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क्या 'कर्नाटक स्कूल ऑफ़ बैटिंग' भारतीय क्रिकेट का भविष्य है?

कर्नाटक का क्रिकेट. एक समय था जब बॉलर निकाल रहा था. आज-कल बैट्समैन उगल रहा है.

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27 मई 2016 (अपडेटेड: 27 मई 2016, 08:35 AM IST)
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'स्कूल ऑफ़ बैटिंग', भारतीय क्रिकेट के इतिहास में ये बात बम्बई के लिए ही कही जाती रही है. आज़ाद मैदान और शिवाजी पार्क को टेस्ट क्रिकेट की नर्सरी कहा जाता था और सत्तर-अस्सी के सालों में भारत के टेस्ट बल्लेबाजी लाइनअप के ऊपर इस समन्दर पर बसे एकरेखीय शहर का दबदबा था. फिर नब्बे का दौर आया आया और 'मुंबई स्कूल ऑफ़ बैटिंग' इकठ्ठा होकर एक ही खिलाड़ी के नाम में घनीभूत हो गया - सचिन रमेश तेंदुलकर. नई सदी में देश की राजधानी वीरेन्दर सहवाग ने सचिन की शास्त्रीयता में थोड़ी उद्दंडता मिलाई और गौतम गंभीर ने गांगुली की बेपरवाह बैकलिफ्ट में एकाग्र दक्षता. सचिन और द्रविड़ की बल्लेबाजी को परदे पर देख बड़े हुए आज के सितारे शिखर धवन और विराट कोहली आज भी उन्हें अपना हीरो मानते हैं, लेकिन बल्लेबाज़ी अपने मन की करते हैं.
नई सदी में भारतीय टेस्ट बल्लेबाजी ने अपना अघोषित स्वर्णकाल देखा. बैंगलोर के द्रविड़ ने कोलकाता के गांगुली, हैदराबाद के लक्ष्मण अौर मुम्बई के सचिन के साथ मिलकर बल्लेबाज़ी का 'फैब फोर' बनाया, जिसे नज़फगढ़ के सहवाग ने मिलकर 'फेमस फाइव' में बदल दिया. लेकिन ये पांच बल्लेबाज़ भर नहीं थे. इन सभी की अलग बैटिंग स्टाइल रही जिसका फायदा भारतीय टीम ने एक बहुमुखी बल्लेबाजी लाइनअप बनाने में उठाया. अब खबर में 'मुम्बई स्कूल अॉफ बैटिंग' नहीं थी. खेल, टीम अौर देश बहुमुखी हो रहा था.
इधर एक नई चीज़ सुनने में आई है. फेसबुक पर हमारे दोस्त अनुराग वत्स ने 'कर्नाटक स्कूल अॉफ बैटिंग' के उभार का ज़िक्र किया है. आधार - इस आईपीएल में विभिन्न टीमों से खेलने वाले कर्नाटक के बल्लेबाज़ अच्छा कर रहे हैं. अनुराग लिखते हैं, 'मयंक अग्रवाल को छोड़कर कर्नाटक का हर बल्लेबाज़ आइपीएल 9 में बहुत अच्छा कर रहा है. करुण नायर अौर के एल राहुल ने छोटे फॉर्मेट में अपनी (छुपी हुई) आक्रामक शैली दिखा दी है. राहुल तो पहले ही टेस्ट में खुद को सबित कर चुके हैं, अौर नायर भी टेस्ट कॉल से ज़्यादा दूर नहीं लगते. रॉबिन उथ्प्पा अौर मनीष पांडे भी केकेआर के लिए अच्छा कर रहे हैं. पांडे तो भारत की सीमित अोवर टीम का हिस्सा भी हैं अौर उनकी अॉस्ट्रेलिया में खेली मैच जिताऊ पारी की याद अभी तक हमारे जेहन में ताजा है.' कौन हैं ये बल्लेबाज़, जो कर्नाटक को भारतीय बल्लेबाजी के लिए उम्मीद भरा ठिकाना बना रहे हैं? के एल राहुल को हम सब टेस्ट पिच पर देख चुके हैं. आज वे इस कर्नाटक की इस युवा बल्लेबाजी यूनिट का सबसे चमकता नाम हैं. हम भारतीय वैसे ही सेंचुरी के फैन हैं, लेकिन अॉस्ट्रेलिया में सेंचुरी तो स्वर्णधूल है.  सिडनी में अपने दूसरे ही टेस्ट में सेंचुरी मारकर राहुल ने यही स्वर्णधूल कमायी है.  इस आईपीएल में उन्होंने अपना दूसरा रंग दिखाया है अौर विराट कोहली, डिविलियर्स अौर क्रिस गेल के समकक्ष खेलते हुए 147 की स्ट्राइक रेट से 386 रन बना चुके हैं. करुण नायर भी इसी तरह रणजी में चमत्कारिक प्रदर्शन के साथ टेस्ट की दावेदारी में आए. उनके नाम रणजी नॉकआउट में तीन लगातार मैचों में सेंचुरी लगाकर टीम को चैम्पियनशिप जीत दिलाने का श्रेय जाता है.  लेकिन इस आईपीएल में उनकी हैदराबाद के खिलाफ खेली गई 59 गेंद पर 83 रन की पारी ने उन्हें एकदम चर्चाअों में ला दिया. आखिरी गेंद पर दिल्ली को जीत दिलाकर वे अचानक सीमित अोवर क्रिकेट के संभावित दावेदार बन गए. चंद ही दिन बाद उन्हें इसका इनाम भी मिला, जब उन्हें ज़िम्बाबवे के खिलाफ भारतीय टीम में चुन लिया गया. मनीष पांडे आईपीएल में पहले भारतीय के रूप में शतक बनाकर चमके थे. फिर रास्ते में कुछ अंधेरे मोड़ आए. लेकिन उनका सिडनी का एकदिवसीय शतक उन्हें भारतीय टीम का हिस्सा बना गया. इन सबके साथ खड़े बल्ले से खेलने वाले वापसी के लिए संघर्षरत रॉबिन उथप्पा तो हैं ही. केकेआर के लिए उनकी अोपनिंग टीम को काफ़ी आगे तक लेकर आई.
इन्हीं सब नामों को मिलाकर आज कई क्रिकेट विशेषज्ञ कर्नाटक में भारतीय बल्लेबाजी का भविष्य देख रहे हैं. जैसे नब्बे के दशक में भारतीय गेंदबाजी 'कर्नाटक अटैक' बन गई थी, इस बल्लेबाजी की बहुमुखी युवा प्रतिभा उम्मीद जगा रही है.
वटवृक्ष की छांव में बड़े होने वाले हर पौधे के ऊपर उसकी छांव होती है. कर्नाटक की क्रिकेट में बल्लेबाज़ी का ऐसा ही एक वटवृक्ष बीस साल पहले उगा था. नाम था राहुल द्रविड़. राहुल द्रविड़ के चाहनेवाले जानते हैं द्रविड़ खुद अपनी पूरी उमर खेल के महानायक सचिन की छाया में खेले. लेकिन बाद के सालों में खुद उनकी बल्लेबाज़ी का कल्ट उजला ही उजला होता गया. खासकर टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाज़ी के टिकाऊपन अौर अचूक तकनीक के संदर्भ में द्रविड़ का नाम लिया जाना अनिवार्य हो गया. लेकिन इसका एक स्थानीय असर भी है. कर्नाटक के उनकी बाद की पीढ़ी के बल्लेबाज़ों में दर्शक राहुल द्रविड़ का अक्स देखने लगे. यह संयोग नहीं है कि कर्नाटक के रॉबिन उथप्पा अौर के एल राहुल दोनों ने ही बल्लेबाजी के साथ विकेटकीपिंग को अपना हथियार बनाया. इसका उन्हें फायदा भी हुआ. जैसा अनुराग हालिया आईपीएल के संदर्भ में लिखते हैं, 'खास बात ये है कि राहुल इस दौरान आरसीबी के लिए कीपिंग भी करते रहे अौर उन्होंने टीम को एक एक्स्ट्रा बल्लेबाज के साथ खेलने का मौका दिया. उस दिन के लिए जब टीम के 'फेमस फोर' बल्लेबाजों की फॉर्म एक साथ छुट्टी पर हो.'
लेकिन द्रविड़ की छांव ने कई कर्नाटक के बल्लेबाजों को प्राथमिक रूप से 'टेस्ट बल्लेबाज' होने का तमगा भी दिया, ऐसा तमगा जिसका आज के समय खिलाड़ी के लिए नकारात्मक असर भी हो जाता है. चेतेश्वर पुजारा का उदाहरण सामने है. के एल राहुल ने यह खतरा सबसे ज़्यादा झेला है. इसलिए उनका इस आईपीएल में चमकना, अौर वो भी एक आक्रामक बल्लेबाज़ के रूप में, बहुत अच्छी बात है. वैसे भी विराट कोहली ने यह साबित किया है कि सीमित अोवर क्रिकेट में आक्रामक होने के लिए गैर-पारंपरिक शॉट लगाना ही अकेला रास्ता नहीं. बल्लेबाज पूरी शास्त्रीयता से खेलते हुए भी विपक्षी के धुर्रे बिखेर सकता है.
इस 'कर्नाटक स्कूल ऑफ़ बैटिंग' की सबसे अच्छी बात ये है की इसने चराचर जगत में अपना नाम और लोकप्रियता भले ही आईपीएल सीज़न से कमाई हो, इनका आधार ठोस प्रथम श्रेणी के प्रदर्शन हैं. बीते पांच सालों में कर्णाटक रणजी ट्रॉफ़ी की सबसे मज़बूत टीम बनकर उभरी है. रणजी ही नहीं, इसने बैक टू बैक ईरानी ट्रॉफी भी जीती और एकदिवसीय की विजय हजारे ट्रॉफी भी. ऐसा निरंतरता वाला रिकॉर्ड बीते पांच साल में और किसी प्रथम श्रेणी टीम का नहीं रहा. इसका आधार करुण नायर, के एल राहुल, मनीष पांडे अौर रॉबिन उथप्पा जैसे बल्लेबाजों का प्रदर्शन रहा है.
यहां एक बात अौर नोट करने की है. 'कर्नाटक स्कूल अौर बैटिंग' कहने से इसे एक खास बैटिंग शैली से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. टीम हमेशा भिन्न किस्म के बल्लेबाजों को मिलाकर बनती है अौर तभी उसमें एक सम्पूर्णता आती है. यहां एक ही टीम के खिलाड़ी होने की वजह से ये बल्लेबाज़ भिन्न एप्रोच टीम में लेकर आते हैं. दरअसल ये बल्लेबाज साथ खेलने पर एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं.
इसके अलावा आजकल आईपीएल के चलते भिन्न टीमों के खिलाड़ी साथ खेलने लगे हैं. मुम्बई के अजिंक्य रहाणे की बल्लेबाजी पर राहुल द्रविड़ का असर - वे राजस्थान रॉयल्स में उनके कप्तान रहे, साफ़ देखा जा सकता है. रोहित शर्मा अौर अजिंक्य रहाणे एक ही टीम का हिस्सा हैं, लेकिन भिन्न किस्म के बल्लेबाज हैं. इन तमाम बल्लेबाजों ने खाली मैदानों अौर मुश्किल पिचों पर पांच दिन के मैचों में खूब पसीना बहाया है. विश्वास कर सकते हैं कि इनका आईपीएल में किया उम्दा प्रदर्शन टिकेगा, कुछ अन्य आईपीएल सितारों की तरह अगरबत्ती के धुएं की तरह उड़ नहीं जाएगा.  दूसरी अच्छी बात है कि एक रॉबिन उथप्पा को छोड़कर इन युवाअों की उम्र अभी चौबीस-पच्चीस ही है. याने अगर ये भारतीय टीम में जमे तो आगे कई सालों तक टीम का हिस्सा रहेंगे. भविष्य की टीम की रूपरेखा इन नामों को नज़र में रख बनाई जा सकती है.

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