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जस्टिस चंद्रचूड़ ने महिलाओं को लेकर लैंग्वेज गाइडलाइंस बनाई थीं, CJI सूर्यकांत क्यों बदलवा रहे?

Supreme Court ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के संदर्भ में की, जिसमें जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा था, “पीड़िता के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना…रेप की कोशिश नहीं है.”

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11 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 11 फ़रवरी 2026, 06:10 PM IST)
Handbook on Combating Gender Stereotypes
सुप्रीम कोर्ट ने 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' को खारिज कर दिया है. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)
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चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' को खारिज कर दिया है. इसे सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में हार्वर्ड से पढ़े पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ की पहल पर पब्लिश किया था. यह एक कानूनी गाइड है, जिसका मकसद अदालती कार्यवाही और फैसलों में महिलाओं के प्रति इस्तेमाल होने वाली रूढ़िवादी और अपमानजनक भाषा को खत्म करना था. लेकिन CJI सूर्य कांत ने इसे रेप सर्वाइवर्स और आम लोगों के लिए किसी भी तरह से मददगार नहीं माना है.

मंगलवार, 10 फरवरी को CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने कहा,

हैंडबुक में यौन हमले के अलग-अलग पहलुओं को फॉरेंसिक मतलब दिया गया है, जिन्हें रेप सर्वाइवर, उसके रिश्तेदार या आम लोग शायद न समझ पाएं.

कोर्ट ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के संदर्भ में की, जिसमें जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा था, “पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना…रेप की कोशिश नहीं है.” सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की इस टिप्पणी पर स्वत: संज्ञान लिया था. सर्वोच्च अदालत ने हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को बेहद असंवेदनशील बताया था. इसी मामले की कार्यवाही के दौरान CJI ने 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' को खारिज कर दिया.

CJI ने कहा, "यह बहुत ज़्यादा हार्वर्ड-ओरिएंटेड है." बेंच ने भोपाल में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) से कहा कि वह डोमेन एक्सपर्ट्स, एकेडेमिक्स और वकीलों का एक पैनल बनाए जो इस मुद्दे पर फिर से विचार करे, एक गाइडलाइन बनाए और सुप्रीम कोर्ट को एक रिपोर्ट सौंपे. बेंच ने कहा, 

हम इसे ठीक करने के लिए एमिकस क्यूरी (न्यायालय का मित्र) शोभा गुप्ता और सीनियर एडवोकेट एच एस फुल्का समेत वकीलों की मदद लेंगे.

CJI ने कहा कि एक बार इसे फाइनल कर लेने के बाद, NJA को इसे हाई कोर्ट जजों के लिए स्टडी मटीरियल बनाना चाहिए, जिन्हें बैच में बुलाया जा सकता है और सेक्सुअल असॉल्ट मामलों से निपटने के लिए ज़रूरी सेंसिटिविटी के बारे में ट्रेन किया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा,

सुप्रीम कोर्ट में बैठे हाई कोर्ट जजों को उपदेश देने का कोई मकसद नहीं है. उन्हें NJA में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग मिलनी चाहिए.

बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च, 2025 के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अपराध की तैयारी और अपराध करने की कोशिश के बीच अंतर किया गया था. हाईकोर्ट के फैसले से हंगामा मच गया था और पिछले साल 26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर खुद संज्ञान लेते हुए उस पर रोक लगा दी थी. साथ ही हाई कोर्ट के जज की असंवेदनशीलता पर दुख भी जताया था. 

ये भी पढ़ें: 'ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं', अब सुप्रीम कोर्ट में इलाहबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी पर होगी सुनवाई

क्या है ‘हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स’?

'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण कानूनी गाइड है. 16 अगस्त 2023 को CJI (तत्कालीन) डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा पेश की गई इस हैंडबुक का मकसद अदालती कार्यवाही और फैसलों में महिलाओं के प्रति इस्तेमाल होने वाली रूढ़िवादी और अपमानजनक भाषा को खत्म करना है. इसमें ‘जेंडर-अनजस्ट’ (लिंग-अन्यायपूर्ण) शब्दों की एक सूची दी गई है और उनके स्थान पर अधिक उचित और तटस्थ शब्दों के उपयोग का सुझाव दिया गया है. जैसे-

- 'ईव-टीजिंग' के बजाय ‘स्ट्रीट सेक्सुअल हैरेसमेंट’.

- 'हाउसवाइफ' के बजाय ‘होममेकर’.

- 'हुकर' या 'प्रॉस्टिट्यूट' के बजाय ‘सेक्स वर्कर’.

- 'फूहड़' या 'चरित्रहीन' जैसे अपमानजनक शब्दों के स्थान पर केवल 'महिला' शब्द का प्रयोग.

हैंडबुक की प्रस्तावना में, तब के CJI चंद्रचूड़ ने लिखा था, “हैंडबुक महिलाओं के बारे में आम स्टीरियोटाइप की पहचान करती है, जिनमें से कई का इस्तेमाल अदालतें पहले भी कर चुकी हैं और यह दिखाती है कि वे गलत क्यों हैं और वे कानून के इस्तेमाल को कैसे बिगाड़ सकते हैं. इसका मकसद पिछले फैसलों की आलोचना करना या उन पर शक करना नहीं है, बल्कि सिर्फ यह दिखाना है कि कैसे स्टीरियोटाइप का अनजाने में इस्तेमाल किया जा सकता है. आखिर में, यह उन खास कानूनी मुद्दों पर मौजूदा सिद्धांत को बताता है जो कुछ मामलों, खासकर यौन हिंसा से जुड़े मामलों में फैसला सुनाते समय ज़रूरी हो सकते हैं.”

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