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सुप्रीम कोर्ट ने वापस दिलाई हाई कोर्ट की 2 महिला जजों की नौकरी, जो कहा वो सबको सुनना चाहिए

जस्टिस नागरत्ना के फैसले में कई बातों पर चर्चा हुई. जैसे कि न्यायिक व्यवस्था में शामिल महिलाएं किस तरह से फिजिकल और साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम्स का सामना करती हैं.

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जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने दोनों अधिकारियों को उनकी सीनियरिटी के अनुसार पंद्रह दिनों के अंदर बहाल करने का निर्देश दिया है. (फोटो- AI)
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प्रशांत सिंह
1 मार्च 2025 (पब्लिश्ड: 08:42 AM IST)
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सुप्रीम कोर्ट ने 28 फरवरी को दो महिला जजों की बहाली का आदेश दिया. इन महिला जजों को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh Women Judges) और सरकार की एक रिपोर्ट के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हमें महिलाओं की चिंताओं और कठिनाइयों के बारे में पता होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा, ये जानने से पहले पूरा मामला जानते हैं.

दरअसल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 6 महिला सिविल जजों को बर्खास्त कर दिया था. इनके नाम हैं- अदिति शर्मा, सरिता चौधरी, ज्योति वरकड़े, सोनाक्षी जोशी, प्रिया शर्मा और रचना अतुलकर जोशी. फिर जब उनकी वापसी हुई, तो कुछ शर्तें रखी गईं. और कहा गया कि उन्हें सेवा से हटाने के लिए आधार उनकी परफॉर्मेंस को बनाया गया था. लेकिन 1 अगस्त 2023 को हाई कोर्ट ने 6 में से 4 जजों की बहाली कर दी. लेकिन उनमें से अदिति शर्मा और सरिता चौधरी को वापस नहीं बुलाया गया. जिसके बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. जानकारी की मानें तो ये दोनों साल 2018 और 2017 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में शामिल हुई थीं.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक इस पर एक जज की तरफ से कोर्ट में कहा गया, 

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इन तर्कों पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अधिकारियों को नोटिस जारी किया था. और उनसे इस मामले पर जवाब मांगा. अब इसी मामले पर कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए महिला न्यायिक अधिकारियों की नौकरी से बर्खास्तगी को रद्द किया है. कहा है कि नौकरी से टर्मिनेशन का फैसला 'punitive, arbitrary and illegal' माने दंडात्मक, मनमाना और अवैध है.  

रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने दोनों अधिकारियों को उनकी सीनियरिटी के अनुसार पंद्रह दिनों के अंदर बहाल करने का निर्देश दिया है. साथ ही, मध्य प्रदेश सरकार और हाई कोर्ट को आदेश दिया कि इन अधिकारियों की प्रोबेशन अवधि उसी दिन से मानी जाए, जिस दिन उनके जूनियर्स होने की पुष्टि हुई थी. हालांकि, टर्मिनेशन की अवधि के दौरान के वित्तीय लाभ केवल पेंशन लाभों के लिए विचार किए जाएंगे.

जस्टिस नागरत्ना के फैसले में कई बातों पर चर्चा हुई. जैसे कि न्यायिक व्यवस्था में शामिल महिलाएं किस तरह से फिजिकल और साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम्स का सामना करती हैं. कोर्ट ने कहा कि गर्भपात शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है. फैसले में कहा गया,

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एक जज के संबंध में कोर्ट ने पाया कि प्रोबेशन पीरियड के दौरान उनकी शादी हुई, उन्हें कोविड का पता चला और उनका गर्भपात हो गया. उन्हीं दिनों उनके भाई को कैंसर का पता चला. शीर्ष अदालत ने माना कि हाई कोर्ट को उनके मुद्दों पर संवेदनशीलता के साथ विचार करना चाहिए था. वहीं दूसरी जज के संबंध में कोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ कथित रूप से लंबित शिकायत का जवाब देने के लिए उन्हें कोई मौका नहीं दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के इस फैसले पर पहले भी नाराजगी जताई थी. जस्टिस नागरत्ना ने कहा था,

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अब आपको इस केस की टाइमलाइन बताते हैं.

नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में खुद संज्ञान लिया था. जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से एक महीने के भीतर इस मामले पर नए सिरे से विचार करने को कहा. इसके बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अगस्त 2024 को अपने पहले के प्रस्तावों पर पुनर्विचार किया और चार अधिकारियों - ज्योति वरकड़े, सोनाक्षी जोशी, प्रिया शर्मा और रचना अतुलकर जोशी - को कुछ शर्तों के साथ बहाल करने का फैसला किया. जबकि अन्य दो महिलाओं, अदिति कुमार शर्मा और सरिता चौधरी की बर्खास्तगी जारी रही.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन महिला जजों के केस पर विचार किया. सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अदिति शर्मा का प्रदर्शन 2019-20 के दौरान वेरी गुड और गुड रेटिंग से गिरकर बाद के सालों में औसत और खराब की स्थिति पर आ गया. बताया गया है कि 2022 में उनके पास लगभग 1,500 लंबित मामले थे, जिन्हें निपटाने की दर 200 से कम थी. यहां पर ये भी बता दें कि जज अदिति शर्मा ने हाई कोर्ट को 2021 में गर्भपात होने और फिर अपने भाई के कैंसर के बारे में जानकारी दी थी.

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