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'तेजाब स्त्री-पुरुष में भेदभाव नहीं करता', HC ने एसिड अटैक के पीड़ित को दिलाया 15 लाख मुआवजा

Acid Attack की वजह से राहुल की पलकें जल गईं. दोनों कान जल गए और उनकी कार्टिलेज भी टूट गई. गर्दन, सीने और बाएं कंधे पर भी एसिड से काफी नुकसान हुआ. शरीर में 45 प्रतिशत की डिसेबिलिटी आ गई. आंखें भी पूरी तरह से देखने लायक नहीं रहीं.

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26 जून 2026 (अपडेटेड: 26 जून 2026, 01:24 PM IST)
jharkhand high court raises compensation for acid attack male victim flags gender gap
झारखंड हाई कोर्ट ने एसिड अटैक के मामले में फैसला सुनाया है (PHOTO- ecommitteesci.gov.in)
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'स्त्री हो या पुरुष, एसिड किसी के साथ भेदभाव नहीं करता'. ये कहना है झारखंड हाई कोर्ट का. हाई कोर्ट ने एक एसिड अटैक के मामले में पीड़ित को मिलने वाले मुआवजे पर बात करते हुए ये टिप्पणी की है. दरअसल पीड़ित को पहले 3 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था. लेकिन कोर्ट ने इस मुआवजे को बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दिया है. साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे की स्कीम में संशोधन करने को कहा है. कोर्ट का कहना है कि इससे ये सुनिश्चित किया जाएगा कि पीड़ित चाहे महिला हो या पुरुष, दोनों को बराबर माना जाएगा.

जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए इस बात पर जोर दिया कि एसिड से होने वाला नुकसान, दोनों को बराबर ही होता है. इसलिए जो मुआवजा दिया जाता है, वो ये देखकर तय नहीं होना चाहिए कि पीड़ित महिला है या पुरुष.

क्या है पूरा केस?

ये पूरा मामला साल 2012 का है. 31 मई, 2012 को रांची में राहुल कुमार पर एसिड अटैक हुआ. जब हमला हुआ, तब राहुल अपने घर पर बैठकर पढ़ाई कर रहा था. इसी बीच राहुल के चचेरे छोटे भाई से पड़ोस में रहने वाले बच्चे का विवाद हो गया. विवाद बच्चों के बीच था, लेकिन उसमें बड़े लोग भी कूद पड़े. राहुल भी वहीं खड़ा था, तभी पड़ोस की महिला घर के अंदर गई और एसिड की एक बोतल ले आई. उसने कथित तौर पर राहुल के चेहरे पर एसिड फेंक दिया.

इस अटैक की वजह से राहुल का चेहरा बुरी तरह प्रभावित हुआ, उनकी आंखों की पलकें जल गईं. दोनों कान जल गए और उनकी कार्टिलेज भी टूट गई. इसके अलावा राहुल की गर्दन, सीने और बाएं कंधे पर भी एसिड से काफी नुकसान हुआ. इसे ठीक करवाने के लिए राहुल को 14 बार प्लास्टिक सर्जरी करवानी पड़ी. कुल मिला कर राहुल के शरीर में 45 प्रतिशत की डिसेबिलिटी आ गई. उनकी आंखें भी पूरी तरह से देखने लायक नहीं रहीं. उपाय एक ही था, इलाज. इलाज में भी राहुल अब तक कुल 25 लाख रुपये लगा चुके हैं. लेकिन अब भी काफी इलाज होना बाकी है. जब ये अटैक हुआ, उस समय राहुल चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) की तैयारी में लगे थे. कोर्ट ने कहा,

‘रिट-पिटीशन दायर करने वाले के सारे सपने, इच्छाएं और टारगेट आरोपी द्वारा उठाए गए एक कदम की वजह से विफल हो गए.’

पहले 3 लाख मिले, बाद में पहुंचे हाई कोर्ट

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक राहुल कुमार को शुरू में जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण के जरिए 'झारखंड पीड़ित मुआवजा योजना, 2016' के तहत 3 लाख रुपये मिले. उन्होंने मुआवजा बढ़ाकर 25 लाख रुपये करने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो 2019 में एक जज ने उनकी अपील ठुकरा दी. जज का कहना था कि उन्हें तय रकम पहले ही मिल चुकी है. इसके बाद राहुल ने 1,374 दिन बाद इस पर अपील दायर की.

इसके लिए उन्होंने लंबे समय तक चले इलाज और अपनी आर्थिक तंगी का हवाला दिया. उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनके बुजुर्ग माता-पिता वकील का खर्च नहीं उठा सकते थे. उनकी यह अपील हाई कोर्ट कानूनी सेवा समिति के जरिए दायर की गई थी. बेंच ने देरी को माफ करते हुए कहा,

‘इस तरह के मामलों में अपील या अर्जी दायर करने में हुई देरी पर पूरी सहानुभूति के साथ विचार किया जाना चाहिए. जिंदगी भर के सदमे से गुजर रहे पीड़ित के लिए यह देरी कोई मायने नहीं रखती.’

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कोर्ट ने दिलवाया पूरा मुआवजा

2016 की स्कीम के तहत, एसिड अटैक के पुरुष पीड़ितों को कम से कम 3 लाख रुपये मिलते हैं और इसकी कोई अधिकतम सीमा नहीं है. वहीं 2019 का संशोधन बस महिला पीड़ितों पर लागू होता है. चेहरे खराब हो जाने पर कम से कम मुआवजा 7 लाख रुपये है, जो 8 लाख रुपये तक हो सकता है. इस बारे में टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा,

'2016 की स्कीम को आए हुए एक दशक हो चुका है और अब समय आ गया है कि इस स्कीम में अलग-अलग कैटेगरी के लिए तय मुआवजे की रकम में संशोधन पर विचार किया जाए, ताकि इसे 2019 की स्कीम के बराबर लाया जा सके. ऐसा खासकर पुरुष पीड़ितों के लिए जरूरी है ताकि इससे पैदा होने वाले भेदभाव को खत्म किया जा सके.

2016 की स्कीम को देखें तो कम से कम 3 लाख रुपये तय किए गए हैं, लेकिन पीड़ितों को मिलने वाली रकम की कोई अधिकतम सीमा नहीं है. कोर्ट ने कहा कि इसका मतलब है कि मामले की गंभीरता के आधार पर ज़्यादा रकम दी जा सकती है. हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि पीड़ित सिर्फ शारीरिक चोटों के लिए नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी जीने की क्षमता खोने के लिए भी मुआवजे के हकदार हैं.

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