रईस अपने आने की आहट और न आने के कहीं पहले ही चर्चा और विवादों में रही फिल्म है.रिलीज के ठीक पहले कैलाश विजयवर्गीय का मामला आया. जब ट्रेलर आया. तो एक सीन था.शिया समुदाय के पवित्र अलम-ए-मुबारक के जुलूस के ऊपर से शाहरुख कूद रहे थे. भावनाएंआहत होनी ही थीं. फिल्म में पाकिस्तानी एक्ट्रेस माहिरा खान भी हैं, उसका बवाल अलगहुआ. वहीं शाहरुख, रितेश सिधवानी, फरहान अख्तर और निर्देशक राहुल ढोलकिया को एकसंयुक्त बयान देकर कहना पड़ा था कि फिल्म अब्दुल लतीफ़ शेख की लाइफ पर नहीं बनी है.पर है कौन ये लतीफ़?--------------------------------------------------------------------------------1992 की बात है. अहमदाबाद के एक क्लब के सामने 4 लड़के कार से उतरते हैं. उनके हाथमें स्टेनगन है और एके-47 भी. अंदर घुसकर वो गोलियां चलाना शुरू करते हैं. 5 मिनटगोलियां चलतीं हैं, कुल 9 लोग मारे जाते हैं. वो वापस मारुति में चढ़ते हैं, गायब होजाते हैं. हमला करने वाला ये अब्दुल लतीफ शेख का गिरोह था. वही आदमी जिसके लिए कहागया कि शाहरुख खान की अगली फिल्म बन रही है. रईस. मरने वाला आदमी था हंसराजत्रिवेदी. ये लतीफ के खिलाफ मजबूत होने लगा था. इसलिए उसको मार डाला गया. लेकिन उसरोज हंसराज और उसके लोगों के अलावा 6 बेगुनाह भी मारे गए थे. अब्दुल लतीफ अहमदाबादके दरियापुर इलाके में रहा करता था. उसके घर की हालत ठीक नहीं थी. परिवार बड़ा थाइसलिए घर के सब लोग काम करते. इसी चक्कर में उसकी पढ़ाई भी नहीं हो पाई. कालूपुरओवरब्रिज के पास देशी दारु बेचने से लतीफ ने क्राइम की दुनिया में प्रवेश किया. 70के दशक तक वो छुटभैय्या ही था. फिर वो शराब के धंधे में उतर गया. वो विदेशी शराब कीस्मगलिंग और सप्लाई करता. धीरे-धीरे अहमदाबाद के साथ उसका दबदबा पूरे गुजरात मेंफैल गया. लतीफ का ऐसा भौकाल था कि कोई भी बुटलेगर बिना उसकी मर्जी के शराब नहीं बेचसकता था. उसे शराब लतीफ से ही खरीदनी पड़ती थी. बाद के दिनों में लतीफ ने हथियारस्मगल करने वाले शरीफ खान से जा मिला. अब वो शराब के साथ-साथ हथियारों की भी तस्करीकरने लगा. फिरौती के लिए अपहरण, बंदूक की स्मगलिंग, सुपारी लेकर मर्डर करना यहीउसके काम थे. इसकी कमाई से शहर कोट इलाके में रहने वाले बदमाशों को इकठ्ठा किया.अपनी गैंग बना ली. 1992 आते-आते उसके गैंग में 50 बदमाश थे. 500 छोटे-मोटे गुंडेउसकी मदद करते. उसके गिरोह के पास 4 एके-47 थी. 8 स्टेनगन थी. अर 100 के लगभगऑटोमेटिक- नॉन ऑटोमेटिक हथियार थे. तब गुजरात के पुलिस उपायुक्त कहा करते थे. अगरइसको जल्द ही नहीं रोका गया तो ये अगला दाऊद इब्राहिम बन जाएगा. 1985 में उसनेनिकाय चुनाव में चुनाव लड़ा. पांच सीटों पर. वो भी जेल में रहते हुए. ताज्जुब ये किसारी सीटों पर चुनाव जीत गया. ये अपने में ही बड़ी अजीब सी बात थी. 1992 में लतीफको तड़ीपार कर दिया गया. उसके सिर पर तब तक 8 मर्डर और 24 दूसरे अपराध लग चुके थे.लेकिन अहमदाबाद में उसका आना-जाना बेखटके चलता. वो किसी से नहीं डरता था क्योंकिउसके पीछे मुसलमानों का हाथ था. वो भी बेवजह नहीं. उसने अपनी मसीहाई इमेज बना लीथी. बड़े सलीके से मुसलमानों को बरगलाए रखा. उनकी कमजोरी का फायदा उठाया. दंगों मेंउनकी मदद की. इसीलिए वो उसको संरक्षण देते. बेसिकली वो एक हत्यारा था जिस पर 40 सेज्यादा हत्याओं के केस थे. खुद गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री अमर सिंह चौधरी ने उसकेलिए कहा था कि बड़ी चतुराई से उसने मुसलमानों की कमजोरी को भुनाया है और उनका मसीहाबन बैठा है. लतीफ़ अपने तौर-तरीकों के लिए भी फेमस था. लोग उसे मसीहा तो मानते ही,कुछ उसको 'गुजरात का किंग' कहते. बताते हैं कि वो गुजरात की सड़कों पर 50 की स्पीडसे कार दौड़ाता था. रिवर्स गियर में. उसके बारे में ये किस्सा भी चलता है कि उसके औरदाऊद के बीच गैंगवार चलता था. एक बार लतीफ के आदमियों ने दाऊद को घेर लिया और उसरोज़ दाऊद को गुजरात छोड़कर भागना पड़ा. हालांकि बाद में साल 1995 में वो दिल्ली मेंधरा गया. साबरमती जेल अहमदाबाद में बंद था. वहां से भागने की कोशिश की और मारा गया.