मोची जूते के कारीगर, नाई कहलाएंगे सौंदर्य सेवा प्रदाता... संसदीय समिति ने अहम सुझाव दिए हैं
संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति ने सुझाव दिया है कि मोची, कुम्हार और नाई जैसे पेशों की पहचान जाति से नहीं बल्कि कौशल से होनी चाहिए.

उद्योग से जुड़े मामलों की संसदीय समिति ने पीएम विश्वकर्मा योजना (PM Vishwakarma Yojana) में बदलाव का एक प्रस्ताव रखा है. कमिटी ने सुझाव दिया है कि इस योजना के तहत कारीगरों को उनके स्किल के आधार पर नाम देना चाहिए, बजाय किसी जातिसूचक नाम के. कमिटी ने सुझाया है कि मोची और नाई जैसे पेशेवर लोगों को उनके कौशल के आधार पर पहचान मिलनी चाहिए.
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक़, कमिटी ने कारीगरों के लिए कुछ नाम सुझाए हैं. जैसे मोची को जूते का कारीगर, नाई को सौंदर्य सेवा प्रदाता, कुम्हार को मिट्टी के उत्पाद निर्माता और धोबी को लॉन्ड्री एवं क्लीनिंग सर्विस प्रोवाइडर के नाम से पुकारा जाना चाहिए. कमिटी का मानना है कि इससे कारीगरों को अधिक समावेशी और पेशेवर बनाया जा सकेगा.
अभी तक इन कामों को एक समुदाय से जोड़कर देखा जाता था. इसलिए कमिटी चाहती है कि क्षेत्र-विशेष नाम तत्काल हटाकर पेशा-निरपेक्ष नाम अपनाए जाएं. उनका ये भी मानना है कि इससे समाज में रूढ़िवादिता ख़त्म होगी.
नामों में बदलाव के साथ एक और सिफारिश भी की गई है. कहा गया कि राज्यों और सामाजिक विशेषज्ञों से परामर्श कर योजना के तहत कामों की एक नई सूची तैयार की जाए. फिर इसे पूरे देश में लागू किया जाए. रिपोर्ट के मुताबिक़, विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कारीगरों को सम्मान मिलेगा और इससे अपने को आगे बढ़ाने का हौसला भी.
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कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में योजना के बजट में कटौती का भी ज़िक्र किया है. उनके अनुसार पीएम विश्वकर्मा योजना को साल 2025 में 5,100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जो साल 2026 के बजट में घटाकर 3,860 करोड़ कर दिए गए. इस योजना के तहत कारीगरों को टूलकिट और प्रशिक्षण देने का प्रावधान है. कमिटी ने इन्हीं प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए आवंटित बजट की समीक्षा का भी प्रस्ताव रखा है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, छोटे कारोबारियों को सहारा देने के लिए भी समिति ने ‘नैनो उद्यम’ की एक नई श्रेणी तत्काल शुरू करने की बात कही है. इसके लिए 10 लाख रुपये की आरंभिक निवेश सीमा तय करने का सुझाव भी दिया गया है.
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