खराब किडनी छोड़ 'हेल्दी' किडनी निकाल दी, 14 साल बाद डॉक्टर पर 2 करोड़ का जुर्माना
Aligarh Medical negligence: NCDRC ने गलत सर्जरी के चलते हुई एक मौत के मामले में डॉक्टर को आदेश दिया है कि वे पीड़ित परिवार को 2 करोड़ रुपये का मुआवजा दे. सालों तक चली काूननी लड़ाई के बाद शख्स ने केस जीता है.

नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) ने एक व्यक्ति को 2 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश अलीगढ़ के एक डॉक्टर को दिया है. डॉक्टर को पीड़ित की मां की सर्जरी करनी थी. आरोप है कि इस दौरान डॉक्टर ने महिला की खराब किडनी की बजाय स्वस्थ किडनी निकाल दी. इसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. 2 साल बाद उनकी मौत हो गई. आरोपी डॉक्टर की पहचान डॉ राजीव लोचन के तौर पर हुई है. अलीगढ़ में वो आशीर्वाद नर्सिंग होम चलाते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में राजीव लोचन ने एक महिला की गलत सर्जरी कर दी थी. इसके बाद उन्होंने परिवार को चुप रहने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट और 50 हजार रुपये के ‘रिश्वत’ की पेशकश भी की. लेकिन परिवार ने उनके खिलाफ NCDRC में 2014 में शिकायत दर्ज कराई. सालों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद मई 2026 में आयोग ने डॉक्टर को ‘लापरवाही से की गई सर्जरी’ के आरोप में पीड़ित परिवार को मुआवजा देने के लिए कहा.
मामले की सुनवाई जस्टिस एपी साही (प्रेसिडेंट) और भरत कुमार पांड्या (सदस्य) की बेंच कर रही थी. 18 मई के अपने आदेश में बेंच ने कहा,
2012 में पेट दर्द से शुरू हुआ मामलायह नुकसान ऐसा है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती. बेटों के लिए मां को खोना, पति के लिए पत्नी को खोना और परिवार के लिए एक गृहिणी को खोना. इस नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती. खासकर लापरवाही के तरीके को देखते हुए.
अलीगढ़ में रहने वाली शांति देवी (उस समय उम्र 56 साल) को पेट दर्द की समस्या थी. शुरू में उन्होंने नजरअंदाज किया लेकिन जब दर्द ज्यादा बढ़ने लगा तो वह डॉक्टर लोचन के क्लिनिक में गईं. शांति देवी के बेटे वीर सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा,
वो पहली बार डॉ. राजीव लोचन के क्लीनिक गए थे. हमें लगा कि यह एक रूटीन चेकअप होगा. मगर वहां कई टेस्ट हुए. सर्जरी के लिए कहा गया. हमने एक दो अस्पताल में और पूछा. वहां भी सर्जरी की सलाह दी गई. फिर हम आशीर्वाद क्लिनिक ही आ गए.
6 मई को मृतक को किडनी निकालने के लिए ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया. मगर सर्जरी के बाद चीजें और खराब होने लगीं. 24 घंटे बाद भी उन्हें पेशाब नहीं आया. शरीर सूज गया और हल्का नीला पड़ने लगा. फिर डॉक्टर ने उन्हें डायलिसिस के लिए दूसरे अस्पताल भेज दिया. 3 जून 2012 को वीर सिंह ने नई दिल्ली के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. दिनेश खुल्लर से सलाह ली. उन्होंने नए टेस्ट करवाने के लिए कहा, जिसमें पता लगा कि पहले वाले डॉक्टर ने मरीज की बाईं किडनी निकाल दी थी. वहीं, दाईं ओर की खराब किडनी शरीर में ही मौजूद थी.
वीर सिंह ने बताया कि डॉ लोचन ने अपनी गलती नहीं मानी. उन्होंने कहा कि वो शांति देवी की किडनी ट्रांसप्लांट करा देंगे. उनके परिवार को चुप रहने के लिए 50 हजार रुपये देने की पेशकश भी की. रवि ने बताया,
डॉक्टर का लाइसेंस रद्दमां और हमारा ब्लड ग्रुप अलग था. हमने किडनी ट्रांसप्लांट के लिए AIIMS नई दिल्ली में रजिस्ट्रेशन कराया लेकिन वहां लाइन बहुत लंबी थी.
परिवार ने डॉक्टर के खिलाफ पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई. घटना की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया. 18 जुलाई 2012 को बोर्ड ने डॉ. लोचन को ‘पूरी तरह से जिम्मेदार और दोषी’ पाया. मार्च 2013 में उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल ने डॉ. लोचन का लाइसेंस दो साल के लिए सस्पेंड कर दिया. 2014 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस सस्पेंशन को बरकरार रखा. इस बीच शांति देवी की 20 फरवरी 2014 को ‘शॉक और सेप्टीसीमिया’ से मौत हो गई. उसी साल अगस्त में वीर सिंह ने डॉ. लोचन पर मेडिकल लापरवाही का आरोप लगाते हुए NCDRC में शिकायत दर्ज कराई.
शिकायत में कहा गया,
परिवार को शक था कि स्वर्गीय शांति देवी के शरीर से निकाली गई स्वस्थ किडनी को (डॉ. लोचन) ने खुद अमीर बनने की नीयत से गैर-कानूनी तरीके से बेच दिया था.
2015 में शिकायत स्वीकार हुई. 2017 तक लिखित बयान दाखिल हुए. कई बार सुनवाई टली. 2026 में अब मामले पर सुनवाई होकर फैसला आया. कोर्ट ने माना कि अगर सही ऑपरेशन होता, तो मरीज ज्यादा समय तक जीवित रहती. कोर्ट ने दोषी डॉक्टर से मरीज के परिवार को 2 करोड़ का मुआवजा देने को कहा है.
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