यूपी का वो ब्लास्ट केस, जिसमें अखिलेश यादव ने केस वापस लेने की सिफ़ारिश कर दी थी
गोरखपुर, फ़ैज़ाबाद, बनारस और लखनऊ में धमाकों के बाद यूपी पुलिस पर सवाल क्यों उठे?
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2007 में फ़ैज़ाबाद कोर्ट में भी बम धमाका हुआ था. तारिक क़ासमी और ख़ालिद मुजाहिद को इन धमाकों के लिए भी दोषी ठहराया गया था.
22 मई 2007. यूपी का गोरखपुर. यहां गोरखनाथ मंदिर से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर है गोलघर. शाम का समय था. अंधेरा धीरे-धीरे घिर रहा था. लोग अपने-अपने काम से ख़ाली हो रहे थे. अचानक से गोलघर पर एक के बाद एक तीन धमाके हुए. धमाके बहुत तेज़ नहीं थे. लिहाज़ा किसी की मौत नहीं हुई. लेकिन 6 लोग घायल ज़रूर हो गए. खबरें बताती हैं कि बहुत कमज़ोर ब्लास्ट था. क़यास लगाए गए कि ये चेतावनी की नीयत से किए गए धमाके थे.
जांच के दौरान पुलिस ने दावा किया कि इन धमाकों को इंडियन मुजाहिदीन और हरक़त-उल-जिहाद इस्लामी (हूजी) ने अंजाम दिया है. इस घटना के कुछ महीनों बाद दिसम्बर के महीने में यूपी पुलिस ने गिरफ़्तारी की. दो लोगों की. एक तारिक क़ासमी और दूसरे ख़ालिद मुजाहिद की. STF ने तारिक़ और ख़ालिद पर आरोप लगाए कि ये लोग हूजी के लिए काम करते हैं. STF ने दावा किया कि इन लोगों को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया था. तारिक और ख़ालिद के पास से 1.25 किलो RDX, 6 डेटोनेटर, 3 मोबाइल फ़ोन और 2 सिम कार्ड बरामद हुए थे.
बनारस की कचहरी में भी ब्लास्ट हुआ था, जिसका आरोपी तारिक और ख़ालिद को बताया गया.
तारिक और ख़ालिद को साल 2007 में ही 23 नवंबर को लखनऊ, बनारस और फ़ैज़ाबाद की कचहरी में हुए बम धमाकों का भी दोषी बनाया गया. इन धमाकों में कई लोगों की मौक़े पर मौत हो गई थी. साल 2013 में ख़ालिद की फ़ैज़ाबाद से लखनऊ आते वक़्त पुलिस हिरासत में मौत हो गयी. और अब गोरखपुर सेशन कोर्ट ने तारिक क़ासमी को गोरखपुर बम धमाकों में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
लेकिन यहां पर ये भी बताते चलें कि तारिक़ क़ासमी और ख़ालिद मुजाहिद को हिरासत में लिए जाने, यूपी पुलिस की कार्रवाई और पुलिस हिरासत में ख़ालिद मुजाहिद की मौत पर सवाल भी उठे थे.
विवाद और निमेष आयोग
तारिक और ख़ालिद की गिरफ़्तारी को लेकर STF ने जो दावे किए, उस पर मीडिया में प्रकाशित ख़बरों और ख़ालिद और तारिक के परिजनों की ओर से कई सवाल उठाए गए थे. जहां STF ने ये दावा किया था कि तारिक और ख़ालिद को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से पकड़ा गया था, वहीं परिजनों का आरोप था कि सादी वर्दी में आए लोग दोनों को घरों से ले गए थे.
जौनपुर के मड़ियाहूं थाना क्षेत्र में रहने वाला ख़ालिद मदरसे में पढ़ाता था. परिजनों का दावा था कि 16 दिसंबर 2007 को मदरसे में पढ़ाने के बाद ख़ालिद शाम को घर लौट रहा था. एक चाट की दुकान पर रुककर चाट खाने लगा. इसी वक्त वहां सफेद रंग की टाटा सूमो आयी. आरोप है कि गाड़ी में सादी वर्दी में हथियारबंद लोग सवार थे. वो ख़ालिद को ज़बरन उठाकर गाड़ी में बिठाने लगे. खालिद और मौके पर मौजूद लोगों ने विरोध किया, तो सूमो से आए लोगों ने हथियार निकाल लिए और ख़ालिद को लेकर चले गए. आरोप है कि खालिद के चचेरे भाई ने इस घटना की सूचना तत्काल थाने पर दी, और FIR दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन पुलिस ने इंकार कर दिया. कहा जाता है कि ये सूचना प्रदेश के डीजीपी सहित सभी जिम्मेदार अधिकारियों और मानवाधिकार आयोग को दी गई. लेकिन तत्काल कोई क़दम नहीं उठाए गए.
अभियुक्त तारिक क़ासमी (बाएं) और ख़ालिद मुजाहिद (दाहिने). ख़ालिद की 2013 में मौत हो गयी थी. (तस्वीर साभार : आउटलुक)
वहीं दूसरे आरोपी तारिक क़ासमी की कहानी भी उसके परिजनों के मुताबिक इसी से मिलती जुलती है. तारिक पहले यूनानी डॉक्टर हुआ करता था. आज़मगढ़ में रानी की सराय में यूनानी दवाखाना चलाता था. तारिक और उसके परिजनों का दावा है कि तारिक अपने क्लीनिक से 12 दिसंबर की शाम को घर लौट रहा था. रास्ते में सफ़ेद रंग की टाटा सूमो गाड़ी ने तारिक की गाड़ी को ओवरटेक किया. गाड़ी में से कुछ लोग उतरे, और तारिक से सूमो में बैठे मरीज़ को देखने के लिए कहने लगे. इसी बीच कुछ लोगों ने उसे पकड़कर सूमो में डाल दिया. शोर मचाने पर तारिक के साथ मारपीट की गयी, ऐसे भी आरोप लगाए गए.
तारिक और ख़ालिद दोनों ने ही आरोप लगाए कि उन्हें बनारस, लखनऊ और फ़ैज़ाबाद में अलग-अलग स्थानों पर रखा गया. मारपीट की गयी. परिजनों का ये भी आरोप था कि 18-19 दिसंबर की दरम्यानी रात कुछ अधिकारी घर पर आए और कुछ काग़ज़ और सामान उठाकर ले गए. इसके बाद 22 दिसंबर को विस्फोटकों के साथ तारिक और ख़ालिद के बाराबंकी से गिरफ़्तार होने का दावा STF ने कर दिया.
कट टू मार्च 2008. ख़ालिद और तारिक की गिरफ़्तारी की जा चुकी थी. विवाद हो रहा था. यूपी के DGP थे विक्रम सिंह. विक्रम सिंह ने यूपी के प्रमुख गृह सचिव को पत्र लिखा कि तारिक क़ासमी और ख़ालिद मुजाहिद की गिरफ़्तारी के प्रकरण में कई प्रकार की शिकायतों और चर्चाओं की पृष्ठभूमि में एक न्यायिक जांच का अनुरोध किया गया है. इसके लिए रिटायर्ड ज़िला जज आरडी निमेष की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया जाए. ये था निमेष आयोग. इस आयोग को 6 महीने में अपनी जांच पूरी करके अपनी रिपोर्ट जमा करनी थी.
आयोग ने क्या कहा?
आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया. प्रदेश में सत्ता बदल गयी. 2012 में यूपी की कमान अखिलेश यादव ने सम्हाली. आयोग ने 31 अगस्त 2012 को अपनी रिपोर्ट सौंपी. साल 2013 में जब ख़ालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में ट्रांज़िट के दौरान मौत हो गयी, उसके कुछ समय बाद इस रिपोर्ट को यूपी विधानसभा में पेश किया गया. लेकिन जानकारों की मानें तो फ़रवरी में ही कई अख़बारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस रिपोर्ट को पहले ही सार्वजनिक कर दिया था. ख़बरों की मानें तो इस रिपोर्ट में आयोग ने तारिक और ख़ालिद की गिरफ़्तारी को संदिग्ध माना था. लेकिन उन्होंने इसके दोषियों की शिनाख्त करने और उनकी ज़िम्मेदारी तय नहीं की थी.
अखिलेश यादव
उसी समय यूपी सरकार ने बड़ा क़दम उठाया. ख़ालिद और तारिक समेत दूसरे कुछ आरोपियों के खिलाफ़ दर्ज केसों को वापिस लेने का प्रयास शुरू किया. कहा जाता है कि इसके लिए यूपी के गृह विभाग की तरफ़ से पत्र भेजा गया. लेकिन बाराबंकी कोर्ट ने केस खत्म करने से इनकार कर दिया. इसकी वजह पर्याप्त कारणों का अभाव और केस बंद करने लायक साक्ष्य न होना बताया गया. उसके बाद ट्रायल चला. और अब गोरखपुर ब्लास्ट केस में कोर्ट की ओर से तारिक को सज़ा सुनाई गई है.
जांच के दौरान पुलिस ने दावा किया कि इन धमाकों को इंडियन मुजाहिदीन और हरक़त-उल-जिहाद इस्लामी (हूजी) ने अंजाम दिया है. इस घटना के कुछ महीनों बाद दिसम्बर के महीने में यूपी पुलिस ने गिरफ़्तारी की. दो लोगों की. एक तारिक क़ासमी और दूसरे ख़ालिद मुजाहिद की. STF ने तारिक़ और ख़ालिद पर आरोप लगाए कि ये लोग हूजी के लिए काम करते हैं. STF ने दावा किया कि इन लोगों को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ़्तार किया गया था. तारिक और ख़ालिद के पास से 1.25 किलो RDX, 6 डेटोनेटर, 3 मोबाइल फ़ोन और 2 सिम कार्ड बरामद हुए थे.
बनारस की कचहरी में भी ब्लास्ट हुआ था, जिसका आरोपी तारिक और ख़ालिद को बताया गया.
तारिक और ख़ालिद को साल 2007 में ही 23 नवंबर को लखनऊ, बनारस और फ़ैज़ाबाद की कचहरी में हुए बम धमाकों का भी दोषी बनाया गया. इन धमाकों में कई लोगों की मौक़े पर मौत हो गई थी. साल 2013 में ख़ालिद की फ़ैज़ाबाद से लखनऊ आते वक़्त पुलिस हिरासत में मौत हो गयी. और अब गोरखपुर सेशन कोर्ट ने तारिक क़ासमी को गोरखपुर बम धमाकों में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
लेकिन यहां पर ये भी बताते चलें कि तारिक़ क़ासमी और ख़ालिद मुजाहिद को हिरासत में लिए जाने, यूपी पुलिस की कार्रवाई और पुलिस हिरासत में ख़ालिद मुजाहिद की मौत पर सवाल भी उठे थे.
विवाद और निमेष आयोग
तारिक और ख़ालिद की गिरफ़्तारी को लेकर STF ने जो दावे किए, उस पर मीडिया में प्रकाशित ख़बरों और ख़ालिद और तारिक के परिजनों की ओर से कई सवाल उठाए गए थे. जहां STF ने ये दावा किया था कि तारिक और ख़ालिद को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से पकड़ा गया था, वहीं परिजनों का आरोप था कि सादी वर्दी में आए लोग दोनों को घरों से ले गए थे.
जौनपुर के मड़ियाहूं थाना क्षेत्र में रहने वाला ख़ालिद मदरसे में पढ़ाता था. परिजनों का दावा था कि 16 दिसंबर 2007 को मदरसे में पढ़ाने के बाद ख़ालिद शाम को घर लौट रहा था. एक चाट की दुकान पर रुककर चाट खाने लगा. इसी वक्त वहां सफेद रंग की टाटा सूमो आयी. आरोप है कि गाड़ी में सादी वर्दी में हथियारबंद लोग सवार थे. वो ख़ालिद को ज़बरन उठाकर गाड़ी में बिठाने लगे. खालिद और मौके पर मौजूद लोगों ने विरोध किया, तो सूमो से आए लोगों ने हथियार निकाल लिए और ख़ालिद को लेकर चले गए. आरोप है कि खालिद के चचेरे भाई ने इस घटना की सूचना तत्काल थाने पर दी, और FIR दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन पुलिस ने इंकार कर दिया. कहा जाता है कि ये सूचना प्रदेश के डीजीपी सहित सभी जिम्मेदार अधिकारियों और मानवाधिकार आयोग को दी गई. लेकिन तत्काल कोई क़दम नहीं उठाए गए.
अभियुक्त तारिक क़ासमी (बाएं) और ख़ालिद मुजाहिद (दाहिने). ख़ालिद की 2013 में मौत हो गयी थी. (तस्वीर साभार : आउटलुक)
वहीं दूसरे आरोपी तारिक क़ासमी की कहानी भी उसके परिजनों के मुताबिक इसी से मिलती जुलती है. तारिक पहले यूनानी डॉक्टर हुआ करता था. आज़मगढ़ में रानी की सराय में यूनानी दवाखाना चलाता था. तारिक और उसके परिजनों का दावा है कि तारिक अपने क्लीनिक से 12 दिसंबर की शाम को घर लौट रहा था. रास्ते में सफ़ेद रंग की टाटा सूमो गाड़ी ने तारिक की गाड़ी को ओवरटेक किया. गाड़ी में से कुछ लोग उतरे, और तारिक से सूमो में बैठे मरीज़ को देखने के लिए कहने लगे. इसी बीच कुछ लोगों ने उसे पकड़कर सूमो में डाल दिया. शोर मचाने पर तारिक के साथ मारपीट की गयी, ऐसे भी आरोप लगाए गए.
तारिक और ख़ालिद दोनों ने ही आरोप लगाए कि उन्हें बनारस, लखनऊ और फ़ैज़ाबाद में अलग-अलग स्थानों पर रखा गया. मारपीट की गयी. परिजनों का ये भी आरोप था कि 18-19 दिसंबर की दरम्यानी रात कुछ अधिकारी घर पर आए और कुछ काग़ज़ और सामान उठाकर ले गए. इसके बाद 22 दिसंबर को विस्फोटकों के साथ तारिक और ख़ालिद के बाराबंकी से गिरफ़्तार होने का दावा STF ने कर दिया.
कट टू मार्च 2008. ख़ालिद और तारिक की गिरफ़्तारी की जा चुकी थी. विवाद हो रहा था. यूपी के DGP थे विक्रम सिंह. विक्रम सिंह ने यूपी के प्रमुख गृह सचिव को पत्र लिखा कि तारिक क़ासमी और ख़ालिद मुजाहिद की गिरफ़्तारी के प्रकरण में कई प्रकार की शिकायतों और चर्चाओं की पृष्ठभूमि में एक न्यायिक जांच का अनुरोध किया गया है. इसके लिए रिटायर्ड ज़िला जज आरडी निमेष की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया जाए. ये था निमेष आयोग. इस आयोग को 6 महीने में अपनी जांच पूरी करके अपनी रिपोर्ट जमा करनी थी.
आयोग ने क्या कहा?
आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया. प्रदेश में सत्ता बदल गयी. 2012 में यूपी की कमान अखिलेश यादव ने सम्हाली. आयोग ने 31 अगस्त 2012 को अपनी रिपोर्ट सौंपी. साल 2013 में जब ख़ालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में ट्रांज़िट के दौरान मौत हो गयी, उसके कुछ समय बाद इस रिपोर्ट को यूपी विधानसभा में पेश किया गया. लेकिन जानकारों की मानें तो फ़रवरी में ही कई अख़बारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस रिपोर्ट को पहले ही सार्वजनिक कर दिया था. ख़बरों की मानें तो इस रिपोर्ट में आयोग ने तारिक और ख़ालिद की गिरफ़्तारी को संदिग्ध माना था. लेकिन उन्होंने इसके दोषियों की शिनाख्त करने और उनकी ज़िम्मेदारी तय नहीं की थी.
अखिलेश यादव
उसी समय यूपी सरकार ने बड़ा क़दम उठाया. ख़ालिद और तारिक समेत दूसरे कुछ आरोपियों के खिलाफ़ दर्ज केसों को वापिस लेने का प्रयास शुरू किया. कहा जाता है कि इसके लिए यूपी के गृह विभाग की तरफ़ से पत्र भेजा गया. लेकिन बाराबंकी कोर्ट ने केस खत्म करने से इनकार कर दिया. इसकी वजह पर्याप्त कारणों का अभाव और केस बंद करने लायक साक्ष्य न होना बताया गया. उसके बाद ट्रायल चला. और अब गोरखपुर ब्लास्ट केस में कोर्ट की ओर से तारिक को सज़ा सुनाई गई है.

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