सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी तो मिल गई लेकिन नया संसद भवन बनाने से सरकार को फ़ायदा क्या होगा?
बेंच में सबसे अलग राय रखने वाले जस्टिस खन्ना ने क्या कहा?
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कुछ ऐसा दिखेगा नया संसद भवन और आसपास का इलाका.
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मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार 5 जनवरी को बहुत बड़ी राहत मिली. नए संसद भवन और मंत्रालयों की नई इमारत बनाने वाले मामले में. यानी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को लेकर सारी कानूनी अड़चन खत्म हो गई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है. 10 दिसंबर 2020 को नए संसद भवन का शिलान्यास हुआ था, जिसमें पीएम मोदी भी पहुंचे थे, लेकिन तब भी ये मामला सुप्रीम कोर्ट में अटका था. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शिलान्यास तो कर लीजिए, लेकिन जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता है, ना कुछ तोड़ा जाएगा, ना ही कुछ जोड़ा जाएगा.
सालभर पहले दिल्ली हाई कोर्ट से शुरू हुआ ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और इस पर खूब लंबी बहस चली. श्याम दीवान, संजय हेगडे, गौतम भाटिया, वृंदा भंडारी ये देश के नामी वकील हैं. इस प्रोजेक्ट के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की तरफ से इन्होंने केस लड़ा. इस बहस में सरकार का बचाव किया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने. प्रोजेक्ट के पक्ष और विपक्ष में अखबारों में भी खूब लेख लिखे गए. और 5 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तो भी तीन जजों की बेंच में एक राय नहीं बन पाई. बेंच के एक जज की राय थोड़ी अलग थी. तो असल में किस बात को लेकर इतना विरोध हो रहा है? नए संसद भवन, नए मंत्रालय, नया राष्ट्रपति भवन बनाने की बात पर इतना हंगामा क्यों हुआ? और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा? हर बात को रेशा-रेशा अलग करके समझेंगे. घटना शुरू कहां से होती है? बात शुरू करते हैं पिछले साल की फरवरी से. डीडीए यानी दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए लैंड यूज में बदलाव की कवायद शुरू की. ये राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक के 4 किलोमीटर के दायरे में लैंड यूज़ में बदलाव की बात थी. लैंड यूज़ में बदलाव को इस तरह से समझिए कि जहां अभी खाली लॉन हैं या पेड़ पौधे हैं, या अस्थाई निर्माण हैं, वहां पक्के निर्माण की इजाज़त दी गई. इसके ख़िलाफ राजीव सूरी नाम के एक शख्स ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका डाल दी. परेशानी क्या थी याचिकाकर्ता की? इनकी दलील थी कि संविधान में जीवन के अधिकार के तहत नागरिकों को शुद्ध हवा और ग्रीन ज़ोन का हक मिला है. यानी विस्टा ज़ोन के लैंड यूज़ में बदलाव करके इमारतें बनाने की इजाज़त देना संविधान से मिले जीवन के अधिकार के खिलाफ है. दिल्ली हाई कोर्ट को भी इस बात में दम लगा. इसलिए 11 फ़रवरी 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने डीडीए से कहा कि आप लैंड यूज का नोटिफिकेशन निकालने से पहले कोर्ट में आएं.
नवीनीकरण से पहले ऐसा दिखता है सेंट्रल विस्टा
लेकिन जब इस मामले में केंद्र सरकार भी पार्टी बन गई तो दिल्ली हाई कोर्ट की ही डिविजन बेंच ने 28 फरवरी 2020 को पहले के फैसले पर स्टे लगा दिया. उसके बाद डीडीए ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया. अब याचिकाकर्ता राजीव सूरी पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट. उसी बात को लेकर. हाई कोर्ट वाली याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर हो गई. और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के खिलाफ कई और याचिकाएं भी दायर की गईं. इन याचिकाओं में जो बड़ी दलीलें थीं, वो जान लेते हैं.
पहली - लैंड यूज़ में बदलाव का विरोध,
दूसरी - नगर निगम के कानूनों का उल्लंघन
तीसरी- पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन
चौथी दलील- इतने बड़े फैसले में जनता की राय को शामिल ना करना. यानी पब्लिक कंसल्टेशन ना होना, सारे बड़े फैसले सीक्रेटली लेना.
और पांचवां विरोध था कि हेरिटेज कमेटी की पहले से इजाज़त नहीं ली गई थी. नियम और इतिहास क्या कहते हैं? अब ये समझिए कि ये बातें क्यों उठी? अगर देश के किसी आम हिस्से में कुछ बनाना होता तो इतनी बातों का जवाब सरकार को नहीं देना पड़ता, लेकिन ये सेंट्रल विस्टा का मामला है. अब इसमें क्या ख़ास है? दिल्ली के राजपथ पर राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक का एरिया सेंट्रल विस्टा कहलाता है. सेंट्रल विस्टा में करीब 44 बिल्डिंग आती हैं. संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक वगैरह. इसी पूरे ज़ोन को री-प्लान किया जा रहा है -सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत. ये ऐतिहासिक विरासत वाली जगह है. दिल्ली के मास्टर प्लान 1962 में इस जगह के लिए कहा गया था कि ये समृद्ध संस्कृति की आंकाक्षाएं पूरी करने के लिहाज से अहम जगह है. यानी इस जगह पर ऐसे ही कुछ भी तोड़ा, कुछ भी बनाया नहीं जा सकता. अगर कुछ बनाना है तो उस पर स्टडी होगी. ये देखा जाएगा कि अगले कम से कम 25 सालों तक इस जगह की जरूरतें कैसी रहेंगी, कितना ट्रैफिक रहेगा, सीवेज का क्या सिस्टम होगा, फ्लोर एरिया कितना होगा, आदि आदि. सरकार ने क्या किया? इस तरह के रीडेवलपमेंट पर पूरी स्टडी होती है. उसके बाद सेंट्रल विस्टा कमेटी समेत संबंधित विभागों की इजाज़त लेनी होती है, जिनमें पर्यावरण मंत्रालय की एनओसी भी शामिल है. और फिर काम शुरू हो सकता है. मोदी सरकार ने अपने तरीके से इस तरह की औपचारिकताएं पूरी कीं, और उसके बाद सितंबर 2020 में ठेका निकालकर रीडेवलपमेंट का काम टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को दे दिया. आर्किटेक्टर और डिजाइनिंग का काम मिला गुजरात के आर्किटेक्ट विमल पटेल को. इन्होंने ही नए संसद भवन का डिजाइन तैयार किया है. आर्किटेक्चर के मामले में विमल पटेल का बहुत नाम है. गुजरात हाई कोर्ट, IIM अहमदाबाद, IIT जोधपुर, अहमदाबाद का रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट, RBI अहमदाबाद जैसी इमारतों के डिजाइन विमल पटेल ने ही तैयार किए हैं. उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.
बदलाव के बाद कुछ ऐसा दिखेगा सेंट्रल विस्टा
अब सरकार अपने इस काम में आगे बढ़ रही थी, और सुप्रीम कोर्ट में इस प्रोजेक्ट पर बहस चल रही थी. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील संजय हेगडे ने दलील रखी कि इस प्रोजेक्ट के लिए जनता की राय ली जानी चाहिए, पब्लिक कंसल्टेशन होना चाहिए. एडवोकेट हेगडे की दलील थी कि जब सुप्रीम कोर्ट भी बनाया गया था, तब भी पब्लिक कंसल्टेशन का मॉडल था. जबकि सेंट्रल विस्टा कमेटी ने इस मॉडल को उस वक्त मंजूरी दे दी, जब देश में लॉकडाउन लगा हुआ था. मीटिंग भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए हुई थी. इस मीटिंग की अध्यक्षता अडिशनल डायरेक्टर जनरल (वर्क्स) कर रहे थे, जिनका अब तक का तजुर्बा सिर्फ सड़कें बनाने का ही रहा है. प्रोजेक्ट की बिड और पर्यावरण के सवाल भी उठे. कोर्ट में सरकार ने क्या कहा? अब इस पर सरकार का पक्ष आता है. एसजी तुषार मेहता ने कहा,
पहला कि पब्लिक के पार्टिसिपेशन के लिए कोई डिस्क्लोज़र नहीं किया गया है.
और दूसरा कि हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी की पहले से अनुमति नहीं ली गई थी.
कोर्ट के फैसले से ना इत्तेफाकी रखने की इजाजत भी हमारा लोकतंत्र देखता है. लेकिन सरकार को इसी फैसले का इंतजार था और अब रीडेवलपमेंट का प्रोसेस शुरू होगा. सबसे पहले 2022 तक नया संसद भवन बनाने का प्लान है. इस मामले में जो भी अपडेट आते जाएंगे, हम आपको देते रहेंगे.
सालभर पहले दिल्ली हाई कोर्ट से शुरू हुआ ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और इस पर खूब लंबी बहस चली. श्याम दीवान, संजय हेगडे, गौतम भाटिया, वृंदा भंडारी ये देश के नामी वकील हैं. इस प्रोजेक्ट के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की तरफ से इन्होंने केस लड़ा. इस बहस में सरकार का बचाव किया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने. प्रोजेक्ट के पक्ष और विपक्ष में अखबारों में भी खूब लेख लिखे गए. और 5 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तो भी तीन जजों की बेंच में एक राय नहीं बन पाई. बेंच के एक जज की राय थोड़ी अलग थी. तो असल में किस बात को लेकर इतना विरोध हो रहा है? नए संसद भवन, नए मंत्रालय, नया राष्ट्रपति भवन बनाने की बात पर इतना हंगामा क्यों हुआ? और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा? हर बात को रेशा-रेशा अलग करके समझेंगे. घटना शुरू कहां से होती है? बात शुरू करते हैं पिछले साल की फरवरी से. डीडीए यानी दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए लैंड यूज में बदलाव की कवायद शुरू की. ये राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक के 4 किलोमीटर के दायरे में लैंड यूज़ में बदलाव की बात थी. लैंड यूज़ में बदलाव को इस तरह से समझिए कि जहां अभी खाली लॉन हैं या पेड़ पौधे हैं, या अस्थाई निर्माण हैं, वहां पक्के निर्माण की इजाज़त दी गई. इसके ख़िलाफ राजीव सूरी नाम के एक शख्स ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका डाल दी. परेशानी क्या थी याचिकाकर्ता की? इनकी दलील थी कि संविधान में जीवन के अधिकार के तहत नागरिकों को शुद्ध हवा और ग्रीन ज़ोन का हक मिला है. यानी विस्टा ज़ोन के लैंड यूज़ में बदलाव करके इमारतें बनाने की इजाज़त देना संविधान से मिले जीवन के अधिकार के खिलाफ है. दिल्ली हाई कोर्ट को भी इस बात में दम लगा. इसलिए 11 फ़रवरी 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने डीडीए से कहा कि आप लैंड यूज का नोटिफिकेशन निकालने से पहले कोर्ट में आएं.
नवीनीकरण से पहले ऐसा दिखता है सेंट्रल विस्टालेकिन जब इस मामले में केंद्र सरकार भी पार्टी बन गई तो दिल्ली हाई कोर्ट की ही डिविजन बेंच ने 28 फरवरी 2020 को पहले के फैसले पर स्टे लगा दिया. उसके बाद डीडीए ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया. अब याचिकाकर्ता राजीव सूरी पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट. उसी बात को लेकर. हाई कोर्ट वाली याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर हो गई. और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के खिलाफ कई और याचिकाएं भी दायर की गईं. इन याचिकाओं में जो बड़ी दलीलें थीं, वो जान लेते हैं.
पहली - लैंड यूज़ में बदलाव का विरोध,
दूसरी - नगर निगम के कानूनों का उल्लंघन
तीसरी- पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन
चौथी दलील- इतने बड़े फैसले में जनता की राय को शामिल ना करना. यानी पब्लिक कंसल्टेशन ना होना, सारे बड़े फैसले सीक्रेटली लेना.
और पांचवां विरोध था कि हेरिटेज कमेटी की पहले से इजाज़त नहीं ली गई थी. नियम और इतिहास क्या कहते हैं? अब ये समझिए कि ये बातें क्यों उठी? अगर देश के किसी आम हिस्से में कुछ बनाना होता तो इतनी बातों का जवाब सरकार को नहीं देना पड़ता, लेकिन ये सेंट्रल विस्टा का मामला है. अब इसमें क्या ख़ास है? दिल्ली के राजपथ पर राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक का एरिया सेंट्रल विस्टा कहलाता है. सेंट्रल विस्टा में करीब 44 बिल्डिंग आती हैं. संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक वगैरह. इसी पूरे ज़ोन को री-प्लान किया जा रहा है -सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत. ये ऐतिहासिक विरासत वाली जगह है. दिल्ली के मास्टर प्लान 1962 में इस जगह के लिए कहा गया था कि ये समृद्ध संस्कृति की आंकाक्षाएं पूरी करने के लिहाज से अहम जगह है. यानी इस जगह पर ऐसे ही कुछ भी तोड़ा, कुछ भी बनाया नहीं जा सकता. अगर कुछ बनाना है तो उस पर स्टडी होगी. ये देखा जाएगा कि अगले कम से कम 25 सालों तक इस जगह की जरूरतें कैसी रहेंगी, कितना ट्रैफिक रहेगा, सीवेज का क्या सिस्टम होगा, फ्लोर एरिया कितना होगा, आदि आदि. सरकार ने क्या किया? इस तरह के रीडेवलपमेंट पर पूरी स्टडी होती है. उसके बाद सेंट्रल विस्टा कमेटी समेत संबंधित विभागों की इजाज़त लेनी होती है, जिनमें पर्यावरण मंत्रालय की एनओसी भी शामिल है. और फिर काम शुरू हो सकता है. मोदी सरकार ने अपने तरीके से इस तरह की औपचारिकताएं पूरी कीं, और उसके बाद सितंबर 2020 में ठेका निकालकर रीडेवलपमेंट का काम टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को दे दिया. आर्किटेक्टर और डिजाइनिंग का काम मिला गुजरात के आर्किटेक्ट विमल पटेल को. इन्होंने ही नए संसद भवन का डिजाइन तैयार किया है. आर्किटेक्चर के मामले में विमल पटेल का बहुत नाम है. गुजरात हाई कोर्ट, IIM अहमदाबाद, IIT जोधपुर, अहमदाबाद का रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट, RBI अहमदाबाद जैसी इमारतों के डिजाइन विमल पटेल ने ही तैयार किए हैं. उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.
बदलाव के बाद कुछ ऐसा दिखेगा सेंट्रल विस्टाअब सरकार अपने इस काम में आगे बढ़ रही थी, और सुप्रीम कोर्ट में इस प्रोजेक्ट पर बहस चल रही थी. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील संजय हेगडे ने दलील रखी कि इस प्रोजेक्ट के लिए जनता की राय ली जानी चाहिए, पब्लिक कंसल्टेशन होना चाहिए. एडवोकेट हेगडे की दलील थी कि जब सुप्रीम कोर्ट भी बनाया गया था, तब भी पब्लिक कंसल्टेशन का मॉडल था. जबकि सेंट्रल विस्टा कमेटी ने इस मॉडल को उस वक्त मंजूरी दे दी, जब देश में लॉकडाउन लगा हुआ था. मीटिंग भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए हुई थी. इस मीटिंग की अध्यक्षता अडिशनल डायरेक्टर जनरल (वर्क्स) कर रहे थे, जिनका अब तक का तजुर्बा सिर्फ सड़कें बनाने का ही रहा है. प्रोजेक्ट की बिड और पर्यावरण के सवाल भी उठे. कोर्ट में सरकार ने क्या कहा? अब इस पर सरकार का पक्ष आता है. एसजी तुषार मेहता ने कहा,
"जो कुछ हो रहा है, वो देश के हित में है, कानून संगत है. ये निर्माण एक पॉलिसी डिसीजन है, जिस पर कोर्ट तब तक रोक नहीं लगा सकती, जब तक मौलिक अधिकारों का हनन न हो रहा हो. प्रोजेक्ट में मौजूदा हेरिटेज भवनों को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. ये म्यूजियम के तौर पर सहेजकर रखे जाएंगे. अगर याचिकाकर्ताओं को पर्यावरण की चिंता है तो मैं भरोसा दिलाना चाहता हूं कि इसका पूरा ख्याल रखा जाएगा."अक्टूबर और नवंबर में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में खूब बहस हुई. 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया. फिर बात आई शिलान्यास की. 7 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को शिलान्यास की अनुमति दे दी. हालांकि कोर्ट ने सरकार को इस बात के लिए लताड़ भी लगाई कि जब कोर्ट में इस पर याचिकाएं लंबित हैं तो आप निर्माण का काम कैसे शुरू कर सकते हैं. तब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अभी हम कोई कंस्ट्रक्शन नहीं करेंगे, कोई तोड़-फोड़ या पेड़ों की कटाई नहीं करेंगे, बस शिलान्यास करेंगे. 10 दिसंबर को शिलान्यास पीएम मोदी ने किया. और फिर इंतजार था सुप्रीम कोर्ट के फैसले का, जो अब आया है. फ़ैसले में क्या कहा गया? फैसला देने वाली बेंच में तीन जज थे. जस्टिन एएम खानविलकर, जस्टिन दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना. फैसले में जस्टिस खानविलकर और जस्टिस माहेश्वरी की एक राय थी. जस्टिन खन्ना की राय इनसे थोड़ी अलग थी. यानी 2-1 से ये फैसला आया. बेंच का बहुमत जिस तरफ होता है, वही कोर्ट का फैसला माना जाता है. कोर्ट ने माना कि विस्टा प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर सेंट्रल विस्टा कमेटी और हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी ने ठीक किया. माने कानूनी रूप से फैसला सही था. कोर्ट ने पर्यावरण समिति की सिफारिशों को भी वैध और न्यायोचित माना है. फैसला पढ़ते हुए जस्टिस खानविलकर ने कहा कि डीडीए का नोटिफिकेशन भी वैलिड और लीगल है. बेंच ने पर्यावरण मंत्रालय से कहा कि भविष्य के जो भी प्रोजेक्ट्स हों, उनमें स्मॉग टावर्स भी लगाए जाने चाहिए. कंस्ट्रक्शन के दौरान स्मॉग गन्स का भी इस्तेमाल होना चाहिए. इन दोनों का इस्तेमाल प्रदूषण को कम करने के लिए होता है. जस्टिस खन्ना का डिसेंट नोट क्या कहता है? ये तो हुई फैसले की बात. अब जस्टिस खन्ना के डिसेंट नोट की बात करते हैं. उन्होंने कहा कि हैरिटेज कंजर्वेशन कमेटी का पहले से अप्रूवअल नहीं लिया गया था, इसलिए इस मामले को दोबारा जनसुनवाई के लिए भेजा जाना चाहिए. जस्टिस खन्ना ने कहा कि जहां तक प्रोजेक्ट के लिए टेंडर जारी करने या मंजूर करने की बात है तो उसमें मैं अपने साथी जजों की बात से सहमत हूं. लेकिन लैंड यूज चेंज करने के पहलू पर मेरा ये मानना है कि ये प्रक्रिया कानून के लिहाज से गलत मानी जाएगी. बैड इन लॉ. जस्टिस खन्ना ने ये भी बताया कि इसे वो बैड इन लॉ क्यों कह रहे हैं. दो बिंदू उन्होंने रखे.
पहला कि पब्लिक के पार्टिसिपेशन के लिए कोई डिस्क्लोज़र नहीं किया गया है.
और दूसरा कि हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी की पहले से अनुमति नहीं ली गई थी.
कोर्ट के फैसले से ना इत्तेफाकी रखने की इजाजत भी हमारा लोकतंत्र देखता है. लेकिन सरकार को इसी फैसले का इंतजार था और अब रीडेवलपमेंट का प्रोसेस शुरू होगा. सबसे पहले 2022 तक नया संसद भवन बनाने का प्लान है. इस मामले में जो भी अपडेट आते जाएंगे, हम आपको देते रहेंगे.

