35 करोड़ की लागत से घर बने, डेढ़ करोड़ का काम अटका तो गरीबों को अलॉट नहीं हुए
Kanpur के Ghatampur में Aasra Awas Yojana के 840 फ्लैट्स बन कर तैयार हो गए हैं. लेकिन बीते 6 साल से ये प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हैं. इनको बनाने में 35 करोड़ का खर्चा आया. लेकिन काम के प्रति बेरुखी ऐसी कि डेढ़ करोड़ के अभाव में ये फ्लैट्स अब खंडहर बन चुके हैं.
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इस देश में अक्सर सरकारें गरीबों या बेघरों के लिए आवास बनाती रही हैं. लेकिन कानपुर में अधिकारियों ने गरीबों के लिए बने 'आसरा आवास योजना' (Aasra Awas Yojana) के साथ जो किया है. उसे देख कर लगता है कि गरीब के सिर पर छत दुर्लभ ही है. आसरा योजना के तहत यहां घाटमपुर में 840 फ्लैट्स बन कर तैयार हो गए हैं. लेकिन बीते 6 साल से ये प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हैं. इनको बनाने में 35 करोड़ का खर्चा आया. लेकिन काम के प्रति बेरुखी ऐसी कि डेढ़ करोड़ के अभाव में ये फ्लैट्स अब खंडहर बन चुके हैं. जिन परिवारों को ये अलॉट होने थे, वो आज भी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं.
आजतक ने इस मामले में बने हुए फ्लैट्स की पड़ताल की है. पड़ताल में पता चला कि फ्लैट्स के लिए आई टाइल्स, सैनिटरी फिटिंग, पानी टंकी और पाइप आदि खुले में पड़े हैं. इनका क्या होगा, पता नहीं. सारा सामान अब कबाड़ में बदल चुका है. डूडा (जिला शहरी विकास अभिकरण) के तहत वर्ष 2013 में इन फ्लैटों का निर्माण शुरू हुआ था. नीयत अच्छी थी कि बेघर लोगों को घर दिया जाएगा. उत्तर प्रदेश जल निगम ने बिल्डिंग का ढांचा भी खड़ा कर दिया, लेकिन सड़क, बिजली कनेक्शन, पानी की फिटिंग और अंतिम फिनिशिंग का काम अधूरा छोड़ दिया.
हैरान करने वाली बात ये है कि जहां करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, वहीं मात्र डेढ़ करोड़ रुपये का फंड जारी न होने के कारण पूरी योजना अधर में लटकी पड़ी है. शहरी विकास मंत्रालय और लोकल एडमिनिस्ट्रेशन के बीच को-ऑर्डिनेशन की कमी का खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्होंने 13 साल पहले खुद के घर का सपना देखा था. हैरानी की बात यह है कि जुलाई 2025 में कानपुर के जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने इस जगह का निरीक्षण किया था.
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पूरे दलबल और प्रशासनिक अमले के साथ वो पहुंचे थे. उन्होंने लोगों को भरोसा दिया था, जल्द इसका समाधान किया जाएगा. लेकिन डीएम साहब गए तो शायद बाकी अधिकारियों के कान से भी वो बात निकल गई. जमीनी हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं. डूडा के प्रोजेक्ट ऑफिसर का कहना है कि फंड के लिए बार-बार रिमाइंडर भेजे जा रहे हैं, लेकिन शासन स्तर से अभी तक मंजूरी नहीं मिली है.
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