मोटी सैलरी वालों की पहले लुटिया डूबेगी! इन 'अलर्ट्स' से पहचानें नौकरी खतरे में
Tech Layoffs: जिन लोगों ने नौकरी से हाथ धोया, उनका कहना है कि इंसान का एक्सपीरियंस मायने नहीं रखता. टेक कंपनियों की छंटनी के कारण का कोई आधिकारिक आधार नहीं है. ऑफिशियली कोई सीधी-सपाट वजह भी नहीं बताई जाती. लेकिन, कुछ बातें हैं जो हर इम्प्लॉई के लिए अलर्ट की तरह काम कर सकती हैं.

नवंबर 2022 में ChatGPT लॉन्च हुआ. लॉन्च होते ही ये सबसे तेजी से इस्तेमाल किया जाने वाला प्लेटफॉर्म बन गया. चैटजीपीटी ने एक इंसान के हाथों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की पावर दे दी. इस एहसास ने गूगल और मेटा जैसी कंपनियों तक की नींद उड़ा दी थी. AI का चलन बढ़ा तो बात जॉब सिक्योरिटी पर आई. दुहाई दी जाती रही कि AI से नौकरी खत्म नहीं होगी. दूसरी तरफ, टेक कंपनियां ताबड़तोड़ लेऑफ यानी छंटनी के घोड़े पर सवार होती गईं.
2022 के आखिरी से ही ओरेकल, एक्स (तब ट्विटर), मेटा, एमेजॉन, गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट जैसी बड़ी टेक फर्म्स ने छंटनी शुरू कर दी. कर्मचारी ऑफिस जाने को तैयार थे कि अचानक कंपनी की पिंक स्लिप मिली. माने, नौकरी गई. ये सिलसिला आज भी जारी है.
इंडिया टुडे से जुड़ीं दीबाश्री मोहंती की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में ही करीब 95 कंपनियों ने 73,000 से ज्यादा लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया. मेटा, ओरेकल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने एक ही महीने में दसियों हजार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया. क्या अगला नंबर आपका है? कुछ निशानियां जरूर हैं, जो बताती हैं कि आपकी नौकरी खतरे में है.
कब नौकरी खतरे में समझो?अब छंटनी करने का तरीका बदल चुका है. कंपनियां लेऑफ तय करने के लिए बकायदा सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रही हैं. किसे टर्मिनेट करना है और किसे रखना है, यह तय करने का एक पूरी तरह से सिस्टमैटिक तरीका है.
टेक सेक्टर में सर्वे लगातार दिखाते हैं कि ज्यादातर प्रोफेशनल्स का मानना है कि उम्र को लेकर भेदभाव अभी भी मौजूद है. कुल मिलाकर एक साफ तस्वीर नजर आती है. 40 और 50 की उम्र के प्रोफेशनल्स, खासकर वे जो सीनियर इंडिविजुअल कंट्रीब्यूटर रोल में हैं, जिनकी सैलरी ज्यादा है और जिनकी भूमिका सीधे रेवेन्यू से जुड़ी नहीं है, वे खुद को तेजी से खतरे में देख रहे हैं.
छंटनी का एक बड़ा कारण यह है कि टेक कंपनियां ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ पैसा बहाना शुरू कर दिया है. ओरेकल को ही देखें तो मार्च की छंटनी कुछ हद तक AI डेटा सेंटर के लिए रिसोर्स खाली करने से जुड़ी थी.
साफ संकेत है कि इंसान का एक्सपीरियंस मायने नहीं रखता. जरूरी यह है कि क्या वो इंसान सीधे तौर पर कंपनी को रेवेन्यू जेनरेट करके दे पा रहा है या नहीं. टेक कंपनियों की छंटनी के कारण का कोई आधिकारिक आधार तो नहीं है. ऑफिशियली कोई सीधी-सपाट वजह भी नहीं बताई गई. लेकिन, जिन लोगों ने नौकरी से हाथ धोया है, उनका अपना नजरिया है, जो खतरा बताता है. बस उसकी आहट पहचाननी है.
नौकरी खोने वालों ने क्या बताया?ओरेकल इंडिया में पूर्व मार्केटिंग मैनेजर 48 वर्षीय धन्या मेहरा ने बताया,
"मुझे हमेशा लगता था कि एक्सपीरियंस कुछ मायने रखेगा. लेकिन जब मुझे नौकरी से निकाल दिया गया, तो ऐसा लगा कि इनमें से कोई भी बात मायने नहीं रखती. मेरा नाम कॉस्ट शीट पर महज एक नंबर की तरह था."
52 साल के प्रोजेक्ट लीड पन्ना दास का भी एक्सपीरियंस ऐसा ही रहा. उन्होंने कहा,
"आपको सालों तक बताया जाता है कि आपका एक्सपीरियंस कीमती है. लेकिन आखिर में ऐसा नहीं लगता कि फैसले इसी बात पर लिए जाते हैं."
छंटनी के समय उम्रदराज कर्मचारी ज्यादा नुकसान में रहते हैं. उनके लिए दोहरी मुसीबत है. अगर नौकरी गई, तो दूसरी नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है. क्योंकि उनकी पोजिशन के लिए मार्केट में मौके बहुत सीमित होते हैं.
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दो दशक से ज्यादा के एक्सपीरियंस रखने वाले रिक्रूटमेंट और करियर मैनेजमेंट प्रोफेशनल अंकुर अग्रवाल मोटी सैलरी को भी नौकरी जाने की एक वजह बताते हैं. वो कहते हैं,
"बड़े ऑर्गनाइजेशन अब पुराने तरीके से लेऑफ नहीं करते. वे ऑप्टिमाइज करते हैं. बैकग्राउंड में हमेशा एक मॉडल चलता रहता है. आपका रोल रेवेन्यू से जितना दूर होगा, आप उतने ही कमजोर होंगे, खासकर अगर आपकी मोटी सैलरी है."
इससे एक पैटर्न समझ में आता है, जो अब बहुत से लोग देख रहे हैं. जिन लोगों की नौकरी जाने का सबसे ज्यादा रिस्क है, वे जरूरी नहीं कि खराब काम करने वाले हों. वे अक्सर ऐसे लोग होते हैं, जिनके काम को सीधे रेवेन्यू से जोड़ना सबसे मुश्किल होता है और जिन्हें काम पर रखने में खर्च सबसे ज्यादा होता है.
यह एक खास तरह की प्रोफाइल को दिखाता है-
- मिड-से-सीनियर इंडिविजुअल कंट्रीब्यूटर
- ह्यूमन रिसोर्स (HR), मार्केटिंग या इंटरनल ऑपरेशन जैसे सपोर्ट फंक्शन में रोल
- क्लाइंट या रेवेन्यू-फेसिंग टीमों से कई लेयर दूर काम करने वाले प्रोफेशनल
इनका काम अक्सर क्रिटिकल होता है, लेकिन तुरंत फाइनेंशियल टर्म्स में उसे मापना हमेशा आसान नहीं होता. अंकुर अग्रवाल इसमें एक और बात जोड़ते हैं,
"ओरेकल जैसी कंपनियों का एक्विजिशन (कंपनियां खरीदना) का लंबा इतिहास रहा है. जब दो टीमें एक जैसा काम करती हैं, तो डुप्लीकेशन खत्म किया जाता है. और जब ऐसा किया जाता है, तो लागत बहुत जल्दी एक डिसाइडिंग फैक्टर बन जाती है.”
अंकुर अग्रवाल कुछ हाई-रिस्क सिग्नल बताते हैं-
- मार्केट के मुकाबले काफी ज्यादा सैलरी
- टीम मैनेजमेंट की जिम्मेदारियों के बिना सीनियर इंडिविजुअल कंट्रीब्यूटर
- ऐसे रोल जो सीधे रेवेन्यू से जुड़े ना हों
- ज्यादा लागत वाली पोजिशन पर होना
- ऐसे स्किल जो मार्केट में आसानी से मिल जाते हैं
उन्होंने इसे एक लाइन में समेट दिया, “सिर्फ वही लोग सच में चौंकते हैं, जो बिजी होने को कीमती समझ बैठने का गुमान रखते हैं…”
AI की जानकारी होना काफी नहींAI पर लौटते हैं. आपके पास AI और अन्य स्किल्स के कितने ही सर्टिफिकेशन क्यों ना हों. अगर आपकी AI समझ और स्किल्स कंपनी को फायदा नहीं दे रहे हैं, तो खतरा है. उम्र ज्यादा है, तो छंटनी की तलवार पर सबसे पहला नाम आपका हो सकता है. ऐसे में नेटवर्किंग की अपनी अहमियत है. जॉब सिक्योर करने में इसका इस्तेमाल करना भी एक स्किल है. ये परमानेंट सॉल्यूशन तो नहीं है, लेकिन मददगार जरूर है.
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लेऑफ के ट्रेंड का मतलब यह कतई नहीं है कि किसे नौकरी से निकाला जा रहा है, बल्कि यह भी है कि आपकी वैल्यू को कितने चुपचाप और सिस्टमैटिक तरीके से आंका जा रहा है. जबकि आपको खुद अपनी वैल्यू का पता नहीं चलता.
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