AIADMK में पड़ी फूट, एक गुट ने TVK को दिया समर्थन, कहा- 'विजय जनता के मुख्यमंत्री'
Tamil Nadu Politics: AIADMK के सीनियर नेता सीवी शनमुगम वाले गुट ने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) को समर्थन दे दिया है. उन्होंने यह भी साफ किया कि AIADMK किसी भी अलायंस का हिस्सा नहीं है, यानी पार्टी का BJP से कोई रिश्ता नहीं है.

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद AIADMK (ऑल इंडियन अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम) में फूट पड़ गई है. पार्टी के एक गुट ने थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (TVK) को समर्थन दे दिया है. इस गुट का नेतृत्व सीवी शनमुगम कर रहे हैं. उनके साथ कम से कम 30 विधायक हैं. हालांकि, शनमुगम ने कहा कि उनका मकसद AIADMK को तोड़ना नहीं है.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, समर्थन का ऐलान करते हुए सीवी शनमुगम ने AIADMK में दरार की खबरों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि उनका पार्टी को तोड़ने का कोई इरादा नहीं है. इससे पहले मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा था कि शनमुगम के नेतृत्व वाला विधायकों का समूह चाहता है कि पार्टी प्रमुख एडप्पादी के. पलानीस्वामी अपने पद से इस्तीफा दे दें.
शनमुगम ने यह भी साफ किया कि AIADMK किसी भी अलायंस का हिस्सा नहीं है, यानी पार्टी का BJP से कोई रिश्ता नहीं है. हाल ही में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में AIADMK ने कुल 47 सीटें जीती थीं. TVK को यह समर्थन ऐसे समय में आया है, जब तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री विजय को यह साबित करना होगा कि उनके पास बहुमत का समर्थन है.
TVK चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, उसने 108 सीटें जीतीं, लेकिन बहुमत से 10 सीटें कम रह गईं. विजय ने कांग्रेस, लेफ्ट, विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की मदद से सरकार बनाई.
शनमुगम ने क्या कहा?चेन्नई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए शनमुगम ने पार्टी को चुनावों में मिली असफलताओं की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा,
“यह जनादेश विशेष रूप से विजय के मुख्यमंत्री बनने के लिए है. यह सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात है जिसे हमें समझना होगा. लोगों का जनादेश विजय के मुख्यमंत्री बनने के पक्ष में है. इसलिए, हम लोगों के जनादेश का सम्मान करते हैं. उस जनादेश का मान रखने के लिए, हम मुख्यमंत्री विजय को पूरे दिल से बधाई देते हैं. AIADMK पार्टी और AIADMK विधायी दल के तौर पर, हम मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली TVK सरकार को अपना पूरा समर्थन देते हैं.”
राज्यसभा के पूर्व सांसद शनमुगम ने कहा कि 30 विधायक ‘द्रविड़ मुनेत्र कझगम’ (DMK) और AIADMK के बीच गठबंधन की खबरों से नाराज थे. उन्होंने यह भी कहा कि AIADMK प्रमुख EPS यानी एडप्पादी के. पलानीस्वामी DMK के समर्थन से मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. लेकिन ज्यादातर विधायकों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. शनमुगम ने आगे कहा,
"हम एकजुट रहेंगे. EPS अब भी हमारे नेता हैं. हम किसी भी गठबंधन (BJP) के साथ नहीं हैं. EPS हमारे महासचिव हैं."
शनमुगम के समर्थन देने के बाद अब पलानीस्वामी के साथ केवल 17 विधायक ही बचे हैं.
EPS गुट ने लगाया लालच का आरोप
EPS गुट वाली AIADMK का आरोप है कि बागी विधायक इस लालच में TVK से जुड़ रहे हैं कि विजय उन्हें मंत्री पद दे देंगे. AIADMK ने अपने ऑफिशियल अकाउंट से लिखा,
“पार्टी किसके साथ गठबंधन करेगी, ये तय करने वाले आप (शनमुगम) कौन होते हैं? 1 करोड़ 34 लाख से ज्यादा वोट हमारी पार्टी EPS के लिए पड़े थे. उनकी वजह से जीत हासिल करने के बाद आज उसी पार्टी, कार्यकर्ताओं और हमारे सहयोगी दलों BJP, PMK और AMMK को छोड़ना शर्मनाक है. पार्टी को संभालकर रखने वाले हमारे महासचिव पलानीस्वामी (EPS) ही हैं.”
AIADMK ने यहां BJP का भी नाम लिया. कहा कि बगावत करके 30 विधायकों ने हमारी साथी BJP को भी निराश कर दिया है.
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DMK से अलग होकर AIADMK का गठनAIADMK की स्थापना 17 अक्टूबर 1972 को जाने-माने एक्टर और नेता एम.जी. रामचंद्रन (MGR) ने की थी. MGR उस समय DMK में कोषाध्यक्ष थे. उन्होंने पार्टी के हिसाब-किताब में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया और सार्वजनिक रूप से खर्च का हिसाब-किताब मांगा. इससे नाराज होकर DMK प्रमुख एम. करुणानिधि ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया. इसके बाद MGR ने अपनी नई पार्टी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (ADMK) बनाई, जो बाद में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम(AIADMK) बनी.
MGR का निधन और पार्टी में फूट24 दिसंबर 1987 को मुख्यमंत्री रहते हुए MGR का निधन हो गया. इसके बाद पार्टी में उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष छिड़ गया. पार्टी दो गुटों में बंट गई. ‘जानकी गुट’ MGR की पत्नी वी.एन. जानकी का समर्थन कर रहा था. जबकि ‘जयललिता गुट’ एक्ट्रेस से नेता बनीं जे. जयललिता का समर्थन कर रहा था. जयललिता उस समय पार्टी की प्रचार सचिव थीं.
शुरुआत में जानकी रामचंद्रन ने बहुमत हासिल किया और वे तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन उनकी सरकार केवल 24 दिनों तक ही चल सकी. 1989 के विधानसभा चुनावों में दोनों गुट अलग-अलग लड़े, जिससे वोटों का बंटवारा हुआ और DMK सत्ता में लौट आई. इस चुनाव में जयललिता के गुट को 27 सीटें मिलीं, जबकि जानकी गुट को केवल 2 सीटें मिलीं.
जानकी रामचंद्रन ने अपनी हार स्वीकार की और राजनीति से संन्यास ले लिया. इसके बाद 1989 में पार्टी के दोनों गुटों का विलय हो गया और जयललिता को सर्वसम्मति से पार्टी का निर्विवाद नेता और महासचिव चुन लिया गया. 1991 के चुनावों में भारी जीत के साथ जयललिता पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं और 2016 में अपने निधन तक पार्टी की सबसे बड़ी नेता बनी रहीं.
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