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'एक देश, एक चुनाव' का नया ड्राफ्ट तैयार, क्या सच में 2029 में देश के सारे इलेक्शन एक साथ हो जाएंगे?

One Nation, One Election: मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के हवाले से आ रही ख़बरों पर यकीन करें तो मोदी सरकार 2026 के मॉनसून सत्र में 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक पेश कर सकती है. लॉ कमीशन और नीति आयोग इस बारे में अपना नया ड्राफ्ट लगभग तैयार कर चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कैसे 2029 में एक साथ चुनाव कराने की तैयारी कर रही है सरकार.

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1 जून 2026 (अपडेटेड: 1 जून 2026, 02:40 PM IST)
One Nation One Election
'वन नेशन-वन इलेक्शन' की तैयारी क्या पूरी हो चुकी है?
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भारत का संविधान कहता है कि हर पांच साल में चुनाव होंगे. जिसमें देश की जनता अपने-अपने सांसद-विधायक चुनकर लोकसभा और विधानसभाओं में भेजेगी. मगर असलियत ये है कि हर साल देश के किसी ना किसी कोने में, कोई ना कोई इलेक्शन होता ही रहता है. कभी लोकसभा का तो कभी विधानसभा का. कभी नगर निगम चुनाव तो कभी पंचायत चुनाव. 

चुनाव मतलब गली-मुहल्लों में लाउडस्पीकर का शोर, सड़कों पर रैलियों का जाम और टीवी-रेडियो पर नेताओं की बयानबाजियां. मगर आए दिन होने वाले चुनावों का सबसे बड़ा खामियाजा होता है, विकास कार्यों में होने वाली देरी. आदर्श चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct)  के चलते सरकारें कोई नई योजना लागू नहीं कर पाती. नतीजा आम आदमी का नुकसान. वही आम आदमी जिसके जन प्रतिनिधि को चुनने के नाम पर ये इलेक्शन होते हैं. 

ऐसे में जरा कल्पना कीजिए कि आपको पांच साल में सिर्फ एक बार पोलिंग बूथ तक जाना पड़े और देश के सारे चुनाव एक साथ निपट जाएं तो कैसा रहे? सुनने में ये किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा लगता है, लेकिन सरकार इसे हकीकत बनाने के बेहद करीब पहुंच चुकी है.

सूत्रों की मानें तो बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि दिल्ली के गलियारों में इसे लेकर तारीखें तय होने लगी हैं. नीति आयोग और विधि मंत्रालय के बड़े अधिकारियों की बड़ी-बड़ी बैठकें हो रही हैं. इन मीटिंग्स का एजेंडा सीधा है कि अगर 2029 में पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने हैं, तो कितनी ईवीएम (EVM) लगेंगी, कितना पैसा खर्च होगा और सुरक्षाबलों का इंतजाम कैसे होगा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लॉ कमीशन और हाई-लेवल कमेटी की ताजा रिपोर्ट के बाद सरकार इसी मॉनसून सत्र में इससे जुड़ा एक बड़ा बिल संसद में ला सकती है.

युवा मतदाताओं यानी मिलेनियल्स और जेन-जी के लिए यह मुद्दा सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि उनके करियर और सहूलियत से जुड़ा है. हर कोई जानना चाहता है कि क्या वाकई 2029 से हर साल चुनाव का ये झंझट खत्म होने जा रहा है या फिर यह सिर्फ एक सियासी शिगूफा है. आइए, इस पूरे मामले की एबीसीडी (ABCD) को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं.

कैसे काम करेगा ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ का फॉर्मूला?

सबसे बड़ा सवाल जो हर किसी के दिमाग में आता है, वो यह कि अगर आज ये कानून लागू हो जाता है, तो जिन राज्यों में अभी पिछले साल ही चुनाव हुए हैं या अगले साल होने वाले हैं, वहां क्या होगा? क्या वहां की सरकारें गिरा दी जाएंगी? 

मिसाल के तौरपर 2026 में शपथ लेने वाले पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा क्या 2031 तक का अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाएंगे? क्या इन दोनों को 2029 में ही इस्तीफा देकर फिर से चुनाव का सामना करना पड़ेगा?

इसका जवाब है, नहीं. लॉ कमीशन और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली कमेटी ने जो फॉर्मूला तैयार किया है, उसके तहत राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को एक टाइमलाइन के हिसाब से एडजस्ट किया जाएगा.

इस प्लान को दो चरणों में लागू करने की सिफारिश की गई है. पहले चरण में लोकसभा और देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे. इसके बाद दूसरे चरण में, यानी मुख्य चुनावों के 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों (नगर निगम और पंचायत) के चुनाव होंगे. 

अब आते हैं असली सवाल पर कि क्या सभी राज्यों की विधानसभाएं 2029 में भंग कर दी जाएंगी? वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार इसे समझाते हुए लल्लनटॉप से कहते हैं,

जिन राज्यों का कार्यकाल 2029 के आसपास खत्म हो रहा है, उन्हें तो सीधा इस टाइमलाइन में जोड़ दिया जाएगा. लेकिन जिन राज्यों में चुनाव 2027 या 2028 में होने हैं, उनके कार्यकाल को कुछ महीनों के लिए कम या ज्यादा करके 2029 के सांचे में फिट किया जाएगा. 

इसके लिए संविधान में एक बड़ा संशोधन करना होगा, जिसे संसद के दोनों सदनों से पास कराना जरूरी होगा.

EVM का गणित और खर्च 

अब बात उस मुद्दे की जो सीधे तौरपर हमसे और आपसे जुड़ा हुआ है, यानी पइसा कितना बचेगा? चुनाव आयोग के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव में 1.35 लाख करोड़ रुपये का खर्च आया. इसी तरह 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में करीब चार हजार करोड़ रुपये खर्च हुए. साफ है कि बार-बार चुनाव कराने में देश का हजारों करोड़ रुपया पानी की तरह बह जाता है. 

लॉ कमीशन की प्रोग्रेस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर 2029 में एक साथ चुनाव कराने हैं, तो बड़े पैमाने पर नई ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) मशीनों की जरूरत पड़ेगी. इस लॉजिस्टिक्स को संभालने के लिए सरकार को भारी-भरकम बजट की जरूरत होगी.

अगर 2029 में लोकसभा के साथ-साथ देश की सभी विधानसभाओं के चुनाव भी एक साथ कराने के लिए करीब 30 लाख से अधिक ईवीएम और वीवीपैट सेट की आवश्यकता होगी. ये डाटा नीति आयोग के पुराने अनुमानों और विधि मंत्रालय के ताजा वर्किंग नोट पर आधारित है. इस हिसाब से ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करना है तो शुरुआत में सरकार को मशीनों की खरीद पर कई हजार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. 

सिर्फ इतना ही नहीं हर मशीन की अपनी एक लाइफ होती है जो करीब 12 से 15 सालों तक चलती है. इसका मतलब है कि शुरुआती खर्च भले ही बहुत ज्यादा दिखे, लेकिन लंबे समय में हर साल होने वाले चुनावी खर्चों में भारी कटौती होगी. बार-बार पोलिंग स्टाफ को भेजने, सुरक्षा बलों को एक राज्य से दूसरे राज्य मूव करने का खर्च सीधे तौर पर आधा हो जाएगा.

 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का पूरा मॉडल

आगे बढ़ने से पहले  'वन नेशन, वन इलेक्शन' का पूरा मॉडल इस इन्फोग्राफिक के जरिए समझ लेते हैं,

'वन नेशन, वन इलेक्शन' का रोडमैप (2029)

लॉ कमीशन और हाई-लेवल कमेटी की सिफारिशों पर आधारित मॉडल

चरण 1
मेगा इलेक्शन (लोकसभा + विधानसभा)

देश की लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे. पूरे देश के नागरिक एक ही समय पर केंद्र और राज्य की सरकार चुनने के लिए वोट डालेंगे.

↓ (100 दिनों का अंतराल)
चरण 2
लोकल इलेक्शन (स्थानीय निकाय)

मुख्य चुनाव संपन्न होने के ठीक 100 दिनों के भीतर पूरे देश में एक साथ नगर निगम, नगरपालिका और ग्राम पंचायत के चुनाव कराए जाएंगे.

इस मॉडल से क्या बड़े बदलाव होंगे?

• बार-बार आदर्श आचार संहिता (Code of Conduct) लागू होने से मुक्ति मिलेगी और विकास कार्य नहीं रुकेंगे.
• पूरे देश में सभी चुनावों के लिए एक ही कॉमन वोटर लिस्ट होगी, जिससे नाम कटने का झंझट खत्म होगा.
• सुरक्षा बलों और चुनाव ड्यूटी में लगने वाले सरकारी स्टाफ की बार-बार तैनाती बंद होगी जिससे सरकारी पैसा बचेगा.

Note: AI की मदद से तैयार इंफोग्राफिक

आचार संहिता का चक्कर और युवाओं का नफा-नुकसान

Gen Z और मिलेनियल वोटर्स के लिए सबसे बड़ी राहत की बात होगी कि उन्हें बार-बार ‘मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट’ की वजह सेे होने वाली दिक्कतों से नहीं जूझना पड़ेगा. अभी होता ये है कि देश के किसी न किसी हिस्से में हर छह महीने में चुनाव हो रहे होते हैं. जैसे ही आचार संहिता लगती है, सरकारें कोई नई नीतिगत घोषणा नहीं कर सकतीं. नतीजा, नए टेंडर नहीं रुक जाते हैं. यहां तक की सरकारी नौकरियों के नए नोटिफिकेशन भी अटक जाते हैं.

जब चुनाव एक साथ होंगे, तो साल के बारह महीने विकास कार्य बिना किसी रुकावट के चलेंगे. सरकारें पांच साल तक सिर्फ गवर्नेंस और डिलीवरी पर फोकस कर सकेंगी. ना कि हर वक्त चुनावी मोड में रहकर लोकलुभावन वादे करने में मशरूफ रहेंगी. 

नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट ‘नीति आयोग का एक साथ चुनाव कराने पर कार्यपत्र’ (Working Paper on Simultaneous Elections) में साफ कहा है कि 

बार-बार चुनाव होने से देश के आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ती है क्योंकि अधिकारियों और शिक्षकों की ड्यूटी लगातार चुनाव कराने में लगी रहती है, जिससे स्कूल-कॉलेज और दफ्तरों का कामकाज प्रभावित होता है.

कानूनी दिक्कतें और विपक्ष का रुख?

अब तक की बातें पढ़कर आपको लग रहा होगा कि फिर देर किस बात की, तुरंत लागू करो ये योजना. तो जनाब जरा ठहरिये. ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का रास्ता जितना आसान दिख रहा है, असल में उतना है नहीं. इस कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार को संविधान के कई अनुच्छेदों (Articles) में बदलाव करना होगा. 

इनमें लोकसभा के कार्यकाल से जुड़ा अनुच्छेद 83 के साथ-साथ विधानसभाओं के कार्यकाल से जुड़ा अनुच्छेद 172 और राज्यों में राष्ट्रपति शासन से जुड़ा अनुच्छेद 356 भी शामिल हैं. इसके अलावा, कानून लागू करने से पहले आधे से ज्यादा राज्यों की विधानसभाओं से भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दिलाना जरूरी होगा.

विपक्ष का इस मुद्दे पर तीखा विरोध है. क्षेत्रीय दलों का मानना है कि अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए, तो राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय मुद्दों पर हावी हो जाएंगे. उनका तर्क है कि एक आम वोटर केंद्र की बड़ी पार्टी के प्रभाव में आकर राज्य के लिए भी उसी को वोट दे देगा, जिससे क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. 

इसके साथ ही, अगर बीच में कोई सरकार गिर जाती है, तो बचे हुए समय के लिए क्या दोबारा चुनाव होंगे या राष्ट्रपति शासन लगेगा, इस पर अभी पूरी तरह से आम सहमति बनना बाकी है.

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पहले भी साथ होते थे चुनाव

कई लोगों को लगता है कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने का ये आइडिया एकदम नया ताजा है. लेकिन असल में ऐसा है नहीं. इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि भारत में चुनावों की शुरुआत ऐसे ही हुई थी. साल 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही कराए जाते थे.

चुनाव आयोग के ऐतिहासिक डाटा को पढ़कर पता चलता है कि ये सिलसिला तब टूटा जब 1968 और 1969 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग कर दी गईं. उसके बाद 1971 में लोकसभा चुनाव भी समय से पहले हो गए और यह पूरी साइकिल बिगड़ गई. 

अब सरकार उसी पुरानी व्यवस्था को नए डिजिटल और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के साथ वापस लाने की कोशिश कर रही है ताकि देश को बार-बार होने वाले चुनावी खर्च और प्रशासनिक सुस्ती से बचाया जा सके. 

वीडियो: आसान भाषा में: क्या राष्ट्रीय एजेंडे, राज्य के मुद्दों पर हावी हो जायेंगे? वन नेशन वन इलेक्शन से किसको फायदा?

सामान्य प्रश्न

अगर 2029 से पहले किसी राज्य की सरकार गिर गई तो क्या होगा?

लॉ कमीशन के ड्राफ्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में उस राज्य में सिर्फ बचे हुए कार्यकाल (Mid-term) के लिए ही चुनाव होंगे ताकि 2029 की कॉमन टाइमलाइन डिस्टर्ब न हो.

क्या वन नेशन वन इलेक्शन के लिए संविधान संशोधन जरूरी है?

हां, इसके लिए संविधान के कम से कम पांच अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा और संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी.

क्या इसके लागू होने से वोटर्स के अधिकार कम हो जाएंगे?

नहीं, वोटर्स के अधिकार बिल्कुल वही रहेंगे. बस उन्हें अलग-अलग महीनों में जाने की बजाय एक ही बार में अपने दोनों प्रतिनिधि (सांसद और विधायक) चुनने का मौका मिलेगा.

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