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अटल सरकार के बारे में दो चौंकाने वाले खुलासे

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दिल्ली का एक इलाका है धौला कुआं. इसके पास एक अस्पताल है. फौजी भाइयों के लिए. रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल. यहां एक मरीज है. 7 अगस्त को उन्हें यहां भर्ती हुए पांच बरस हो जाएंगे. मरीज को नहीं पता. क्योंकि वो कोमा में है.

लेकिन सुर्खियां सेहत या तारीखों का इंतजार नहीं करतीं. पिछले कई रोज से ये मरीज खबरों में है. दो नई किताबों के चलते. पहली किताब है आईएएस, नेता, मंत्री और फिर बागी हुए यशवंत सिन्हा की ऑटोबायोग्राफी. द रेलेंटलेस- एन आटोबायोग्राफी. दूसरी किताब है भारतीय नौ सेना के मुखिया रहे एडमिरल (रिटायर्ड) सुशील कुमार की. इसका शीर्षक है ए प्राइम मिनिस्टर टु रिमेंबर- मेमरीज ऑफ ए मिलिट्री चीफ.

अब इंतजार खत्म करते हैं. मरीज का नाम है मेजर जसवंत सिंह. एक और नाम भी है. राजनीति वाला. जसवंत सिंह जसोल. भाजपा के संस्थापक सदस्य. अटल सरकार में रक्षा, वित्त और विदेश मंत्री रहे. 2014 तक सांसद रहे. और फिर बीजेपी का टिकट न मिलने पर बाड़मेर से बागी हो लड़े. इसी चक्कर में पार्टी से निकले. चुनाव हारे. मगर जिंदगी की जंग. वो अभी जारी है.

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अगर पुराने संदर्भ देने की छूट होती है तो लिखता कि जसवंत स्वतंत्र पार्टी की सोच वाले थे. स्वतंत्र पार्टी पूंजीवाद विरोधी नहीं थी. समाजवाद के नाम पर रूस के मॉडल की समर्थक नहीं थी. और इसीलिए उस दौर के सरकारी समाजवादी, यानी कांग्रेस स्वतंत्र पार्टी और इसके नेताओं को अमरीका का पिट्ठू कहते थे. एक दौर था, जब अमरीकी एजेंट शब्द को हिंदुस्तान की सियासत में गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता था.

एक दौर आज का है. जब जसवंत सिंह पर अमरीकी असर में होने के इल्जाम लग रहे हैं. एडमिरल सुशील कुमार अपनी किताब में एक ब्यौरा देते हैं. अपने कार्यकाल के दौरान का. उनका कार्यकाल था दिसंबर 1998 से दिसंबर 2001 के बीच. और इसी बीच हुआ था 9/11. इस हमले के बाद अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अफगानिस्तान के खिलाफ जंग का ऐलान किया था. अमरीका चाहता था कि इस जंग में भारत भी उसका साथ दे. इसी मकसद से नई दिल्ली में एक अमरीकी फौजी दल सरकार से मिलने आया था. इसकी कमान थी यूएस पैसिफिक कमान के कमांडर इन चीफ एडमिरल डेनिस ब्लेयर के पास. डेनिस ने कुमार से कहा कि हमें खुद हमारे राष्ट्रपति ने भेजा है. हमें आपका सहयोग चाहिए.

रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, जहां पिछले 5 साल से भर्ती हैं जसवंत सिंह
रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, जहां पिछले 5 साल से भर्ती हैं जसवंत सिंह

ऐसा नहीं था कि सहयोग का बयान सिर्फ खाकी वर्दी वालों की तरफ से आ रहा था. डेनिस ने कहा कि अमरीकी विदेश उप मंत्री स्ट्रॉब टैलबॉट भी भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा से बात कर रहे हैं.

क्या चाहता था अमरीका हमसे. ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम (अफगानिस्तान पर हमले के लिए दिया गया नाम) के दौरान. ये कि नौ सेना हमारे जंगी जहाज अमरीकी जहाजों और लड़ाकू विमानों को बीच समंदर खाद पानी तेल इत्यादि मुहैया कराएं. वायुसेना बमवर्षक जहाजों के उड़ने के लिए अपने फॉरवर्ड बेस दे. और थलसेना अफगानिस्तान में जमीनी तैनाती के लिए अपने सिपाही भेजे.

इन तीनों सेनाओं के उस वक्त मुखिया थे एडमिरल सुशील कुमार, एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस और जनरल एस पदमनाभन. तीनों ने तय किया. सरकार को इस युद्ध में शामिल होने के खिलाफ सुझाव देंगे.

फिर हुई साउथ ब्लॉक यानी पीएमओ में सीसीएस की मीटिंग. जसवंत सिंह ने अपनी खूबसूरत लहजे और शब्दों वाली अंग्रेजी में तर्क रखने शुरू किए. कि कैसे ये अमरीका की नहीं, पूरी दुनिया की जंग है. आतंकवाद के खिलाफ. कि कैसे ये मौका है, हमारे लिए. दुनिया की इकलौती महाशक्ति अमरीका के साथ बावस्ता होने का. आदि इत्यादि.

जसवंत ये सब बोल रहे थे और वाजपेयी सुशील की तरफ देख रहे थे. जसवंत रुके तो वाजपेयी बोले.

हमारे एडमिरल खुश नहीं हैं.

बातचीत के क्रम में फौजी अफसरों की भी बारी आई. सुशील कुमार ने कहा, हम तो अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध में नहीं हैं.

अब अटल ने नजर रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की तरफ घुमाई. वह भी एक वाक्य बोल चुप हो गए.

हमारे सेनाध्यक्षों ने सब कह दिया है.

सूक्तियों का सियासी संत समझ गया. अब उसकी बारी थी. देश के प्रधानमंत्री बोले.

इसको थोड़ा और सोचना पड़ेगा.

किसी को सोचने की जरूरत नहीं पड़ी. मामला ठंडे बस्ते में चला गया.

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जसवंत का दूसरा जिक्र आया जुलाई 2001 की आगरा शिखर वार्ता के जिक्र में. यशवंत सिन्हा की किताब में. किताब के ब्यौरों के मुताबिक…

आगरा में अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के चीफ मार्शल लॉ ऑफिसर परवेज मुशर्रफ के बीच बात होनी थी. पूरी सीसीएस (सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी) को वहां रहने को कहा गया था.

काफी हाइप के बीच बात शुरू हुई. मुशर्रफ इस मौके का इस्तेमाल दुनिया के सामने अपनी सत्ता को वैधता दिलवाने के लिए कर रहे थे.

आगरा में वाजपेयी और मुशर्रफ के बीच आमने सामने वन ऑन वन वाली बातचीत शुरू हुई. हर दौर की बात के बाद वाजपेयी अपने मंत्रियों और सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र को ब्रीफ करते. उधर औपचारिकता के लिए प्रतिनिधिमंडल की भी बैठक चल रही थी. पहला दिन ऐसे ही बीता. दूसरे दिन भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने प्रस्ताव दिया कि अटल और मुशर्रफ के साथ, दोनों देशों के विदेश मंत्री भी बैठें. पाकिस्तान के विदेश मंत्री अब्दुल सत्तार भी इसके लिए सहमत थे. और दोनों देशों के मुखिया तो थे ही. तो अब चार लोगों के बीच बातचीत चली. फिर दोनों विदेश मंत्रियों ने एक साझा बयान का मसौदा तैयार किया.

आगरा शिखर वार्ता  के दौरान की प्रधानमंत्री अटल बिहारी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ
आगरा शिखर वार्ता  के दौरान की प्रधानमंत्री अटल बिहारी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ (फोटो-इंडिया टुडे)

टाइप किए मसौदे में जसवंत सिंह ने अपनी कलम से कुछ बदलाव किए. फिर इस कागज की दो फोटोकॉपी कराई गईं. एक कॉपी अब्दुल सत्तार को दे दी गई. दूसरी लेकर जसवंत सिंह अटल बिहारी के कमरे में आए. यहां प्रधानमंत्री अटल बिहारी से चर्चा कर रहे थे गृह मंत्री आडवाणी और वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा.

यशवंत और आडवाणी ने ड्राफ्ट को ध्यान से पढ़ा और दो बिंदुओं पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई. आडवाणी ने कहा कि इसमें सीमापार के पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का जिक्र नहीं है. ये जरूर होना चाहिए. सिन्हा ने कहा कि ड्राफ्ट में 1972 के शिमला समझौते का संदर्भ नहीं आया. इसे नहीं छोड़ा जा सकता. जसवंत को ये दोनों बिंदु ड्राफ्ट में जोड़ने की सलाह दी गई. अटल बिहारी भी इन बिंदुओं से सहमत थे. लेकिन जसवंत उखड़ गए. यशवंत सिन्हा लिखते हैं

मुझे नहीं पता कि वह किस तरह के प्रेशर में काम कर रहे थे. वह हमारे सुझाव सुन भड़क गए. गुस्से में बोले, ये ड्राफ्ट मैंने फाइनल किया है पाकिस्तान के विदेश मंत्री संग मिलकर. अगर आपको इस पर भरोसा नहीं है, तो आपको मुझ पर भी भरोसा नहीं है. अब मैं इस मामले में कुछ नहीं करूंगा. आप सब लोग ड्राफ्ट फाइनल कर लें.

इसके बाद जसवंत कमरे से निकल गए. मीटिंग अचानक खत्म हो गई.

कमरे से बाहर निकलते हुए आडवाणी बोले, यशवंत जी, क्या हमने अपनी असहमतियां बताकर कोई गलती की. यशवंत ने आडवाणी से कहा कि हमे जो ठीक लगा, वही कहा. फिर यशवंत जसवंत के कमरे में गए. उन्हें समझाने की कोशिश की. कुछ घंटों बाद जसवंत शांत हुए. मगर तब तक शिखर वार्ता अशांत हो चुकी थी.

आगरा शिखर वार्ता (फोटो- इंडिया टुडे)
आगरा शिखर वार्ता (फोटो- इंडिया टुडे)

मुशर्रफ भारतीय संपादकों के साथ बात कर रहे थे. टीवी पर ये लाइव दिखाया जा रहा था. मुशर्रफ अपने प्रोपेगेंडा में सफल हुए. वार्ता असफल हुई.

जसवंत किसके दबाव में थे. अमरीकी राजनयिकों के साथ उनके करीबी संबंधों की तरफ क्यों इशारा किया जाता है. जसवंत की क्या सफाई है.

हम नहीं जान पाएंगे. क्योंकि उनका दिमाग कोमा में है. बीमारी से रूमानियत दूर ही रखी जाए तो बेहतर. मगर चितेरे दिमाग के घुप्प अंधेरे के पार सफेद रौशनी दिखाते हैं. गहराई में जाती.

जैसे धौला कुआं. इसमें मिलने वाली सफेद रेत के चलते धौला (सफेद) नाम पाता.

जिसके करीब रेत का एक सिपाही (ग्राम पोस्ट जसोल, जिला बाड़मेर) बिखर रहा है. तिनका तिनका.


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