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'दोषी नेता 6 साल बाद कैसे बना सकते हैं कानून?', SC ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

Supreme Court ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सजा पाए हुए विधायक/सांसदों पर लगाए जाने वाले छह साल के बैन पर सवाल उठाया है. कोर्ट ने केंद्र सरकार और EC से दागी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने वाली याचिका पर जवाब मांगा है.

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11 फ़रवरी 2025 (अपडेटेड: 11 फ़रवरी 2025, 02:47 PM IST)
supreme court mp mla convicted life ban
सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताओं के चुनाव लड़ने पर सवाल उठाया. (इंडिया टुडे)
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सजायाफ्ता विधायक/सांसदों (MP/MLA) पर लगाए जाने वाले छह साल के बैन पर सवाल उठाया है. कोर्ट ने कहा कि उसे दोषी ठहराए गए विधायकों को सिर्फ छह साल के लिए चुनाव लड़ने से रोकने में कोई लॉजिक नहीं दिखता. साथ ही कोर्ट ने सजा पाए विधायकों और सांसदों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने 2016 में सजा पाए विधायक/सांसदों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए एक जनहित याचिका दायर की थी. 2016 से लंबित इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच ने कहा, 

यदि दोष साबित हो जाए तो सरकारी कर्मचारी पर आजीवन प्रतिबंध लग जाता है. फिर लोग संसद में वापस कैसे आ सकते हैं? इसमें हितों का टकराव स्पष्ट है. कानून तोड़ने वाले लोग कानून कैसे बना सकते हैं?

अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए. उन्होंने रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1951 की धारा 8 औऱ 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी. याचिका में दोषी राजनेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने और अलग-अलग अदालतों में उनके खिलाफ लंबित मुकदमों को तेजी से निपटाने की मांग की गई.

मौजूदा और रिटायर्ड सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों की मॉनिटरिंग के मुद्दे को कोर्ट ने चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को रेफर कर दिया. कोर्ट ने ये फैसला तीन जजों की एक बेंच द्वारा 11 नवंबर, 2023 को पारित एक आदेश को ध्यान में रखते हुए लिया, जिसने याचिका के इस पहलू को कई गाइडलाइंस जारी करके निपटाया था. इन गाइडलाइंस के मुताबिक हाई कोर्ट्स को इन मामलों की मॉनिटरिंग के लिए एक डेडिकेटेड बेंच का गठन करना चाहिए. बेंच ने अपने जजमेंट में धारा 8 और 9 को चुनौती देने के मुद्दे को भविष्य में विचार करने के लिए अलग कर दिया था.

मौजूदा रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1951 की धारा 8 के तहत किसी राज्य विधानसभा या संसद का कोई सदस्य अपने अपराध के लिए सजा काटने की तारीख से छह साल तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है. धारा 8 के मुताबिक, दो या दो साल से ज्यादा अवधि की सजा वाले किसी अपराध में दोषी पाए जाने पर अयोग्यता वाला प्रावधान लागू होता है. 

धारा 9 के मुताबिक, राज्य या केंद्र सरकार के अंतर्गत कोई पद धारण करने वाला व्यक्ति, जिसे भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति निष्ठाहीनता के चलते बर्खास्त कर दिया गया हो, उसे बर्खास्तगी की तारीख से पांच साल की अवधि के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मामले पर विचार करने के लिए सुनवाई की अगली तारीख 4 मार्च तय की है. साथ ही बेंच ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी से इस मामले में सहायता करने का अनुरोध किया क्योंकि इसमें एक वैधानिक प्रावधान को चुनौती दी गई है. केंद्र की ओर से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट सोनिया माथुर ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा.

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कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है. मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस मनमोहन और दीपांकर दत्ता ने कहा, 

राजनीति का अपराधीकरण एक बड़ा मुद्दा है. और चुनाव आयोग को इस पर ध्यान देना चाहिए. हमें यह बताया जाना चाहिए कि जो व्यक्ति सरकारी सेवा में बने रहने के योग्य नहीं है, वह मंत्री कैसे बन सकता है. 

कोर्ट ने आगे क्लियर किया कि अगर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की ओर से कोई जवाब दाखिल नहीं किया जाता है तो वह मामले को आगे बढ़ाएगी.

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