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तुर्की और सीरिया में भूकंप से 5 हज़ार मौत, भारत ने भेजी मदद!

इस इलाके में इतना भयानक भूकंप आने की वजह क्या है?

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7 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 7 फ़रवरी 2023, 09:03 PM IST)
इस इलाके में इतना भयानक भूकंप आने की वजह क्या है?
इस इलाके में इतना भयानक भूकंप आने की वजह क्या है?
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6 फ़रवरी 2023 की सुबह तुर्किए और सीरिया में 04 बजकर 17 मिनट पर भूकंप आया. रिक्टर स्केल पर तीव्रता मापी गई, 7.8. भूकंप का पहला झटका दक्षिणी तुर्किए के गाज़ियनटेप में महसूस हुआ. हालांकि, बाद में झटके आस-पास के कई शहरों के अलावा सीरिया, लेबनान, इज़रायल और साइप्रस में भी महसूस किए गए. सबसे ज़्यादा नुकसान तुर्किए और सीरिया में देखा गया. वहां पूरे दिन ऑफ़्टरशॉक्स आते रहे. जिसके कारण राहत अभियान चलाने में मुश्किल आई. और, हताहतों की संख्या भी बढ़ती गई. मीडिया रपटों के अनुसार, 05 हज़ार लोगों की मौत की पुष्टि हुई. यूनाइटेड नेशंस (UN) का दावा, अंतिम आंकड़ा 20 हज़ार के पार जा सकता है.

इन सबके बीच दुनियाभर के देशों और संस्थाओं ने मदद भेजनी शुरू कर दी है. भारत ने नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फ़ोर्स (NDRF) और डॉग स्क्वॉड्स को रवाना किया है. रूस ने तीन सौ सैनिकों को तुर्किए भेजा है. वे मलबा हटाने में मदद कर रहे हैं. उनके अलावा, अमेरिका, चीन, यूरोपियन यूनियन समेत कई देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन सामने आए हैं. सबसे दिलचस्प मामला ग्रीस का रहा. ग्रीस, तुर्किए को मदद की पेशकश करने वाले सबसे शुरुआती देशों में से था. ऐतिहासिक तौर पर दोनों देश एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे हैं. मगर 1999 में आए भूकंप के बाद दोनों दुश्मनी भुला कर साथ आए थे. तब से इस रिश्ते में तरावट आई है.

आइए जानते हैं,

- तुर्किए और सीरिया में चल क्या रहा है?
- इस इलाके में इतना भयानक भूकंप आने की वजह क्या है?
- और, ग्रीस-तुर्किए अर्थक़्वेक डिप्लोमेसी की असली कहानी क्या है?

ये मैप देखिये 

क्रेडिट - AFP

ये तुर्किए के दक्षिण में बसा शहर गाज़ियनटेप है. इससे लगभग 18 किलोमीटर और दक्षिण में जाएं तो सीरिया की सीमा शुरू हो जाती है. 20 लाख की आबादी वाले गाज़ियनटेप में एक-तिहाई से अधिक लोग सीरियाई शरणार्थी हैं. सीरिया में 2011 से सिविल वॉर चल रहा है. राष्ट्रपति बशर अल-असद को हटाने के मकसद से शुरू हुआ आंदोलन अपना रास्ता भटक गया. फिर वहां इस्लामिक स्टेट आया. उन्हें हराने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन की एंट्री हुई. रूस ने असद की मदद की. सब गड्ड-मड्ड होकर रह गया. 12 बरस बाद भी सीरिया जंग के चंगुल से बाहर नहीं निकल सका है. निकल सके हैं तो कुछ लोग, जो शरणार्थी बनकर तुर्किए और यूरोप के दूसरे हिस्सों में दोयम दर्जे की ज़िंदगी बिता रहे हैं. हालांकि, दुर्भाग्य ने उनका वहां भी पीछा नहीं छोड़ा. 06 फ़रवरी को आए भूकंप का केंद्र गाज़ियनटेप के पास ही था. भूकंप से पहले गाज़ियनटेप को ‘शरणार्थियों का शहर’ कहा जाता था, अब वो मलबे के ढेर में बदल चुका है.

21 साल की करीना होरलाख छह महीने पहले ही तुर्किए आई थी. यूक्रेन से. शरणार्थी बनकर. उसको गाज़ियनटेप में टेंपररी ठिकाना मिला था. वो वहीं रहकर लॉ की पढ़ाई पूरी कर रही है. भूकंप के बाद मची अराजकता ने उसको पिछले बरस की याद दिला दी है. करीना बोली,

‘अभी फ़रवरी का महीना चल रहा है और ठीक एक बरस पहले इसी तरह बिस्तर हिलने से मेरी नींद अचानक खुली थी. मुझे लगा कि फिर से बमबारी होने लगी है. मेरी आंखों के सामने घर के हालात तैरने लगे. मुझे बहुत देर के बाद पता चला कि यहां आख़िर हो क्या रहा है?’

इस भूकंप से प्रभावित लोगों में करीना या गाज़ियनटेप इकलौते नहीं हैं. तुर्किए के कम से कम दस बड़े शहर इस आपदा के शिकार हुए हैं. सीरिया पहले से ही युद्ध की वीभीषिका से त्रस्त हैं. सीरिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर अलेप्पो एक समय तक एक मिडिल-ईस्ट के सबसे रौनकदार शहरों में गिना जाता था. सिविल वॉर ने उसे ‘घोस्ट सिटी’ में बदल दिया. हाल के भूकंप ने अलेप्पो को रेंगने पर मजबूर कर दिया है.

अब कुछ आपबीतियां सुन लीजिए.

तुर्की के एक पीड़ित ने कहा,

ऐसा लग रहा था मानों ज़मीन के अंदर पवनचक्कियां लगी हों. हम ज़मीन को हिलते हुए महसूस कर पा रहे थे. झटके लगातार मज़बूत हो रहे थे. हम खुद काबू में नहीं थे. पता नहीं था कि क्या करें?

तुर्की के एक अन्य पीड़ित ने कहा,

मैंने अपने परिवार के 12 लोग खो दिए हैं. मेरी मां और भाई अभी भी मलबे में दबे हुए हैं. मेरे एक भाई को मलबे से निकाला जा रहा है. मैंने ख़ुद से चार बच्चों को मलबे से ज़िंदा निकाला है. हम मलबे से उनकी आवाजें सुन सकते हैं. वे अभी भी जिंदा हैं. उन्हें बाहर निकालने का कोई रास्ता नहीं है. उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है. कोई मशीनरी काम नहीं कर रही. हम हर देश से मदद की गुहार लगाते हैं. मानवता के नाते, हमारी मदद करें. हम पर विपदा आन पड़ी है.

तुर्किए से और क्या अपडेट्स हैं?

- नंबर एक. तुर्किए में मृतकों की संख्या साढ़े तीन हज़ार के करीब पहुंच गई है. 20 हज़ार से अधिक लोग घायल हैं. भूकंप में 06 हज़ार से अधिक घर तबाह हुए हैं. ये शुरुआती आंकड़े हैं. जैसे-जैसे सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन बढ़ेगा, वैसे-वैसे नुकसान का ग्राफ़ और ऊपर जाएगा. यूनाइटेड नेशंस का कहना है कि कम से कम 20 हज़ार लोगों की जान जा सकती है.

- नंबर दो. भूकंप के एपिसेंटर में सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है. सड़कें टूटी हुईं हैं. रास्तों में जाम लगा है. लोग सुरक्षित जगहों की तलाश में भाग रहे हैं. भूकंप के छोटे-मोटे झटके भी लगातार आ रहे हैं. कुछ शहरों में रात का तापमान शून्य से नीचे चला गया. इन सबके चलते राहत अभियान चलाने में बहुत मुश्किल आ रही है.

- नंबर तीन. तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने सात दिनों के राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया है. अर्दोआन ने दक्षिण-पूर्वी तुर्किए में तीन महीने के लिए आपातकाल भी लगा दिया है.

- नंबर चार. तुर्किए को दुनियाभर से मदद मिल रही है. भारत, अमेरिका, चीन, रूस, यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन, इज़रायल समेत कई देशों ने अपनी टीमें भेजीं है. भारत की मदद पर तुर्किए ने आभार प्रकट किया. भारत में तुर्किए के राजदूत ने ट्वीट किया, ‘A friend in need is a friend indeed’. यानी, जो ज़रूरत में काम आए, वही सच्चा दोस्त होता है.

ये तो हुई तुर्किए की बात. सीरिया का क्या हाल है?

सीरिया के मामले में परेशानी कई गुणा बढ़ जाती है. इसकी तीन बड़ी वजहें हैं.

- नंबर एक. युद्ध. बरसों से चल रहे झगड़े में बुनियादी इंफ़्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुके हैं. डॉक्टर हैं तो अस्पताल नहीं, और अस्पताल हैं तो डॉक्टर्स नहीं. पर्याप्त मेडिकल फ़ैसिलिटी नहीं है. एंबुलेंस की कमी है. स्किल्ड लोग नहीं हैं. सड़कें सुरक्षित नहीं हैं. यानी, सीरिया में सरकार के पास सर्वाइवर्स को बचाने के लायक पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. तुर्किए, नेटो का देश है. उसके यूरोप और एशिया में कई देशों के साथ दोस्ताना संबंध भी हैं. सीरिया के मामले में ऐसा नहीं है. युद्ध के कारण उसकी साख अलग ख़राब हो रखी है. ऐसे में अगर उसके पास बाहरी मदद पहुंचती है तो ये किसी वरदान से कम नहीं होगा.

- नंबर दो. शरणार्थी संकट. सीरिया का इदलिब प्रांत भूकंप से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है. इदलिब इकलौता ऐसा प्रांत है, जो अभी भी विद्रोहियों के क़ब्ज़े में है. इस इलाके में लाखों शरणार्थी रहते हैं. अगर कोई देश वहां मदद पहुंचाना चाहता है तो उन्हें विद्रोहियों से समझौता करना होगा. सीरिया सरकार इदलिब में विदेशी मदद की अनुमति नहीं देता है. उनका मानना है कि ये उसकी संप्रभुता के ख़िलाफ़ है. मानवाधिकार संगठनों ने सीरिया सरकार से इसमें ढील देने की अपील की है. जब तक सरकार नहीं मानती, तब तक बीत रहा हर एक पल इदलिब को क़यामत के नजदीक ला रहा है.

- नंबर तीन. पहले से मौजूद समस्याएं. सीरिया सिर्फ़ युद्ध से ही परेशान नहीं है. वहां आर्थिक संकट चल रहा है. खाने के सामान की कमी है. हाल ही में वहां कोलरा संक्रमण भी फैला था.
यूएन की रिपोर्ट के अनुसार, सीरिया की 90 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही है. वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम (WFP) की रिपोर्ट कहती है कि, 60 प्रतिशत से अधिक लोगों को ये नहीं पता है कि, दूसरे टाइम का खाना कहां से आएगा. 30 लाख लोग तो कुछ ही समय बाद भुखमरी की कगार पर पहुंचने वाले हैं. इन सबके चलते ये देश पहले ही बिखराव के मुहाने तक पहुंच गया था. भूकंप ने इस रफ़्तार को तेज़ ही किया है.

सीरिया से और क्या अपडेट्स हैं?

- सीरिया में मृतकों की संख्या डेढ़ हज़ार के पार पहुंच गई है. कई इलाकों में रेस्क्यू टीम को पहुंचने में मुश्किल आ रही है. आशंका है कि इससे मलबे में फंसे लोगों को निकालने में मुश्किल आएगी. इसके अलावा, मौसम भी तेज़ी से बदल रहा है. इससे मलबे में फंसे लोगों के पास बचा समय कम होता जा रहा है.

- यूएन में सीरिया के राजदूत ने कहा कि, उनके यहां आने वाली सारी मदद सरकार की आंखों से होकर गुजरेगी. उनका इशारा इदलिब की तरफ़ था.

अब आख़िर में एक क़िस्सा.

तुर्किए का एक पड़ोसी देश है, ग्रीस. एक समय तक ग्रीस ऑटोमन साम्राज्य के अधीन था. ग्रीस ने आज़ादी के लिए लंबी लड़ाई लड़ी. आज़ादी के बाद भी ग्रीस और तुर्किए के संबंध कभी मधुर नहीं हुए. फिर आया 1999 का साल. 17 अगस्त को तुर्किए में 7.6 तीव्रता का भूकंप आया. इसमें 17 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई और लाखों लोग बेघर हुए थे. तुर्किए के लिए उबरना मुश्किल हो गया था. उस दौर में ग्रीस ने सबसे पहले तुर्किए को मदद भेजी थी. इस भूकंप के महीने भर बाद ग्रीस में 5.9 तीव्रता का भूकंप आया. तब तुर्किए ने अपनी रेस्क्यू टीम ग्रीस भेजी थी. मलबे के ढेर से सर्वाइवर्स को निकालते लोगों की तस्वीर दोनों देशों की जनता के मन में छप गई. इसके बाद ही दोनों देशों ने राजनैतिक संबंधों को बेहतर करने की दिशा में पहल की. इस ऐपिसोड को इतिहास में अर्थक़्वेक डिप्लोमेसी के नाम से जाना जाता है.

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