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  • 23rd of January is the day when deadliest earthquake in history rocked China, killed more than eight lakh people

आज के ही दिन आया था सबसे बड़ा जलजला, एकसाथ मरे थे 8 लाख से ज्यादा लोग

जहां पहाड़ था, वहां मैदान हो गया. जहां जमीन थी, वहां गड्ढा हो गया और पानी निकलने लगा.

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23 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 23 जनवरी 2021, 05:42 AM IST)
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इसे आज तक की तारीख का सबसे बड़े और सबसे भयंकर तूफान कहा जाता है. भूकंप के कारण जमीन में कई जगह गहरे छेद हो गए और उनसे पानी बाहर आने लगा. रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता बस 8.0 से 8.3 के बीच थी. इससे ज्यादा बड़े भूकंप देखे हैं दुनिया ने. मगर इसका असर इतना मारक था कि जितना कभी किसी और भूकंप का नहीं रहा.
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23 जनवरी, 1556. इस तारीख को इतिहास का सबसे बड़ा भयंकर भूकंप आया था. हम इंसानों ने जो सबसे खतरनाक हादसे देखे हैं, उनमें से एक. इस भूकंप में करीब साढ़े आठ लाख लोग मारे गए थे. शाम के धुंधलके में भूकंप आया. फिर रात भर झटके आते रहे. सुबह जब धुंधलका छंटा, तो लगा कि जहां शहर हुआ करता था वहां जैसे कभी कोई शहर ही नहीं था. कोई मुर्दों का टीला हो. कब्रिस्तान. लाशें की लाशें बिछी थीं. मलबे का ढेर था. आस-पास के शहर भी मरघट बन गए थे. ये भूकंप आया था चीन में. ठीक-ठीक कहें, तो उत्तरी चीन के शांक्सी प्रांतमें.
इतिहास के तीन सबसे बड़े कुदरती हादसे चीन में ही हुए कुदरती हादसों में मरने वालों की ठीक-ठीक संख्या गिनना मुश्किल काम है. अब के जमाने में तो पूरे आंकड़े होते हैं. सैटेलाइट होता है. कौन सी गली में कितने मकान हैं और किस मकान में कितने लोग रहते हैं, सब जमा जानकारी होती है. बावजूद इसके कोई हादसा हो जाए, तो एकदम ठीक-ठीक गिनती बता पाना टेढ़ी खीर है. और ये वाकया तो साढ़े चार सौ साल से भी ज्यादा पुराना है. तब तो हादसे में हुए ठीक-ठीक नुकसान का पता लगा पाना और मुश्किल सवाल था. इसके बावजूद कहा जाता है कि इस भूकंप के कारण करीब साढ़े आठ लाख लोग मारे गए थे. कहने वाले कहते हैं कि मरने वालों की तादाद इससे ज्यादा भी हो सकती है. वैसे एक बात बता दें. इतिहास में जो सबसे मारक और भयंकर प्राकृतिक हादसे हुए हैं, उनमें सबसे बड़े तीन चीन में ही हुए. पहले नंबर पर है 1931 में आई बाढ़. इसमें 10 लाख के करीब लोग मारे गए. दूसरे नंबर पर है 1887 में आई बाढ़, जिसमें करीब नौ लाख लोग मरे. तीसरे नंबर पर ये भूकंप है.
26 अप्रैल, 2015 को नेपाल में भूकंप आया. इसके कारण बहुत तबाही हुई. पिछले 25 सालों में हिमालयी क्षेत्र के अंदर इतना विनाशक भूकंप नहीं आया था.
26 अप्रैल, 2015 को नेपाल में भूकंप आया. इसके कारण बहुत तबाही हुई. पिछले 25 सालों में हिमालयी क्षेत्र के अंदर इतना विनाशक भूकंप नहीं आया था.

800 किलोमीटर के इलाके तक हुआ भूकंप का असर उस समय चीन में राजतंत्र था. मिंग वंश का राज था. राजा थे जियाजिंग. ये भूकंप जियाजिंग के राज की पहचान बन गई. लोगों ने भूकंप का ही नाम रख दिया जियाजिंग. यहां चीन में एक वेई नदी घाटी है. ये ही जगह भूकंप का केंद्र थी. सबसे नजदीक में तीन शहर थे. हुआक्सियान, हुआइयन और वेनियन. भूकंप में कितना नुकसान हुआ होगा, इसका अंदाजा बस इस बात से लगाइए कि हुआक्सियान शहर पूरा सपाट हो गया. हर घर, हर इमारत जमींदोज. कुछ साबुत नहीं बचा. आधी से ज्यादा आबादी साफ हो गई. बाकी शहरों का हाल भी ऐसा ही था. कई ऐसे इलाके भी थे, जहां रहने वाले 60 से 70 फीसद लोग मारे गए. भूकंप का असर करीब 800 किलोमीटर के इलाके तक हुआ.
हैती में भूकंप आना आम बात है. मगर 12 जनवरी, 2010 को आया ये भूकंप बड़ा विनाशक था. करीब तीन लाख लोग मारे गए थे इसमें. तस्वीर में जो इमारत नजर आ रही है, वो हैती का राष्ट्रपति भवन है.
हैती में भूकंप आना आम बात है. मगर 12 जनवरी, 2010 को आया ये भूकंप बड़ा विनाशक था. करीब तीन लाख लोग मारे गए थे इसमें. तस्वीर में जो इमारत नजर आ रही है, वो हैती का राष्ट्रपति भवन है.

लाखों लोगों के मरने की ये वजह थी जैसे बुखार मापने का स्केल थर्मामीटर में फिट होता है, वैसे ही भूकंप नापने के लिए रिक्टर स्केल होता है. एक से 10 के स्केल में भूकंप कहां है, इससे उसकी ताकत मापी जाती है. तो ये जो भूकंप था, वो 8.0 से 8.3 के बीच कहीं पर था. ये बहुत मजबूत भूकंप हुआ. मगर इतना भी नहीं कि इतने लाखों लोग मारे जाएं. तो फिर क्या वजह थी कि इतने लोग मरे? वजह थी वो जगह जहां भूकंप आया. ये इलाका बहुत घना बसा था. चिपके-चिपके घर थे. ऊपर से उनकी मजबूती भी भगवान भरोसे थी. मिट्टी भी बहुत मुलायम थी इस इलाके की. यहां के लोग ज्यादातर 'याओदोंग' में रहते थे. ये याओदोंग गुफानुमा घर होते थे. अक्सर ढलवा चट्टानों के एक किनारे बने होते थे. जब भूकंप आया, तो इनमें रहने वाले लोगों को चेतने का भी मौका नहीं मिला. भूकंप के कारण चट्टानें जमींदोज हो गईं. उन चट्टानों में बने ये गुफानुमा घर भी कहां बचने वाले थे. बाकी के जो घर थे, वो भी बड़े कमजोर हुआ करते थे. जब वो गिरे, तो उनमें रहने वाले लोग भी उनके नीचे दबकर मर गए. भूकंप का असर भी बड़ा डरावना था. कई जगहों पर जमीन में गहरे गड्ढे हो गए. 60 फुट गहरी दरारें पड़ गईं. भूकंप ने पहाड़ की चोटी को पाटकर समतल कर दिया. नदी ने रास्ता बदल लिया. नदी के एकाएक रास्ता बदल लेने से नए इलाकों में बाढ़ आ गई. उसमें भी लोग मरे. भूस्खलन हुआ. पहाड़ी इलाकों में ये सब होना जख्म पर मिर्च रगड़ने जैसा है. जान-माल का नुकसान बढ़ जाता है.
12 मई, 2008 को चीन के सिचुआन प्रांत में आए भूकंप के बाद की तस्वीर है ये. पिछले 30 सालों में चीन ने इतना भयंकर भूकंप नहीं झेला. करीब 90,000 लोग मारे गए थे इसमें. तकरीबन पौने चार लाख लोग घायल हुए थे.
12 मई, 2008 को चीन के सिचुआन प्रांत में आए भूकंप के बाद की तस्वीर है ये. पिछले 30 सालों में चीन ने इतना भयंकर भूकंप नहीं झेला. करीब 90,000 लोग मारे गए थे इसमें. तकरीबन पौने चार लाख लोग घायल हुए थे.

उस समय के रेकॉर्ड्स में इस भूकंप का जो जिक्र है, उसका हिंदी तर्जुमा कुछ इस तरह होगा:
1556 के बसंत के मौसम में शांक्सी प्रांत में भूकंप आया. हमारे हुआ इलाके में कई चीजें हुईं. नदियों और पहाड़ों ने जगहें बदल लीं. सड़कें बर्बाद हो गईं. कुछ जगहों पर एकाएक जमीन ऊपर उठ गई. नई पहाड़ियां बन गईं. कई जगहों पर पहाड़ की चोटियां समतल हो गईं. कई जगहों पर घाटियां बंद हो गईं. कुछ इलाकों में नए झरने बहने लगे. कई जगहों पर जमीन में दरार आ गई. झोपड़ियां, गर, सरकारी इमारतें, मंदिर, दीवारें सब देखते ही देखते जमींदोज हो गए. एकाएक सब बर्बाद हो गया.
'बड़े भूकंप के पहले और बाद में कई हल्के झटके आते हैं' कहने को तो उस दिन कुछ सेकेंड के लिए ही आया भूकंप, मगर उसका असर कई महीनों तक महसूस होता रहा. करीब छह महीने बाद तक रह-रहकर भूकंप के झटके महसूस होते रहे. ये कुदरती प्रक्रिया है. जब भी कोई बड़ा भूकंप आता है, तो उसके पहले और बाद में छोटे-छोटे झटके आते हैं. ये पहले और बाद महीनों में भी हो सकते हैं और सालों में भी. कुछ महीनों पहले दिल्ली में लगातार थोड़े-थोड़े समय बाद भूकंप आ रहा था. तब कई चेतावनियां आई थीं. कि ये झटके कुदरत का संकेत हैं. जानकार कह रहे थे कि हिमालय का पूरा इलाका बहुत अस्थिर है. ये छोटे-छोटे भूकंप के झटके संकेत हैं कि आने वाले समय में बहुत जोरदार भूकंप आने वाला है. ऐसे ही जब कोई बड़ा भूकंप आता है, तब भी छोटे-छोटे भूकंपों के लौटकर आने का अंदेशा रहता है. जमीन के अंदर जो प्लेट्स होती हैं, वो अजस्ट होती हैं. इसी वजह से जमीन के ऊपर हलचल महसूस होती है
 26 दिसंबर, 2003 को ईरान के बाम प्रांत में आए भूकंप में 31,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. पहले भूकंप आया और फिर अगले दिन भूस्खलन हुआ. बाम की करीब 85 फीसद इमारतें तबाह हो गई थीं. 75,000 से ज्यादा लोगों को घर-बार छोड़ना पड़ा था. दुनिया के 60 से भी ज्यादा देशों ने ईरान को मदद दी. तब जाकर वो इस भूकंप के बाद हुए विनाश से उबर पाया.
26 दिसंबर, 2003 को ईरान के बाम प्रांत में आए भूकंप में 31,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. करीब 85 फीसद इमारतें तबाह हो गई थीं. 75,000 से ज्यादा लोगों को घर-बार छोड़ना पड़ा था. दुनिया के 60 से भी ज्यादा देशों ने ईरान को मदद दी.

लोगों ने इस भूकंप से सीखकर जीने का तरीका बदल लिया इंसान सीखने वाला प्राणी है. वो चीजों से सबक सीखता है. कितनी सारी चीजें हैं, जो हमें छुटपन से ही मालूम चल जाती हैं. जैसे ये कि आग को नंगे हाथ नहीं छूना चाहिए. ये अर्जित अनुभव है. भूकंप की तबाही देखकर जो लोग बचे, उन्होंने बहुत कुछ सीखा. जो सीखा, उसे अपने जीने के तरीके में डाला. अपने बाद आने वाली पीढ़ी को भी उन्होंने अपना अनुभव दिया. इन्हीं अनुभवों से लैस लोगों ने ऐसे तरीके खोजे जो कि भूकंप और इस तरह के हादसों में कारगर साबित हों. पत्थर के घरों और चट्टानों के अंदर गुफानुमा मकानों का चलन खत्म हो गया. उनकी जगह बांस, मिट्टी और लकड़ी से बने मकानों ने ले ली. जो कि भूकंप के लिहाज से सबसे फिट मानी जाती हैं. आखिरकार ऐसे ही सीख-सीखकर इंसानों की ये नस्ल इतने बसंत आगे आई है.


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