वो बातें, जिनसे पता चल जाता है कि शाहरुख़ सलमान में से कौन बेस्ट है
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध...
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फोटो - thelallantop
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कल्ट क्या होता है? परिभाषाएं छोड़िये, उदहारण देखिए –

क्रांति मखमल की सेज़ नहीं है. (फ़िदेल)

यदा यदा ही धर्मस्यः

मेरा सपना है कि एक दिन हर एक घाटी भर जाएगी, हर एक पहाड़ बौना हो जाएगा और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ सपाट हो जाएंगे. तब ईश्वर की महिमा प्रकट होगी और सभी इंसान उसे एक साथ देखेंगे. (मार्टिन लूथर किंग जूनियर)

क्रूर नेता उन नए नेताओं से प्रतिस्थापित हो जाते हैं जो बाद में क्रूर बन जाते हैं. (चे ग्वेरा)

तेरी बाहों में मर जाएं हम!

दोस्तों न कोई साथी है न मंजिल, फिर भी निकल पड़ा हूं...
सलमान खान. शाहरुख़ खान. दो कल्ट. दरअसल सफ़लताओं की दो अलहदा कहानियां. दो कहानियां जिसके कई किरदार एक ही हैं. दो कहनियां जिसके नायक भी कभी एक से हैं तो कभी अलग-अलग.
सलमान खान. शाहरुख़ खान. जो 2018 तक आते-आते अपना एक यूनिक ऑरा बना चुके हैं. यूं दोनों में दस अंतर ढूंढना उनके फैंस तो क्या अब एक आम इंसान के लिए भी मुश्किल नहीं है.
सलमान खान. शाहरुख़ खान. जिनको कल्ट बनाती है, उनकी फैन फोलोइंग.

स्ट्रगल वाले दिन
दोनों के शुरुआती कैरियर की बात की जाए तो देश, काल और परिस्थिति तीनों ही इतनी अलग थीं कि तुलना करना ऐसा लगता है जैसे संतरे और सेब की तुलना करना.
मुंबई का सलमान, शाहरुख़ से कहीं पहले ही स्टार बन चुका था. ‘मैंने प्यार किया’ से भी पहले. ‘बीवी हो तो ऐसी’ से भी पहले. बल्कि पैदा होने से भी पहले. यही स्टार पुत्र-पुत्रियों का एडवांटेज़ है, अब तैमूर को ही ले लीजिए.
दूसरी तरफ दिल्ली के लौंडे शाहरुख़ का कैरियर ‘ऋतु आए फल होवे’ की तर्ज़ पर धीरे-धीरे नरिश हुआ. बिल्कुल बेसिक से. नुक्कड़ नाटक. टीवी कलाकार. टीवी कलाकार में लीड रोल. फ़िल्म. फ़िल्मी विलेन और फिर कहीं जाकर नाम से पहले ‘दी’ लगा – ‘दी शाहरुख़ खान’.
यूं शाहरुख़ और सलमान के बीच का अंतर, कुछ-कुछ मुहम्मद रफ़ी और किशोर के अंतर सरीखा लगता है.

शाहरुख़ और सलमान की पहली सफल फ़िल्में - मैंने प्यार किया, बाज़ीगर
शाहरुख़ की सफलता कोई रिवॉल्यूशन नहीं इवॉल्यूशन सरीखी थी. एक पुरानी ‘मच्योर्ड’ व्हिस्की सी धीरे-धीरे परवान चढ़ी. और जब चढ़ गई तो उतरी नहीं. उधर सलमान की सफलता वोडका शॉट्स सरीखी. झट से चढ़े और झट से उतर जाए. लेकिन उतरते-उतरते सफलता का दूसरा बॉटम्स अप तैयार. तो नशा वहां भी लगातार बना रहता.
इसलिए शाहरुख़ के ‘प्रोमिनेंट’ कमबैक नहीं दिखेंगे. सलमान के दिखेंगे. ऐसे कि आप उनपर उंगली लगा कर बता सकते हो.
शाहरुख़ ‘ग्रे-शेड’ में भी शाहरुख़ था. शाहरुख़ ‘कॉलेज रोमांस’ में भी शाहरुख़ था. शाहरुख़ उससे पहले भी शाहरुख़ था, शाहरुख़ उसके बाद भी शाहरुख़ रहा.
दूसरी तरफ ‘हम आपके हैं कौन’ वाला सलमान कोई और था और ‘प्यार किया तो डरना क्या’ वाला सलमान कोई और. ‘तेरे नाम’ वाले सलमान और ‘बजरंगी भाईजान’ वाले सलमान भला एक ही शख्स हो सकते हैं क्या? नहीं न. ऐसा लगता था कि ‘मैंने प्यार क्यूं किया’ वाला सलमान ‘मैंने प्यार किया’ वाले सलमान की मज़ाक उड़ा रहा है. ऐसा लगता कि दोनों एक दूसरे के राइवल हैं.

'अवतारी' पुरुष
ये मेकओवर सलमान के ही बस का था, या सलमान के ही हिस्से था.
सलमान एक बैड बॉय था, इसलिए उसे ‘बैड बॉयज़’ का ‘प्रेम’ मिला. जबकि शाहरुख़ की शैतानियां भी कूल से लेकर क्यूट के स्पेक्ट्रम में आती थीं, इसलिए वो लड़कियों के दिल में ‘राज’ करने लगा. इस प्रेम और राज के बीच का ही अंतर सलमान और शाहरुख़ के बीच का अंतर है. शाहरुख़ तमाम ‘बुराइयों’ के बावज़ूद रोमेंटिक था. सलमान तमाम रोमांस के बावज़ूद ‘बुरा’ था.
अर्ली नाइंटी. वो लिबरलाइजेशन का काल था. स्वप्न का काल. रेनेसां के इंतज़ार का काल. उम्मीदों और आशाओं का काल.
उसी दौरान दो सालों में दो डॉक्यूमेंट्रीज़ आईं – एक थी भारत की विवाह परंपरा के ऊपर और दूसरा था एक ट्रेवल ब्लॉग. एक का नाम था – ‘हम आपके हैं कौन’. दूसरे का नाम था – ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’.
वो बड़े-बड़े सेट्स और विदेशी लोकेशंस का काल था.
ये मज़े की बात है कि ‘दिलवाले...’ के बावज़ूद शाहरुख़ की छवि एक ‘मध्यमवर्गीय’ एक्टर की थी. उसकी तुलना अमोल पालेकर से की गई. वहीं ‘हम आपके...’ जैसी फैमिली मूवी के बावज़ूद सलमान ‘केसिनोवा’ टाइप.

हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे.
विलेन और एंटी हीरो के रोल से अपनी पहचान बनाने वाला शाहरुख़ – मैरिज मेटेरियल और ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम साथ साथ हैं’ और ‘हम आपके हैं कौन’ वाला सलमान – कैसेनोवा.

माया मेम'साब
शाहरुख़ ‘क्लासेज़’ की सबसे नीची सीढ़ी में आते थे. उनसे ऊपर नसीर जैसे कलाकार थे. सलमान ‘मासेज़’ की सबसे ऊंची सीढ़ी में आते थे. उनके नीचे जैकी श्रॉफ जैसे कलाकार थे. शाहरुख़ ने बहुत कम आर्ट मूवीज़ कीं मगर कीं – माया मेम’साब, पहेली. लेकिन, सलमान कमोबेश कॉमर्शियल बने रहे.
शाहरुख़ जब ‘दिलवाले...’ में बियर चुरा रहे होते थे तब भी क्यूट लगते थे. जबकि अभी कुछ समय पहले ही डर, बाज़ीगर और अंजाम में एंटी-हीरो बन चुके थे.
उधर सलमान जब बंधन में कहते कि जो जीजाजी करेंगे मैं वो करूंगा, तो लगता कि कोई ‘मुन्नाभाई’ गांधीगिरी कर रहा हो.
‘तेरे नाम’ और ‘हम दिल दे चुके सनम’ दोनों ही में हारा हुआ सलमान भी ‘बेडेस’ सलमान है. लेकिन ‘यस बॉस’ और ‘राजू बन गया...’ का मतलबी शाहरुख़ भी, ‘ओह सो क्यूट’ है!
यूं जो वे फिल्मों में कर रहे थे, उसकी लगभग उल्टी इमेज रियल में बन रही थी. यही ‘ऑल्टर इगो’ था. यही ‘यिन येंग’ था.
सलमान कला पक्ष थे, अपने ‘होने’ की कमाते थे. शाहरुख़ भावपक्ष थे, अपने ‘करने’ की खाते थे.

दोनों संजय लीला भंसाली की नज़रों से
मैंने गौर किया है कि विशाल भारद्वाज और इम्तियाज़ अली दोनों ही ‘औरतों’ को समझने में और उसको पोट्रेट करने में माहिर हैं. लेकिन जहां विशाल विमेन साइकॉलजी के विशेषज्ञ हैं वहीं इम्तियाज़ विमेन फिलोसोफी. विशाल की फिल्मों की औरतों को देखकर औरों को लगता है हां औरतें ऐसी ही होती हैं. वहीं इम्तियाज़ की फिल्मों की औरतों को देखकर खुद को लगता है – अरे ऐसी ही तो हूं मैं.
मैं ये बात शाहरुख़ और सलमान के ‘ललित निबंध’ के बीच में इसलिए लेकर आ रहा हूं क्यूंकि सलमान और शाहरुख के साथ भी ऐसा ही है. लोग शाहरुख़ से प्रेम करते हैं, लेकिन सलमान सा बनना चाहते हैं. सलमान सा बनना पुरुषों के लिए आसान है, शाहरुख़ से प्रेम करना स्त्रियों के लिए आसान है. इसलिए ही मैंने देखा है ‘जेंडर वाइज़’ भी दोनों की फैन फोलोइंग में अंतर है.
शाहरुख़ के फैंस शाहरुख़ को ‘चाहते’ हैं सलमान के फैंस सलमान ‘बनना चाहते’ हैं.
सलमान की बॉडी, सलमान की हेयर स्टाइल, सलमान का ब्रेसलेट....
लेकिन शाहरुख के केस में ‘कोजिटो एर्गो सम’...
यानी शाहरुख़ एक सोच है, इसलिए वो शाहरुख़ है. शाहरुख़ हुआ नहीं जा सकता, बस शाहरुख़ से प्रेम किया जा सकता है.
और यूं शाहरुख को प्रेम करने वाले ज्ञान मार्ग में चले. सलमान को प्रेम करने वाले भक्ति मार्ग में – रांझा रांझा करदी नीं मैं आप्पे रांझा होई.

लव हेट रिलेशनशिप
शाहरुख़ रिस्क लेते रहते थे लेकिन फिर भी उनका कैरियर ज़्यादा स्टेबल लगा. सलमान ‘सेफ प्ले’ करते थे लेकिन फिर भी उनका कैरियर ज़्यादा उतार चढ़ाव भरा रहा.
शाहरुख़ और सलमान दोस्त थे, दोस्त हैं. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. ‘चुपके-चुपके’ के सेट में दोनों की हाथापाई रिश्तों में खटाई की तरह थी.
आप की अदालत में एक बार सलमान ने कहा भी था कि हमारे परिवार के रिश्ते अच्छे हैं. वे मिलते जुलते रहते हैं. लेकिन परिवार के दो बच्चे जैसे एक दूसरे से बात नहीं करते, वही स्थिति है.
शाहरुख़ को देखकर लगता है कि अगर वो एक्टर नहीं होते तो बिज़नसमैन होते. वहीं सलमान को देखकर कहा जा सकता है कि अगर वो एक्टर न होते तो स्पोर्ट्समेन होते. लेकिन है जस्ट-अपोज़िट. वही ‘यिन येंग’. शाहरुख़ जब तक चोटिल न हुए थे, तब तक खेल को अपना कैरियर बनाना चाहते थे. इधर सलमान बीइंग ह्यूमन ब्रांड के कर्ताधर्ता हैं.
शाहरुख़ दिल्ली हैं, सलमान मुंबई. शाहरुख़ सफलता हैं, सलमान परंपरा. शाहरुख़ फैमिली हैं, सलमान बैचलर...

शाहरुख़ आगे हैं, सलमान ऊंचे हैं. कैरियर ग्राफ के मामले में जस्ट उल्टा है.
शाहरुख़ आजकल अपनी ही सफलता के मुकाबले छोटे लगने लगे हैं, या उनकी सफलताएं उनसे बड़ी हो गईं हैं. ज़ीरो में उनका किरदार का साइज़ फ़िल्म इंडस्ट्री में उनके इस समय के कद को रिप्रेजेंट करता सा लगता है. होने को तुलना की बात की जाए तो जहां इस एक सीन में सलमान लंबा है लेकिन शाहरुख़ आगे खड़ा है, वहीं कैरियर में सलमान आगे है और शाहरुख़ का कद लंबा है.
शाहरुख़ जो कहते थे कि मेरा कंपटीशन खुद अपने आप से है, यकीनन अपनी ही सफलता के मुकाबले बौने लगने लगे हैं इसलिए ही तो वो कभी ‘फैन’ तो कभी ‘बिल्लू बार्बर’ में खुद का किरदार करते हुए नज़र आते हैं. लगता है कि उनको उठना है तो किसी शाहरुख़ की ही हेल्प लेनी पड़ेगी.
सलमान और शाहरुख़ चाहे कितने ही बड़े दोस्त या दुश्मन हों लेकिन उनके फैंस हमेशा तलवारे ताने खड़े रहते हैं. उनके बीच कभी दोस्ती संभव नहीं है. और उन सबको पता है कि ये दौड़ का अंतिम लैप है और हर लैप में आगे रहने वाले शाहरुख़ इस लैप में हांफ रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि अब उनको थ्री सिक्सटी डिग्री मेकओवर की ज़रूरत है. क्या ये भी एक संयोग नहीं कि 360 डिग्री और ‘ज़ीरो’ डिग्री एक ही होता है. क्या ये ‘ज़ीरो’ शाहरुख़ को वापस रेस में ला पाएगी. क्या रोहित शेट्टी, इम्तियाज़ अली जो नहीं कर पाए वो आनंद एल राय कर पाएंगे?
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# लाखों नेताओं के बावज़ूद फ़िदेल कास्त्रो के कंधे पर बैठे कबूतर वाली फोटो कल्ट है.

क्रांति मखमल की सेज़ नहीं है. (फ़िदेल)
# तैंतीस करोड़ देवी देवताओं के बावज़ूद केवल कृष्ण का विराट रूप कल्ट है.

यदा यदा ही धर्मस्यः
# रोज़ सुने जाने वाले भाषणों के बीच मार्टिन लूथर किंग का आई हेव अ ड्रीम कल्ट है.

मेरा सपना है कि एक दिन हर एक घाटी भर जाएगी, हर एक पहाड़ बौना हो जाएगा और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ सपाट हो जाएंगे. तब ईश्वर की महिमा प्रकट होगी और सभी इंसान उसे एक साथ देखेंगे. (मार्टिन लूथर किंग जूनियर)
# दसियों क्रांति पुरुषों के बावज़ूद केवल चे ग्वेरा कल्ट है.

क्रूर नेता उन नए नेताओं से प्रतिस्थापित हो जाते हैं जो बाद में क्रूर बन जाते हैं. (चे ग्वेरा)
# हज़ारों भाव-भंगिमाओं के बीच एक विशेष कैमरा एंगल से लिया गया शाहरुख़ का हाथ फैलाने वाला सीन कल्ट है.

तेरी बाहों में मर जाएं हम!
# ढेरों बेहतरीन कोरियोग्राफ्ड गीतों के रहते भी फटी जींस पहने और ‘टॉपलेस’ सलमान खान का ‘ओ, ओ, जानेजाना’ गीत का डांसिंग स्टेप कल्ट है.

दोस्तों न कोई साथी है न मंजिल, फिर भी निकल पड़ा हूं...
सलमान खान. शाहरुख़ खान. दो कल्ट. दरअसल सफ़लताओं की दो अलहदा कहानियां. दो कहानियां जिसके कई किरदार एक ही हैं. दो कहनियां जिसके नायक भी कभी एक से हैं तो कभी अलग-अलग.
सलमान खान. शाहरुख़ खान. जो 2018 तक आते-आते अपना एक यूनिक ऑरा बना चुके हैं. यूं दोनों में दस अंतर ढूंढना उनके फैंस तो क्या अब एक आम इंसान के लिए भी मुश्किल नहीं है.
सलमान खान. शाहरुख़ खान. जिनको कल्ट बनाती है, उनकी फैन फोलोइंग.

स्ट्रगल वाले दिन
दोनों के शुरुआती कैरियर की बात की जाए तो देश, काल और परिस्थिति तीनों ही इतनी अलग थीं कि तुलना करना ऐसा लगता है जैसे संतरे और सेब की तुलना करना.
मुंबई का सलमान, शाहरुख़ से कहीं पहले ही स्टार बन चुका था. ‘मैंने प्यार किया’ से भी पहले. ‘बीवी हो तो ऐसी’ से भी पहले. बल्कि पैदा होने से भी पहले. यही स्टार पुत्र-पुत्रियों का एडवांटेज़ है, अब तैमूर को ही ले लीजिए.
दूसरी तरफ दिल्ली के लौंडे शाहरुख़ का कैरियर ‘ऋतु आए फल होवे’ की तर्ज़ पर धीरे-धीरे नरिश हुआ. बिल्कुल बेसिक से. नुक्कड़ नाटक. टीवी कलाकार. टीवी कलाकार में लीड रोल. फ़िल्म. फ़िल्मी विलेन और फिर कहीं जाकर नाम से पहले ‘दी’ लगा – ‘दी शाहरुख़ खान’.
यूं शाहरुख़ और सलमान के बीच का अंतर, कुछ-कुछ मुहम्मद रफ़ी और किशोर के अंतर सरीखा लगता है.

शाहरुख़ और सलमान की पहली सफल फ़िल्में - मैंने प्यार किया, बाज़ीगर
शाहरुख़ की सफलता कोई रिवॉल्यूशन नहीं इवॉल्यूशन सरीखी थी. एक पुरानी ‘मच्योर्ड’ व्हिस्की सी धीरे-धीरे परवान चढ़ी. और जब चढ़ गई तो उतरी नहीं. उधर सलमान की सफलता वोडका शॉट्स सरीखी. झट से चढ़े और झट से उतर जाए. लेकिन उतरते-उतरते सफलता का दूसरा बॉटम्स अप तैयार. तो नशा वहां भी लगातार बना रहता.
इसलिए शाहरुख़ के ‘प्रोमिनेंट’ कमबैक नहीं दिखेंगे. सलमान के दिखेंगे. ऐसे कि आप उनपर उंगली लगा कर बता सकते हो.
शाहरुख़ ‘ग्रे-शेड’ में भी शाहरुख़ था. शाहरुख़ ‘कॉलेज रोमांस’ में भी शाहरुख़ था. शाहरुख़ उससे पहले भी शाहरुख़ था, शाहरुख़ उसके बाद भी शाहरुख़ रहा.
दूसरी तरफ ‘हम आपके हैं कौन’ वाला सलमान कोई और था और ‘प्यार किया तो डरना क्या’ वाला सलमान कोई और. ‘तेरे नाम’ वाले सलमान और ‘बजरंगी भाईजान’ वाले सलमान भला एक ही शख्स हो सकते हैं क्या? नहीं न. ऐसा लगता था कि ‘मैंने प्यार क्यूं किया’ वाला सलमान ‘मैंने प्यार किया’ वाले सलमान की मज़ाक उड़ा रहा है. ऐसा लगता कि दोनों एक दूसरे के राइवल हैं.

'अवतारी' पुरुष
ये मेकओवर सलमान के ही बस का था, या सलमान के ही हिस्से था.
सलमान एक बैड बॉय था, इसलिए उसे ‘बैड बॉयज़’ का ‘प्रेम’ मिला. जबकि शाहरुख़ की शैतानियां भी कूल से लेकर क्यूट के स्पेक्ट्रम में आती थीं, इसलिए वो लड़कियों के दिल में ‘राज’ करने लगा. इस प्रेम और राज के बीच का ही अंतर सलमान और शाहरुख़ के बीच का अंतर है. शाहरुख़ तमाम ‘बुराइयों’ के बावज़ूद रोमेंटिक था. सलमान तमाम रोमांस के बावज़ूद ‘बुरा’ था.
अर्ली नाइंटी. वो लिबरलाइजेशन का काल था. स्वप्न का काल. रेनेसां के इंतज़ार का काल. उम्मीदों और आशाओं का काल.
उसी दौरान दो सालों में दो डॉक्यूमेंट्रीज़ आईं – एक थी भारत की विवाह परंपरा के ऊपर और दूसरा था एक ट्रेवल ब्लॉग. एक का नाम था – ‘हम आपके हैं कौन’. दूसरे का नाम था – ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’.
वो बड़े-बड़े सेट्स और विदेशी लोकेशंस का काल था.
ये मज़े की बात है कि ‘दिलवाले...’ के बावज़ूद शाहरुख़ की छवि एक ‘मध्यमवर्गीय’ एक्टर की थी. उसकी तुलना अमोल पालेकर से की गई. वहीं ‘हम आपके...’ जैसी फैमिली मूवी के बावज़ूद सलमान ‘केसिनोवा’ टाइप.

हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे.
विलेन और एंटी हीरो के रोल से अपनी पहचान बनाने वाला शाहरुख़ – मैरिज मेटेरियल और ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम साथ साथ हैं’ और ‘हम आपके हैं कौन’ वाला सलमान – कैसेनोवा.

माया मेम'साब
शाहरुख़ ‘क्लासेज़’ की सबसे नीची सीढ़ी में आते थे. उनसे ऊपर नसीर जैसे कलाकार थे. सलमान ‘मासेज़’ की सबसे ऊंची सीढ़ी में आते थे. उनके नीचे जैकी श्रॉफ जैसे कलाकार थे. शाहरुख़ ने बहुत कम आर्ट मूवीज़ कीं मगर कीं – माया मेम’साब, पहेली. लेकिन, सलमान कमोबेश कॉमर्शियल बने रहे.
शाहरुख़ जब ‘दिलवाले...’ में बियर चुरा रहे होते थे तब भी क्यूट लगते थे. जबकि अभी कुछ समय पहले ही डर, बाज़ीगर और अंजाम में एंटी-हीरो बन चुके थे.
उधर सलमान जब बंधन में कहते कि जो जीजाजी करेंगे मैं वो करूंगा, तो लगता कि कोई ‘मुन्नाभाई’ गांधीगिरी कर रहा हो.
‘तेरे नाम’ और ‘हम दिल दे चुके सनम’ दोनों ही में हारा हुआ सलमान भी ‘बेडेस’ सलमान है. लेकिन ‘यस बॉस’ और ‘राजू बन गया...’ का मतलबी शाहरुख़ भी, ‘ओह सो क्यूट’ है!
यूं जो वे फिल्मों में कर रहे थे, उसकी लगभग उल्टी इमेज रियल में बन रही थी. यही ‘ऑल्टर इगो’ था. यही ‘यिन येंग’ था.
सलमान कला पक्ष थे, अपने ‘होने’ की कमाते थे. शाहरुख़ भावपक्ष थे, अपने ‘करने’ की खाते थे.

दोनों संजय लीला भंसाली की नज़रों से
मैंने गौर किया है कि विशाल भारद्वाज और इम्तियाज़ अली दोनों ही ‘औरतों’ को समझने में और उसको पोट्रेट करने में माहिर हैं. लेकिन जहां विशाल विमेन साइकॉलजी के विशेषज्ञ हैं वहीं इम्तियाज़ विमेन फिलोसोफी. विशाल की फिल्मों की औरतों को देखकर औरों को लगता है हां औरतें ऐसी ही होती हैं. वहीं इम्तियाज़ की फिल्मों की औरतों को देखकर खुद को लगता है – अरे ऐसी ही तो हूं मैं.
मैं ये बात शाहरुख़ और सलमान के ‘ललित निबंध’ के बीच में इसलिए लेकर आ रहा हूं क्यूंकि सलमान और शाहरुख के साथ भी ऐसा ही है. लोग शाहरुख़ से प्रेम करते हैं, लेकिन सलमान सा बनना चाहते हैं. सलमान सा बनना पुरुषों के लिए आसान है, शाहरुख़ से प्रेम करना स्त्रियों के लिए आसान है. इसलिए ही मैंने देखा है ‘जेंडर वाइज़’ भी दोनों की फैन फोलोइंग में अंतर है.
शाहरुख़ के फैंस शाहरुख़ को ‘चाहते’ हैं सलमान के फैंस सलमान ‘बनना चाहते’ हैं.
सलमान की बॉडी, सलमान की हेयर स्टाइल, सलमान का ब्रेसलेट....
लेकिन शाहरुख के केस में ‘कोजिटो एर्गो सम’...
यानी शाहरुख़ एक सोच है, इसलिए वो शाहरुख़ है. शाहरुख़ हुआ नहीं जा सकता, बस शाहरुख़ से प्रेम किया जा सकता है.
और यूं शाहरुख को प्रेम करने वाले ज्ञान मार्ग में चले. सलमान को प्रेम करने वाले भक्ति मार्ग में – रांझा रांझा करदी नीं मैं आप्पे रांझा होई.

लव हेट रिलेशनशिप
शाहरुख़ रिस्क लेते रहते थे लेकिन फिर भी उनका कैरियर ज़्यादा स्टेबल लगा. सलमान ‘सेफ प्ले’ करते थे लेकिन फिर भी उनका कैरियर ज़्यादा उतार चढ़ाव भरा रहा.
शाहरुख़ और सलमान दोस्त थे, दोस्त हैं. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. ‘चुपके-चुपके’ के सेट में दोनों की हाथापाई रिश्तों में खटाई की तरह थी.
आप की अदालत में एक बार सलमान ने कहा भी था कि हमारे परिवार के रिश्ते अच्छे हैं. वे मिलते जुलते रहते हैं. लेकिन परिवार के दो बच्चे जैसे एक दूसरे से बात नहीं करते, वही स्थिति है.
शाहरुख़ को देखकर लगता है कि अगर वो एक्टर नहीं होते तो बिज़नसमैन होते. वहीं सलमान को देखकर कहा जा सकता है कि अगर वो एक्टर न होते तो स्पोर्ट्समेन होते. लेकिन है जस्ट-अपोज़िट. वही ‘यिन येंग’. शाहरुख़ जब तक चोटिल न हुए थे, तब तक खेल को अपना कैरियर बनाना चाहते थे. इधर सलमान बीइंग ह्यूमन ब्रांड के कर्ताधर्ता हैं.
शाहरुख़ दिल्ली हैं, सलमान मुंबई. शाहरुख़ सफलता हैं, सलमान परंपरा. शाहरुख़ फैमिली हैं, सलमान बैचलर...

शाहरुख़ आगे हैं, सलमान ऊंचे हैं. कैरियर ग्राफ के मामले में जस्ट उल्टा है.
शाहरुख़ आजकल अपनी ही सफलता के मुकाबले छोटे लगने लगे हैं, या उनकी सफलताएं उनसे बड़ी हो गईं हैं. ज़ीरो में उनका किरदार का साइज़ फ़िल्म इंडस्ट्री में उनके इस समय के कद को रिप्रेजेंट करता सा लगता है. होने को तुलना की बात की जाए तो जहां इस एक सीन में सलमान लंबा है लेकिन शाहरुख़ आगे खड़ा है, वहीं कैरियर में सलमान आगे है और शाहरुख़ का कद लंबा है.
शाहरुख़ जो कहते थे कि मेरा कंपटीशन खुद अपने आप से है, यकीनन अपनी ही सफलता के मुकाबले बौने लगने लगे हैं इसलिए ही तो वो कभी ‘फैन’ तो कभी ‘बिल्लू बार्बर’ में खुद का किरदार करते हुए नज़र आते हैं. लगता है कि उनको उठना है तो किसी शाहरुख़ की ही हेल्प लेनी पड़ेगी.
सलमान और शाहरुख़ चाहे कितने ही बड़े दोस्त या दुश्मन हों लेकिन उनके फैंस हमेशा तलवारे ताने खड़े रहते हैं. उनके बीच कभी दोस्ती संभव नहीं है. और उन सबको पता है कि ये दौड़ का अंतिम लैप है और हर लैप में आगे रहने वाले शाहरुख़ इस लैप में हांफ रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि अब उनको थ्री सिक्सटी डिग्री मेकओवर की ज़रूरत है. क्या ये भी एक संयोग नहीं कि 360 डिग्री और ‘ज़ीरो’ डिग्री एक ही होता है. क्या ये ‘ज़ीरो’ शाहरुख़ को वापस रेस में ला पाएगी. क्या रोहित शेट्टी, इम्तियाज़ अली जो नहीं कर पाए वो आनंद एल राय कर पाएंगे?
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