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बंगाल में DGP नियुक्ति पर बवाल, UPSC ने राज्य सरकार का पैनल लौटाया, सुप्रीम कोर्ट जाने को कहा

UPSC ने 31 दिसंबर 2025 को तत्कालीन होम सेक्रेटरी (अब मुख्य सचिव) नंदिनी चक्रवर्ती को दो पेज का लेटर लिखा था. जिसमें साफ कहा कि राज्य ने डीजीपी पद की वेकेंसी दिसंबर 2023 में होने के बावजूद प्रस्ताव जुलाई 2025 में भेजा गया.

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UPSC Cites Delay, Asks Bengal To Approach Supreme Court Over Top Cop's Appointment
UPSC ने 30 अक्टूबर 2025 को इम्पैनलमेंट कमेटी की बैठक बुलाई, लेकिन वैकेंसी की तारीख को लेकर सदस्यों में मतभेद थे. (फोटो- PTI)
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प्रशांत सिंह
7 जनवरी 2026 (Updated: 7 जनवरी 2026, 11:40 AM IST)
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पश्चिम बंगाल में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नई नियुक्ति पर विवाद गहरा गया है. UPSC ने राज्य सरकार द्वारा भेजे गए पैनल प्रस्ताव को देरी के कारण वापस कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट से दिशा-निर्देश लेने की सलाह दी है. ये मामला इसलिए बेहद संवेदनशील है क्योंकि वर्तमान DGP राजीव कुमार 31 जनवरी 2026 को रिटायर हो रहे हैं, जबकि विधानसभा चुनाव मार्च-अप्रैल 2026 में होने की संभावना है. ऐसे में नए DGP की समय पर नियुक्ति न होना चुनावी व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है.

UPSC ने 31 दिसंबर 2025 को तत्कालीन होम सेक्रेटरी (अब मुख्य सचिव) नंदिनी चक्रवर्ती को दो पेज का लेटर लिखा था. जिसमें साफ कहा कि राज्य ने डीजीपी पद की वेकेंसी दिसंबर 2023 में होने के बावजूद प्रस्ताव जुलाई 2025 में भेजा गया. ये सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में 3 जुलाई 2018 के आदेश का उल्लंघन है. इस आदेश में स्पष्ट निर्देश है कि राज्य सरकारें डीजीपी नियुक्ति का प्रस्ताव वर्तमान अधिकारी के रिटायरमेंट से कम से कम तीन महीने पहले यूपीएससी को भेजें.

देरी के बावजूद UPSC ने 30 अक्टूबर 2025 को इम्पैनलमेंट कमेटी की बैठक बुलाई, लेकिन वैकेंसी की तारीख को लेकर सदस्यों में मतभेद थे. इस गतिरोध पर यूपीएससी ने भारत के अटॉर्नी जनरल से कानूनी राय ली. अटॉर्नी जनरल ने स्पष्ट किया कि यूपीएससी के पास ऐसी बड़ी देरी को माफ करने का कोई प्रावधान नहीं है. यदि प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो ये गंभीर अनियमितता होगी, क्योंकि इससे अन्य योग्य IPS अधिकारियों को इम्पैनलमेंट का अवसर नहीं मिल पाएगा. उन्होंने सलाह दी कि राज्य सरकार को पहले ही सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण या अनुमति लेनी चाहिए थी.

ये विवाद नया नहीं है. ममता बनर्जी सरकार प्रकाश सिंह फैसले के बाद से यूपीएससी की भूमिका का विरोध करती रही हैं. राज्य का तर्क है कि पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य सूची में आते हैं, इसलिए डीजीपी नियुक्ति में केंद्र का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.

पुराने विवाद

2021 में भी डीजीपी नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की याचिका खारिज की थी, जिसमें यूपीएससी को बाईपास करने की मांग थी. कोर्ट ने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया था. इससे पहले 2019 में भी पांच राज्यों (बंगाल सहित) की याचिकाएं खारिज हुईं.

राजीव कुमार खुद विवादों में रहे हैं. 2019 में सीबीआई जांच के दौरान ममता बनर्जी उनके समर्थन में धरने पर बैठी थीं. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने उन्हें डीजीपी पद से हटाया था, लेकिन चुनाव बाद फिर बहाल कर दिया. 2016 विधानसभा चुनाव से पहले भी राजीव कुमार (तब कोलकाता पुलिस कमिश्नर) को हटाया गया था.

वीडियो: राजधानी: अमित शाह ने पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले क्या दावा किया?

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