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नोएडा के अस्पताल में इंसानों के लिए पहुंचीं जानवरों की सिरिंज, पूरी 60 हजार!

पिछले साल 25 दिसंबर को अस्पताल प्रशासन ने जेम (GeM) पोर्टल के जरिए राजधानी लखनऊ की एक एजेंसी को 60 हजार सिरिंज का ऑर्डर दिया था. यह ऑर्डर प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी हुई. सवाल उठता है कि अस्पताल प्रशासन को कैसे एक बार भी पता नहीं चला कि उसे वेटरनरी सिरिंज रिसीव हो रही थीं.

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प्रगति पांडे
| भूपेंद्र चौधरी
2 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 2 अप्रैल 2026, 06:54 PM IST)
Noida, UP
नोएडा के सरकारी हॉस्पिटल ने इंसानों की जगह जानवरों की सिरिंज ऑर्डर कर दी. (फोटो- इंडिया टुडे)
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सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था लापरवाही को लेकर अक्सर ही चर्चा में रहती है. नोएडा में इसने एक और ‘आसमान’ छू लिया है. यहां के जिला सरकारी अस्पताल में इंसानों के इलाज के लिए जानवरों की सिरिंज ऑर्डर कर दी गईं. वो भी 100-200 नहीं, पूरे 60 हजार. बाद में 'मानवीय भूल' वाला घिसा-पिटा एक्सक्यूज दे दिया गया.

इंडिया टुडे से जुड़े भूपेंद्र चौधरी की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल 25 दिसंबर को अस्पताल प्रशासन ने जेम (GeM) पोर्टल के जरिए राजधानी लखनऊ की एक एजेंसी को 60 हजार सिरिंज का ऑर्डर दिया था. यह ऑर्डर प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी हुई. सवाल उठता है कि अस्पताल प्रशासन को कैसे एक बार भी पता नहीं चला कि उसे वेटरनरी सिरिंज रिसीव हो रही थीं.

प्रोसेस के तहत यह ऑर्डर फार्मासिस्ट से लेकर सीनियर मेडिकल ऑफिसर (SMO) और कम्युनिटी मेडिकल सर्विस (CMS) तक के पास से होकर गुजरा. बावजूद इसके किसी को भी इस ऑर्डर में हुई गलती का पता नहीं चला. ऑर्डर के बाद सिरिंज अस्पताल भी पहुंचीं और स्टोर रूम में भी रखी गईं.

जब स्टोर रूम में डिलीवर हुए बक्सों को खोला गया तो वहां मौजूद लोग हैरान रह गए. क्योंकि, पैकेजिंग पर साफ लिखा था कि ये सिरिंज “पशु चिकित्सा उपयोग के लिए” हैं. इसके बाद इस ऑर्डर को वापस कर दिया गया.

अस्पताल प्रशासन से हुई इस लापरवाही पर अस्पताल की CMS डॉ. अजय राणा से बात की गई. उन्होंने इस लापरवाही को सिर्फ एक “मानवीय भूल” बताया. राणा ने आगे बताया कि जैसे ही सप्लाई आई, तुरंत गलती को पहचान लिया गया और ऑर्डर को वापस कर दिया गया. साथ ही इस ऑर्डर का कोई बिल नहीं बनाया गया और न ही किसी तरह की कोई पेमेंट की गई.

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बता दें कि अस्पताल में दवाइयों और उपकरणों की खरीद की एक तय प्रक्रिया होती है. इस प्रक्रिया में कई लोग शामिल होते हैं. बावजूद, इसके इतनी बड़ी गलती का होना जिला अस्पताल के सिस्टम और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है.

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