़की की लाश मिली. येगीता की लाश थी जो सड़क से सिर्फ 5 मीटर की दूरी पर पड़ी थी. चरवाहे ने पुलिस कोबताया. कंट्रोल रूम को मैसेज गया और पुलिस वाले वहां पहुंचे. तलाश हुई थी गीता से50 मीटर की दूरी पर संजय की लाश भी झाड़ियों के बीच मिल गई. घरवालों ने शिनाख्त की.और माना कि यही गीता और संजय हैं. उनकी लाश अपने घर से लगभग चार किलोमीटर दूर मिलीथी. संजय के पास अब भी सत्रह रुपये पड़े थे. गीता की उंगली में उसकी चांदी की अंगूठीपड़ी थी. जिसका मतलब ये लगाया गया कि किडनैपिंग लूट के इरादे से नहीं हुई थी.एक पुलिस वाला उस जगह को दिखाता हुआ जहां संजय की लाश मिली. दूसरी फोटो में वो कारजिसमें बच्चों का किडनैप हुआ.डेडबॉडीज सड़ना-गलना शुरू हो गईं थीं. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में ये बात सामने आई किउन पर कई घाव किए गए थे. कुछ तो नौ इंच गहरे. संजय 5 फुट 10 इंच का फ़ौजी बच्चा था.और बहुत अच्छा बॉक्सर भी था. उसने भरपूर विरोध किया था. उसकी देह पर 25 घाव थे.ज्यादातर सीधे हाथ पर. गीता की बॉडी पर छह घाव थे. उसके सीने, सिर और उल्टी हथेलीपर. उसके गले पर भी चीरने का निशान था. पोस्टमॉर्टम में ये बात आई कि इनका मर्डर 26अगस्त को ही 10 बजे रात हुआ था. अमृता बाजार पत्रिका को एक पुलिस वाले ने 29 अगस्तको बताया कि ऑटोप्सी रिपोर्ट के हिसाब से गीता का रेप नहीं हुआ था. आधिकारिक तौर परभी डॉक्टर्स ये बताने की हालत में नहीं थे कि गीता के साथ रेप हुआ था या नहीं.पुलिस सर्जन भरत सिंह ने इसकी वजह बॉडी में शुरू हो चुके डीकंपोजीशन को बताया. राज्यसभा में हंगामा और विदेश निकल गए मोरारजी लोकसभा में उस दिन खूब हंगामा हुआ. शेम-शेम के नारे लगे. इस घटना को सबने चौंकानेवाला और दुखद बताया. अगले दिन लोकसभा और राज्यसभा में और ज्यादा हंगामा बढ़ा.राज्यसभा में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के इस्तीफे की मांग की गई. लोगों कागुस्सा पुलिस को लेकर था. असर हुआ कि राजिंदर नगर थाने के अफसरों को बर्खास्त कियागया. दिल्ली के लोग गुस्से में थे और प्रधानमंत्री मोरारजी उस रात नैरोबी के लिएनिकल गए. केन्या के राष्ट्रपति जोमो केन्यत्ता के फ्यूनरल में इंडिया को रिप्रेजेंटकरने.31 अगस्त को किडनैपिंग में इस्तेमाल की गई कार जैसी एक कार मजलिस पार्क में पाई गई.नंबर था DHD 7034. इसी मॉडल की एक कार और गायब बताई जा रही थी लेकिन उसका नंबर थाDEA 1221. पुलिस ने उसके मालिक अशोक शर्मा को बुलाया. कार अशोका होटल के सामने सेचोरी गई थी. अशोक ने उसे चोरी के छह हफ्ते पहले ही खरीदा था. उन्होंने अपने पास पड़ीचाबियों से खोली तो गाड़ी खुल गई. स्टीरियो और स्पीकर गायब थे. पहली नजर में उसमेंकुत्ते की चैन और कई ब्लेड्स मिलीं. दो नंबर प्लेट्स भी मिलीं जिसमें एक असली थी.कार की सफेद ग्रिल को बदल कर काला कर दिया गया था. बाद में फोरेंसिक वालों ने कारकी खोज-खबर ली तो उससे सिगरेट के टुकड़े, बालों के गुच्छे और खून के ढाबे भी मिले.कार के मैट पर जो मिट्टी मिली वो उस रिज वाली जगह से मैच खाती थी जहां दोनों लाशेंमिली थीं.प्रोटेस्ट में वाजपेयी का सिर फूट गया इसके बाद लोगों का गुस्सा और भड़क गया. छात्रों का हुजूम बोट क्लब पहुंचने लगा. कईछात्र पुलिस कमिश्नर के घर पहुंच गए और पुलिस के खिलाफ नारे लगाने लगे. लेकिन सबसेज्यादा भीड़ बोट क्लब पर जीसस एंड मेरी कॉलेज की लड़कियों के प्रदर्शन में थी. कई औरस्टूडेंट्स ग्रुप भी उनके सपोर्ट में आगे आ गए. तब एक्सटर्नल अफेयर्स देखने वालेमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वहां पहुंचे और लड़कियों से बात करने लगे. तभी छात्रों काएक ग्रुप भड़का और पत्थरबाजी शुरू कर दी. पत्थर वाजपेयी को लगे और उनका कुर्ता खूनमें भीग गया. उनके माथे में बाईं तरफ चोट आई. हड्डी में अंदर घाव हुआ और पांच टांकेआए. वाजपेयी उस दिन सिर में पट्टी बांधे लोकसभा पहुंचे. अगले दिन से सीबीआई नेक्राइम ब्रांच से मामले की जांच अपने हाथ में ले ली. अब सवाल उठ रहे थे कि बच्चोंको मारा किसने. एक बात आई कि कुछ समय पहले नेवी की एक कमेटी ने कुछ सैनिकों को सजासुनाई थी. वजह ये थी कि वो कुछ स्मगलर्स की हेल्प करते थे. मदन मोहन चोपड़ा भी उसकमेटी के अहम सदस्य थे. एक और बात थी कि कुछ दिन पहले ही गीता चोपड़ा का झगड़ा एकफौजी अफसर के बेटे से हुआ था. कहीं उसका हाथ तो नहीं था? लेकिन ये दोनों अंदाजेतुक्के ही निकले. क्योंकि मारने वाले कोई और थे.रंगा और बिल्ला : मर्डर के पीछे का चेहरा पुलिस वाले इस मामले के बाद सकपकाए थे. मीडिया में कोई कुछ बोल नहीं रहा था लेकिनखबर थी कि फिंगरप्रिंट्स और दूसरे फोरेंसिक सबूत इशारा कर रहे हैं कि इस केस मेंबिल्ला का हाथ है. बिल्ला मतलब जसबीर सिंह. इस मर्डर केस में उसका साथी था रंगाखुस जिसका असली नाम था कुलजीत सिंह. रंगा पहले ट्रक ड्राइवर हुआ करता था जो बाद मेंमुंबई में टैक्सी चलाने लगा था. उसे शाम सिंह नाम के आदमी ने बिल्ला से मिलवाया. येकहकर कि ये जाना-माना क्रिमिनल है. और उसने दो अरब लोगों को मारा है. इसके पहलेमुंबई में दोनों ने मिलकर रंगा की टैक्सी में एक बच्चे को किडनैप किया था. जिसे बादमें छोड़ दिया. बिल्ला इसके पहले थाणे जेल से भी भाग चुका था.पकड़े भी गए तो अजीब तरीके से8 सितंबर 1978 को जिस वक़्त ये पकडे गए, उस वक़्त कालका मेल में चढ़ रहे थे. इनके पीछेपुलिस किस कदर पड़ी थी, आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि कहा जाता है. उस वक़्त रेलवेस्टेशन पर 100 से ज्यादा पुलिस वाले सादी वर्दी में खड़े थे.इनने गलती की, ये आर्मी वालों के लिए रिजर्व डिब्बे में चढ़ गए. दो सैनिकों ने इनसेसवाल जवाब किए तो ये भिड़ गए . आर्मी वालों ने इनको पीटा तब भी होशियारी दिखाई.खिलौना बंदूक दिखाकर डराने की कोशिश की. फिर कुछ पंजाबी सिपाहियों को देख बोले किहम तो पंजाबी हैं लड़ क्यों रहे हैं? आपस में खुसफुसाए, मराठी में कह रहे थे कि फौजवालों की राइफल छुडा लो. लेकिन ये भी काम न आया कुछ फ़ौजी मराठा थे, उनने बात समझली.वहीं लांस नायक ए.वी. शेट्टी थे. उनने नवयुग में इनकी तस्वीर देख रखी थी. अखबारउनके पास था. इन दोनों को पकड़ लिया गया. रस्सी से बांध दिया गया और पुलिस को देदिया गया. पुलिस ने इनसे अलग-अलग पूछताछ की. इनकी दी जानकारी पर कई-कई जांचें हुईं.डीएनए सबूत जुटाए गए. सेशन कोर्ट ने मुकदमा चलने पर इन्हें फांसी की सजा दी.क्योंकि दोनों के पास कोई ऐसा सबूत नहीं था जो उनको निर्दोष दिखा सके या बचा सके.26 नवंबर 1979 को हाईकोर्ट ने भी इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी.रंगा ने बाद में एक रिट पिटीशन भी लगाईं कि इसके केस को फिर देखा जाए. सन 82 की बातहै ये. सुप्रीम कोर्ट ने इसे टाल दिया. कहा गया कि कितनी भी दया दिखाई जाए.सजा-ए-मौत से कम तो कुछ न होगा.ऐसा भी खुलासा हुआ थाक्योंकि इस केस में मीडिया का खूब ध्यान गया खूब चर्चाएं भी हुईं इसलिए केस केदौरान कई अजीब सी बातें भी हुईं. उनमें से एक ट्यूजडे पोस्ट का किस्सा है. अक्टूबरचल रहा था. रंगा-बिल्ला पकडे गए थे. अविनाश दुबे नाम का एक पब्लिशर और सुरिंदर वत्सनाम का एक एडिटर जो ट्यूजडे पोस्ट नाम से एक टैब्लॉयड निकाला करते थे. तीस हजारीकोर्ट में प्रकट हुए. अग्रिम जमानत मांगने. उनको लग रहा था कि दिल्ली पुलिस उनकोपकड़ लेगी.उनका दावा था कि उन्हें पता है कि गीता और संजय को किसने मारा है. उनका कहना था येदो वीआईपीज के बच्चे हैं. एक यूनियन कैबिनेट मिनिस्टर का बेटा है और एक सेना के बड़ेअफसर का बेटा है. इनने बताया ट्यूजडे पोस्ट ने मुंबई की एक जासूसी एजेंसी की मददली, जिसका नाम पंडित डिटेक्टिव एजेंसी था. इन लोगों को दुबे ने 500 रुपये रोज़ कीफीस भी दी थी. इनके मुताबिक़ बिल्ला को दो वीआईपी लोगों के बच्चों ने हायर किया था.बिल्ला गीता को किडनैप कर निश्चित जगह लाने वाला था, जहां ये दोनों मिलते.इन दोनों को गीता से बदला लेना था, गीता ने उस मिनिस्टर के बेटे के प्रपोजल कोठुकरा दिया था. और सेना के अफसर के बेटे को भी किसी बदतमीजी के लिए थप्पड़ भी माराथा. इन लोगों ने कहा हमारे पास खून से सनी वो पैंट भी है जो सेना के अफसर के बेटेने हत्या के वक़्त पहनी थी. साथ में कहा कि हमारे पास बिल्ला का टेप रिकॉर्ड भी है.गिरफ्तारी के पहले के इस टेप में उसने बताया था कि कैसे दिल्ली पुलिस ने उसे फंसायाथा. ताकि असल गुनहगार न पकडे जा सकें. ये भी कहा कि हमने रंगा-बिल्ला को पकड़नेवाले जवानों में से एक जवान का भी इंटरव्यू लिया था. जिसमें उसने बताया कि उनको तोवो लोग अपने साथ मुंबई से साथ लाए थे.इन लोगों ने आरोप लगाए कि पहले मंत्री ने उनको खरीदना चाहा. सबूतों के बदले 2 लाखभी देना चाहते थे. ऐसा नहीं हुआ तो क्राइम ब्रांच के जरिये उनके दफ्तर पर छापेडलवाने लगे. लेकिन बाद में ऐसे सवाल भी उठे कि मुश्किल से एक साल पुरानी ट्यूजडेपोस्ट कैसे हर दिन के पांच सौ रुपये जासूसों पर खर्च सकती है. साथ ही जहां तक पुलिसनहीं पहुंच सकी. इस एंगल ने भी पूरे केस में बहुत सनसनी मचाई लेकिन अंत में इसकाखास असर पड़ा नहीं.अंत में 31 जनवरी 1982 को दोनों को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई. सरकार इंदिरागांधी की आ चुकी थी. फांसी के वक़्त कई पत्रकार उनसे मिलना चाहते थे. उस पर भी हल्लामचा. और अंत में कुछ पत्रकार उससे मिल भी पाए. इस बीच 1978 में बहादुर बच्चेबच्चियों के लिए ब्रेवरी अवार्ड लाई. जिसका नाम गीता और संजय चोपड़ा के नाम पर रखेगए. जो आज भी दिए जाते हैं.--------------------------------------------------------------------------------वीडियो: