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'मुसलमानों के लिए बेहतर शिक्षा और नौकरी तक पहुंचना आसान नहीं', नई रिपोर्ट में और क्या पता चला?

इस Study को वाशिंगटन डीसी के ‘यूएस-इंडिया पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ (USIPI) ने कराया है. इस रिपोर्ट को हैदराबाद की ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट पॉलिसी एंड प्रैक्टिस’ (CDPP) ने प्रकाशित किया है.

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Status of Muslims in India
शिक्षा और रोजगार के मामले में मुस्लिम समुदाय की पहुंच सीमित है. (सांकेतिक तस्वीर: PTI)
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रवि सुमन
13 मार्च 2025 (Updated: 13 मार्च 2025, 09:40 AM IST)
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देश में मुस्लिम समुदाय के लोगों की क्या स्थिति (Status of Muslims) है? पढ़ाई-लिखाई और नौकरी पाने के मामले में उनकी पहुंच कहां तक है? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब के लिए ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट पॉलिसी एंड प्रैक्टिस’ (CDPP), हैदराबाद ने एक नई रिपोर्ट पेश की है. रिपोर्ट का नाम है— ‘रिथिंकिंग अफर्मेटिव एक्शन फॉर मुस्लिम्स इन कंटेंपरेरी इंडिया’. हिंदी में इसे ‘समकालीन भारत में मुसलमानों के लिए सकारात्मक कार्रवाई पर पुनर्विचार’ कहा जाएगा.

इस रिपोर्ट में उन उपायों पर भी चर्चा की गई है, जिनसे शिक्षा और रोजगार के मामले में अल्पसंख्यक समुदाय की पहुंच को बढ़ाया जा सकता है.

एजुकेशनल स्टेटस
  • मुस्लिम परिवारों के स्कूली बच्चों के लिए इस बात कि बहुत कम संभावना है कि वो उच्च स्कूली शिक्षा ले पाएंगे. हालांकि, हाल के सालों में उनकी भागीदारी बढ़ी है.
  • सभी सामाजिक-धार्मिक समूहों (SRG) में पोस्ट सेकेंडरी लेवल पर (हाई स्कूल के बाद) मुस्लिम युवाओं की भागीदारी सबसे कम है. मुस्लिम ग्रेजुएट की संख्या अब भी बहुत कम है.
  • सभी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में प्राइवेट एजुकेशन तक मुस्लिम छात्रों की पहुंच थोड़ी बेहतर है. इसके बावजूद, इस मामले में उनकी स्थिति हिंदू अगड़ी जातियोंं और हिंदू OBC जातियों से बहुत पीछे है.
  • हिंदू अगड़ी जातियों और हिंदू OBC जातियों की तुलना में, बहुत कम ही मुस्लिम छात्र उच्च शिक्षा के लेवल पर कोई टेक्नीकल, प्रोफेशनल या मैनेजमेंट का कोर्स चुनते हैं. 

प्राइवेट एजुकेशन और प्रोफेशनल कोर्स को लेकर रिपोर्ट में एक और बात बताई गई है. हिंदू अगड़ी जातियों, हिंदू OBC जातियों और मुस्लिम लोगों के ‘परिवार और उनके रहने की जगह’ की एकसमान स्थिति के बावजूद, इन मामलों में मुस्लिम परिवारों की पहुंच बहुत कम है.

नौकरी की स्थिति

उपभोग और संपत्तियों के मालिकाना अधिकार के मामले में, मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अभाव का सामना कर रहा है. 

  • दूसरे वंचित SRG, रोजगार संरचना में ऊपर की ओर आ रहे हैं. उनकी स्थिति में सुधार हुआ है. इस तुलना में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. नौकरी के मामले में मुसलमानों की स्थिति में बड़े बदलाव नहीं आए हैं.
  • नियमित वेतन वाली नौकरियों तक मुसलमानों की पहुंच बढ़ी है. लेकिन सफेदपोश पेशों (ऑफिस से की जाने वाली नौकरियों) के मामले में वो अब भी पीछे हैं.
सुधार के तरीके

इस रिपोर्ट में सुधार के लिए सात सिफारिशें की गई हैं. इसके लिए कुछ बातों को आधार बनाया गया है-

  • सामाजिक नीतियों का मजबूत धर्मनिरपेक्षीकरण. यानी कि नीतियों को धर्म से परे रखकर बनाया जाए.
  • सरकार और सरकारी संस्थाओं को मुसलमानों की पहचान को निष्पक्ष और सकारात्मक रूप में दिखाना चाहिए. यानी न तो उनके बारे में गलत धारणाएं फैलाई जाएं और न ही उन्हें बाकी समाज से अलग-थलग महसूस कराया जाए.

सिफारिशें-

  1. OBC में धर्म-आधारित कोटा की कोई आवश्यकता नहीं है. OBC में एक सब कैटेगरी की जरूरत है जो तर्कसंगत और धर्मनिरपेक्ष हो.
  2. SC वर्ग में दलित मुस्लिम शामिल होने चाहिए.
  3. आरक्षण पर मौजूदा 50 प्रतिशत की सीमा का फिर से मूल्यांकन किया जाना चाहिए. ताकि सकारात्मक बदलाव का अधिक लाभ पिछड़े समुदायों को भी मिल सके. 
  4. रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम’ (TADP) और ‘माइनॉरिटी कंसन्ट्रेशन डिस्ट्रिक्ट’ (MCD) को एक साथ मिलकार चलाने की जरूरत है. TADP उन जिलों के विकास पर ध्यान देता है जो पिछड़े हैं. MCD वैसे जिले होते हैं जहां अल्पसंख्यक आबादी ज्यादा होती है.
  5. सरकार को ऐसी सोची-समझी और सक्रिय नीति बनानी चाहिए जो उन व्यवसायों (काम-धंधों) की समस्याओं को हल करें, जिनमें मुसलमान बड़ी संख्या में काम करते हैं या जिन पर वो निर्भर हैं.
  6. सामुदायिक सशक्तिकरण के मुद्दे पर प्राइवेट सेक्टर को भी सोचना होगा. उन्हें भी इस चर्चा में हिस्सा लेने की जरूरत है.
  7. सरकार और समाज को मुस्लिम समुदाय की संस्थाओं, चैरिटी संगठनों और स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने पर जोर देना चाहिए.

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रिपोर्ट तैयार करने वाले कौन हैं?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तीन लोगों ने मिलकर इस रिपोर्ट को तैयार किया है. हिलाल अहमद, मोहम्मद संजीर आलम और नजीमा परवीन. अहमद और आलम दिल्ली के‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. परवीन नई दिल्ली के ‘पॉलिसी पर्सपेक्टिव्स फाउंडेशन’ (PPF) में एसोसिएट फेलो हैं. इस स्टडी को वाशिंगटन डीसी के ‘यूएस-इंडिया पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ (USIPI) ने कराया है. रिपोर्ट को हैदराबाद के ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट पॉलिसी एंड प्रैक्टिस’ (CDPP) ने प्रकाशित किया है.

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