अभी दारा शिकोह को ले के चर्चा हो रही है. गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम वाली. इससेपहले उत्तराखंड में मुस्लिम कर्मचारियों के नमाज के लिए स्पेशल छुट्टी देने कीघोषणा हुई. बहुत सारे लोगों ने पूछना शुरू किया कि बाकी धर्मों से भेद-भाव क्यों.क्या बाकी की पूजा महत्त्वपूर्ण नहीं है. मुस्लिमों के साथ स्पेशल व्यवहार क्योंकिया जा रहा है. लोग कहने लगे कि मुस्लिम तुष्टिकरण बहुत पहले से चला आ रहा है.इसके बाद डिमॉनीटाइजेशन के दौर में ओवैसी का बयान आया कि मुस्लिमों के इलाके केएटीएम में पैसे नहीं डाले जा रहे. फिर किसी ने पूछ लिया कि हज सब्सिडी के बारे मेंक्यों नहीं बोलते. इसके साथ बहुत दिन से ये भी चल रहा था कि ट्रिपल तलाक खत्म हो.क्योंकि इससे मुस्लिम समाज में कुव्यवस्था फैली हुई है. जाकिर नाइक पर जब सरकार काडंडा पड़ा तो माना गया कि कड़ा डिसीजन है, पर लेना पड़ता है. लगा शायद इसी सेमुसलमानों का भला हो जाएगा.देश के कई राज्यों में चुनाव हैं. उत्तर प्रदेश में भी हैं. मायावती कह रही हैं किमुसलमानों को भाजपा से बचाना होगा. सपा मुखिया मुलायम कह रहे हैं कि मुसलमान उनकेसाथ हैं. अखिलेश के ही राज में मुजफ्फरनगर दंगे हुए थे. तब पूरा परिवार सैफईमहोत्सव मना रहा था. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि मुसलमानों के बारेमें हर बात में इस्लाम का ही जिक्र होता है. हर चीज धर्म के नजरिये से ही देखी जातीहै.30 नवंबर 2006 को 403 पेज की एक रिपोर्ट आई थी. सच्चर कमिटी की. पार्लियामेंट मेंरखी गई. मुसलमानों के सोशल, इकॉनमिक और एजुकेशनल कंडीशन पर. कमिटी के चीफ थे दिल्लीहाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राजिंदर सच्चर. दो साल में रिपोर्ट तैयार हुई.रिपोर्ट में पता चला कि मुसलमानों की स्थिति शेड्यूल्ड कास्ट और शेड्यूल्ड ट्राइबसे नीचे है. किसी कम्युनिटी की स्थिति नापने का एक और तरीका भी है. IAS और IPSकितने आते हैं समुदाय से. इससे एक जनरल इम्पावरमेंट का पता चलता है.Indian Expressसच्चर कमिटी के मुताबिक IAS और IPS में 3 और 4 परसेंट मुस्लिम थे. 1 जनवरी 2016 केहोम मिनिस्ट्री डेटा के मुताबिक अब ये 3.32 और 3.19 है. ये भी पता चला है कि IPSमें कमी हुई है क्योंकि मुस्लिम प्रमोटी ऑफिसर बहुत कम आये हैं. सच्चर रिपोर्ट मेंये 7.1 परसेंट थे, अब 3.82 परसेंट हैं. आलम ये है कि हर 100 IAS और IPS में मात्र 3मुस्लिम ऑफिसर हैं.अगर सरकारी डेटा का विश्लेषण किया जाये, तो पता चलेगा कि अभी भी स्थिति में ज्यादासुधार नहीं आया है. कुछ चीजों में तो स्थिति पहले से भी खराब हो गई है. जैसे कि2005 में भारतीय पुलिस में मुसलमानों का परसेंटेज 7.63 था जो 2013 में घटकर 6.27 होगया. 2013 के बाद धर्म के आधार पर का डेटा सरकार ने बनाना बंद कर दिया है. कई बारपुलिस पर ये भी आरोप लगा है कि दंगों के वक्त इनकी धार्मिक भावना जाग जाती है.मुसलमानों की कम संख्या होने की वजह से पुलिस सेक्युलर नहीं रह जाती.Indian Expressअगर एवरेज मंथली पर कैपिटा इनकम देखें तो 2006 से लेकर अब तक मुसलमानों का ही सबसेकम रहा है. किसी भी समुदाय से कम. तो जब सरकारी आंकड़ा ही कह रहा है तो ऐसे मेंनेताओं की बातें बिल्कुल नहीं सुहाती.अगर लोग किसी तरह के सुधार की बात कह रहे हैं तो वो धर्म पर ही जा रहा है. जब लोगसमाज पर अटैक कर रहे हैं तो वो भी धर्म को लेकर ही हो रहा है. मतलब मुसलमानों को जबभी देखना है तो धर्म के ही चश्मे से. लोग एक आम इंसान के तौर पर उनको देख ही नहींपा रहे. ये नहीं देख पा रहे कि वो भी हाड़-मांस से बने हैं. उनको भी खाना, रोजगार,पढ़ाई की जरूरत है. ऐसा तो नहीं है कि हर मुसलमान बिना रोजगार के सिर्फ हज जाने केबारे में सोच रहा है. फिर भी जबर्दस्ती एक माहौल तैयार किया जाता है. इतनीनकारात्मकता फैलाई जाती है कि मुसलमान खुद ही धर्म के बारे में बोलने को मजबूर होजाता है. तो फिर कहते हैं कि देखो बोल रहा है.हमेशा मदरसों पर अटैक किया जाता है कि ये लोग धर्मांधता फैला रहे हैं. पर ये नहींपता चलता कि अगर गरीब तबका वहां भी ना जाये तो कहां जाये. ये समाज की विफलता है. किजो पहले से फंसा हुआ है, उसी पर उंगली उठाई जाये. ताकि वो अपने खोल में छुप जाये.बेहतर तो यही होगा कि सरकारें खुद से सच बोलना शुरू करें. जनता कुछ बोले ये बड़ामुश्किल लगता है. क्योंकि पिछड़ा समाज इतना डिबेट कर ही नहीं सकता. नेताओं का दीदातो इतना है कि कहने लगते हैं कि अगर केंद्र में कोई गांधी होता तो बाबरी नहीं गिरीहोती. क्या देश एक खानदान के भरोसे चलता है. या एक व्यक्ति के. यूपीए सरकार सच्चररिपोर्ट आने के बाद आठ साल तक सत्ता में बनी रही. पर क्या किया? हमें पता नहीं. जबइसका हिसाब उनको लगा होगा तो फिर वादे करना शुरू कर दिये. भाजपा की सरकार पर आरोपलगा रहे हैं कि माइनॉरिटी के खिलाफ काम कर रहे हैं. पर इसमें भी जो मुद्दे उठा रहेहैं, वो धर्म को लेकर ही हैं. ये ताज्जुब होता है. 2016 में भी आकर इस्लाम को महमूदगजनवी के चश्मे से ही देखा जा रहा है. तैमूर की आंखों से. जो कि इतिहास का एकहिस्सा भर थे. जब थे, तब थे. जहां थे, वहां थे.(Indian Express की रिपोर्ट से इनपुट)--------------------------------------------------------------------------------बॉलीवुड के सबसे बड़े देशभक्त अक्षय कुमार इंडिया में वोट नहीं कर सकते!1000 से ऊपर मुसलमान मार दिए गए हैं और कहीं ये खबर नहीं बताई गईये परंपरा फूहड़ थी तो हमें पढ़ने दो ना, चैप्टर क्यों बैन किया कोर्ट बहादुर?पंजाब में दो मुस्लिम लड़के बन गए गोरक्षकबादशाह अकबर ब्रज बोली में दोहे कहता था, एक उसे मरते वक्त याद आया