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राख से निकल आया था इज़रायल, खून से लिखी अपनी कहानी

कोई भी देश मोटा-मोटी दो चीज़ों से बना होता है – वहां के लोग और वो ज़मीन जिसे वो अपना कहते हैं. ये दोनों साथ आएं तो एक देश का खाका बनना शुरू होता है. तो इज़रायल की कहानी भी इन हिस्सों में बंटी है. हम उसे ऐसे ही सुनेंगे.

यहूदी – एक सताई हुई कौम जिसने हमेशा इज़रायल का सपना देखा था

इज़रायल यहूदियों का देश है. उनका भर नहीं, जो इज़रायल में रहते हैं, बल्कि हर उस व्यक्ति का जो खुद को यहूदी कहता है. इज़रायल पहुंच कर कोई भी यहूदी वहां की नागरिकता ले सकता है. तो इज़रायल की कहानी यहूदियों की कहानी है.

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मुसलमानों और ईसाइयों की तरह ही यहूदी भी अब्राहम को ईश्वर का दूत मानते हैं. मान्यता के हिसाब से अब्राहम के बेटे का नाम था आइज़ैक. और आइज़ैक के बाद हुए जैकब. जैकब ही आगे चल कर इज़रायल कहलाए. जैकब के 12 बेटे थे और एक बेटी. इन 12 बेटों के वंशज इज़रायल के 12 कबीले बने.

इज़रायल के नाम पर ही आधुनिक और मिथकीय इज़रायल देश का नाम पड़ा.

एक्सोडस – यहूदियों के पलायन की कहानी

मान्यताओं के मुताबिक इज़रायल (हिब्रू मिथक वाले देश) में सूखा पड़ा तो जैकब अपना परिवार लेकर अपने बेटे जोसफ के पास मिस्र चले गए. तब वहां फैरो राजाओं का राज था. जोसफ की फैरो से खूब बनती थी. लेकिन जोसफ के देहांत के बाद बने फैरो ने यहूदियों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. फिर मूसा यहूदियों को लेकर मिस्र से निकले, रास्ते में लाठी से समंदर के बीच रास्ता बनाया और इज़रायल पहुंचे. यहां इज़रायल का राज्य बना – भूमध्य सागर और जॉर्डन नदी के बीच की ज़मीन पर.

मिस्र छोड़कर जाते यहूदी (डेविड रॉबर्ट्स की पेंटिंग)
मिस्र छोड़कर जाते यहूदी (डेविड रॉबर्ट्स की पेंटिंग)

लेकिन यहूदियों को यहां भी चैन नहीं मिला. ईसा से लगभग 700 साल पहले यहां असीरियाई राजाओं का कब्ज़ा हो गया. इन्हें अपना देश छोड़कर जाना पड़ा. 12 में से 10 कबीले दुनिया में गुम हो गए माने जाते हैं. असीरियाई राजाओं के बाद भी इज़रायल पर हमले होते रहे. बेबीलॉन ने जब इज़रायल पर हमला किया तो यरुशलम को तबाह कर दिया. इस तरह के हमलों ने यहूदियों का इज़रायल में रहना मुश्किल कर दिया. तो वो दुनिया के अलग-अलग कोनों में बस गए.

इस कहानी को यहूदियों के असल इतिहास से ज़्यादा एक मिथक माना जाता है. लेकिन यहूदियों के लिए ये बहुत मायने रखती है, खासकर ये बात कि उन्हें उनकी जड़ों से उखाड़ कर भगा दिया गया था. इसी के चलते वो दुनिया में जहां रहे, हमेशा अपने देश इज़रायल लौटने का सपना देखते रहे.

इज़रायल – वो ज़मीन, जिसे देने का वादा खुद भगवान ने किया था!

ऊपर बताई मिथकीय कहानी में यहूदियों का विश्वास ही वजह थी कि आधुनिक इज़रायल बसाने की कोशिश जब हुईं, तब सबका ध्यान ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ पर ही था. माने वो ज़मीन जो भगवान ने अब्राहम को देने का वादा किया था – भूमध्य सागर से लेकर जॉर्डन नदी के बीच की ज़मीन.

अब्राहम की ज़मीन आईज़ैक की हुई और फिर उनके बाद जैकब की. तो खुद को जैकब का वंशज मानने वाले यहूदी इज़रायल पर अपना हक मानते हैं.

बाइबल के मुताबिक 'प्रॉमिस्ड लैंड' का नक्शा आधुनिक इज़रायल जैसा ही है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
बाइबल के मुताबिक ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ का नक्शा आधुनिक इज़रायल जैसा ही है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

तंग आकर एक बार फिर यहूदी ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ लौटे

यहूदी रूस और यूरोप में भी खुश नहीं थे. उनके धर्म और उनकी तरक्की से दूसरे लोगों को दिक्कत रही और इसलिए दंगों में हमेशा यहूदियों को निशाना बनाया जाता था. तो 29 अगस्त, 1897 को स्विट्ज़रलैंड के बेसल शहर में वर्ल्ड ज़ायनिस्ट ऑर्गनाइज़ेशन की एक मीटिंग हुई. इसे पहली ज़ायनिस्ट कांग्रेस कहा गया. ज़ायनिज़म उस आंदोलन को कहते हैं, जो यहूदियों को इज़रायल में बसाने के लिए शुरू हुआ था. इसमें तय किया गया कि दुनिया भर के यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाया जाए, उसी ज़मीन पर जो अब्राहम को भगवान से वादे में मिली थी.

लेकिन एक पेच था. वो ज़मीन खाली नहीं थी, उस पर अब अरब बसते थे. हालांकि इलाके को अब तक फिलिस्तीन नाम से नहीं जाना जाता था. यरुशलम, नाबलुस और एकर नाम के तीन ज़िले थे, जिन पर तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य का राज था. कुछ लोगों ने इस बात पर ध्यान भी दिलाया लेकिन ज़ायनिस्टों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा.

आलिया – यहूदियों की लहर

तय किया गया कि यहूदी इज़रायल जाएंगे और वहां ज़मीन खरीद कर बसेंगे. इसके लिए 1901 में जूइश नेशनल फंड बनाया गया. इसके ज़रिए दुनिया भर के धनी यहूदियों ने फिलिस्तीन में ज़मीन खरीदने के लिए पैसे भेजना शुरू किया. इसके चलते यहूदी बड़ी संख्या में फिलिस्तीन जाने लगे. इसे यहूदियों की आलिया कहा गया. हिब्रू में आलिया का मतलब लहर होता है. ऐसी पांच लहरों का ज़िक्र प्रमुखता से किया जाता है. यहूदी आकर बसते रहे और अरब लोगों से ज़मीन खरीदते गए.

फिलिस्तीन आते यहूदी
फिलिस्तीन आते यहूदी

 

लेकिन ये ज़मीन न येरुशलम में खरीदी गई, न जूडिया और समारिया की पहाड़ियों में. अपने पवित्र शहरों के बजाए यहूदियों का ज़ोर उस ज़मीन को खरीदने पर रहा, जहां खेती हो सके.

मैंडेट सिस्टमः फसाद की जड़

फिर 1914 में पहला विश्व युद्ध छिड़ गया. तुर्की जर्मनी की तरफ से लड़ा और हार गया. लड़ाई के बाद तुर्की से जीती हुई ज़मीन को छह हिस्सों में बांट दिया गया – तुर्की, लेबनान, सीरिया, इराक, ट्रांसजॉर्डन और फिलिस्तीन. यही पहला मौका था जब आधुनिक समय में अब्राहम को वादे में मिली ज़मीन को एक देश मानकर नाम दिया गया था. जनसंख्या के हिसाब से फिलिस्तीन अरब लोगों का देश था. लेकिन वहां यहूदी तेज़ी से बढ़ रहे थे.

लीग ऑफ नेशन्स द्वारा फिलिस्तीन में अंग्रेज़ों के मैंडेट की घोषणा
लीग ऑफ नेशन्स द्वारा फिलिस्तीन में अंग्रेज़ों के मैंडेट की घोषणा

जीते हुए देशों को इन इलाकों का ट्रस्टी बना दिया गया. इसे मैंडेट सिस्टम कहा गया. फिलिस्तीन का मैंडेट मिला ब्रिटेन को. ट्रस्टी बनाए देशों की ज़िम्मेदारी थी कि उनके मैंडेट वाले इलाकों में लोकल लोगों की सरकार बनाएं और उन्हें आज़ाद कर दें. छह में से पांच मैंडेट में ये हुआ, एक को छोड़कर – फिलिस्तीन. कारण ये कि अंग्रेज़ फिलिस्तीन देकर किसे जाएं, तय नहीं कर पा रहे थे. जनसंख्या अरबों की ज़्यादा थी लेकिन दुनिया भर में ज़ायिस्ट आंदोलन ने ऐसी राजनैतिक पैठ बनाई थी कि सारे ताकतवर देशों का झुकाव यहूदियों की तरफ ज़्यादा था.

1917 में ब्रिटेन के फॉरन ऑफिस के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जेम्स बैलफर ने ब्रिटेन में यहूदियों के रसूखदार नेता लॉर्ड वॉल्टर रॉट्सचाइल्ड को एक खत लिखकर वादा कर दिया कि फिलिस्तीन यहूदियों का देश है. फिलिस्तीन को मैंडेट करार देने वाले दस्तावेज़ भी यहूदियों की मांग को ध्यान में रखकर ही तैयार किए गए थे.

‘यीशुव’ – आधुनिक इज़रायल का पुरखा

तो तीस साल के अंग्रेज़ों के राज में मोटा-माेटी स्थिति रही कि यहूदी मज़बूत होते गए, अरब लोग ज़मीन खोते गए. हिटलर के आने के बाद जर्मनी और पोलैंड में यहूदियों का रहना और मुश्किल हो गया और पांचवीं आलिया में ढेर सारे यहूदी फिलिस्तीन पहुंचे. अंग्रेज़ों ने फिलिस्तीन में व्यवस्था बनाने में जो गुंजाइश रखी, वो यहूदियों ने पूरी की. यूरोप के अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने ‘यीशुव’ को आकार दिया. यीशुव एक पैरेलल सरकार की तरह था. इसके तहत यहूदियों के लिए एक अलग अर्थव्यवस्था, शिक्षा और फौज तक बनाई गई. उस वक्त यहूदियों से संख्या में दस गुना रहे अरब लोग इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं बना पाए.

यरुशलम की अल अक्सा मस्जिद मुसलमानों की तीसरी सबसे पवित्र जगह है. साथ ही यहूदियों के लिए पवित्र वेलिंग वॉल है. तो शहर को लेकर यहूदी और अरब खूब लड़े.
यरुशलम की अल अक्सा मस्जिद मुसलमानों की तीसरी सबसे पवित्र जगह है. साथ ही यहूदियों के लिए पवित्र वेलिंग वॉल है. तो शहर को लेकर यहूदी और अरब खूब लड़े.

यीशुव के चलते यहूदियों को मज़बूत होते देख अरब लोगों में डर पैदा होने लगा. यरुशलम की वेस्टर्न वॉल को लेकर 1929 में यहूदियों और अरब लोगों में दंगा हो गया. अरब और यहूदियों के बीच रार पनप गई. जब-जब यहूदी और अरब लड़ते, ज़्यादा नुकसान हमेशा अरब लोगों का होता. 1937 में जाकर अंग्रेज़ों को ये समझ में आया कि फिलिस्तीन का यहूदियों और अरब लोगों में बंटवारा करना ज़रूरी है वर्ना दोनों कौम आपस में लड़ मरेंगी. अंग्रेज़ों ने पील पार्टीशन प्लान बनाया लेकिन वो कभी मुकम्मल नहीं हुआ. बात बढ़ती रही, अरब-यहूदी दंगे होते रहे. आखिर में अंग्रेज़ यहूदियों और अरब दोनों के दुश्मन बन गए.

न अंग्रेजों की चली, न संयुक्त राष्ट्र संघ की

1947 में अंग्रेज़ फिलिस्तीन को लेकर संयुक्त राष्ट्र चले गए. इस वक्त पूरी दुनिया यूरोप में यहूदियों के कत्लेआम को लेकर सहानुभूति से भरी थी. तो संयुक्त राष्ट्र ने भी माना कि यूरोप से आकर बसने वाले यहूदियों के लिए फिलिस्तीन को बांट कर एक देश बनना चाहिए. लेकिन अब तक हालात इतने बिगड़ गए थे कि अंग्रेज़ संयुक्त राष्ट्र का प्लान लागू नहीं करा सकते थे. तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि 15 मई 1948 में फिलिस्तीन छोड़ देंगे, बिना लड़ाई का स्थाई समाधान निकाले. अंग्रेज़ों के फिलिस्तीन में आखिरी चीफ सेक्रेटरी ने कह दिया था कि उनके ऑफिस की चाबी डोर मैट के नीचे छोड़ देंगे.

अंग्रेज़ों के जाने के एक दिन पहले ही 14 मई को यीशू ने आज़ादी का ऐलान कर दिया. अपने मुल्क को वही नाम दिया, जिसका यहूदियों ने 2000 सालों से सपना देखा था – इज़रायल. इस दिन से ज़्यादातर दुनिया के लिए फिलिस्तीन इज़रायल हो गया.

इज़रायल की आज़ादी के ऐलान पर दस्तखत करते हुए इज़रायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन
इज़रायल की आज़ादी के ऐलान पर दस्तखत करते हुए इज़रायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन

अंग्रेज़ गए तो अरब और यहूदियों में गृहयुद्ध छिड़ गया. अरब लोगों की मदद के लिए आस-पास के सारे अरब देशों ने इज़रायल पर हमला कर दिया. लेकिन इज़रायल डटकर लड़ा और सबको हराया. कभी फिलिस्तीन कहलाने वाले इलाके में से 78 फीसदी पर अब इज़रायल का कब्ज़ा हो गया, यरुशेलम सहित. अरब गाज़ा और वेस्ट बैंक में ठेल दिए गए. यही इज़रायल की सबसे मुकम्मल तस्वीर है.

इसके बाद इज़रायल और अरब देशों में मशहूर सिक्स डे वॉर और यौम किप्पुर वॉर जैसी लड़ाइयां होती रहीं. इसमें इज़रायल ने ज़मीन जीती लेकिन उसका मौलिक अधिकार हमेशा उतने इलाके पर ही माना गया जितना 1949 में उसके पास था. अरब बचे हुए 22 फीसदी के लिए लड़ते आ रहे हैं. इस लड़ाई को हम इज़रायल फिलिस्तीन के झगड़े के नाम से जानते हैं. इस झगड़े के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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